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सामाजिक परिवर्तन की प्रौद्योगिकीय | सामाजिक परिवर्तन का चक्रीय सिद्धान्त | सामाजिक परिवर्तन का रेखीय सिद्धान्त | कार्ल मार्क्स रेखीय सिद्धान्त | टॉयनवी का चक्रीय सिद्धान्त

सामाजिक परिवर्तन की प्रौद्योगिकीय | सामाजिक परिवर्तन का चक्रीय सिद्धान्त | सामाजिक परिवर्तन का रेखीय सिद्धान्त | कार्ल मार्क्स रेखीय सिद्धान्त | टॉयनवी का चक्रीय सिद्धान्त

सामाजिक परिवर्तन की प्रौद्योगिकीय

सामाजिक परिवर्तन की प्रौद्योगिकीय एवं आर्थिक व्याख्या

मार्क्स के अनुसार उत्पादन की पद्धति या प्रौद्योगिकी में परिवर्तन से उत्पादन की भौतिक शक्तियों में परिवर्तन आता है। उत्पादन की भौतिक शक्ति के परिवर्तन से उत्पादन के सम्बन्धों, जिन्हें मार्क्स आर्थिक सम्बन्ध कहता है और जिनसे मिलकर समाज का आर्थिक ढाँचा बनता है, में परिवर्तन आता है। अन्त में समाज के आर्थिक ढाँचे या उत्पादन के आर्थिक सम्बन्धों में परिवर्तन होने पर सम्पूर्ण समाज के राजनैतिक, धार्मिक तथा नैतिक आदि ढाँचों में तीव्र अथवा धीमी गति से परिवर्तन हो जाता है। मार्क्स के सामाजिक परिवर्तन की इस प्रौद्योगिकीय व्याख्या को परिवर्तन की प्रौद्योगिकीय आर्थिक व्याख्या कहा जा सकता है।

सामाजिक परिवर्तन का चक्रीय सिद्धान्त

अथावा

सामाजिक परिवर्तन के चक्रीय सिद्धान्त का आलोचनात्मक मूल्यांकन

चक्रीय सिद्धान्त – सामाजिक परिवर्तन का चक्रीय सिद्धान्त प्रकृति और मानव समाज के परिवर्तनों में एक क्रम बनाता है। जैसे दिन के बाद रात और रात के बाद दिन आते हैं, जैसे गर्मी के बाद बरसात और बरसात के बाद जाड़े की ऋतु आती है उसी तरह मानव समाज संस्कृतियाँ कुछ निश्चित दशाओं से गुजरती है। केवल समाज और संस्कृति के क्षेत्र में ही नहीं बल्कि परिवर्तन के चक्रिक सिद्धान्त को राजनीति, कला तथा अन्य क्षेत्रों में भी लागू किया जाता है। उदाहरण के लिये कला के क्षेत्र में यह दिखाने की कोशिश की गई है कि प्रायः परम्परावाद से रोमांचवाद की ओर, रोमांचवाद से फिर परम्परावाद की ओर परिवर्तन होता देखा जा सकता है। प्रसिद्ध जर्मन दार्शनिक हीगल (Hegal) ने मानव इतिहास में कुछ निश्चित अवस्थायें मानी है। हीगल के अनुसार मानव इतिहास के हर क्षेत्र में प्रत्येक वाद के बाद प्रतिवाद होता है और प्रतिवाद के बाद संवाद होता है। यह संवाद पुनः एक वाद के रूप में प्रतिवाद को जन्म देता है। इस प्रकार वाद, प्रतिवाद और संवाद की अवस्थायें मानव इतिहास के सभी क्षेत्रों में देखी जा सकती है। हीगल ने धर्म, कला, संस्कृति, साहित्य, तथा मानव जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी परिवर्तन की इन्हीं तीनों अवस्थाओं से गुजरते हुये दिखाने की चेष्टा की है।

यूँ तो चक्रिय सिद्धान्त में कुछ सत्य है परन्तु इसके अपवाद कम नहीं है। सामाजिक परिवर्तन की चक्रिक व्याख्या परिवर्तन का केवल एक पहलू है। परिवर्तन के दूसरे पहलू में पुनरावृत्ति नहीं दिखाई पड़ती है। परेटो के शब्दों में, ‘जितना यह सत्य है कि इतिहास में पुनरावृत्ति होती है उतना ही यह भी सत्य है कि इतिहास में पुनरावृत्ति नहीं होती।’ वास्तव में जिन घटनाओं को हम पुनरावृत्ति मानते हैं उनमें कुछ समानता होते हुए भी काफी अन्तर दिखाई पड़ेंगे। कुछ ऐतिहासिक घटनायें पहली घटनाओं जैसे हो सकती हैं परन्तु कुछ बिल्कुल नई होती है। सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों के भिन्न-भिन्न देशकाल में भिन्न-भिन्न कारक काम करते रहते हैं। अतः यह तो नहीं हो सकता है कि दो भिन्न कालों में या दो भिन्न समाजों में एक-सी परिस्थितियां एकत्रित हो जायें।

सामाजिक परिवर्तन का रेखीय सिद्धान्त

अथवा

कार्ल मार्क्स रेखीय सिद्धान्त

कार्ल मार्क्स (Karl Marx)- इनका नाम रैखिक सिद्धान्त के प्रतिपादकों में मुख्य रूप से लिया जाता है। इनमें सामाजिक परिवर्तन के सिद्धान्त में तकनीकि का विकास एवं सामाजिक वर्गों में परस्पर सम्बन्धों को अत्यधिक महत्व दिया गया है। व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये प्रकृति एवं अन्य मनुष्यों पर आश्रित है। प्रकृति पर नियन्त्रण के प्रयास में व्यक्ति अपने भौतिक जीवन का विकास करते हैं। उत्पादन के साधनों के समरूप समाज में विशेष प्रकार का संगठन विकसित होता है। उत्पादन के साधनों पर भी सभी व्यक्तियों का एक समान अधिकार नहीं होता। आर्थिक-सामाजिक असमानतायें आदिम साम्यवाद को छोड़कर प्रत्येक समाज में पायी जाती है। तकनीकी के विकास में श्रम विभाजन एवं विशेषीकरण बढ़ता है। इससे भी समाज में असमानतायें बढ़ती हैं। इस प्रकार भिन्न वर्ग विकसित होते हैं तथा उसमें परिणामस्वरूप सामाजिक परिवर्तन होते है। मार्क्स के शब्दों में, “आज तक अस्तित्व में जो समाज हैं, उनका इहिास वर्ग संघर्ष का इतिहास है।” अतः मार्क्स ने सामाजिक परिवर्तन का प्रमुख कारण वर्ग संघर्ष माना गया है।

कार्ल मार्क्स ने आर्थिक आधारों पर सामाजिक परिवर्तन की व्याख्या दी है। प्रौद्योगिकी में परिवर्तन उत्पादन के साधनों में परिवर्तन करता है। जिससे समाज की आर्थिक संरचना बदलती है और आर्थिक संरचना में परिवर्तन के परिणामस्वरूप समाज की अन्य व्यवस्थायें जैसे वैज्ञानिक, सामाजिक, विचारवादी एवं राजनीतिक तथा आध्यात्मिक परिवर्तन भी होते हैं।

उत्पादन के साधनों के समरूप व्यक्तियों में आर्थिक सम्बध विकसित होता है, तथा न आर्थिक सम्बन्धो के आधार पर समाज की आर्थिक संरचना का विकास होता है, जिसे मार्क्स प्रसंरचना (Infrastructre) कहते हैं। उत्पादन के साधनों में परिवर्तन तकनीकी विकास के कारण होता रहता है और इससे प्रसंरचना प्रभावित होती है। आर्थिक संरचना अथवा प्रसंरचना में परिवर्तन बाकी अधिसंरचनाओं (Superstructure), जैसे वैधानिक, धार्मिक, राजनीतिक तथा ललित कला से सम्बन्धित इत्यादि में परिवर्तन होते हैं। व्यक्ति की चेतना व्यक्ति के सामाजिक अस्तित्व को निर्धारित नहीं करती अपितु व्यक्तियों का सामाजिक अस्तित्व उसकी चेतना को निर्धारित करता है।

मार्क्स का समाज का वर्गीकरण भी उसके सामाजिक परिवर्तन के रैखिक सिद्धान्तों के विचारों का समर्थन करता है। इन्होंने समाज विकास की पाँच अवस्थायें बताई हैं-

(अ) आदिम समाज (Primitive Society)

(ब) एशियाई समाज (Asiatic Society)

(स) प्राचीन समाज (Ancient Society)

(द) सामन्तवादी समाज (Feudal Society)

(य) पूँजीवादी समाज (Capitalistic Society)

मार्क्स के सिद्धान्त की अनेक विद्वानों ने कड़ी आलोचना की है। उनका कहना है कि मार्क्स ने आर्थिक संरचना को सामाजिक परिवर्तन का प्रमुख कारण माना है, जो कि उचित नहीं है क्योंकि अनेक कारणों से स्वयं आर्थिक संरचना भी प्रभावित होती रहती है। मार्क्स अपने सिद्धान्तों के साथ ही यह भी नहीं बताते कि स्वयं प्रौद्योगिकी तथा उत्पादन के साधनों में परिवर्तन कैसे होता है। इन्होंने आर्थिक सम्बन्ध, आर्थिक शक्ति एवं आर्थिक संरचना जैसे शब्दों का प्रयोग तो किया, परन्तु इन्हें अधिक स्पष्ट नहीं कर पायें इन आलोचनाओं के बावजूद मार्क्स का सामाजिक परिवर्तन का सिद्धान्त एक प्रमुख सिद्धान्त माना जाता है।

टॉयनवी का चक्रीय सिद्धान्त

टायनबी का सिद्धान्त (Theory of Toynobee)- टायनबी ने भी चक्रीय सिद्धान्त के पक्ष में ही मत व्यक्त किया है किन्तु आपके विचार अन्य विद्वानों से पर्याप्त मात्रा में भिन्न है। अपने चुनौती (Challenge) और प्रति उत्तर (Response) दो तत्वों के आधार पर सामाजिक परिवर्तन को समझने का प्रयास किया है। सम्पूर्ण सामाजिक परिवर्तन व्यक्ति को मिलने वाली चुनौतियों (Challenges) और उनके द्वारा दिये गये प्रतिउत्तरों (Responses) में छिपा हुआ है। व्यक्ति को एक ओर प्रकृति से विभिन्न प्रकार की चुनौतियाँ मिला करती हैं तथा इन चुनौतियों के साथ व्यक्ति अपना सामंजस्य स्थापित करने के लिये अपने जीवन में विभिन्न प्रकार के परिवर्तन कर अभियोजन (Adjustment) स्थापित करके प्रतिउत्तर देता है। इसी प्रकार सामाजिक चुनौतियाँ भी व्यकित को प्रतिउत्तर के लिये मजबूर करती हैं। जब तक काई समाज इन चुनौतियों को पूरा किया करता है उसका अस्तित्व कायम रहता है किन्तु जैसे-जैसे सांस्कृतिक प्रतिमान शिथिल होते जाते हैं समाज पतन की ओर बढ़ता है। संक्षेप में यही मानव समाज के उत्थान और पतन की कहानी है जिसे आप चुनौती एवं प्रतिउत्तर के रूप में स्पष्ट करते हैं।

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Pankaja Singh

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