राजनीति विज्ञान

नौकरशाही का अर्थ | नौकरशाही की विशेषताएँ | नौकरशाही के दोष | दोषों को दूर करने के उपाय

नौकरशाही का अर्थ | नौकरशाही की विशेषताएँ | नौकरशाही के दोष | दोषों को दूर करने के उपाय

प्रत्येक राज्य में शासन व्यवसायों में शासन का कार्य व्यवहार में सरकारी कर्मचारियों द्वारा ही चलाया जाता है। ये कर्मचारी शासन द्वारा नौकरी पर रखे जाते हैं। नौकरशाही का शाब्दिक अर्थ ‘डेस्क’ सरकार या ब्यूरो सरकार है। व्यापक अर्थ में हम नौकरशाही को ऐसी ‘सेवा’ व्यवस्था के नाम से जानते हैं जहाँ शासन को संभागों, विभागों और ब्यूरो आदि में विभाजित किया जाय। मर्यादित अर्थ में नौकरशाही से सार्वजनिक सेवकों के एक ऐसे निकाय का बोध होता है जो एक सोपान की अवस्था में संगठित हों और परिवर्तनशील सार्वजनिक नियन्त्रण के क्षेत्र से बाहर हों। इस प्रकार नौकरशाही प्रशासन का अनिवार्य अंग है और उसके बिना शासन का कार्य नहीं चल सकता।

नौकरशाही का अर्थ-

समय के अनुसार नौकरशाही शब्द का प्रयोग और अर्थ बदलता रहा है। यूरोपीय देशों ने इस शब्द का अर्थ ‘नियमित सरकारी कर्मचारियों के समूह’ से लिया जाता है। प्रमुख रूप से नौकरशाही शब्द को चार अर्थों में प्रयोग किया जाता है- (i) एक विशेष प्रकार के संगठन के रूप में, (ii) एक अच्छे प्रबन्ध में बाधक के रूप में, (iii) एक बड़ी सरकार के रूप में और (iv) नौकरशाही के रूप में । उपरोक्त शीर्षकों का हम नीचे विस्तृत अध्ययन करेंगे:-

(i) एक विशेष प्रकार के संगठन के रूप में- इसके अन्तर्गत प्रत्येक सदस्य को कुछ कर्तव्य सौंपे जाते हैं और सत्ता को इस प्रकार विभाजित किया जाता है कि प्रत्येक सदस्य उसे दिये गये कार्यों को भली प्रकार पूरा कर सके। संगठन की रचना पद-सोपान के आधार पर होती है। इसमें लिखित अभिलेखों एवं दस्तावेजों को अधिक महत्त्व दिया जाता है। कर्मचारियों की भरती नियमानुसार होती है और उसके लिये उचित प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाती है।

(ii) अच्छे प्रबन्ध में बाधक के रूप में नौकरशाही– प्राय: नौकरशाही अच्छे प्रबन्ध में बाधक ही देखी गई है। इससे अच्छे से अच्छा प्रशासन ठप्प हो जाता है। नौकरशाही को विभिन्न अवगुणों और कठिनाइयों का प्रतीक माना जाता है। इसमें प्रत्येक निर्णय अति विलम्ब से लिया जाता है।

(iii) बड़ी सरकार के रूप में नौकरशाही- प्रायः नौकरशाही का अर्थ दड़ी सरकार से लिया जाता है। इसका अर्थ यह है कि राज्य के बढ़े हुए कर्त्तव्य एवं दायित्वों को सम्पूर्ण करने के लिये जो संगठन कार्य करता है वही नौकरशाही है। वर्तमान युग में सरकार को इतने अधिक कार्य करने होते हैं कि वह उनको प्रत्यक्ष रूप से नहीं कर सकती। इसी कारण जनता और मन्त्रियों के बीच एक शक्ति का उदय हुआ है। यह शक्ति लिपिकों की है और वे निरपेक्ष शक्ति रखते हैं।

(iv) स्वतन्त्रता-विरोधी नौकरशाही- इसका अर्थ है कि वह सरकार की एक ऐसी व्यवस्था है जिसका नियन्त्रण सर्वशक्तिमान अधिकारियों के हाथ में रहता है जो साधारण जनता की स्वतन्त्रता का हनन करने लगते हैं।

नौकरशाही की विशेषताएँ

नौकरशाही की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं:-

(1) इसमें कार्यों का बुद्धिमत्तापूर्वक विभाजन किया जाता है।

(2) अधिकारियों को कानूनी सीमा में रह कर सफलतापूर्वक कार्य करना होता है; अतएव संगठन में लोचहीनता होती है।

(3) यह दोहरी विशेषज्ञता लिये होती है। सेवा में प्रवेश के लिए परीक्षा पास करनी होती है तथा उचित प्रशिक्षण भी प्राप्त करना होता है जिससे वे अपने क्षेत्र में विशेषज्ञ हो जाते हैं।

(4) नौकरशाही में पद-सोपान के सिद्धान्त को मान्यता प्रदान की जाती है। इसमें नीचे का अधिकारी अपने ऊपर के अधिकारी के प्रति उत्तरदायी होता है।

(5) प्रशासनिक कानून, नियम और निर्णय आदि सभी लिखित रूप में होते हैं, जिसके अनुसार उन्हें काम करना होता है।

(6) नियुक्ति के स्पष्ट नियम और योग्यताएँ होते हैं।

(7) नौकरशाही में स्वामी भक्ति किसी व्यक्ति विशेष के प्रति नहीं होता वरन् निवैयक्तिक कार्यों के प्रति होती है।

नौकरशाही के दोष

कुछ विद्वानों का मत है कि नौकरशाही एक ऐसी शक्ति है जो साधारण नागरिकों के स्वतन्त्रता में बाधा उत्पन्न करती है। इसमें निम्नलिखित दोष हैं:-

(1) साधारण जनता की उपेक्षा- बहुधा यह देखा जाता है कि जनहित के अनेक कानून व्यवस्थापिका, द्वारा पारित किये जाने के बाद भी नौकरशाही द्वारा लागू नहीं किये जाते। ये अपने हितों की रक्षा के लिये जन साधारण की माँगों की उपेक्षा कर देते हैं।

(2) रूढ़िवादिता के समर्थक- इसका दूसरा दोष इनका रूढ़िवादी होना है। लोकसेवक प्रायः प्राचीन परम्परा और रीति-रिवाजों के समर्थक और नवीनता एवं विकास के विरोधी होते हैं।

(3) लाल फीताशाही- इसमें लाल फीताशाही का बोलबाला रहता है। परिणाम यह होता है कि छोटे से छोटे कार्य भी बहुत देर से होते हैं।

(4) शक्ति की भूख होती है- इसमें लेशमात्र सन्देह नहीं है कि लोकसेवक शक्ति के भूखे होते हैं। वे अपनी शक्तियों के विस्तार में लोकहित की पूर्णतया अवहेलना कर देते हैं।

(5) समाज से अलग समझना- इनमें समाज के अन्य वर्गों के लोगों से अपने को श्रेष्ठ समझने की भावना होती है। वे अलग रहते हैं और इस कारण लोकहित के विषय में सोच भी नहीं पाते।

(6) विभागवाद- सरकार का कार्य विभिन्न विभागों द्वारा किया जाता है। प्रत्येक विभाग अपने आपको स्वतंत्र और पृथक् इकाई मानकर यह भूल जाता है कि वह उसी सरकार का अंग है जिसके अंग अन्य विभाग हैं। एक विभाग दूसरे विभाग को और दूसरा विभाग तीसरे विभाग को कार्य सौंपता चला जाता है। इस प्रक्रिया में कोई भी कार्य सुचारु रूप से नहीं हो पाता।

(7) तानाशाही का रूप- लोकसेवक यह मानते हैं कि शासन वाले के लिए केवल वे ही उपयुक्त व्यक्ति हैं। परिणाम यह होता है कि वह जनता की आवश्यकताओं को नहीं समझ पाता। वे धीरे-धीरे काफी शक्ति अपने हाथ में ले लेते हैं और जनता की स्वतंत्रता का हनन  अकरने लगते हैं तथा एक प्रकार से वे तानाशाह बन बैठते हैं।

दोषों को दूर करने के उपाय

निम्नलिखित उपायों द्वारा दोषों को दूर किया जा सकता है:-

(i) इनकी शक्तियों को विकेन्द्रीकरण कर देना चाहिए।

(ii) व्यवस्थापिका और मन्त्रिपरिषद् का पूर्ण नियन्त्रण होना चाहिए।

(iii) इन्हें केवल कार्यपालिका के प्रति उत्तरदायी कार्यपालिका के प्रति उत्तरदायी न होकर जनता के प्रति थी उत्तरदायी होना चाहिए।

(iv) इसमें विभिन्न वर्गों को प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए।

(v) प्रशासनिक न्यायाधिकरण स्थापित किया जाना चाहिए।

(vi) प्रशासकों और प्रशासितों के बीच में संचार-व्यवस्था प्रभावशाली होनी चाहिए।

(vii) इसे सामान्य जनता का सहयोग प्राप्त करना चाहिए।

नौकरशाही और मन्त्रिपरिषद् में सम्बन्ध– संसदीय व्यवस्था में मंत्रिपरिषद और लोक- सेवकों के बीच अत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। वास्तव में प्रशासन का समस्त भार इन दोनों पर ही होता है। मंत्रीगण प्रशासनसम्बन्धी नीतियों का निर्धारण करते हैं और लोकसेवक उनको कार्यान्वित करते हैं तथा उनको बनाने में भी मंत्रियों को सलाह देते हैं।

मन्त्रियों की प्रशासन अनभिज्ञता- संसदीय शासन में मंत्रीगण अपने-अपने विभागों के अध्यक्ष होते हैं। किन्तु वास्तव में उनको अपने विभागों के वास्तविक अनुभवों और प्रशासनिक बारीकियों का ज्ञान नहीं होता है। वे उस विभाग के विशेषज्ञ नहीं होते। उनके पास समय का अभाव भी होता है। उन्हें प्रशासन का ज्ञान भी नहीं होता है।

लोकसेवकों की प्रशासनिक विशिष्टता- लोकसेवक प्रशासन के मामलों में विशेषज्ञ होते हैं। वे नीति-निर्धारण का कार्य ही नहीं करते अपितु मंत्रियों को नीति निर्धारण के कार्य में सलाह भी देते हैं। सलाह का कार्य अत्यन्त महत्त्व रखता है। क्योंकि किसी नीति की सफलता- असफलता इसी सलाह पर निर्भर करती है। लम्बे समय से एक ही तरह का कार्य करते रहने के कारण उन्हें प्रशासन के क्षेत्र में पर्याप्त अनुभव प्राप्त हो जाता है। मंत्रियों को प्रशासन का कार्य चलाने हेतु इन अनुभवी लोकसेवकों पर निर्भर रहना पड़ता है।

अविशेषज्ञों और विशेषज्ञों के समन्वय से लाभ- कुछ विद्वानों का यह कहना है कि मंत्रियों के अविशेषज्ञ होने के कारण लोकसेवक प्रशासन का सर्वेसर्वा बन जाता है और मंत्रीगण केवल हस्ताक्षर करने की मशीन मात्र रह जाते हैं। किन्तु वास्तव में स्थिति यह है कि अविशेषज्ञों और विशेषज्ञों के समन्वय से लोकतंत्र का अत्यन्त लाभ होता है। राजनीतिक नेता के नाते मंत्रीगण जनता की इच्छा जानते हैं तथा जनता की इच्छा के अनुरूप ही नीतियों का निर्धारण करते हैं। इन नीतियों को कार्यान्वित करने में विशेषज्ञों की आवश्यकता होती है और इस कार्य को लोकसेवक सम्पन्न करते हैं। साथ ही लोकसेवकों का परामर्श मंत्रियों के लिए अत्यन्त लाभदायक होता है। मंत्री लोकसेवक के परामर्श को तभी मानता है जब उसे वह उचित लगता है। अनुचित समझने पर वह उसे मानता नहीं है। मंत्रियों को परामर्श देने का कार्य अत्यन्त महत्त्व रखता है। लोकसेवक को अपने इस उत्तरदायित्व का पूर्ण निर्वाह करना चाहिए।

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Pankaja Singh

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