शिक्षाशास्त्र

बेसिक शिक्षा का अर्थ | बेसिक शिक्षा के उद्देश्य | बेसिक शिक्षा की व्यवस्था | बेसिक शिक्षा की प्रमुख विशेषताएँ | बेसिक शिक्षा की समीक्षा | शिक्षाशास्त्री के रूप में गाँधीजी का मूल्यांकन

बेसिक शिक्षा का अर्थ | बेसिक शिक्षा के उद्देश्य | बेसिक शिक्षा की व्यवस्था | बेसिक शिक्षा की प्रमुख विशेषताएँ | बेसिक शिक्षा की समीक्षा | शिक्षाशास्त्री के रूप में गाँधीजी का मूल्यांकन | Meaning of Basic Education in Hindi | Objectives of Basic Education in Hindi | Basic education system. Salient Features of Basic Education in Hindi | Review of Basic Education in Hindi | Evaluation of Gandhiji as an educationist in Hindi

बेसिक शिक्षा का अर्थ

बेसिक शिक्षा को वर्धा-योजना, नयी तालीम अथवा बुनियादी शिक्षा के नाम से भी जाना  जाता है। किन्तु बेसिक शिक्षा के नाम से यह योजना अधिक प्रसिद्ध है। इस योजना के प्रारम्भिक इतिहास की संक्षिप्त जानकारी प्राप्त करना यहाँ अनुपयुक्त न होगा। अक्टूबर 1937 ई० में गांधीजी वर्धा (Wardha) नामक स्थान पर थे। वहाँ 22 और 23 अक्टूबर 1937 ई० को मारवाड़ी हाईस्कूल की रजत जयंती समारोह होना निश्चित था। इस अवसर पर अखिल भारतीय राष्ट्रीय शिक्षा सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसे ‘वर्धा शिक्षा सम्मेलन भी कहते हैं। इस सम्मेलन में देश के विभिन्न भागों से शिक्षा विशेषज्ञों, राष्ट्रीय नेताओं, समाज सुधारकों आदि को आमन्त्रित किया गया। इस सम्मेलन में गांधीजी को सभापति के पद पर आसीन किया गया। उस सभा में शिक्षासम्बन्धी विचार-विमर्श हुए और कुछ प्रस्ताव पारित किये गये। इन प्रस्तावों के आधार पर पाठ्यक्रम तैयार करने के लिए एक समिति की नियुक्ति की गयी। इस समिति के अध्यक्ष जामिया मिलिया इस्लामिया दिल्ली के आचार्य डॉ० जाकिर हुसेन को अध्यक्ष बनाया गया। इसी कारण इस समिति को ‘डॉ० जाकिर हुसेन समिति’ कहते हैं। इस समिति ने दिसम्बर 1937 तथा अप्रैल 1938 में दो रिपोर्ट प्रस्तुत कीं। इन रिपोर्टों में बेसिक शिक्षा के सम्पूर्ण स्वरूप का वर्णन है। अब प्रश्न यह उठता है कि इसे बेसिक शिक्षा क्यों कहा जाता है ? इसके निम्नलिखित कारण है-

(1) यह शिक्षा भारतीय सभ्यता, संस्कृति एवं शिक्षा-संगठन का आधार-स्वरूप है।

(2) शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ प्रत्येक भारतीय बच्चे को यह शिक्षा अनिवार्य और निःशुल्क रूप से दी जाती है।

(3) यह शिक्षा बालकों की मौलिक आवश्यकताओं और अभिरुचियों से घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित होती है।

(4) यह शिक्षा समस्त भारतीयों को अपने वातावरण को समझने और उसके अनुसार आचरण करने के लिए मूलभूत ज्ञान प्रदान करती है।

(5) यह आधारभूत शिक्षा प्रत्येक जाति, वर्ग, लिंग भारतीय व्यक्ति की सामान्य संपत्ति है।

(6) यह शिक्षा किसी स्थानीय हस्तकला पर आधारित होती है, जिससे बालक को अपने जीवन निर्वाह में सहायता मिलती है।

(7) यह शिक्षा सामुदायिक जीवन के आधारभूत व्यवसायों से सम्बन्धित होती है।

बेसिक शिक्षा के उद्देश्य

बेसिक शिक्षा का कार्यान्वयन निम्नलिखित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया गया है-

(1) लोकतन्त्रात्मक समाज की स्थापना।

(2) बालकों में नागरिकता के गुणों का विकास।

(3) विद्यालयों एवं विद्यार्थियों को आत्मनिर्भर बनाना ।

(4) बालकों का नैतिक या चारित्रिक विकास।

(5) सांस्कृतिक विकास ।

(6) बालकों का शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास।

(7) बालकों को जीविकोपार्जन के योग्य बनाना तथा श्रम के प्रति रुचि उत्पन्न करना।

बेसिक शिक्षा की व्यवस्था

व्यवस्था की दृष्टि से बेसिक शिक्षा को निम्नलिखित स्तरों में विभाजित किया गया है-

(1) पूर्व बेसिक स्तर- नर्सरी शिक्षा।

(2) बेसिक स्तर- कक्षा 1 से 8 तक। इसे दो उपस्तरों में बाँटा गया है-

(i) जूनियर बेसिक स्तर- कक्षा 1 से 5 तक।

(ii) सीनियर बेसिक स्तर कक्षा 6 से 8 तक ।

(3) उत्तर बेसिक स्तर- कक्षा 8 के बाद की शिक्षा। इसे उच्चत्तर शिक्षा, उच्च शिक्षा तथा प्रौढ़ शिक्षा में बाँट सकते हैं। बेसिक शिक्षा के माध्यम से पाठ्यक्रम और शिक्षण विधियों आदि का वर्णन ‘गांधीजी की शैक्षिक विचारधारा के सन्दर्भ में पहले ही किया जा चुका है।

बेसिक शिक्षा की प्रमुख विशेषताएँ

बेसिक शिक्षा में निम्नलिखित प्रमुख विशेषताएँ पायी जाती हैं। इन्हीं विशेषताओं को बेसिक शिक्षा के आधारभूत सिद्धान्त कहा जा सकता है-

(1) अनिवार्य तथा निःशुल्क शिक्षा (6 वर्ष से लेकर 14 वर्ष तक के बालकों के लिए)।

(2) शिक्षा का आधार स्थानीय हस्तकला।

(3) मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा।

(4) आत्म-निर्भरता के सिद्धान्त पर बल।

(5) मूल्यांकन का आधार-वर्ष भर के कार्य-कोई परीक्षा नहीं।

(6) अहिंसा पर आधारित शिक्षा।

(7) स्वतन्त्रताप्रधान शिक्षा।

(8) आदर्श नागरिकता की शिक्षा।

(9) सामाजिक आधार।

(10) आर्थिक आधार।

बेसिक शिक्षा की समीक्षा

बेसिक शिक्षा का मूल्यांकन करने के लिए हमें इसके, गुण-दोषों पर दृष्टिपात करना होगा। विस्तार में आलोचना और समालोचना करना इस अध्याय के क्षेत्र के बाहर की बात है। बेसिक शिक्षा के गुणों को पूर्ववर्णित इसकी विशेषताओं के आधार पर समझा जा सकता है; अतः नीचे हम बेसिक शिक्षा के केवल दोषों अथवा कमियों की ओर ही संकेत करेंगे-

  1. बेसिक शिक्षा के दोष- विभिन्न विद्वानों एवं शिक्षाशास्त्रियों ने निम्नलिखित दोष बतलाये हैं-

(1) बेसिक शिक्षा में आत्म-निर्भरता का सिद्धांत उचित नहीं है।

(2) इस पद्धति में समय और कृच्चे माल की बरबादी होती है, क्योंकि उत्पादक बच्चे होते हैं।

(3) उत्पादित वस्तुओं के क्रिी की गम्भीर समस्या आती है। क्योंकि बच्चों द्वारा निर्मित वस्तुओं की अपेक्षा सस्ती और सुन्दर वस्तुएँ बाजार में उपलब्ध होती हैं।

(4) हस्तकला पर केन्द्रित शिक्षा पर बल देना आज के यांत्रिक युंग में उचित नहीं।

(5) शिक्षकों के हित की उपेक्षा ।

(6) उच्च शिक्षा की उपेक्षा।

(7) धार्मिक शिक्षा का अभाव।

(8) यह शिक्षा विशेषकर गाँवों के लिए ही उपयोगी हो सकती है।

(9) बेसिक स्कूलों की समय-सारिणी असंतुलित होती है।

(10) सह-सम्बन्ध विधि पर अधिक बल। इससे छात्र अन्य विषयों का विशेष ज्ञान नहीं प्राप्त कर सकते।

झिंगरन और शर्मा ने बेसिक शिक्षा के दोषों को ध्यान में रखते हुए बड़े ही कटु शब्दों में इसकी आलोचना की है। उनके अनुसार-“यह योजना काल्पनिक है, एक अनावश्यक विश्वास है, एक मनःसृष्टि है, और वास्तविक व्यवहार से परे हैं। इस योजना में एक सुव्यवस्थित शिक्षा दर्शन की अपेक्षा भावुकता अधिक है। इसे गांधीजी की महानता से प्रभावित व्यक्तियों ने भावुकतावश ही स्वीकार किया है।”

निष्कर्ष

गांधीजी एक जन-सेवक महामानव के रूप में उच्चकोटि के दार्शनिक और शिक्षाशास्त्री थे। सत्य, अहिंसा, प्रेम और कर्म ही उनके जीवन-दर्शन का आधार था। उन्होंने आजन्म इन्हीं सिद्धान्तों का पालन किया और मानव को संदेश दिया कि इन्हीं सिद्धान्तों पर चलने में उसकी भलाई है। गांधीजी ने मानव-जीवन में नैतिकता को भी बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान दिया है। उनके शैक्षिक विचारों में भी इन्हीं तत्वों की छाप है। वे शिक्षा को पूर्ण विकास की प्रक्रिया मानते थे। उनके अनुसार शिक्षा का उद्देश्य बालक का सर्वाङ्गीण विकास करना है।

शिक्षाशास्त्री के रूप में गाँधीजी का मूल्यांकन

गाँधी जी ने जीवन के प्रत्येक पहलू से सम्बन्धित कार्य किये। शिक्षा के क्षेत्र में भी उन्होंने अनेक प्रयोग किये और एक राष्ट्रीय शिक्षा योजना प्रस्तुत की। इसीलिए शिक्षा जगत में उन्हें एक शिक्षाशास्त्री के रूप में स्थान प्राप्त हुआ।

गाँधी जी एक धार्मिक विचारों के व्यक्ति थे इसलिए वे आत्मा और परमात्मा में विश्वास करते थे तथा मनुष्य जीवन का अन्तिम उद्देश्य आत्मा की संसार से मुक्ति मानते थे। इस मुक्ति के लिए, वे बालक की शारीरिक मानसिक, चारित्रिक एवं नैतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक सभी प्रकार के विकास की आवश्यकता समझते थे। इन्हें ही वे शिक्षा के उद्देश्य मानते थे।

इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए उन्होंने हस्तकौशलों पर आधारित पाठ्यक्रम का निर्माण किया। कुछ लोगों का कहना है कि उन्होंने पाठ्यचर्ण के हस्त कौशलों पर आवश्यकता से अधिक बल दिया है। इसके अतिरिक्त गांधी जी को यह बात भी केवल सैद्धान्तिक ही सिद्ध हुई कि समस्त शिक्षा का आधार कोई हस्त-कौशल होना चाहिए हाँ, पाठ्यक्रम में मातृभाषा को प्रमुख स्थान देकर गाँधी जी ने बहुत महत्वपूर्ण कार्य किया।

गाँधी जी का सबसे महत्वपूर्ण योगदान शिक्षण विधियों के क्षेत्र में है। उन्होंने करके सीखने पर बल दिया है। आज इस शिक्षण विधि को शिक्षा जगत में काफी महत्व दिया जा रहा है। गाँधी जी ने अध्यापक के विषय में जो विचार व्यक्त किये वे आज के विद्यालयों के वातावरण की दृष्टि से अनुपयुक्त से अवश्य लगते हैं, किन्तु हैं उपयुक्त अध्यापक छात्रों का मित्र, सहयोगी, परामर्शदाता बनकर ही उन्हें उन्नति के पथ में आगे बढ़ने में सहायता सही अर्थों में दे सकता है, एक कठोर अध्यापक बनकर नहीं। इस प्रकार हम देखते हैं कि गाँधी जी का शिक्षा-दर्शन आदर्शमादी था क्योंकि वे शिक्षा का अन्तिम उद्देश्य मोक्ष प्राप्त करने में सहयोग देना मानते थे, प्रकृतिवादी इसलिए कह सकते हैं वह बालक को उसकी प्रकृति के अनुसार विकसित करने की बात कहता है तथा प्रयोजनवादी इसलिए कह सकते हैं क्योंकि यह बालक को उसकी रुचि के अनुसार क्रिया करके सीखने पर बल देता है जिससे पाठ्यक्रम के सभी विषयों में समन्वय तथा एकीकरण स्थापित हो सके। गाँधी जी के शिक्षा दर्शन में उक्त तीनों विचारधाराओं का समन्वय है। इस बात का समर्थन करके एम०एम०पाटिल ने लिखा है कि “उनका शिक्षा दर्शन अपनी योजना में प्रकृतिवादी, उद्देश्यों में आदर्शवादी और अपने कार्यक्रम तथा कार्यविधि में प्रयोजनवादी है। कुछ लोग पाटिल साहब के इस कथन के विरोध में आवाज उठाते हैं कि गाँधी जी हर दृष्टि से आदर्शवादी थे।

अब यदि हम गाँधी जी के शैक्षिक विचारों और शिक्षा जगत में मूल्यांकन करें तो हम देखते हैं कि उनकी मूल देन है. केवल बेसिक शिक्षा की योजना। शिक्षा के जो सिद्धान्त हैं वे हमारे देश और वर्तमान काल के लिए ही नहीं अपितु हर क्षेत्र व काल में सही उतरने वाले हैं, अर्थात् उन्हें सार्वभौमिक सिद्धान्त कहा जा सकता है। इसलिए हुमायूँ कबीर ने लिखा है कि- “गाँधी जी की राष्ट्र को बहुत सी देनों में नवीन शिक्षा के प्रयोग की देन सर्वोत्तम है।”

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Pankaja Singh

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