राजनीति विज्ञान

स्वस्थ लोकमत के निर्माण में बाधाएँ | स्वस्थ लोकमत के निर्माण की शर्ते

स्वस्थ लोकमत के निर्माण में बाधाएँ | स्वस्थ लोकमत के निर्माण की शर्ते

स्वस्थ लोकमत के निर्माण में बाधाएँ

(1) शिक्षा का अभाव- स्वस्थ जनमत निर्माण के मार्ग में अशिक्षा सबसे बड़ी बाधा है अशिक्षित नागरिक जटिल राजनीतिक एवं आर्थिक मामलों के सम्बन्ध में अपना कोई निजी मत नहीं रखते हैं। क्योंकि उनमें सोचने-विचारने की बौद्धिक क्षमता नहीं होती। वे दूसरे के बहकावे में आकर उनका मत अपना मत बना लेते हैं। धूर्त, राजनीतिज्ञ उन्हें आसानी से गुमराह भी कर सकते हैं।

(2) आर्थिक विपन्नता एवं विषमता- निर्धनता मनुष्य के लिए अभिशाप है। वे अपनी आर्थिक, चिन्ताओं में इतने घिरे रहते हैं कि उनके पास सार्वजनिक प्रश्नों के सम्बन्ध में विचार- मन्थन करने का अवसर ही नहीं मिला। निर्धनता के कारण वह न तो उच्च शिक्षा प्राप्त कर पाता है और न अपना स्वास्थ्य ठीक रख पाता है। अभावों में जीते-जीते उनका मनोबल टूट जाता है और सार्वजनिक प्रश्नों पर विचार करने की उनकी रुचि समाप्त हो जाती है। निर्धन लोग अमीरों के हाथों बिक जाते हैं और उनके पिछलग्गू हो जाते हैं तथा अमीरों के मत के ही वे अपना मत बना लेते हैं। इस प्रकार आर्थिक विषमता एवं विपन्नता के रहते हुए स्वस्थ जनमत की आशा करना व्यर्थ है।

(3) साम्प्रदायिकता- साम्प्रदायिकता की संकीर्ण भावना निश्चित रूप से जनमत के लिए अभिशाप है। साम्प्रदायिकता के लोग वर्गीय हितों पर अधिक ध्यान देते हैं किन्तु सार्वजनिक हितों पर नहीं | अतः संकुचित साम्प्रदायिक विचार स्वस्थ जनमत के निर्माण में सबसे बड़ी बाधा है।

(4) राजनीतिक चेतना का अभाव- जागरूक नागरिकों से ही प्रभावशाली जनमत बन सकता है। यदि नागरिक अपने अधिकारों एवं सार्वजनिक हितों के लिए सचेत नहीं होते तो स्वस्थ जनमत का निर्माण नहीं हो सकता।

(5) दोषपूर्ण राजनीतिक दल- यदि राजनीतिक दल सुनिश्चित राजनीतिक तथा आर्थिक कार्यक्रमों पर आधारित हों तो वे लोकमत के निर्माण में बहुत सहायक हो सकते हैं, किन्तु यदि इनका निर्माण जाति, धर्म, भाषा या वर्ग के आधार पर हुआ तो संकुचित दृष्टिकोण का प्रतिपादन करते हैं। ऐसे दूषित प्रचार द्वारा वे जनता को गुमराह करते हैं और देश की एकता को हानि पहुँचाते हैं। इस प्रकार दोषपूर्ण दल स्वरूप लोकमत के निर्माण में बाधा उत्पन्न करते हैं।

(6) प्रचार-साधनों पर सरकारी नियन्त्रण- प्रेस, रेडियो तथा टेलीविजन आदि प्रचार- माध्यमों पर सरकार का नियन्त्रण होने से जनता सही तथ्यों से अवगत नहीं हो पाती और सरकार द्वारा सूठे प्रचार का शिकार हो जाती है; फलतः स्वस्थ जनमत का निर्माण नहीं हो पाता। तानाशाही शासन में सरकार प्रचार-माध्यम पर पूर्ण नियन्त्रण रखती है तथा अपने हितों के अनुकूल जनमत को बनाने का प्रयत्न करती है, परन्तु इसे स्वस्थ जनमत नहीं कहा जा सकता है।

(7) पक्षपातपूर्ण समाचारपत्र- समाचारपत्र जनमत-निर्माण का सबसे प्रभावशाली साधन है। यदि समाचारपत्र निष्पक्ष नहीं है, वे धनी व्यक्तियों या सरकार के प्रभाव में हैं तो वे अपने विचारों की अभिव्यक्त निष्पक्ष रूप से नहीं कर सकते। ऐसे समाचारपत्रों को पढ़कर लोग गुमराह हो जाते हैं। अत: पक्षपातपूर्ण समाचारपत्र स्वस्थ लोकमत निर्माण नहीं कर सकते, बल्कि वे तो लोकमत को पूर्ण दिकृत ही कर देते हैं।

(8) आधारभूत एकता का अभाव- कुछ आधारभूत सिद्धान्तों के सम्बन्ध से देश की सम्पूर्ण जनता को एकमत होना चाहिये। यदि ऐसा न हुआ तो सुदृढ़ बनने में कठिनाई होगी। आधारभूत एकता का अभाव स्वस्थ जनमत के निर्माण में बाधक होता है।

स्वस्थ लोकमत के निर्माण की शर्ते

(i) सुशिक्षित जनता- स्वस्थ लोकमत के निर्माण के लिए जनमत का शिक्षित है अत्यन्त आवश्यक है। शिक्षा के अभाव में व्यक्ति का मानसिक तथा बौद्धिक विकास नहीं हो पाता। ऐसी स्थिति में उनका अपना कोई सुनिश्चित मत नहीं होता, बल्कि दूसरों के विचार प्रभावित होता है। सोल्टाऊ ने ठीक ही कहा है-“लोकमत प्रबुद्धता की मात्रा जनता की शिक्षा तथा बुद्धि के सामान्य स्तर पर करता है।”

(2) निर्धनता का उन्मूलन- निर्धनता मानवता के लिए अभिशाप है। धन के अभाव में नागरिकों के व्यक्तित्व का उचित विकास नहीं हो सकता। यह आवश्यक है कि नागरिकों की न्यूनतम आर्थिक आवश्यकताएँ पूरी हों, उनके भोजन, वस्त्र, निवास, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि की उचित व्यवस्था हो । क्योंकि इनके अभाव में वह अपनी योग्यता एवं कार्यक्षमता को नहीं बनाये रख सकता। निर्धन व्यक्ति अमीर लोगों के हाथ बिक जाते हैं और वे उनके पिछलग्गू बन जाते हैं, अतः स्वस्थ जनमत के लिए निर्धनता उन्मूलन आवश्यक है।

(3) साम्प्रदायिकता का अन्त- स्वस्थ एवं जागरूक जनमत के लिए जनता में पारस्परिक कटुता या वैमनस्य नहीं होना चाहिये। किसी भी राष्ट्र में धर्म-सम्प्रदाय, भाषा एवं वर्ग आदि संकुचित आधारों पर भेदभाव या पारस्परिक वैमनस्य का होना लोकमत के लिए घातक है। साम्प्रदायिक भावनाओं में लिप्त रहने के कारण लोग स्वस्थ राष्ट्रीय दृष्टिकोण से विचार नहीं कर सकते।

(4) स्वतन्त्रता एवं निष्पक्ष प्रेस- प्रेस की स्वतन्त्रता एवं निष्पक्षता स्वस्थ जनमत के लिए बहुत आवश्यक है। समाचारपत्रों पर सरकारी या गैरसरकारी किसी प्रकार का दबाव नहीं बनाना चाहिये और उन्हें सार्वजनिक प्रश्नों पर स्वतन्त्रतापूर्वक अपने विचार व्यक्त करने की स्वतन्त्रता होनी चाहिये। समाचारपत्रों की स्वतन्त्रता के साथ-साथ यह भी आवश्यक है कि समाचारपत्र निष्पक्षता के साथ अपने विचारों को अभिव्यक्त करें तथा राजनीतिक दल वर्ग विशेष के साथ पक्षपात न करें।

(5) स्वस्थ एवं सबढ़ राजनीतिक दल- स्वस्थ जनमत के निर्माण में राजनीतिक दल भी  महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यदि वे सुदृढ़ राजनीतिक-आर्थिक आधारों पर निर्मित हों तथा राष्ट्रवादी दृष्टिकोण रखते हों। जनता के समक्ष वे सही तथ्यों को प्रस्तुत करें तथा अपने सुनिश्चित एवं स्पष्ट कार्यक्रमों को ईमानदारी से लागू करें। दलों द्वारा विषाक्त, संकीर्ण एवं भ्रमपूर्ण प्रचार लोकमत को स्पष्ट करता है। राजनीतिक दलों को चाहिये कि वे जनता के समक्ष सत्य तथ्यों को रखें और उन्हें स्वस्थ राजनीतिक शिक्षा प्रदान करें, जिससे स्वस्थ लोकमत का निर्माण हो सके।

(6) विचार अभिव्यक्ति एवं संगठन की स्वतन्त्रता- अपने विचारों को सबके समक्ष रखने एवं संगठन बनाने की स्वतन्त्रता लोकमत के लिए आवश्यक है। यदि विचार-अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता नहीं होगी तो लोग अपने विचार पूर्ण रूप से प्रकट नहीं कर सकेंगे; फलत: जनमत का निर्माण ही न हो सकेगा। इसके साथ ही नागरिकों को अपने विचारों के प्रचार एवं प्रसार के लिए संगठन बनाने एवं सम्मेलन करने की पूर्ण स्वतन्त्रता होनी चाहिए।

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Pankaja Singh

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