राजनीति विज्ञान

प्रधानमन्त्री | प्रधानमन्त्री की नियुक्ति | प्रधानमन्त्री की स्थिति | प्रधानमन्त्री के अधिकार | प्रधानमन्त्री के कार्य | प्रधानमन्त्री का महत्त्व

प्रधानमन्त्री | प्रधानमन्त्री की नियुक्ति | प्रधानमन्त्री की स्थिति | प्रधानमन्त्री के अधिकार | प्रधानमन्त्री के कार्य | प्रधानमन्त्री का महत्त्व

प्रधानमन्त्री

ब्रिटिश शासन व्यवस्था में मंत्रिपरिषद ही वास्तविक शासक है। मंत्री परिषद् का अध्यक्ष अर्थात् प्रधानमन्त्री का प्रशासन में प्रमुख स्थान है। वह प्रशासन की धुरी है। विलियम बर्नोन हरकोर्ट के अनुसार-“वह तारा समूह” के बीच चन्द्रमा है।” ग्रीज के मत में, शासन समस्त देश का स्वामी है और प्रधानमन्त्री शासन का स्वामी है।”

प्रधानमन्त्री की नियुक्ति-

राजा प्रधानमन्त्री की नियुक्ति करता है किन्तु यह केवल औपचारिकता है। संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार राजा प्रधानमन्त्री की नियुक्ति में स्वतंत्र नहीं है। उसे परम्परा के अनुसार निर्वाचन के पश्चात् कामन्स सभा में बहुमत दल के नेता को मन्त्रिमण्डल बनाने हेतु आमन्त्रित करना पड़ता है।

प्रधानमन्त्री की स्थिति, अधिकार और कार्य

प्रधानमन्त्री के अधिकार और कर्त्तव्य अत्यन्त व्यापक होते हैं। उनके निम्नलिखित कार्य मुख्य हैं:-

(1) मन्त्रिमण्डल का निर्माण- प्रधानमंत्री मन्त्रिमण्डल का निर्माण करता है। वह अपने मन्त्रिमण्डल के सदस्यों की सूची राजा को देता तथा उसकी स्वीकृति मिलने पर उन्हें मन्त्री पद और विभाग देता है।

(2) मन्त्रिमण्डल का कार्य-संचालन- वह देखता है कि प्रत्येक मंत्रालय सुचारु रूप से कार्य कर रहा है कि नहीं। विभिन्न मंत्रालयों के बीच मतभेद उत्पन्न हो जाने पर प्रधानमन्त्री से उसे दूर करता है।

3) मन्त्रिमण्डल का अन्त- प्रधानमन्त्री अपनी इच्छा के अनुसार मन्त्रिमण्डल भंग कर सकता है। वह मतभेद होने पर किसी भी मन्त्री को पदच्युत् कर सकता है।

(4) विशिष्ट व्यक्तियों को उपाधि प्रदान करना- यद्यपि यह कार्य राणा का है परन्तु यह कार्य राजा प्रधानमन्त्री के परामर्श से ही करता है।

(5) राजकीय पदों पर नियुक्ति– प्रधानमन्त्री राजा को उच्च राजकीय पदों पर नियुक्ति के लिए व्यक्तियो की सूची देता है, जिसे राजा मान लेता है।

(6) शासनसम्बन्धी नीति का निर्धारण- प्रत्यक्ष रूप में शासनसम्बन्धी नीति के निर्धारण का कार्य संसद का होता है, परन्तु वास्तव में अप्रत्यक्ष रूप में प्रधानमन्त्री ही यह कार्य करता है।

(7) प्रशासन के विभिन्न विभागों में सामन्जस्य बनाये रखना- प्रधानमंत्री प्रशासन के विभिन्न विभागों में सामन्जस्य बनाये रखता है। उनमें मतभेद उत्पन्न हो जाने पर वही उनका निवारण भी करता है।

(8) विदेशी मामलों पर नियन्त्रण- प्रधानमन्त्री पर विदेश-विभाग न होने पर भी बह समस्त विदेशी मामलों पर नियंत्रण रखता है।

(9) वित्त पर नियन्त्रण- वित्तमन्त्री न होते हुए भी वह वित्तसम्बन्धी सभी कार्यों पर नियन्त्रण रखता है। वित्तमन्त्री प्रधानमन्त्री के परामर्श से ही वित्तसम्बन्धी निर्णय लेता है।

(10) राजा को परामर्श देना- प्रधानमन्त्री विभिन्न विषयों पर राजा को परामर्श देता है। वह संसद और राजा के बीच की कड़ी का कार्य करता है और राजतंत्र तथा लोकतंत्र के मध्य सम्पर्क स्थापित करता है।

(11) कॉमन्स सभा का अधिवेशन बुलाना- प्रधानमन्त्री कॉमन्स सभा का नेता होता है। वही कामन्स सभा का अधिवेशन बुलाता है।

(12) संसद को सन्तुष्ट करने का कार्य- सभी समस्याओं से सम्बन्धित प्रश्नों का उत्तर देने का अन्तिम उत्तरदायित्व प्रधानमन्त्री का होता है। वही सदस्यों को सभी मामलों की पूर्ण जानकारी देता है।

(13) कामन्स सभा भंग करना- सिद्धान्त रूप में राजा कॉमन्स सभा को भंग करता है किन्तु यह परम्परा-सी बन गई है कि प्रधानमन्त्री के परामर्श पर ही राजा कॉमन्स सभा को भंग करता है।

(14) संकटकालीन शक्तियाँ- युद्ध के दौरान प्रधानमन्त्री की शक्तियाँ बढ़ जाती हैं। वह सुरक्षा समिति (Defence Committee) की बैठकों का सभापतित्व करता है। युद्ध-संचालन तथा युद्ध-नीति निर्धारित करने में वह कामन्स सभा तथा मन्त्रिपरिषद् से भी प्रायः स्वतंत्र हो जाता है।

प्रधानमन्त्री का महत्त्व-

प्रधानमंत्री का ब्रिटिश शासन-व्यवस्था में बहुत महत्त्व है। “एक ब्रिटिश प्रधानमन्त्री संसद में बहुमत रखकर वह कार्य करता है जो जर्मनी का राजा और अमरीका का राष्ट्रपति भी नहीं कर सकता है। क्योंकि वह कानून बना सकता है, कर लगा सकता है, उन्हें समाप्त कर सकता है और देश की सैनिक-शक्ति का मार्ग-दर्शन करा सकता है।”

उसकी इस महत्त्वपूर्ण स्थिति को देखते हुए ही उसे ‘मन्त्रिपरिषद्रूपी जहाज को चलाने वाला पहिया’ कहा गया है।

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Pankaja Singh

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