शिक्षाशास्त्र

जॉन डीवी का जीवन-वृत्त और रचनाएँ | डीवी के दार्शनिक विचार | जॉन डीवी के दर्शन की प्रमुख विशेषताएँ

जॉन डीवी का जीवन-वृत्त और रचनाएँ | डीवी के दार्शनिक विचार | जॉन डीवी के दर्शन की प्रमुख विशेषताएँ | Biography and Works of John Dewey in Hindi | Philosophical Thoughts of Dewey in Hindi | Salient Features of John Dewey’s Philosophy in Hindi

जॉन डीवी का जीवन-वृत्त और रचनाएँ

अमेरिका के प्रयोजनवादी दार्शनिक और शिक्षाशास्त्री डॉ० जॉन डीवी का जन्म न्यू इंग्लैन्ड स्थित वरमॉण्ट नामक स्थान में सन् 1859 ई० को हुआ था। उसके पिता ऑर्च वाल्ड डीवी एक व्यापारी थे। प्रारंभिक शिक्षा समाप्त करके डोवी ने वरमॉण्ट विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया और 20 वर्ष की अवस्था में सन् 1879 ई० में वहाँ से बी० ए० की डिग्री प्राप्त किया। कुछ दिनों के बाद ‘जॉन हॉपकिन्स विश्वविद्यालय से काण्ट के दर्शन पर पी-एच० डी० की उपाधि से विभूषित हुए। इस अवधि में वह स्टेनली हॉल, हर्बर्ट बी० एडम्स, जार्ज मोरिस और चार्ल्स पीयर्स आदि विद्वानों के सम्पर्क में आये और मनोविज्ञान, राजनीति, इतिहास और दर्शनशास्त्र का ज्ञान प्राप्त किया।

डीवी ने अपना जीवन अध्यापन कार्य से प्रारम्भ किया। सर्वप्रथम वह मिशीगन विश्वविद्यालय में लेक्चरर बने और 1893 तक कार्य किया। 1894 ई० में शिकागो, विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र विभाग के अध्यक्ष का पद स्वीकार किया और सन् 1902 ई० तक इस पद पर कार्य किया। शिकागो में दर्शनशास्त्र के साथ शिक्षाशास्त्र का भी अध्यापन- कार्य किया और तभी से उनकी रुचि शिक्षा में हो गई। सन् 1903 ई० में ये शिक्षा-विभाग के डाइरेक्टर बने। इसके पश्चात् वह सन् 1904 ई० में कोलम्बिया विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर बने और सन् 1930 ई० तक इस पद पर बने रहे। यहाँ पर उन्होंने शिक्षासंबंधी अनेक प्रयोग किये और शिक्षा के अनेक दार्शनिक सिद्धान्तों की व्याख्या की। सन् 1930 ई० से 1932 ई० तक डीवी कई सामाजिक, शैक्षिक तथा मनोवैज्ञानिक संस्थाओं के सभापति रहे।  अब तक उन्हें शिक्षा और दर्शन के क्षेत्र में काफी ख्याति प्राप्त हुई और देश-विदेश में काफी सम्मान मिला। सन् 1931 ई० में टर्की सरकार ने अपने विद्यालयों के पुनर्संगठन की रूपरेखा तैयार करने के लिए उनको अपने यहाँ आमंत्रित किया। इसके बाद डीवी ने चीन, रूस और टर्की आदि देशों का भ्रमण किया और अपने विचारों को फैलाया। इनके विचारों से प्रभावित होकर उन्हीं के अनुसार इन देशों ने अपनी-अपनी शिक्षा-व्यवस्था में अनेक सुधार भी किये। यह महान् दार्शनिक और शिक्षाशास्त्री अपने जीवन के अंतिम दिनों तक शोधकार्य, लेखन तथा अपने विचारों को व्यावहारिक रूप प्रदान करने में लगा रहा और सन् 1952 ई० में इस लोक को छोड़कर परलोक सिधार गये। डीवी के शिक्षा-सिद्धांतों ने आधुनिक शिक्षा प्रणाली में जो आंदोलन उत्पन्न किया उसका प्रभाव आज विश्व के सभी सभ्य देशों में दिखलाई पड़ता है और भविष्य में भी दिखलाई पड़ता रहेगा।

रचनाएँ-

डीवी के कार्यों को निम्नलिखित दो भागों में विभाजित किया जा सकता है-

(1) विद्यालय की स्थापना- डीवी ने शिकागो विश्वविद्यालय में अपने शिक्षण कार्य की अवधि में एक विद्यालय की स्थापना की, जिसे ‘प्रोग्रेसिव स्कूल’ कहा गया। इस विद्यालय में उसने 4 से 13 वर्ष के बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था की। इसी विद्यालय में उसने ‘करके सीखने के सिद्धांत पर प्रयोग किया और इन्हीं प्रयोगों के आधार पर प्रयोजनवादी विचारों का प्रतिपादन भी किया। इन्हीं प्रयोगों के कारण इस विद्यालय को ‘लैबोरेटरी स्कूल’ भी कहा जाता है। डीवी की जीवन-गाथा लेखक के अनुसार उसके छः बच्चे थे। उससे अपने इन्हीं बच्चों के साथ खेल-खेल में शिक्षा तथा दर्शन की समस्याओं का हल प्राप्त किया और उस हल को अपने लैबोरेटरी स्कूल में प्रयोग द्वारा सिद्ध किया।

(2) अध्यापन और लेखन- डीवी के अध्यापन कार्य का वर्णन उसकी जीवन-गाथा में हम ऊपर कर चुके हैं। नीचे उसकी कुछ प्रमुख रचनाओं का उल्लेख किया जा रहा है, जिनमें उसके दार्शनिक और शैक्षिक विचार मिलते हैं-

(1) ‘माई पेडागॉजिक क्रीड’

(2) ‘दि स्कूल एण्ड सोसाइटी’

(3) ‘दि स्कूल एण्ड दि करीक्युलुम’

(4) ‘दि स्कूल एण्ड दि चाइल्ड’

(5) ‘हाऊ वी थिंक’

(6) ‘इन्टरेस्ट एन्ड एफस इन एजूकेशन’

(7) ‘स्कूल्स ऑव टुमारो’

(8) ‘डेमोक्रेसी एन्ड एजूकेशन’

(9) ‘रिकान्सट्रक्सन इन फिलॉसफी’

(10) ‘सोर्सेज ऑव ए साइंस ऑव एजूकेशन’

(11) ‘इक्तपीरिएंस एन्ड एजुकेशन’

(12) ‘एजूकेशन ऑव टुडे’

इन रचनाओं में से ‘डेमोक्रेसी एन्ड एजूकेशन’ नामक ग्रन्थ को विशेष स्थान प्राप्त है। इसे शिक्षा का एक शास्त्रीय ग्रन्थ माना जाता है।

डीवी के दार्शनिक विचार

डीवी के शैक्षिक विचारों को भलीभाँति समझने के लिए उसके दार्शनिक विचारों का ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है। अतः आगे हम डीवी की दार्शनिक विचारधारा का संक्षेप में वर्णन करेंगे-

(1) मन-सम्बन्धी विचार- डीवी ने ‘मन’ को ‘विकास का परिणाम’ माना है। उसका मत है कि मन जीवन की नाना प्रकार की समस्याओं का समाधान करने के लिए जो क्रिया करता है वह विकास का परिणाम है। डीवी के अनुसार मन एक प्रभावकारी साधन है जो अपने विचार, भाव और क्रिया-पक्षों से जीवन की सामाजिक और व्यावहारिक समस्याओं को हल करता है। इसी साधन के कारण सम्पूर्ण सृष्टि में अन्य प्राणियों की अपेक्षा मानव प्राणी को श्रेष्तम स्थान प्राप्त है। परन्तु यह मन एकान्त में  उपयोगी नहीं सिद्ध हो सकता। इसकी उपयोगिता तो  समाज में ही है। इसी कारण डीवी ने वैयक्तिक मन की अपेक्षा सामाजिक मन को विशेष महत्व प्रदान किया है।

(2) ज्ञान-सम्बन्धी विचार- डीवी ने ‘ज्ञान’ को ‘क्रिया का परिणाम’ माना है। वह इस बात में विश्वास नहीं करता कि ‘ज्ञान’ क्रिया का पथ-प्रदर्शक है वरन् उसके अनुसार क्रिया या कार्य-व्यापार ही ज्ञान के स्रोत हैं। उसका कहना है कि ‘ज्ञान’ क्रिया के बाद होता है और क्रिया अनुभव के बाद होती है। इस प्रकार अनुभव-क्रिया-ज्ञान का एक क्रम होता है। इस दृष्टि से ‘अनुभव’ ज्ञान का स्रोत हुआ। इस प्रकार डीवी के विचार से ज्ञान और अनुभव में कोई विशेष अन्तर नहीं होता। उसका मत है कि ‘ज्ञान’ अनुभव से प्राप्त होता है और ‘अनुभव’ क्रिया द्वारा प्राप्त होता है। अतः ‘अनुभव’ क्रिया का एक अंग मात्र है। डीवी के अनुसार ‘ज्ञान’ सामाजिक प्रगति का एक साधन है। ज्ञान व्यक्ति की मूल-प्रवृत्तियों, प्रेरणाओं, रुचियों, आवश्यकताओं से भी सम्बन्धित होता है। व्यक्ति अपनी मूल-प्रवृत्यात्मक, सामाजिक तथा भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति से सम्बन्धित अनेक समस्याओं का सामना करता है और वातावरण में कुछ ज्ञान प्राप्त करता है। इसी ज्ञान के आधार पर वह नवीन वस्तुओं की खोज करता है और सामाजिक विकास में सहायक होता है।

(3) चिन्तन-प्रक्रियासम्बन्धी विचार- डीवी के अनुसार चिंतन सामाजिक एवं प्राकृतिक वातावरण से अनुकूलन हेतु व्यक्ति द्वारा प्रयोग किया जाने वाला एक साधन है। उसने चिन्तन को क्रियाशीलता का एक कार्य कहा जो किसी समस्या, बाधा और कठिनाई आदि की प्रेरणा से होता है। अतः डीवी के विचार से व्यक्ति चिन्तन तभी प्रारम्भ करता है जब उसके समक्ष कोई समस्या उत्पन्न होती है और चिन्तन की समाप्ति तब होती है जब उस समस्या का समाधान मिल जाता है। इसीलिए उनका विश्वास है कि शुद्ध चिन्तन और मनन एकान्त में सम्भव नहीं है। क्योंकि चिंतन के लिए किसी समस्या, कठिनाई या बाधा का होना आवश्यक है। एकान्त में उसके सामने न कोई विशेष समस्या उत्पन्न होगी और न वह चिन्तन के लिए प्रेरित होगा। डीवी ने यह भी बतलाया है कि यदि व्यक्ति की क्रियाएँ बिना किसी बाधा के सरलतापूर्वक चलती रहें तो चिंतन की कोई आवश्यकता नहीं होगी। इस प्रकार स्पष्ट है कि डीवी ने चिंतन के परिणाम की अपेक्षा उसकी प्रक्रिया पर अधिक ध्यान दिया है; अस्तु वह ज्ञानार्जन के लिए प्रयोगात्मक विधि पर बल देता है।

(4) आत्मासम्बन्धी विचार- डीवी ने आत्मा की कल्पना सामाजिक दृष्टि से की है। उसका विचार है कि आला कोई सूक्ष्म एवं अदृश्य वस्तु न होकर स्थूल रूप से व्यक्ति के सामाजिक एवं व्यक्तिगत व्यवहारों और प्रयोगों में पायी जाती है।

(5) सत्यों, मूल्यों, आदशों आदि सम्बन्धी विचार- डीवी के मतानुसार सत्य, मूल्य, आदर्श आदि स्थिर, शाश्वत् और निश्चित नहीं होते वरन् उनका निर्माण किया जाता है और वे परिवर्तनशील हैं। इसका कारण यह है कि ये सत्य, मूल्य, आदर्श आदि इस परिवर्तनशील जगत् से सम्बन्ध रखते हैं न कि आध्यात्मिक जगत् से। जिस प्रकार इस संसार की समस्त वस्तुओं, घटनाओं, परिस्थितियों आदि में परिवर्तन होता रहता है उसी प्रकार सत्यों, मूल्यों, आदर्शों आदि में भी परिवर्तन होता रहता है। क्योंकि इनका निर्माण व्यक्ति, समय, स्थान और आवश्यकता के अनुसार होता है। जो आज के लिए सत्य है वह कल की बदली हुई परिस्थितियों के लिए सत्य नहीं हो सकता। जो एक व्यक्ति अथवा स्थान के लिए आदर्श है वही दूसरे स्थान और व्यक्ति  के लिए आदर्श नहीं हो सकता। यही बात जीवन-मूल्यों के सम्बन्ध में भी है।

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Pankaja Singh

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