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सामाजिक परिवर्तन के कारक | सामाजिक परिवर्तन का मुख्य कारक

सामाजिक परिवर्तन के कारक | सामाजिक परिवर्तन का मुख्य कारक

सामाजिक परिवर्तन के कारक

सामाजिक परिवर्तन के प्रौद्योगिक कारक

वर्तमान समय में सामाजिक परिवर्तन का प्रमुख कारक है। प्रौद्योगिक के कारण नये उद्योग खुलते हैं जिसमें नगरीकरण होता है। प्रौद्योगीकि ने हमारे समाज में महत्वपूर्ण परिवर्तन लाया है। प्रौद्योगिकी एक ऐसा व्यवस्थित ज्ञान होता है जिसके द्वारा यंत्रों एवं उपकरणों का प्रयोग संभव हो पाया है जैसे टाइपराइटर प्रोद्योगिकी नहीं है बल्कि आइप करने की कला को प्रौद्योगिकी कहा जाता है।

मार्क्स के अनुसार प्रौद्योगिकी मनुष्य की प्रकृति के साथ व्यवहार करने की वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा मनुष्य अपने जीवन का पालन करता हे एवं जिसके द्वारा वह अपने सामाजिक संबंधों के प्रकारों तथा उससे उत्पन्न मानसिक धारणाओं को व्यक्त करता है। इस तरह कहा जा सकता है कि प्रौद्योगिकी हमारे सामाजिक ढाँचे या संरचना में बहुत ही शीघ्र परिवर्तन लाती है। इसके कारण समाज गतिशील होता और कुछ ही वर्षों में संपूर्ण संरचना में परिवर्तन ला देता है। इसका प्रभाव समाज के हर दिशा पर पड़ता हैं समाज के संस्था, विचार, रूढ़ि जनरीति एवं सामाजिक संबंधों पर सीधा प्रभाव प्रौद्योगिकी का पड़ता है।

थार्सटीन वेब्लन ने अपने परिवर्तन संबंधी विचार में मनुष्य को अपनी आदतों द्वारा नियंत्रित माना है। मनुष्य की आदतें तथा मनोवृत्तियाँ उस कार्य तथा प्रविधि का प्रत्यक्ष फल है जिसके द्वारा वह अपनी जीविका कमाता है। मनुष्य जिस प्रकार का कार्य करता है, वही उसके जीवन के स्वरूप को निश्चित करता है और उसी के अनुसार उसकी आदतें बनती है। वेब्लन के अनुसार सिर्फ प्रौद्योगिकी ही सामाजिक परिवर्तन के लिए उत्तरदायी है। इसलिए वेब्लन को ‘प्रौद्योगिकी निर्धारणवाद’ का समर्थक माना जाता है। वेब्लन का कहना है कि ‘मनुष्य वही है जो कुछ करता है, जैसा वह कार्य करता है वैसा ही अनुभव और विचार भी करता है।’

आर्थिक कारक : सामाजिक परिवर्तन का मुख्य कारक

सामाजिक परिवर्तन के आर्थिक कारक

आर्थिक कारक (Economic Factors)- मार्क्स का कहना है कि समाज में परिवर्तन सिर्फ आर्थिक कारकों के द्वारा होता हैं उनका कहना है कि आर्थिक आधार पर समाज में दो वर्ग बनते रहे है जैसे कि वर्तमान समय में हमारे सामने दो वर्ग है-पहला, पूँजीपति वर्ग (बुर्जुआ वर्ग) तथा, दूसरा, मजदूर वर्ग (सर्वहारा)। मार्क्स का कहना है कि इन दोनों वर्गों के निर्माण का आधार सिर्फ आर्थिक हैं इन दोनों वर्गों में संघर्ष के फलस्वरूप ही समाज में परिवर्तन होता है। इसलिए मार्क्स के सामाजिक परिवर्तन संबंधी विचार को आर्थिक निर्धारणवाद कहा जाता है।

सामाजिक परिवर्तन के सांस्कृतिक कारण

सांस्कृतिक कारक (Cultural Factors)-सांस्कृतिक कारक भी सामाजिक परिवर्तन के लिए उत्तरदायी है। हमारे आदर्श, विश्वास, धर्म, प्रथाएँ, संस्थाएँ, रूढ़ियों आदि हमारे सांस्कृति जीवन की प्रतिविंब है। संस्कृति ही जनसंख्या, तकनीकी व उद्योग धंधों के प्रसार की दिशा निर्धारित करता है। ऑगबर्न के अनुसार, भौतिक व अभौतिक दोनों संस्कृतियों में परिवर्तन आने से सामाजिक परिवर्तन आता है जिसे वह सांस्कृतिक विलंबना (Cultural Lag) कहते है। भौतिक संस्कृति हमारी आदतों में परिवर्तन लाती है। वह अभौतिक संस्कृतिक व्यवहारों में। आदतें व व्यवहार दोनों सामाजिक परिवर्तन लाने के लिए पर्याप्त हैं। इसके अतिरिक्त धर्म सामाजिक परिवर्तन की दिशा निर्धारित करता है।

सामाजिक परिवर्तन के प्राकृतिक या भौगोलिक कारक

प्राकृतिक या भौगोलिक कारक (Naural or Geographical Factor) – अनेक बार प्रकृति समाज को परिवर्तन की प्रेरणा देता है। उदाहरण स्वरूप जब भूकंप आता है या बाढ़ आती है अथवा अनावृष्टि होती है, तब बहुत से परिवार उजड़ जाते हैं और उनके संबंधों का पता नहीं चलता। उनके संबंधों में बहुत बड़ा परिवर्तन आता है, लेकिन प्राकृतिक कारक समाज में केवल सहगामी कारकों के महत्व ही नहीं परिवर्तन लाते है अपितु असहगामी कारकों के द्वारा भी परिवर्तन लाते है। प्राकृतिक कारकों के महत्व को स्वीकार करते हुए हटिंग्टन ने कहा है कि जलवायु में परिवर्तन होने से सभ्यता एवं संस्कृति में परिवर्तन होते हैं। हटिंग्टन का कहना है कि सिर्फ भौगोलिक कारक ही सामाजिक परिवर्तन के लिए उत्तरदायी है। इसलिए हटिंग्टन के विचार में “भौगोलिक निर्धारणवाद’ सामाजिक परिवर्तन का महत्वपूर्ण कारक है।

जूलियन हकसले ने भी जलवायु और भूमि का संबंध सामाजिक परिवर्तन से जोड़ा है।

सामाजिक परिवर्तन के जनसंख्यातमक कारक

जनसंख्यात्मक कारक (Demographic Factor)- जनसंख्या का सामाजिक परिवर्तन में महत्वपूर्ण योगदान हैं इस विषय पर सर्वप्रथम चर्चा टी.आर. माल्थस ने 1798 ई. में अपने एक लेख (Essays on the principles of population) में किया है। माल्थस का कहना है कि किसी देश की जनसंख्या ज्यामितीय दर से अर्थात 1, 2, 4,8, 16,32……. जबकि खाद्यान्न उत्पादन अंकगणितीय दर से अर्थात् 1,2,3,4….बढ़ती है, इससे किसी भी देश की जनसंख्या 25 वर्षों में दुगुनी हो जाएगी।जनसंख्या के असंतुलित होने से समाज में भुखमरी, अशिक्षा, बेरोजगारी, गरीबी आदि समस्याएँ अधिक हो जाती है। वर्तमान समय में भारत में जनसंख्या विस्फोट का मुख्य कारण मृत्युदर में अधिकाधिक कमी है।

वैसे तो जनांकिकी (Demography) एक पृथक विज्ञान है लेकिन इसके द्वारा समाज प्रभावित होता है इसलिए इसका भी अध्ययन समाजशास्त्र के एक शाखा के रूप में किया जाता है जब किसी समाज में जनसंख्या अधिक होती है तो संघर्ष बढ़ता हैं इसके विपरीत, जन्मदर घट जाती है और मृत्यु दर बढ़ जाती है जिसके फलस्वरूप देश की जनसंख्या घटती चली जाती है जिससे समाज में कार्यशील व्यक्तियों की कमी हो जाती है और उपलब्ध प्राकृतिक साधनों का समुचित प्रयोग नहीं हो पाता। उससे उस समाज की आर्थिक दशा गिरती जाती है। फलस्वरूप परिवार छोटे होते चले जाते है, जिसका अंतिम परिणाम सामाजिक व परिवारिक संबंधों में परिवर्तन के रूप में होता है।

हर समाज में जनसंख्या कभी घटती है तो कभी बढ़ती हैं। कभी एक समान नहीं रहती। जनसंख्या की वृद्धि एवं ह्रस हमारे समाज के आर्थिक एवं सामाजिक जीवन को प्रभावित करता है। जैसे हमारे देश (भारत) में जनसंख्या की वृद्धि समाज की गरीबी का कारण है अतः यहाँ जनसंख्या वृद्धि रोकने की चिंता है जबकि दूसरे देश में जनसंख्या की कमी से समस्याएँ उत्पन्न हो रही है जैसे-रूस और जर्मनी में। यहाँ गर्भपात कानूनी अपराध माना जाता है। जनसंख्या का एक प्रभाव नगरीकरण पर भी पड़ता है, जिस पर नगर में जितनी आबादी रहती है, वहाँ की सामाजिक एवं आर्थिक व्यवस्था उतनी ही प्रभावित होती है। इस प्रकार बड़े-बड़े शहरों के निर्माण में जनसंख्या ही प्रधान कारण है।

सामाजिक परिवर्तन के वैचारिक कारण

वैचारिक कारक (Ideological Factor)- विचार एवं विचार-धाराएँ भी सामाजिक परिवर्तन लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। किसी समस्या के हल के लिए समाजशास्त्री नवीन विचार प्रस्तुत करते है। मार्क्स ने यह विचार दिया था कि सांस्कृतिक पिरामिड के मूल्य में आर्थिक कारक ही हैं तथा सामाजिक एव राजनीतिक संगठन, कला, साहित्य, विज्ञान, दर्शन, धर्म, सभी ऊपरी संरचनाएँ इस पिरामिड की मूली संरचना पर ही निर्भर है। मैक्सवेबर ने भी आर्थिक कारकों को स्वीकार किया किन्तु उन्हें अधिक महत्व नहीं दिया। वे सामाजिक परिवर्तन के लिए धर्म को अधिक महत्व देते हैं। मार्क्स व बेवर के विचार परस्पर विरोधी है। मार्क्स के विचारों से ही प्रभावित होकर आज विश्व दो खेमों में बँटा हुआ है एक तरफ पूँजीवादी राष्ट्र है तो दूसरी तरफ समाजवादी राष्ट्र। वैचारिक परिवर्तन प्रथाओं, रीति-रिवाजों, संस्थाओं एवं कानून में भी परिवर्तन लाता है। एक विचारधारा को मानने वाले राजनीतिक दल के स्थान पर जब दूसरी विचारधारा को मानने वाला राजनीतिक दल सरकार बनाता है तो समाज में कई नये परिवर्तन दृष्टिगोचर होते हैं।

सामाजिक परिवर्तन के मनोवैज्ञानिक कारक

मनोवैज्ञानिक कारक (Psychological Factors)-  की प्रगति के साथ ही सामाजिक परिवर्तन में मनोवैज्ञानिक कारकों का महत्व बढ़ता जा रहा है। परिवर्तन मनुष्य की प्रकृति में निहित है। मनोवैज्ञानिकों ने मनुष्य की प्रकृति को निराशा की मूल प्रकृति कहकर पुकारा है। उनका कहना है कि मनुष्य उसी प्रवृत्ति के कारण नई-नई खोज करता है और सामाजिक परिवर्तन को प्रोत्साहन मिलता है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि सामाजिक परिवर्तन का मूल आधार मनोवैज्ञानिक कारक है।

सामाजिक परिवर्तन के प्राणिशास्त्री कारक

प्राणिशास्त्रीय कारक (Biological Factors)- प्राणिशास्त्रीय कारक जनसंख्या के प्रकार को निश्चित करते हैं अर्थात व्यक्तियों का कया स्वास्थ्य स्तर होगा यह प्राणिशास्त्रीय कारकों द्वारा निश्चित होगां जैविकीय कारकों के कारण जिस देश में औसत आयु कम हो जाती है, वहाँ विधवा विवाह के रूप में सामाजिक परिवर्तन आने की संभावना रहती है तथा समाज में स्त्री की प्रस्थिति व बच्चों का सामाजीकरण प्रभावित होता है।

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Pankaja Singh

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