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वाइजमैन-पी-कॉक सिद्धान्त | सार्वजनिक व्यय में वृद्धि के वाइजमैन-पी-कॉक सिद्धान्त

वाइजमैन-पी-कॉक सिद्धान्त | सार्वजनिक व्यय में वृद्धि के वाइजमैन-पी-कॉक सिद्धान्त

वाइजमैन-पी-कॉक सिद्धान्त-

सार्वजनिक व्यय के वाइजमैन एवं पी-कॉक सिद्धान्त को वृद्धि के अध्ययन के क्रम में प्रस्तुत किया गया था। इनका विश्लेषण सार्वजनिक व्यय निर्धारण के राजनीतिक सिद्धान्त पर आधारित है। इस राजनीतिक सिद्धान्त के अनुसार सार्वजनिक व्यय का स्तर जनमत अथवा मतदान द्वारा प्रभावित होता है। पी कॉक एवं वाइजमैन मतदाता को ऐसा व्यक्ति मानते हैं जो सार्वजनिक वस्तुओं एवं सेवाओं का लाभ तो प्राप्त करना चाहता है किन्तु कर नहीं देना चाहता। अतः व्यय का निर्धारण लाते समय सरकार यह ध्यान रखती है कि सम्बन्धित कराधान के प्रस्ताव पर मतदाताओं की क्या प्रतिक्रियायें होंगी। इस प्रकार उनकी यह धारणा है कि ‘कराधान का एक सघन स्तर होता है। इस सघन स्तर से अधिक लोग कर नहीं देना चाहते परन्तु आपातकालीन परिस्थितियों जैसे युद्ध का सामना करने के लिए लोग अधिक कर देने के लिए तैयार हो जाते हैं, फलतः सार्वजनिक व्यय में वृद्धि हो जाती है। यद्यपि युद्ध के बाद सार्वजनिक व्यय में कमी होती है फिर भी वह युद्ध पूर्व स्तर से अधिक ही रहता है। सार्वजनिक व्यय की वृद्धि में इन अनिरन्तरताओं को ही पी- कॉक एवं वाइजमैन के ‘विस्थापन प्रभाव’ की संज्ञा दी गई है। विस्थापन प्रभाव न केवल सार्वजनिक व्यय में वृद्धि को, बल्कि उसके स्वरूप अधिमान ढाँचे में आयात को सांस्कृतिक-राजनीतिक परिवेश में सार्वजनिक व्यय को निर्धारित करने वाला मुख्य कारण माना जाना चाहिए।

पी-कॉप एवं वाइजमैन के अनुसार सार्वजनिक व्यय में वृद्धि निरन्तर गति से नहीं बल्कि सीढ़ीनुमा ढंग से कई चरणों में होती है। इस प्रकार इन विद्वानों ने सार्वजनिक व्यय में वृद्धि को समय- सोपान के संदर्भ में व्यक्त किया है। इसी तथ्य को रेखाचित्र के द्वारा स्पष्ट किया गया है-

चित्र में (i) शान्ति के समय में सार्वजनिक व्यय A पर रहता है परन्तु युद्ध के कारण सुरक्षा-व्यय है में अचानक वृद्धि के फलस्वरूप व्यय बढ़कर B बिन्दु पर पहुँच जाता है ओर सार्वजनिक व्यय के बढ़ने की प्रवृत्ति बनी रहने के कारण सार्वजनिक व्यय का पथ BC पर रहता है।

(ii) युद्ध समाप्ति के बाद सार्वजनिक व्यय को पुनः D बिन्दु पर आ जाना चाहिए था और उसका पथ DE होना चाहिए था। परन्तु विस्थापन प्रभाव के कारण ऐसा नहीं होगा।

(iii) युद्ध समाप्ति के बाद सार्वजनक व्यय का पथ जैसा कि चित्र में दिखाया गया है CF या CH होगा जो यह प्रदर्शित करता है कि युद्ध के बाद सार्वजनिक व्यय में कमी होती है, फिर भी वह युद्ध पूर्व-स्तर से अधिक रहता है।

पी-कॉक एवं वाइजमैन ने विस्थापन प्रभाव के वर्णन के साथ ही निम्नलिखित दो अन्य प्रभावों की भी व्याख्या की है- (A) पर्यवेक्षण प्रभाव, (B) संकेन्द्रण प्रभाव।

युद्ध जैसे सामाजिक उथल-पुथल द्वारा सार्वजनिक व्यय में वृद्धि की अनिवार्यता के साथ ही पूर्व उपेक्षित समस्याओं पर ही सरकार को ध्यान केन्द्रित करना पड़ता है। उसे ही इन विद्वानों ने पर्यवेक्षण प्रभाव कहा है।

पी-कॉक एवं वाइजमैन ने इन प्रभावों के साथ ही ‘संकेन्द्रण प्रभाव’ को भी सार्वजनिक व्यय के वृद्धि में महत्वपूर्ण करक माना है। वास्तव में संकेन्द्रण प्रभाव का सम्बन्ध सार्वजनिक व्यय के कुल आकार से उतना नहीं है जितना कि इन व्ययों से सम्बद्ध केन्द्रीय, राज्य एवं स्थानीय सरकारों के उत्तरदायित्वों में होने वाले परिवर्तनों से है। इस प्रकार संकेन्द्रण प्रभाव के इन विभिन्न स्तरों पर की जाने वाली क्रियाओं की वृद्धि दरों के अन्तर को व्यक्त करता है।

मूल्यांकन-

पी-कॉक-वाइमैन अवधारणा के अनुसार किसी बड़ी गड़बड़ी के नहीं होने पर सार्वजनिक व्यय में वृद्धि स्थिर गति से होगी। 1960 के दशक के अन्तिम चरण में पश्चिमी देशों में सार्वजनिक व्यय में विस्फोट वृद्धि हुई। इस वृद्धि की व्याख्या किसी संकट या आपात स्थिति के रूप में नहीं हो सकती। यह कहना अधिक उचित होगा कि पी-कॉक-वाइजमैन अवधारणा केवल संकेत करती है। ठीक व्याख्या प्रस्तुत नहीं करती।

इस प्रकार सार्वजनिक व्यय में वृद्धि से सम्बन्धित इन विभिन्न सिद्धान्तों के अध्ययन के उपरान्त यह नहीं कहा जा सकता कि सार्वजनिक व्यय का कोई ऐसा सामान्य सिद्धान्त है तो सार्वजनिक व्यय में वृद्धि के लिए उत्तरदायी कारणों की व्याख्या करता है। इसका कारण यह है कि विभिन्न देशों में सार्वजनिक व्यय सम्बन्धी व्याख्या के लिए स्वतन्त्र कारण उपलब्ध नहीं है। वह आशा करना भी गलत है कि सार्वजनिक व्यय से सम्बद्ध जटिल व्यवहार को किसी एक मुख्य कारक व्याख्यात्मक कारक अथवा कारकों द्वारा व्यक्त किया जा सकता है। विभिन्न देशों की अपनी आर्थिक एवं गैर आर्थिक विशेषतायें हैं कि जिनके कारक सार्वजनिक व्यय के आकार एवं संरचना की किसी पर एक कारक या घटक के अन्दर समाहित नहीं किया जा सकता। इसके अतिरिक्त समय परिस्थितियों के साथ विभिन्न देशों की निर्णय प्रक्रिया में परिवर्तन हो जाता है, अतः सार्वजनिक व्यय में वृद्धि के लिए अनेक कारक उत्तरदायी है।

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Pankaja Singh

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