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मोपला कृषक आन्दोलन | बारदोली सत्याग्रह | दकन का विद्रोह | कृषक विद्रोह

मोपला कृषक आन्दोलन | बारदोली सत्याग्रह | दकन का विद्रोह | कृषक विद्रोह

मोपला कृषक आन्दोलन

‘मोपला’ दक्षिण मालाबार (केरल) के मुस्लिम बराईदार या कनमदार और खेतिहर मज़दूर या वेरमपट्टमदार थे। क्षेत्रिय जमींदार को अधिकांश हिंदू थे। शोषण के तरह-तरह के उपाय अपनाये थे। जैसे भूमिकर बढ़ा देना, मालगुजारी की नयी दर तय कर देना, किसी प्रकार की सुरक्षा को गारंटी न देना आदि।

मोपलाओं के बग़ावत का पुराना इतिहास रहा है। उनका वर्ग संघर्ष आम तौर पर सांप्रदायिक संघर्ष में बदला जाता और तभी जा कर थमता था। “ख़िलापत” के मुद्दे ने मोपालाओं समेत भारत के सभी मुसलमानों को एक मंच पर जमा कर दिया। याकूब हसन, यू गोपाल मेनन, जी, मुईनुद्दीन कोया और के. माधवन के सफल नेतृत्व में मोपला आंदोलन ने शोषक वर्ग उपनिवेशवादी राज के खिलाफ एक साथ आंदोलन छेड़ दिया और जब वे हिंसक हो उठे तो उन्होंने पुलिसकर्मियों पर हमला कर दिया, सरकारी कार्यालयों को तहस-नहस कर डाला, वहां के रिकार्डों को जला डाला और सरकारी खज़ानों को लूट लिया।

उस समय वे और भी हिंसक को उठे जब उन्हें यह सूचना मिली कि उनके राजनीतिक एवं अध्यात्मिक नेता अली मुसलिम के गिफ्तार होने ममनाथ मस्जिद को ब्रिटिश सेना द्वारा ध्वस्त करने की सूचना मिली। हालांकि यह सूचना बाद में गलत साबित हुई।

लेकिन जब वे शोषण वर्ग जो कि अधिकांश हिंदू जमींदार थे, पर हमले कर रहे थे, उस समय मोपलाओं ने इस बात का ख़ास ख्याल रखा कि आम हिंदुओं से कोई छेड़-छाड़ न करे, न उनकी संपत्तियों को लूटा जाए। यहाँ तक कि मोपलाओं ने कुछ हम्माद को इस के लिए दण्डित भी किया जिसने आम हिंदुओं पर हमला किया था। लेकिन मार्शल लॉ लागू किए जाने के पश्चात् वे अधिक सांप्रदायिक एवं हिंसक हो उठे।

इस मौके पर कांग्रेस ने अपने आपको आपको ‘मोपला’ आंदोलन से अलग कर लिया। इसका एक कारण तो यह था कि कांग्रेस में जमींदार भी शामिल थे और दूसरी और सबसे बड़ी वजह यह थी कि वे अधिक सांप्रदायिक हो गये थे। सरकार ने इस अवसर का लाभ उठाया और आंदोलन को दबाने में सफल रहे।

बारदोली सत्याग्रह

बारदोली गुजरात से सूरत जिला का एक तालुका था। असहयोग आंदोलन (1920-22) के समय से ही यहाँ गांधीवाद का बहुत अधिक प्रभाव था। गांधीवादी योजनाएं सृजनात्मक और मानवतावादी होती थीं और आम लोगों को बहुत आकर्षित करती थीं। बरदौली के 50 प्रतिशत से अधिक लोग ‘दुबला ट्राइव’ के गरीब मज़दूर थे, जिन्हें कालीप्रजा (यानी काले लोग) भी कहा जाता था। आम तौर पर इनका गुज़र-बसर कर्जो पर चलता था। ये अत्यधिक पिछड़े लोग थे।भू-राजस्व में 22 प्रतिशत की वृद्धि ने उनकी कमर तोड़ कर रख दी। ‘कलिपराज को गांधीवादियों ने एक सम्मानित नाम ‘रानीपराज’ दिया, जिस का अर्थ होता है “जंगल के वासी”। लेकिन इससे उसके वास्तविक समस्या का कोई समाधान नहीं निकला। वे अत्यधिक गरीबी अवस्था में रहने पर मजबूर थे। वे अपने खेतों का भू-राजस्व देने में असमर्थ थे। जूट, गल्ले, और रूई के मूल्यों में गिरावट ने उनकी स्थिति को और ख़राब कर दिया था।

इस स्थिति से उभारने के लिए उन लोगों एक गांधीवादी वकील सरदार पटेल को अपने आंदोलन को आगे बढ़ाने केलिए चुना। सरदार पटेल ने तालुका को 13 कैंपों में विभाजित किया और प्रमुख नेताओं को उन किसानों में चेतना लगाने की ज़िम्मेदारी सौपी। वे नेता वास्तव में सत्याग्रही थे, जिन्होंने अपनी सभाओं, पंफलेटों, और घर-घर जाकर प्रचार के माध्यम से किसानों में एक नयी चेतना जगायी। किसानों ने अपने-अपने ईश्वर की क़सम खायी कि वे माल गुजारी अदा नहीं करेंगे। जो किसान अपने भूमिकर अदा करेंगे उनका बहिष्कार किया जायेगा। उन्होंने ‘सत्याग्रह पत्रिका’ प्रकाशन भी शुरू किया, जिसमें उनके नेताओं के भाषण और आंदोलन से जुड़ी खबरें प्रकाशित होती थीं।

वे महिलाएं जो अन्य गांधीवादी सत्याग्रहों में सम्मिलित हुआ करती थीं, वे बरदौली सत्याग्रह में भी भाग लेने लगीं। शारदाबेन, पारस मिथूबेन, शारदा मेहता और मणिबेन पटेल (सरदार पटेल की पुत्री) बारदौली सत्याग्रह की महत्वपूर्ण महिलाएं थी। बरदौली की महिलाएं ही थीं जिन्होंने बल्लभ भाई पोल को ‘सरदार’ की उपाधि प्रदान की थी। अगस्त, 1928 में गांधी जी बारदौली पहुंचे और सरकार ने पटेल को गिरफ्तार न करने की चेतावनी दी। गांधी जी की इस चेतावनी से सरकार दबाव बना और उसने एक राजस्व अधिकारी मैक्सवेल को वस्तुस्थिति का पता लगाने के लिए भेजा। उस अधिकारी ने भी भू-राजस्व दर को बढ़ाये जाने का विरोध किया और अन्ततः भू-राजस्व की दर घटा दी गयी।

दूसरी जगहों के किसान मज़दूर भी आपस में संगठित होने लगे और उन्होंने भी अपनी- अपनी संस्थाएं (या सभा) बनायीं। ‘बिहार किसान सभा’ और ‘आंध्र रैय्यत एसोसिएशन’ आदि की स्थापना हुई। 1936 में लखनऊ में विभिन्न राज्यों के किसान-मजदूरों के नेता एकत्रित । हुए और “अखिल भारतीय किसान सभा’ की स्थापना हुई। स्वामी सहजानंद सरस्वती को इसका अध्यक्ष बनाया गया और एन.सी. रंगा इसके पहले सचिव बने। सभा ने निम्नलिखित प्रस्ताव पारित किया।

  1. जमीदारी प्रथा समाप्त की जाए।
  2. मालगुजारी व्यवस्था लागू की जाए।

पाबना के किसानों ने हिंदू-मुस्लिम एकता का परिचय देकर अधिक परिपक्वता का प्रदर्शन किया। हालांकि कुछ जमींदारों ने इसे सांपादयिक रंग देने की कोशिश की और यह स्वर बुलंद किया कि मुस्लिम किसानों ने हिंदू जमींदारों के खिलाफ बगावत पर उतारू हैं। पाबना विद्रोह पूरी तरह से एक वर्ग संघर्ष था। इशान चौधरी, शंभू पाल, और खूदी मुल्ला आदि पाबना आंदोलन के प्रमुख नेता थे। बंगाल का बुद्धिजीवी वर्ग, जिनमें अधिकांश हिंदू थे, जैसे एस.एन. बनर्जी, आनन्द मोहन बोस, द्वारकानाथ गांगुली ने पाबना में हज़ारों किसानों की सभा को संबोधित किया और कर अधिनियम का साथ दिया। इंडियन एसोसियशन और कुछ राष्ट्रवादी समाचार पत्रों ने मांग की कि रेंट को स्थाई तौर पर निर्धारित कर दिया जाए और खेतों का मालिकाना अधिकार किसानों को दिया जाए।

दकन का विद्रोह

सन् 1875 ई. में महाजनों के विरुद्ध पूना और अहमदनगर में बहुत ही बड़ा दंगा भड़क उठा। इस दंगे को दकन का दंगा (Deccan Riots) कहा जाता है क्योंकि इसने दकन का इलाका जो पश्चिमी/मध्य भारत के ऊपरी हिस्से में फैला हुआ था, बुरी तरह प्रभावित किया।

जिस क्षेत्र में रय्यतवारी व्यवस्था लागू थी, वहां किसानों को मालगुजारी तथा अन्य टैक्सों की ऊंची दर होने के कारण इस का करना बहुत मुश्किल था। इसीलिए वहां के किसान महाजनों के, जो अधिकार मारवाड़ी या गुजराती थे, के चंगुल में फंस गयें नया कानून पूरी तरह से महाजनों के हक में था। ये लोग किसानों की अचल संपत्तियों जैसे खेत खलिहान आदि को अपनी कर्ज़ की वसूली के लिए बेच दिया करते थे। इस तरह सारी ज़मीन किसानों से महाजनों के पास पहुंच गयी थी।

दकन के किसान तुलनात्मक रूप से अधिक सम्पन्न थे। क्योंकि वहां जूट की खेती होती थी और 1861-64 तक चलने वाले अमेरिकी गृहयुद्ध में उन्होंने अच्छा लाभ कमाया था। अमेरिका यूरोपीय बाज़ार में कपास की मांग की भरपाई नहीं कर पाया था जिसका सीधा लाभ दकन के किसानों को मिला था।लेकिन 1864 ई. में ज्यों ही अमेरिका में सीविल बार समाप्त हुई, भारतीय किसानों के कपास निर्यात में कमी आ गयी। इतना ही पर बस नहीं हुआ। सरकार ने जमीन का राजस्व भारत लगभग 50 प्रतिशत बढ़ा दिया। प्राकृति ने भी किसानों का साथ नहीं दिया और खेती चौपट हो गयी। किसानों को महाजनों से पैसे कर्ज लेने पड़े। ताकि जमीन का भू-राजस्व अदा कर सके। इस तरह महाजनों ने एक बार फिर उन किसानों और उनकी जमीनों पर अपनी पकड़ मज़बूत बना ली।

इस आंदोलन की शुरुआत उस समय हुई जबकि काल्मू नाम के एक क्षेत्रीय महाजन ने दिसंबर, 1874 ई. में सिरुर तालुका के करदाह गांव में एक किसान का मकान ढहा दिया। किसानों ने इस घटना से प्रभावित होकर महाजनों और बाहर वालों का बहिष्कार शुरू कर दिया। उन्होंने महाजनों के ज़मीन को जोतने से इंकार कर दियां अन्य मज़दूरों और दूसरे पेशे में लगे लोगों, जैसे-बढ़ई, धोबी, हज़ाम लोहार और मोची आदि ने भी इस आंदोलन में साथ दिया। वे लोग जो महाजनों की मदद किया करते थे, उन्होंने भी उनका बहिष्कार शुरू कर दिया। यह सामाजिक बहिष्कार जल्द ही पूना,अहमदनगर, शोलापुर और सतारा ज़िले तक फैल गया।

जब बहिष्कार का भी कोई विशेष परिणाम न निकला तो किसानों ने अपने संघर्ष के तरीके में कुछ बदलाव का फैसला किया। मध्य मई, 1875 में वे भीमपुरी तालुक के सूपा नामक स्थान पर महाजनों की दुकानों और मकानों पर टूट पड़े। उन्होंने जमीन के खातों और अन्य कागज़ों को उनसे छीन लिया और सार्वजनिक स्थानों पर ले जाकर उन्हें जला डाला। यह दंगा जल्द ही पूना और अहमदनगर के अन्य गांवों में भी फैल गया। सूपा में तो यह दंगा हिंसक हो उठा लेकिन अन्य स्थानों पर यह केवल खातों और बाड़ों को जलाने तक ही सीमित रहा। क्योंकि उन्हें ऐसा आभास होता था कि ये खतिहान ही उनके शोषण की मुख्य वजह हैं

यह आंदोलन लगभग दो महीनों तक चला। हालांकि प्रारंभ में जैसा उत्साह था वैसा आंदोलन के अंतिम दिनों तक क़ायम नहीं रह सका। यह पूरा आंदोलन महाजनों के विरुद्ध था लेकिन इसे किसी भी दृष्टि से अंग्रेजों के विरुद्ध नहीं कहा जा सकता था। कुछ दृष्टिकोण से तो यह ब्रिटिन सरकार के हित में ही जाता था। इसलिए सरकार ने इस आंदोलन को गंभीरता से लिया। किसानों की समस्याओं को समझा और 1879 ई. में दकन कृषि राहत अधिनियम (Deccan Agricultural Relif Act 1879) पारित हुआ। इस अधिनियम से उन्हें कुछ राहत मिली और जमीन के स्थानान्तरण को नियंत्रि किया गया। स्थानांतरण पर रोक फिर भी नहीं लग सकी।

कृषक

अथवा

कृषक विद्रोह

हम देख चुके हैं कि उपनिवेशवादी राज में भारत में कृषि उत्पादन पर बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ा। जमींदारी व्यवस्था में खेतिहर मज़दूरों को जमींदारों की दया पर छोड़ दिया गया। जमींदारों ने उनसे भारी कर वसूल किया और उन्हें अनुचित ढंग से भुगतान करने पर मजबूर किया। रैयतवारी व्यवस्था ने सरकार ने स्वयं ही भारी राजस्व वसूल करना शुरू किया। इस तरह खेतिहर मज़दूर महाजनों से रुपये कर्ज़ लेने को मजबूर हो गये। इसका परिणाम यह हुआ कि जो लोग पहले खेतों के मालिक थे, वे या तो अपने ही खेत को बुराई करने लगे या फिर मजबूरी में खेतिहर मजदूर बन गये। जमीनों के मालिक, महाजन, अमीर किसान और व्यापारी के तो मज़े ही मज़े थे जबकि मज़दूरों उनके खेतों और उनके मवेशियों की स्थिति दयनीय होती गयी।

मज़दूरों की ओर से उनके खिलाफ़ संघर्ष स्वाभाविक भी था और उचित भी कयोंकि उनका हर तरह से शोषण हो रहा था। उन्होंने उन लोगों को सबसे पहले निशाना बनाना शुरू किया जो प्रत्यक्ष रूप से उनका शोषण कर रहे थे। यानी उनके आक्रोश का निशाना सबसे पहले जमींदार और महाजन बने। कैथलीन गौफ़ (Kathleen Gough) ने मजदूरों के द्वारा किये जाने वाले 77 संघर्षों का उल्लेख किया है। उन्होंने इन संघर्षों को पांच समूहों में बांटा है:

  1. बलवर्धक
  2. धार्मिक
  3. सामाजिक
  4. प्रतिशोधात्मक
  5. सशस्त्र आंदोलन

हालांकि 1857 के संघर्ष के पश्चात् मज़दूरों को पूरी तरह से काबू में कर लिया गया। इसके कारण ये थे:

  1. राजकुमारों एवं जमीदारों से ब्रिटिश सरकार के संबंध काफी मजबूत हो गयें
  2. सेना और नागरिक प्रशासन के मध्य सूचना के आदान-प्रदान की प्रक्रिया शुरू हो गई और सेना को पुनर्गठित किया गया।

अट्ठारह सौ पचास के बाद खेतिहर मजदूरों का संघर्ष एक नए दौर पर प्रवेश कर गया क्योंकि पूरे समाज में शोषण के विरुद्ध एक विशेष प्रकार की बेचैनी महसूस की जाने लगी। इस संघर्ष का विस्तार से अध्ययन करने के पश्चात हम कुछ निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं।

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