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युवा सक्रियता की समस्या को नियन्त्रित करने के उपाय | असन्तोष की समस्या को नियन्त्रित करने के उपाय

युवा सक्रियता की समस्या को नियन्त्रित करने के उपाय | असन्तोष की समस्या को नियन्त्रित करने के उपाय

युवा सक्रियता या असन्तोष की समस्या को नियन्त्रित करने के उपाय

(Measures to Control the Problems of Youth Activism of Unrest)

यहां युवा सक्रियता या असन्तोष एवं अनुशासनहीनता की समस्या को हल करने हेतु कुछ सुझाव प्रस्तुत किये जा रहे हैं :

(1) शिक्षण प्रणाली में पायी जाने वाली कमियों को दूर करने की अत्यन्त आवश्यकता है। शिक्षाशास्त्रियों को इस ओर ध्यान देना होगा कि विभित्र विषयों के पाठ्यक्रमों में कौन-कौनसी बातें सम्मिलित करनी हैं और कौन-कौनसी नहीं। परीक्षा प्रणाली और मूल्यांकन के तरीके को भी बदलना होगा। यह तरीका इस प्रकार होना चाहिए कि विद्यार्थी को वर्ष भर पढ़ाई के कार्य में लगा रहना पड़े और मूल्यांकन में पढ़ाने वाले अध्यापक की सहभागिता हो। ऐसी स्थिति में कक्षा में नियमित रूप से कार्य हो सकेगा।

(2) अध्यापक-विद्यार्थी के सम्बन्धों में निकटता लाने का प्रयत्न किया जाय। योग्य व्यक्तियों को शिक्षा अधिकारियों के रूप में पद-भार संभालने का अवसर दिया जाय। ऐसे पदों पर राजनीतिक प्रभाव के आधार पर नियुक्तियां नहीं होनी चाहिए।

(3) शिक्षण संस्थाओं में विद्यार्थियों को इस प्रकार के अवसर उपलब्ध कराये जाने चाहिए कि छात्रों की नेतृत्व सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति मान्यता प्राप्त तरीकों से हो सके। यदि विद्यार्थियों की शक्ति का पूरा-पूरा उपयोग शिक्षण संस्थाओं में किया जाय तो राजनीतिज्ञों को उन्हें भड़काने और अपनी स्वार्थ-पूर्ति के लिए उनको शोषण करने का अवसर ही नहीं मिलेगा।

(4) शैक्षणिक प्रणाली में इस प्रकार से परिवर्तन किये जाने चाहिए कि वह स्वतन्त्र भारत के नवीन आदर्शों के अनुरूप विद्यार्थियों का समाजीकरण कर सके।

(5) शैक्षिक गतिविधियों में अध्यापकों एवं विद्यार्थियों की अधिकाधिक सहभागिता को प्रोत्साहित किया जाय। इसके लिए अध्यापक विद्यार्थी अनुपात को घटाने की जरूरत है।

(6) छात्र अनुशासनहीनता पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में बतलाया गया है कि विश्वविद्यालयों तथा कॉलेजों में राजनीतिक दलों के हस्तक्षेप और छात्र संघों के श्रमिक-संघों के रूप में कार्य करने को रोका जाय।

(7) शिक्षा एवं रोजगार में समन्वय स्थापित किया जाय ताकि युवकों को आर्थिक असुरक्षा की समस्या से मुक्ति मिल सके।

(8) नैतिक शिक्षा पर विशेष जोर दिया जिससे कि विद्यार्थियों के चरित्र निर्माण में सहायता मिल सके।

विश्वविद्यालय शिक्षा पर राधाकृष्णन कमीशन की रिपोर्ट में बतलाया गया है कि विद्यार्थी अनुशासनहीनता को केवल ऐसा वातावरण उत्पन्न करके ही समाप्त किया जा सकता है जिसमें लड़के-लड़कियों को अच्छे विद्यार्थियों के रूप में विकसित होने के उचित अवसर प्राप्त हो। ऐसा विद्यार्थियों को आत्म-सम्मान तथा आत्म-विश्वास विकसित करने का सुअवसर देकर ही किया जा सकता है। यह भी उसी समय सम्भव है, जब विद्यार्थियों को सन्देह तथा भय के वातावरण में रहने देने के बजाय उनमें विश्वास की प्रवृत्ति को उत्पन्न किया जाय। विद्यार्थियों के स्वतः ही अनुशानसपूर्ण जीवन व्यतीत करने के लिए कमीशन ने तीन सुझाव दिये है जो निम्न हैं : (1) विद्यार्थियों को अच्छी सरकार में रुचि लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, लेकिन दलगत राजनीति में नहीं, (2) एक परिवर्तित अनुशासकीय व्यवस्था जिसमें विद्यार्थी अधिक भाग लेंगे, अथवा विद्यार्थी सरकार विकसित की जानी चाहिए तथा (3) अध्यापक,

नरेन्द्र देव कमेटी ने युवा असन्तोष को दूर करने हेतु निम्नलिखित सुझाव दिये हैं : (1) प्रत्येक अध्यापक की देख-रेख में दस से पन्द्रह तक छात्रों को रखा जाना चाहिए। (2) अनुशासनबद्ध जीवन व्यतीत करने वाले छात्रों की सराहना की जानी चाहिए। (3) अभिभावकों एवं अध्यापकों की ऐसी संयुक्त समिति गठित की जानी चाहिए जो नवयुवकों में तनाव को दूर करने हेतु उपाय सुझाये। (4) शिक्षा-संहिता में प्रवेश की निर्धारित आयु से दो वर्ष के कम आयु के छात्र को भी कक्षा में प्रवेश की आज्ञा दी जाय। (5) प्रधानाध्यापक को ही छात्र को महाविद्यालय ने निष्कासित करने और शारीरिक दण्ड देने का अधिकार हो। (6) विद्यार्थियों में अनुशासन बनाये रखने के लिए प्रीफेक्ट व्यवस्था (Prefet System) प्रारम्भ की जानी चाहिए। (7) प्रत्येक विद्यार्थी को वर्ष में 40 घण्टे शारीरिक श्रम व समाज-सेवा के कार्यों में लगाया जाना चाहिए। (8) आकाशवाणी द्वारा युवकों के लिए विशेषतः उपयोगी कार्यक्रमों का प्रसार किया जाना चाहिए। (9) छात्रों को केवल वे ही चलचित्र दिखाये जायं जो उनके लिए उपयोगी हों। (10) विद्यार्थी की प्रगति एवं व्यवहार सम्बन्धी लेखा-जोखा दर्शाने वाला एक रजिस्टर बनाया जाना चाहिए।

विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग (कोठरी कमीशन, 1964-66) ने स्पष्ट किया है कि छात्र-व्यवहार के लिए न केवल शैक्षणिक व्यवस्था उत्तरदायी है बल्कि बाह्य कारक भी। कमीशन का कथन है कि शैक्षणिक प्रणाली में दो उपायों की आवश्यकता है : (1) विद्यार्थियों में असन्तोष पैदा करने करने वाली शैक्षिक कमियों को दूर करना, तथा (2) असन्तोष की घटनाओं के घटित होने को रोकने के लिए उचित सलाहकार तथा प्रशासकीय संगठन की स्थापना। शिक्षण संस्थाओं को अपने शैक्षाणिक स्तर को ऊंचा उठाने और शिक्षण की प्रणाली को उन्नत करने का प्रयत्न करना चाहिए ताकि विद्यार्थी यह महसूस कर सके कि वह निश्चित लक्ष्य के लिए सीखने की प्रक्रिया में भाग ले रहा है। साथ ही यह भी प्रयास होना चाहिए कि विद्यार्थी और अध्यापक के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध हो ताकि विद्यार्थी में यह आत्म-विश्वास जागृत किया जा सके कि अध्यापक को उसके कल्याण में पूर्ण रुचि है और उसकी सहायता से विद्यार्थी अपनी समस्याओं को हल कर सकता है।

मुदालियर आयोग ने युवा असन्तोष को दूर करने हेतु इस प्रकार सुझाव दिये हैं : (1) अध्यापक एवं छात्रों में निकट सम्पर्क कायम करने हेतु कक्षाओं में छात्रों की संख्या कम की जाय। (2) विद्यालयों में छात्र समितियों को अनुशासन बनाये रखने का कार्य सौंपा जाय। (3) छात्रों में अनुशासन के भाव जागृत करने के लिए सैनिक शिक्षा, सामूहिक खेल, रेड-क्रास तथा स्काउटिंग, आदि का उपयोग किया जाना चाहिए। (4) छात्रों को राजनीति में भाग लेने से रोका जाना चाहिए। (5) छात्रों को सामान्य धार्मिक शिक्षा दी जानी चाहिए, न कि किसी धर्म विशेष से सम्बन्धित। (6) छात्रों को चरित्र-निर्माण की शिक्षा दी जानी चाहिए। इसे प्रभावी बनाने के लिए विभिन्न संस्थाओं का सहयोग लिया जाना चाहिए। (7) अध्यापकों को समाज के निर्माता तथा श्रेष्ठ मानव होने का अनुभव कराया जाना चाहिए।

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Pankaja Singh

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