राजनीति विज्ञान

अमरीका का मन्त्रिमण्डल | अमरीका के मन्त्रिमण्डल का गठन | अमरीका के मन्त्रिमण्डल की नियुक्ति

अमरीका का मन्त्रिमण्डल | अमरीका के मन्त्रिमण्डल का गठन | अमरीका के मन्त्रिमण्डल की नियुक्ति

अमरीका का मन्त्रिमण्डल

अमरीका में अध्यक्षात्मक शासन है; अत: समस्त कार्यपालिका की शक्तियाँ संविधान के अन्तर्गत राष्ट्रपति को ही प्राप्त हैं। अमरीका में राष्ट्रपति को उसके कार्यों के सम्पादन में सहायता तथा सलाह देने के लिए मन्त्रिमण्डल की व्यवस्था नहीं की गई है। गत 170 वर्षों में इसका परम्पराओं से विकास हुआ है। संविधान के निर्माता इसे आवश्यक संस्था नहीं समझते थे। फिर भी संविधान में राष्ट्रपति को सलाह देने के लिए एक सलाहकार समिति’ की व्यवस्था की गई है। संविधान के अनुसार, “राष्ट्रपति प्रत्येक कार्यकारी विभाग के मुख्य अधिकारी से लिखित परामर्श ले सकता है।” संविधान- निर्माताओं ने सभी कार्यकारी अधिकार एक ही व्यक्ति राष्ट्रपति को प्रदत्त किये। इसके लिए सलाहकारों की संस्था की आवश्यकता उत्पन्न हुई। कुछे संविधान- निर्माताओं का विचार था कि यह कार्य सीनेट कर सकती है। प्रथम राष्ट्रपति जार्ज वाशिंगटन ने सीनेट के साथ ‘सलाहकार समिति’ के रूप में व्यवहार करने का प्रयत्न भी किया था किन्तु यह सफल न रहा। इसके पश्चात् जार्ज वाशिंगटन ने ही 1789 में चार कार्यपालिका विभागों की स्थापना की। वाशिंगटन ने उन चार विभागाध्यक्षों से लिखित परामर्श माँगने के साथ-साथ व्यक्तिगत परामर्श भी प्रारम्भ किया। इस प्रकार नीति और प्रथाओं से ही मन्त्रिमण्डल अस्तित्व में आया। प्रारम्भ में ये चार विभाग इस प्रकार थे-अर्थ-विभाग, राज्य-विभाग, युद्ध-विभाग  और न्याय-विभाग। कालान्तर में कांग्रेस ने अन्य विभागों की स्थापना की। इस प्रकार ब्रिटिश कैबिनेट का जन्म भी ‘सुविधा और परम्परा’ के आधार पर हुआ है। अमरीकन संविधान में मन्त्रिपरिषद् की व्यवस्था नहीं; अत: यह एक अनौपचारिक संस्था है।

अमरीका के मन्त्रिमण्डल का गठन

 राष्ट्रपति के मन्त्रिमण्डल के आकार में परिवर्तन होता रहा है। राष्ट्रपति वाशिंगटन के मन्त्रिमण्डल में चार विभागों के अध्यक्ष सम्मिलित किये गये थे। राज्य के कार्य के विस्तार के साथ-साथ विभागों की संख्या भी बढ़ी है। इसके फलस्वरूप मन्त्रिमण्डल की सदस्य संख्या दस तक हो गई है। विभागों के अध्यक्षों के अतिरिक्त भी राष्ट्रपति मंत्रिमंडल में अन्य व्यक्तियों को सम्मिलित कर सकता है। कई राष्ट्रपति उपराष्ट्रपति को भी मन्त्रिमण्डल की बैठकों में आमन्त्रित करते हैं। राष्ट्रपति चाहे तो अपने मित्रों को या अन्य किसी व्यक्ति को मंत्रिमण्डल की बैठक में भाग लेने के लिए आमंत्रित कर सकता है, भले ही वह सरकार के किसी पद पर आसीन न हो।

अमरीका के मन्त्रिमण्डल की नियुक्ति-

राष्ट्रपति अपने पद ग्रहण करने के पश्चात् सीनेट के अनुमोदन से विभिन्न विभागों के अध्यक्षों की नियुक्ति करता है। अध्यक्षों की नियुक्ति हेतु संविधान के अनुसार सीनेट की स्वीकृति आवश्यक है। विभागाध्यक्षों के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वे कांग्रेस के सदस्य हों। वे कांग्रेस के प्रति उत्तरदायी भी नहीं होते। वे केवल राष्ट्रपति के प्रति उत्तरदायी होते हैं। राष्ट्रपति अध्यक्षों की नियुक्ति के समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखता है:-

(i) भौगोलिक प्रतिनिधित्व को ध्यान में रखते हुए विभिन्न राज्यों में मंत्रिमण्डल का चयन करता है।

(ii) पद के अनुरूप योग्यता आवश्यक है।

(iii) व्यक्तिगत मित्रता का भी ध्यान रखता है।

(iv) राष्ट्र के प्रमुख वर्गों के हितों को ध्यान में रखते हुए उन्हें भी प्रतिनिधित्व देता है।

(v) कांग्रेस पर प्रभाव रखने वाले व्यक्तियों को भी नियुक्त करता है।

(vi) अपने दल के विभिन्न ग्रुपों को भी प्रतिनिधित्व देकर सन्तुष्ट करने का प्रयत्न करता है।

(vii) प्रायः अपने दल से नियुक्ति करता है किन्तु कभी-कभी विरोधी दल के किसी योग्य व्यक्ति को भी वह अपने मन्त्रिमण्डल में ले सकता है।

उपर्युक्त अध्ययन के पश्चात् भी यह कहना गलत होगा कि इन नियुक्तियों में राष्ट्रपति पूर्ण स्वतंत्र होता है।

कार्य-काल- मन्त्रिमण्डल के सदस्य राष्ट्रपति की इच्छा-पर्यन्त ही अपने पदों पर बने रह सकते हैं। इनको अपने पद से हटाने के लिये सीनेट की स्वीकृति लेने की आवश्यकता नहीं है।

बैठकें– मन्त्रिमण्डल की बैठक प्रायः सप्ताह में एक बार होती है। विचार-विमर्श के विषय राष्ट्रपति ही निश्चित करता है। बैठक की कार्यवाही अनौपचारिक होती है। वाद-विवाद के कोई पूर्व-निश्चित नियम नहीं होते। बैठकों में मतदान आवश्यक नहीं है और यह भी आवश्यक नहीं कि निर्णय सर्वसम्मति या बहुमत से हो। राष्ट्रपति की इच्छा सर्वोपरि है। इसकी समस्त कार्यवाही गुप्त रखी जाती है।

वेतन और भत्ते- मन्त्रियों को मन्त्रिमण्डल का सदस्य होने के कारण वेतन नहीं दिया जाता बल्कि उनको विभागों का अध्यक्ष होने के कारण वेतन तथा भत्ते मिलते हैं।

कार्य- मन्त्रिमण्डल के कार्यों को दो भागों में बाँटा गया है-

(अ) परामर्श संबंधी कार्य- मन्त्रिमण्डल का प्रमुख कार्य राष्ट्रपति को परामर्श देना है।

(ब)प्रशासनसम्बन्धी कार्य- मन्त्रिमण्डल का दूसरा कार्य अपने अपने विभागों के कार्यों को पूरा करना है। प्रत्येक मन्त्री (सचिव) की सहायता के लिए सह-सचिव तथा उपसचिव होते हैं।

राष्ट्रपति उपरोक्त मन्त्रिमण्डल के अतिरिक्त एक ओर अपने व्यक्तिगत मित्रों के कैबिनेट से परामर्श लेता है जिसे ‘किचन कैबिनेट’ इत्यादि नामों से पुकारा जाता है।

राष्ट्रपति और उसके मन्त्रिमण्डल के पारस्परिक सम्बन्ध

मन्त्रिमण्डल के सदस्य राष्ट्रपति के समान नहीं बल्कि वे उसके अधीनस्थ हैं। इनसे परामर्श करके उसे मानना राष्ट्रपति के लिए आवश्यक नहीं है। वह स्वतन्त्र है और अपने मन्त्रिमण्डल के सदस्यों से परामर्श करना उसकी इच्छा पर निर्भर है। व्रोगन के शब्दों में, ‘राष्ट्रपति विभागों के अध्यक्षों का शासक है।”

राष्ट्रपति तथा मन्त्रिमण्डल का परस्पर का सम्बन्ध बहुत कुछ राष्ट्रपति के व्यक्तित्व पर निर्भर करता है। प्रायः प्रतिभाशाली राष्ट्रपति मन्त्रिमण्डल की सलाह की उपेक्षा करते रहे हैं जबकि साधारण व्यक्तित्व वाले राष्ट्रपति मन्त्रिमण्डल की सलाह स्वीकार करते रहे हैं।

ब्रिटिश मन्त्रिमण्डल से तुलना-

अमरीकन मन्त्रिमण्डल ब्रिटिश मन्त्रिमण्डल से बिल्कुल अलग है। केवल एक बात दोनों में समान है कि दोनों का निर्माण परम्परावश हुआ है! दोनों देशों की मन्त्रिपरिषदों के अन्तर को इस प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है..-

(1) अमरीकी मन्त्रिमण्डल राष्ट्रपति के सलाहकारों की एक संस्था मात्र होती है, जबकि ब्रिटेन की मन्त्रिमण्डल के सदस्यों का कार्य शासन-संचालन है तथा उनकी सलाह प्रधानमन्त्री को माननी आवश्यक है।

(2) ब्रिटिश मन्त्रिमण्डल के सदस्य एक ही राजनीतिक दल के सदस्य होते हैं जबकि अमरीकन राष्ट्रपति दूसरे दल से श्री मन्त्रिमण्डल के सदस्य नियुक्त कर सकता है।

(3) ब्रिटिश मन्त्रिमण्डल के सदस्य व्यक्तिगत तथा सामूहिक दोनों रूप में संसद के प्रति उत्तरदायी होते हैं; जबकि अमरीकन मन्त्रिमण्डल के सदस्य कांग्रेस के प्रति उत्तरदायी नहीं होते तथा केवल राष्ट्रपति के प्रति उत्तरदायी होते हैं।

(4) अमरीकन मन्त्रिमण्डल में जो स्थान राष्ट्रपति को प्राप्त है वह ब्रिटिश प्रधानमन्त्री को अपने मन्त्रिमण्डल में प्राप्त नहीं है।

(5) ब्रिटिश मन्त्रिमण्डल अमरीकन मन्त्रिमण्डल की अपेक्षा बहुत शक्तिशाली है। वह संसद का नेतृत्व करती है जबकि अमरीकन मन्त्रिमण्डल कांग्रेस पर कोई प्रभाव नहीं रखती।

(6) ब्रिटिश मन्त्रिमण्डल की सदस्यता लम्बी, सार्वजनिक और राजनैतिक सेवा के पश्चात् मिलती है, जबकि अमरीका में किसी भी व्यक्ति को मन्त्रिमण्डल का सदस्य नियुक्त किया जा सकता है।

(7) ब्रिटेन में मन्त्रिमण्डल की सदस्यता हेतु संसद का सदस्य होना अनिवार्य है जबकि अमरीका में ऐसा आवश्यक नहीं है।

अन्त में हम कह सकते हैं कि अमरीकी मन्त्रिमण्डल को ‘मन्त्रिमण्डल’ कहना गलत है। संसदीय सरकार में मन्त्रिमण्डल वास्तविक राजनीतिक कार्यकारिणी है जबकि अमरीका में यह राष्ट्रपति के हाथ की कठपुतली है।

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Pankaja Singh

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