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बाल अपराध निरोध | किशोर अपराध की रोकथाम | किशोर अपराध की रोकथाम के उपाय

बाल अपराध निरोध | किशोर अपराध की रोकथाम | किशोर अपराध की रोकथाम के उपाय

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बाल अपराध निरोध क्या है?

आज के बालक कल के समाज का निर्माण करने वाले होते हैं। उनके स्वस्थ व्यक्तित्व के द्वारा ही दृढ़ और शक्तिशाली समाज का निर्माण हो सकता है। अपराधी बालक किसी मकान की उन कमजोर ईंटों के समान होते हैं जिन पर खड़ी इमारत शीघ्र ही धराशायी हो जाती है। अतः किसी भी समाज की प्रगति और समृद्धि के लिए बाल अपराधों की रोकथाम आवश्यक है। बालकों की अपराधी-प्रवृत्ति को रोकने के लिए परिवार, शिक्षालय तथा समाज सभी को संयुक्त प्रयास करना होगा।

लोवेल कार (Lowell Carr) का कहना है कि बाल अपराध निरोध के लिए निम्नलिखित बातों की ओर ध्यान देना चाहिए-

(1) बच्चों के सामजिक कार्यो का पता लगाना,

(2) असामाजिक कार्यों के कारणों की खोज,

(3) उनके उपचार की प्रविधियों की जानकारी,

(4) निरोध की प्रविधियों की जानकारी,

(5) लोगों के आनुवंशिक गुणों को सुधारना।

इसी तरह इलियट ने ‘स्कूल’ को तथा सेठना (M. J. Sethna) ने ‘आदर्श शिक्षा व्यवस्था को बाल अपराध निरोध के लिए आवश्यक बताया है, लेकिन इन सब उपायों के बावजूद निम्नलिखित उपायों को भी काम में लाना चाहिए

(1) शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की ओर ध्यान- अनेक बालक शारीरिक एवं मानसिक रोगों के कारण अपराधी हो जाते हैं, अतः उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की समुचित देख-रेख होती रहनी चाहिए और उन्हें स्वस्थ रखने की पूरी कोशिश की जानी चाहिए।

(2) प्रेम और सहानुभूति- बालकों के साथ यथासंभव प्रेम और सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार उनके व्यक्तित्व को उचित मान्यता और आदर देना चाहिए। इससे अच्छा बनने की प्रेरणा मिलती है।

(3) अच्छे वातावरण का सृजन- घर और विद्यालय का वातावरण सुन्दर, स्वास्थ्यप्रद, आनन्ददायक और शान्तिप्रद बनाया जाना चाहिए। विद्यालय में अच्छी फुलवरी, साफ-सुथरा भवन, खेल का मैदान, व्यायामशाला, उठने-बैठने का उचित स्थान, अच्छा पुस्तकालय आदि होना चाहिए। घर में भी इसी तरह के वातावरण का सृजन होना चाहिए क्योंकि इन सबसे अपराधी बालकों का ध्यान विद्यालय की ओर आकृष्ट होता है और इधर-एधर भागने की इच्छा कम हो जाती है। अच्छे वातावरण में अपराध करने का अवसर कम मिलता है।

(क) मनोनाट्य विधि (Psychodrama Method)-  इस विधि के अन्तर्गत पहले मनोवैज्ञानिक साक्षात्कार द्वारा समस्याग्रस्त बालक का अध्ययन करता है। उसकी समस्या तथा अपराध की प्रकृति का अध्ययन कर लेने के बाद बालक को प्रधान पात्र की भूमिका दी जाती है। उसमें और सहायक पात्र भी आवश्यकतानुसार होते हैं। अपराधी बालक अभिनय करता है। मनोवैज्ञानिक उसका निरीक्षण करता है और बीच-बीच में उससे प्रश्न भी करता जाता है। अभिनय करते समय जिस स्थान पर वह संवेगात्मक अनुभूति करता है, उसका भी अध्ययन कर लिया जाता है। इस तरह अपराध की समस्या से मिलता-जुलता एक अभिनय चुनकर उसके माध्यम से बालक की भावनाओं का रेखांकन करने की कोशिश की जाती है।

(ख)मनोविश्लेषण विधि (Psychoanalytical Method)- अचेतन मन की दबी हुई इच्छाओं को खोजकर उसके द्वारा उत्पन्न गड़बड़ी, जो बालक के व्यवहार में अपराध के रूप में दिखायी देती है, विशिष्ट विधियों के द्वारा ठीक की जाती है।

(3) सरकारी विधि- सरकार की ओर से बाल-अपराधियों को सुधारने के लिए अनेक विधियों का झुकरण किया जाता है। इन सभी विधियों की विशेषता यह है कि वयस्क अपराधियों की भाँति बाल अपराधी को प्रत्यक्षतः दण्डित नहीं किया जाता है। यथासम्भव यह प्रयास किया जाता है कि उनका सुधार हो जाय। कुछ प्रमुख सरकारी विधियाँ इस प्रकार हैं –

(क) प्रोबेशन (Probation)-  इस विधि में 18 वर्ष से कम आयु वाले किशोरों को ही शामिल किया जाता है। उन्हें न्यायालय द्वारा दण्डित न करके एक प्रोबेशन अफसर की देख-रेख में रख दिया जाता है। यह अफसर किशोरों को उनके माता-पिता के घर पर ही अपने संरक्षण में रखता है और सुधारने प्रयास करता है। वह अपराधी के चरित्र के बारे में न्यायालय को अपनी रिपोर्ट भेजता रहता है। प्रोबशन अफसर के निम्न काम होते हैं-

(1) वह अपराधी के जीवन का अध्ययन करता है,

(2) वह अपराधी के अपराध का कारण जानकर उसके निदान का प्रयास करता है,

(3) वह अपराधियों को अपने संरक्षण में रखकर सुधारने की कोशिश करता है,

(4) वह अपराधियों को समाज का अच्छा नागरिक बनाने का प्रयास करता है और उसे जीविका भी दिलाता है तथा

(5) जो अपराधी सुधर नहीं पाते, उन्हें वह कारागार भिजवा देता है।

(ख)सुधारगृह (Reformatories)- सुधारगृहों में बाल-अपराधियों का सुधार उद्योग- धन्धों के माध्यम से किया जाता है। इसमें बाल अपराधियों को कोई उद्योग करने को दे दिया जाता है। काम में लग जाने से उनकी शक्तियों का सदुपयोग होने लगता है और अपराध की ओर से उनका ध्यान हट जाता है। ये एक प्रकार से औद्योगिक विद्यालय होते हैं।इस प्रकार के सुधारगृह किशोरों और वयस्कों दोनों के लिए अलग-अलग हैं।

(ग) किशोर न्यायालय (Juvenile Courts)-  किशोर न्यायालय वयस्कों के न्यायालय से भिन्न होते हैं। इनमें न तो वकील होते हैं और न बहसें होती हैं। न्यायाधीश, जिनमें स्त्रियाँ भी होती हैं, अपराधी बालकों के साथ स्नेह, प्रेम, वात्सल्य के साथ व्यवहार करते हुए मनोवैज्ञानिक ढंग से पहले उनके अपराध के कारणों को समझने का प्रयास करते हैं। फिर यह तय करते हैं कि बालक को सुधारने के लिए क्या उपाय किये जायें। उनका लक्ष्य अपराधियों को सुधारना होता है न कि दण्ड देना।

(घ) बोर्स्टल विद्यालय (Borstal School)-  इस विद्यालय में 16-21 वर्ष के बाल- अपराधियों को रखा जाता है। यहाँ बालकों में इस प्रकार सुधार और परिवर्तन किया जाता है कि अपराधी स्वयं अपने अपराध को छोड़ देते हैं। सुधार न होने पर उन्हें बन्दीगृह भेज दिया जाता है। भारत में तमिलनाडु, कनार्टक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात में एक-एक बोर्स्टल विद्यालय है।

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Pankaja Singh

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