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अतः पीढ़ी संघर्ष का अर्थ | अन्तः पीढ़ी संघर्ष के कारण | अन्तर-पीढ़ी संघर्ष के प्रमुख स्वरूप | अन्तर-पीढ़ी संघर्ष के प्रमुख प्रकार | अन्तर-पीढ़ी संघर्ष की उदीयमान प्रवृत्तियां

अतः पीढ़ी संघर्ष का अर्थ | अन्तः पीढ़ी संघर्ष के कारण | अन्तर-पीढ़ी संघर्ष के प्रमुख स्वरूप | अन्तर-पीढ़ी संघर्ष के प्रमुख प्रकार | अन्तर-पीढ़ी संघर्ष की उदीयमान प्रवृत्तियां

अतः पीढ़ी संघर्ष का अर्थ

(Meaning of Infra-generation Conflict)

जहाँ एक ही पीढ़ी के लोगों के बीच किन्हीं कारणों से आपस में तनाव, वैमनस्य एवं संघर्ष की स्थिति पायी जाती है, इसे अन्तःपीढ़ी संघर्ष के नाम से सम्बोधित किया जाता है। दो राजनीतिक गुटों, दो विद्यार्थी समूहों, दो व्यावसायिक अथवा व्यापारिक संघों के बीच पाया जाने वाला संघर्ष अन्तःपीढ़ी संघर्ष के अन्तर्गत ही आता है। एक ही पीढ़ी से सम्बन्धित दो धार्मिक गुटों के मध्य पाया जाने वाला संघर्ष भी अन्तःपीढ़ी संघर्ष ही है। एक ही पीढ़ी के लोगों में राजनीतिक कारणों से भी संघर्ष पाया जाता है। जहाँ विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होती है, वहां राजनीतिक आधार पर लोग अलग-अलग विचारधाराओं में बंद जाते हैं। कुछ साम्यवादी विचारधारा में तो कुछ प्रजातान्त्रिक विचारधारा में, कुछ उदारवादी अर्थव्यवस्था में तो कुछ स्वदेशी विचारधारा पर आधारित अर्थव्यवस्था में विश्वास करते हैं। कुछ सामाजिक परिवर्तन लाने हेतु हिंसक तरीकों पर तो अन्य अहिंसक तरीकों पर विश्वास करते हैं। फलस्वरूप एक ही पीढ़ी के भिन्न-भिन्न मूल्यों, विचारधाराओं एवं पद्धतियों में विश्वास करने वाले लोगों में संघर्ष पाया जाता है। परिवार और जाति के क्षेत्र में भी पारस्परिक समन्वय के अभाव के कारण आज कल अन्तःपीढ़ी संघर्ष देखने को मिलते हैं। गाँवों में पंचायती राज संस्थाओं में भी विभिन्न स्तरों पर एक ही पीढ़ी के लोगों के बीच संघर्ष पाया जाता है। राजनीतिक गुटबन्दी ने अन्तःपीढ़ी संघर्ष को बढ़ाने में विशेष योग दिया है। शिक्षा के प्रमुख केन्द्रों विद्यालयों तक में अन्तः पीढ़ी संघर्ष दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है।

अन्तः पीढ़ी संघर्ष के कारण

(Causes of Intra-genera Conflict)

अन्तः पीढ़ी संघर्ष के लिए अनेक कारण उत्तरदायी हैं। सुविधा के लिए इन कारणों को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया जा सकता है।

(1) मनोवैज्ञानिक कारण (Psycological Causes) – अन्तःपीढ़ी संघर्ष के विभिन्न कारणों में से मनोवैज्ञानिक कारण ही मूल कारण कहे जा सकते हैं। विभिन्न समूहों के लोगों में परस्पर ईर्ष्या, द्वेष की भावनायें, संघर्ष की अभिवृत्तियों, पूर्व धारणायें (Prejudices), रूढ़ियुक्तियाँ (Stercolypes), अविश्वास, घृणा, द्वेष, भय आदि मनोवैज्ञानिक कारक मुख्यतः अन्तःपीढ़ी संघर्ष के लिए उत्तरदायी होते हैं। इसके अतिरिक्त आत्म सम्मान एवं आतम प्रदर्शन की भावनायें अन्तःपीढ़ी संघर्ष को और अधिक प्रबल बना देती है।

(2) ऐतिहासिक कारण (Historical Causes) –  विभिन्न समूहों के लोग में तनाव को जन्म देने में ऐतिहासिक कारणों का मुख्य स्थान रहता है। वर्तमान समय में हिन्दुओं, मुसलमानों तथा सिक्खों के बीच जो तनाव की स्थिति है, वह ऐतिहासिक कारणों के फलस्वरूप है। जब मुसलमान लोग भारत में आये थे तभी से हिन्दू लोग उन्हें विदेशी समझने लगे और उसका परिणाम यह हुआ कि आज भी हिन्दू मुस्लिम तनाव यहाँ पर पाया जाता है।

(3) भौतिक कारण (Physical Causes)-  विभिन्न प्रानतों या क्षेत्रों के रहने वाले लोगों की बनावट, वेश-भूषा, खान-पान इत्यादि भिन्न-भिन्न हैं। मद्रासी, पंजाबी, बंगाली इत्यादि को देखते ही पता चल जाता है कि ये भिन्न-भिन्न प्रान्तों या क्षेत्रों के रहने वाले हैं। इन भौतिक आधारों पर एक प्रान्त का व्यक्ति दूसरे प्रान्त के व्यक्ति से अपने को बिलग समझने लगता है। यह विभिन्नता ही पूर्वाग्रहों को जन्म देती है जिसका स्वाभाविक परिणाम सामूहिक तनाव है।

(4) सामाजिक कारण (Social Causes) –  जब एक समूह के व्यक्तियों का स्तर दूसरे समूह के व्यक्तियों के सामाजिक स्तर से काफी ऊंचा या नीचा होता है तो इस प्रकार की सामाजिक दूरी (Social Distance) के परिणाम स्वरूप उनमें परस्पर द्वेष की भावना घर कर लेती है। उदाहरणार्थ ऊँची जातियों तथा हरिजनों के बीच अन्तःपीढ़ी संघर्ष की स्थिति रहती है।

(5) धार्मिक कारण (Religious Causes)-  भिन्न-भिन्न धर्मों के परिणामस्वरूप भी अन्तःपीढ़ी संघर्ष की उत्पत्ति होती है। हम देखते हैं कि हमारे देश में हिन्दू तथा मुसलमानों के बीच सर्वदा तनाव बना रहता है।

(6) साँस्कृतिक कारण (Cultural Causes) –  जनरीतियाँ, प्रथायें, भाषा, साहित्य, रहन-सहन की विभिन्नता इत्यादि साँस्कृतिक तत्वों के कारण प्रायः सामूहिक तनाव की स्थिति का सामना करना पड़ता है। वर्तमान समय में भारत में जो राष्ट्र भाषा हिन्दी के विरुद्ध अन्य अहिन्दी भाषी विरोध कर रहे हैं वह एक प्रकार का अन्तःपीढ़ी संघर्ष ही तो है।

(7) आर्थिक एवं राजनैतिक कारण (Economic and Political Causes)-  आर्थिक तथा राजनैतिक मामलों को लेकर भी विभिन्न समूहों में तनाव की स्थिति देखी जाती है। श्रमिकों तथा उद्योगपतियों के बीच आर्थिक प्रश्नों के आधार पर ही तनाव बना रहता है। इसी प्रकार राजनैतिक समस्याओं के आधार पर विभिन्न राजनैतिक दलों (Political Parties) के बीच प्रायः तनाव की स्थिति देखी जाती है।

अन्तर-पीढ़ी संघर्ष के प्रमुख स्वरूप या प्रकार

(Major Forms or Types of Inter-generation Conflict)

वर्तमान समय में अन्तर-पीढ़ी संघर्ष एक सार्वभौमिक प्रक्रिया बन गई है। विश्व का ऐसा कोई आधुनिक समाज न होगा जिसमें अन्तर-पीढ़ी संघर्ष के एकाधिक स्वरूप न पाये जाते हो। भारत में अन्तर पीढ़ी संघर्ष की स्थिति विशेष तौर से स्वतन्त्रता के उपरान्त उत्पन्न हुई है। भारत में अन्तर-पीढ़ी संघर्ष के निम्नलिखित स्वरूप विशेष रूप से देखने को मिलते हैं

(1) माता-पिता एवं बच्चों के मध्य संघर्ष (Conflict between Parents and Children)|

(2) सास-श्वसुर एवं बहू के मध्य संघर्ष (Conflict between Parents-in-law and daugther-in-law))।

(3) प्रधानाचार्य एवं विद्यार्थियों के मध्य संघर्ष (Cnflict between Principal and Students)।

(4) शिक्षकों एवं शिक्षार्थियों के मध्य संघर्ष (Conflict between Teacher and Students)।

(5) अधिकारी एवं कर्मचारियों के मध्य संघर्ष (Conflict between Officer and Staff)।

(6) पुराने नेताओं एवं युवा नेताओं के मध्य संघर्ष (Conflict between Old leaders and Youth Leaders)।

(7) परिपक्क एवं युवा अधिवक्ताओं में संघर्ष (Conflict between Senior Advocate and Youth Advocate)|

(8) पुराने कर्मचारियों एवं नये कर्मचारियों में संघर्ष (Conflict Between Old Personnel and New Personnel)|

अन्तर-पीढ़ी संघर्ष के उपर्युक्त स्वरूपों में से प्रथम दो स्वरूप विशेष महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये दो स्वरूप ही अन्य स्वरूपों के उत्पन्न होने में सहायक होते हैं। अतः हम इन स्वरूपों पर प्रथम शीर्षकों में प्रकाश डाल रहे हैं।

अन्तर-पीढ़ी संघर्ष की उदीयमान प्रवृत्तियां

भारतीय समाज में अन्तर पीढ़ी संघर्ष के प्रभाव के रूप में अनेक उदीयमान प्रवृत्तियों के दर्शन होते हैं। संक्षेप में हम इन्हें निम्नलिखित बिन्दुओं (Points) के रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं

(1) भारतीय समाज में विखण्डित परिवारों की संख्या में दिन-प्रति-दिन वृद्धि व बढ़ोत्तरी हो रही है।

(2) सामान्य रूप से पुत्र अपने माता-पिता से पृथक रहना पसन्द करते हैं हां यह बात अवश्य है कि कुछ लोग अलग रहते हुये उनके प्रति परम्परागत दायित्व का निर्वाह करना जारी किये हैं।

(3) अन्तर पीढ़ी संघर्ष से उत्पन्न कुछ उल्लेखनीय उदीयमान या नवीन प्रवृत्तियां हैं – (1) प्रकार्यात्मक संयुक्तता नव स्थानीय आवास, (2) महिलाओं के लिये समान दर्जा (3) व्यक्तियों में समानता (4) संयुक्त जीवन साथी का चुनाव (5) परिवार के आदर्शों का टूटना।

(4) अन्तर-पीढ़ी संघर्ष के परिणामस्वरूप अधिकांश लोग विवाह के पश्चात अपनी पत्नी के साथ पृथक रहना पसन्द करते हैं ताकि वे 3 अपना दाम्पत्ति जीवन अधिक आनन्दपूर्वक व्यतीत कर सकें।

(5) एकाकी व केन्द्रीय परिवार तथा पृथक निव स के मुख्य कारण है – (1) परिवार के नियन्त्रण से मुक्ति (2) पारिवारिक संघर्षों से दूर रहना, (3) कुछ भी करने और कैसे भी रहने के लिए एक स्थान की प्राप्ति (4) अधिक एकांत जगह पाने की इच्छा, (5) आर्थिक स्वतंत्रता की प्राप्ति।

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Pankaja Singh

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