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बाल अपराधियों के सुधार हेतु कार्य | भारत में बाल अपराधियों के सुधार कार्य

बाल अपराधियों के सुधार हेतु कार्य | भारत में बाल अपराधियों के सुधार कार्य

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बाल अपराधियों के सुधार हेतु कार्य

बाल अपराधियों के सुधार हेतु कार्य – भारत में स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् से बाल-अपराधियों का सुधर कार्य पूर्णतया राज्यों को सौंप दिया गया। अब प्रत्येक राज्य बाल-अपराधियों की आयु के निर्धारण तथा उन्हें दी जाने वाली सुविधाओं से सम्बन्धित कानून बनाने के क्षेत्र में स्वतन्त्र है। यद्यपि बाल अपराधी की आयु विभिन्न राज्यों में कुछ विभिन्नता लिए हुए है, लेकिन साधारणतया 7 से 16 वर्ष तक की आयु के अपराधी को बाल अपराधी तथा 16 से 21 वर्ष की आयु तक के अपराधी को किशोर अपराधी की श्रेणी में रखा जाता है। विभिन्न राज्यों में इन दोनों श्रेणियों के बाल अपराधियों का सुधार करने के लिए जो प्रमुख प्रयत्न किये गये हैं, वे इस प्रकार हैं

(1) बाल न्यायालयों की स्थापना (Establishment of Juvenile Courts)-  भारत में सन् 1960 में बाल अधिनियम (Children’sAct,1960) पारित किया गया जिसके द्वारा बाल अपराधियों के मुकदमें की सुनवाई तथा उनके सुधार कार्य के लिए पृथक् बाल न्यायालयों तथा बाल कल्याण परिषदों (Child Welfare Boards) की व्यवस्था की गयी। भारत में अब लगभग सभी राज्यों में यह अधिनियम लागू किया जा चुका है। इसके अनुसार जब किसी बच्चे पर कोई अभियोग होता है तो उसकी सुनवाई अब केवल बाल न्यायालयों में ही की जाती है। यहाँ न तो न्यायालयों के समान वातावरण होता है और न ही किसी वकील के द्वारा जिरह की जाती है। न्यायाधीश साधारणतया कोई महिला होती है जो बहुत सहानुभूति के वातावरण में बच्चे तथा किशोर की मनोवृत्ति एवं अपराध के कारण को जानने का प्रयत्न करती है। यहाँ पुलिस भी सादे कपड़ों में रहती है तथा न्यायाधीश का कार्य कानूनी जटिलता में न पड़कर किशोर की वास्तविक समस्या को समझना तथा उसे सुलझाना होता है। सम्पूर्ण कार्यवाही इस प्रकार की जाती है कि बच्चे के मन में किसी प्रकार का भय उत्पन्न न हो।

(2) पोषण तथा सहायक गृह (Foster and Auxiliary Homes) – पोषण गृह वे स्थान हैं जहाँ 10 वर्ष से कम आयु के ऐसे बाल अपराधियों को रखा जाता है जिन्हें प्रमाणित स्कूलों में नहीं रखा जा सकता। इसके अतिरिक्त इन गृहों में उन बच्चों को भी रखने की व्यवस्था की जाती है जो माता-पिता के परित्याग, कैद अथवा मृत्यु के कारण आवारा जीवन व्यतीत करते हैं तथा जिनके बाल अपराधी बन जाते की आशंका होती है। इस प्रकार पोषण गृह बच्चों को बाल अपराधी बनने से रोकने का भी कार्य करते हैं। साधारणतया पोषण गृह सरकार द्वारा सहायता प्राप्त ऐच्छिक संगठनों द्वारा चलाये जाते हैं।

(3) सुधार गृह (Reformatory Homes) –  बाल अपराधियों के सुधार के लिए स्थापित संस्थाओं में सुधार गृहों का विशेष महत्त्व है। अब सुधार गृह अधिनियम के अन्तर्गत 7 से 16 वर्ष के जिन बाल अपराधियों को न्यायालय द्वारा कारावास अथवा नजरबन्दी (Detention) का आदेश दिया जाता है, उन्हें सुधार गृह में रखने का प्रावधान है। इन सुधार गृहों में बाल अपराधी को कम से कम तीन वर्ष तक तथा अधिक से अधिक सात वर्ष के लिए रखा जाता है। कुछ विशेष परिस्थितियों में 18 वर्ष तक के किशोर अपराधी को भी सुधार गृह में भेजा जा सकता है, लेकिन ऐसी दशा में उसे सुधार गृह में तीन वर्ष से अधिक समय तक नहीं रखा जा सकता। सुधार गृहों का उद्देश्य बच्चे को अपना सुधार स्वयं करने की प्रेरणा देना तथा उसे जेल के दूसरे गम्भीर तथा पेशेवर अपराधियों की दोषपूर्ण संगति से बचाना है।

(4) रिमाण्ड गृह (Remand Homes) –  बाल-अपराधियों का सुधार करने के उद्देश्य से अब पकड़े गये बाल अपराधी को न्यायाधीश के सामने प्रस्तुत करने के समय तक पुलिस की हिरासत में न रखकर एक विशेष सदन अथवा गृह में रखा जाता है जसे ‘रिमाण्ड गृह’ कहा जाता है। बच्चे को किसी रिमाण्ड गृह में लाने के बाद उसे 24 घण्टे के अन्दर किसी न्यायाधीश के सामने पेश करना आवश्यक होता है। इसके पश्चात् जब तक बच्चे का मामला न्यायालय के विचाराधीन रहता है, बच्चा रिमाण्ड गृह में ही रहता है। यहाँ बच्चे द्वारा किये गये अपराध की खोजबीन तथा उसकी सत्यता को ज्ञात करने का प्रयत्न किया जाता है। अन्त में यदि बच्चा दोषी पाया जाता है तो न्यायालय द्वारा दी जाने वाली सजा का आदेश लगभग एक सप्ताह के लिए स्थगित कर दिया जाता है। इस बीच परिवीक्षा अधिकारी अथवा किसी अन्य अधिकारी की संस्तुति के आधार पर न्यायालय यह निर्णय ले लेता है कि बच्चे को रिमाण्ड गृह में ही कुछ दिन रखकर छोड़ दिया जाय अपयवा उसे किसी अन्य संस्था में भेज दिया जाय। साधारणतया रिमाण्ड गृह स्वयं-सेवी कल्याण संगठनों द्वारा संचालित किये जाते हैं तथा इन्हें जनता एवं सरकार की ओर से आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है।

(5) बोर्स्टल संस्थाएं (Borrstal Institutions)-  अनेक राज्यों में आज बोर्स्टल स्कूल अधिनियम भी लागू है। इसके अनुसार 15 से 21 वर्ष तक के किशोर अपराधियों को एक पृथक् सुधार संस्था, जिसे बोर्स्टल संस्था कहा जाता है, में रखने की व्यवस्था है। सुधार गृहों में केवल 16 वर्ष तक के बाल-अपराधियों को ही भेजा जाता है, जबकि इन संस्थाओं में 21 वर्ष तक के किशोर अपराधियों को रखने के कारण इनका दायित्व दायित्व और अधिक बढ़ जाता है। ऐसी सुधार संस्था सबसे पहल ने बोर्स्टल नामक स्थान पर आरम्भ की गयी थी, इसलिए इसे बोर्स्टल संस्था के नाम से जाना जाता है। बोर्स्टल संस्थाएँ दो प्रकार की होती हैं – खुली तथा बन्द (Open and Close) संस्थाएँ। बन्द बोर्स्टल संस्था की प्रकृति जेलों के काफी समान होती है, यद्यपि यहाँ भी किशोर अपराधियों से किसा जाने वाला व्यवहार बहुत सहानुभूतिपूर्वक होता है। इन संस्थाओं में जेल की चहारदीवारी अवश्य होती है लेकिन मुख्य फाटक खुला रहता है। अपराधियों से शारीरिक श्रम करवाने के साथ ही उन्हें औद्योगिक प्रशिक्षण, नैतिक शिक्षा, घरेलू कार्यों तथा संगीत आदि की भी सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं। खुली बोर्स्टल संस्था एक शिविर (Camp) के रूप में अथवा बिना चहा रदीवारी की इमारत के रूप में होती है। यहाँ के स्वतन्त्र वातावरण में अपराधी को मानवीय मूल्यों के प्रति अधिक जागरूक बनाने का प्रयत्न किया जाता है।

(6) प्रमाणित स्कूल (Certifield School) –  जिन राज्यों में बाल अधिनियम लागू है, वहाँ सामान्य मस्तिष्क के कम आयु वाले बाल-अपराधियों के सुधार हेतु प्रमाणित स्कूलों की भी स्थापना की गयी है। प्रमाणित स्कूलों का संचालन स्वयं-सेवी संगठनों अथवा स्थानीय अधिकारियों द्वारा किया जाता है तथा इसके व्यय की व्यवस्था चन्दे और सरकारी अनुदान द्वारा की जाती है। प्रमाणित स्कूल भी दो प्रकार के होते हैं – एक तो वे जिनमें 10 से 12 वर्ष की आयु तक के बाल- अपराधियों को रखा जाता है तथा दूसरी श्रेणी उन स्कूलों की है जिनमें 12 से 16 वर्ष तक के बच्चों को रखा जा सकता है। प्रथम श्रेणी के विद्यालयों में बाल-अपराधियों को सामान्य शिक्षा ही प्रदान की जाती है, जबकि दूसरी श्रेणी के प्रमाणित विद्यालयों में सामान्य शिक्षा के साथ बच्चों को औद्योगिक शिक्षा प्रदान करने की भी व्यवस्था होती है। इन स्कूलों में बच्चे को साधारणतया दो वर्ष से तीन वर्ष तक की अवधि के लिए रखा जाता है, लेकिन बच्चे को व्यवहार अच्छा होने पर उसे दण्ड की अवधि पूरी होने से पहले भी मुक्त किया जा सकता है।

(7) परिवीक्षा सेवाएँ (Probating Services) –  बाल अपराधियों के सुधार में परिवीक्षा सेवाएँ भी अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं। सन् 1958 में केन्द्र सरकार द्वारा ‘अपराधियों के लिए परिवीक्षा अधिनियम’ (Probation of Offender’s Act, 1958) पारित किया गया। इस अधिनियम में यह व्यवस्था है कि न्यायालय द्वारा 21 वर्ष से कम आयु वाले अपराधी को दण्ड देते समय परिवीक्षा अधिकारी की जांच रिपोर्ट पर अवश्य विचार किया जाय। इस अधिनियम में यह भी व्यवस्था की गयी है कि यदि 21 वर्ष की आयु से कम के अपराधी को परिवीक्षा पर न छोड़कर जेल में रहने का आदेश दिया जाता है तो ऐसे आदेश के साथ न्यायालय को निश्चित कारणों का उल्लेख करना होगा। उत्तर प्रदेश प्रथम अपराधी परिवीक्षा अधिनियम (U.P. First Offender’s Probation, Act. 1938) में पहले से ही यह व्यवस्था है कि यदि पहली बार बाल अपराध करने वाले 21 वर्ष से कम के अपराधी को दी जाने वाली सजा 6 माह से अधिक नहीं है तो उसे अनिवार्य रूप से प्रोबेशन पर छोड़ दिया जायगा। वास्तव में परिवीक्षा अधिकारी अपने समाजशास्त्रीय तथा मनोवैज्ञानिक ज्ञान की सहायता से बाल अपराधी के अपराध की परिस्थितियों को समझने का प्रयत्न करता है तथा परिवीक्षा की अवधि में उसकी मनोवृत्तियों को बदलकर उसे पुनः एक अच्छा नागरिक बनाने का प्रयत्न करता है।

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Pankaja Singh

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