अर्थशास्त्र

सार्वजनिक व्यय के प्रभाव | सार्वजनिक व्यय के उत्पादन एवं वितरण पर पड़ने वाले आर्थिक प्रभाव

सार्वजनिक व्यय के प्रभाव | सार्वजनिक व्यय के उत्पादन एवं वितरण पर पड़ने वाले आर्थिक प्रभाव

सार्वजनिक व्यय के प्रभाव

 प्राचीन अर्थशास्त्रियों की यह धारणा कि सार्वजनिक व्यय अनुत्पादक होते हैं, आज निर्मूल सिद्ध हो चुकी है। सार्वजनिक व्यय धन वितरण की विषमताओं को कम करता है और आर्थिक विकास को बढ़ावा देता है। डॉ. डाल्टन का मत है कि “जिस प्रकार करारोपण को उत्पादन में कम-से-कम करनी रहनी चाहिए, उसी प्रकार सार्वजनिक व्यय को उत्पादन में अधिक-से-अधिक वृद्धि करनी चाहिए।

सार्वजनिक व्यय के अच्छे व बुरे दोनों प्रभाव पड़ते हैं। सार्वजनिक व्यय के प्रभावों क तीन शीर्षकों में अध्ययन कर सकते हैं-

(i) उत्पादन पर प्रभाव,

(ii)सार्वजनिक व्यय का वितरण पर प्रभाव,

(iii) सार्वजनिक व्यय के अन्य प्रभाव।

(i) उत्पादन पर प्रभाव-

डॉ. डाल्टन ने सार्वजनिक व्यय के उत्पादन पर पड़ने वाले प्रभावों को तीन शीर्षकों के अन्तर्गत रखा है-

(1) काम करने, बचत करने तथा विनियोग करने की क्षमता पर प्रभाव,

(2) काम करने, बचत करने एवं विनियोग करने की इच्छा पर प्रभाव,

(3) आर्थिक साधनों के हस्तान्तरण पर प्रभाव।

डाल्टन का विचार था कि “अन्य बातें समान रहने पर, जिस प्रकार करारोपण से उत्पादन में सम्भवतः कमी हो जाती है उसी प्रकार सार्वजनिक व्यय से इसमें सम्भवतः वृद्धि अवश्य होगी।”

(1) कार्य करने, बचत करने एवं विनियोग करने की क्षमता पर प्रभाव-

राज्य द्वारा किया गया व्यय व्यक्तियों के कार्य करने की शक्ति को अनेक प्रकार से प्रभावित कर सकता है। यदि सार्वजनिक व्ययों के प्रभाव के कारण दो के रोजगार स्तर पर अनुकूल प्रभाव पड़े तो इसमें उत्पादन स्तर बढ़ेगा, अन्यथा इसके विपरीत प्रभाव पड़ेंगे। “इसमें थोड़ा-सा भी संदेह नहीं हो सकता कि योग्यतापूर्वक ढंग से किए गये सार्वजनिक व्यय से उत्पादन में इस प्रकार वृदधि होनी चाहिए कि यदि करारोपण या अन्य किसी उपाय द्वारा कमी आती हो, जो इसे वित्त प्रबन्ध करने के लिए हो, बशर्ते उन्हें सावधानीपूर्वक चुना गया हो, तो इस नियंत्रण को पार कर देगा। सार्वजनिक व्यय द्वारा मनुष्यों की कार्य करने, बचत करने एवं विनियोग करने की क्षमता को निम्न प्रकार से प्रभावित किया जा सकता है-

(अ) वस्तुओं एवं सेवाओं का उचित प्रबन्ध- राज्य अपने व्ययों द्वारा निर्धन व्यक्तियों की सेवायें प्रत्यक्ष रूप से प्रदान करके इनकी कार्यक्षमता को बढ़ा सकता है। यदि सरकार द्वारा जीवन निर्वाह की वस्तुयें वस्तु मूल्य पर प्राप्त हों तो उनके जीवन सतर को बढ़ाया जा सकता है।

(ब) बचत शक्ति में वृद्धि- वचन दो प्रकार से सम्भव हो सकती है- उपभोग कम करके या आय को बढ़ाकर। सार्वजनिक व्यय से नागरिकों की आय बढ़ती है, अतः अधिक बचत सम्भव की जा सकती है। बचत करने की अच्छी सुविधायें होने से भी नागरिकों की बचत शक्ति को बढ़ाया जा सकता है।

(स) क्रय-शक्ति में वृद्धि- सार्वजनिक व्यय द्वारा क्रय-शक्ति का हस्तान्तरण राज्य से जनता में विभिन्न रूपों में किया जा सकता है और उनकी क्रय-शक्ति को बढ़ाया जा सकता है, जैसे- पेंशन, बेकारी व बीमारी भत्ते, वस्तुओं व सेवाओं पर किया गया व्यय आदि। इससे व्यक्तियों के जीवन स्तर में वृद्धि होकर उनके शारीरिक एवं मानसिक कल्याण में वृद्धि होती है परन्तु अल्पकाल में कार्यक्षमता नहीं बढ़ेगी, परन्तु दीर्घकाल में अवश्य वृद्धि होगी। अतः इस कठिनाई को दूर करने के लिए सरकार द्वारा (क) इस वर्ग की आय में धीरे-धीरे ही वृद्धि करनी चाहिए तथा (ख) यह सहायता नकदी में न होकर सस्ती वस्तुयें व सेवाओं के रूप में ही दी जानी चाहिए।

(द) सुविधायें प्रदान करना- सार्वजनिक व्यय द्वारा ऐसी सुविधायें प्रदान की जा सकती हैं जिनसे व्यक्ति को अपनी उत्पादक क्रियाओं को सम्पन्न करने में सहायता मिले और अधिकाधिक व्यक्तियों में उत्पादन शक्ति में कई गुना वृद्धि होती से कृषि उत्पादन तथा जल-विद्युत शक्ति के विकास से उद्योगों को प्रोत्साहन मिलता है।

(2) काम करने, बचत करने एवं विनियोग करने की इच्छा पर प्रभाव-

कार्य करने की इच्छा का अध्ययन करना एक मानसिक स्थिति है और इच्छा पर जो प्रभाव पड़ते हैं वह निम्न प्रकार हैं-

(अ) वर्तमान व्यय का प्रभाव- वर्तमान समय में सार्वजनिक व्यय करने से नागरिकों की आय में वृद्धि हो जाती है और उनकी कार्य करने की इच्छा भी कम हो जाती है क्योंकि वे कम काम करके भी पर्याप्त धन अर्जित कर लेते हैं।

(ब) भविष्य सम्बन्धी व्यय का प्रभाव- भविष्य में सार्वजनिक व्यय से प्राप्त होने वाले लाभ की आशा काम करने एवं बचत करने की इच्छा को प्रभावित करती है। यदि भविष्य में प्राप्त होने वाला अनुदान निश्चित तथा बिना शर्त के हो तथा जनता के भविष्य में काम करने तथा बचत करने से कोई सम्बन्ध न हो, तो यह व्यय लोगों के काम करने तथा बचत करने की इच्छा में कोई वृद्धि नहीं कर सकेगा, जैसे- युद्ध पेंशन व्यय। “यदि आय की माँग बेलोचदार है तो काम करने व बचत करने की इच्छा पर कुछ प्रतिबन्ध अवश्य रहेंगे।”

(3) आर्थिक साधनों के हस्तान्तरण पर प्रभाव-

सार्वजनिक व्यय के कारण आर्थिक साधनों का एक व्यवसाय से दूसरे व्यवसाय में स्थानान्तरण होता है। प्राचीन अर्थशास्त्री इस स्थानान्तरण को हानिप्रद मानते थे और राज्य का प्रत्येक हस्तक्षेप इस आबंटन को दोषपूर्ण बनाकर उत्पादन को कम कर देता है। डाल्टन का मत है, “भौतिक पूँजी का विकास मानव पूँजी या ज्ञान की लागत पर करना एक भूल है, जिससे हानि होगी और उत्पादन नहीं बढ़ेगी।”

यह हस्तान्तरण निम्न प्रकार का हो सकता है-

(अ) प्रत्यक्ष हस्तान्तरण- प्रत्यक्ष हस्तान्तरण में राज्य स्वयं व्यक्तियों के धन का उपयोग करता है, जो व्यक्तियों की उत्पादन शक्ति को बढ़ाता है। प्रत्यक्ष हस्तान्तरण में सरकार की ओर से जो धन सुरक्षा, नागरिक प्रशासन एवं समाज सेवाओं आदि पर व्यय किया गया उसे सम्मिलित करते हैं।

(ब) अप्रत्यक्ष हस्तान्तरण- जब सरकार स्वयं सार्वजनिक व्यय न करके देश में एक ऐसे उपयुक्त वातावरण का निर्माण कर दे कि उससे लोग स्वयं ही अपने पूँजी को किसी देश की ओर उत्साहित करने लगें तो उसे अप्रत्यक्ष हस्तान्तरण कहेंगे।

(स) एक स्थान से दूसरे स्थान को हस्तान्तरण- सार्वजनिक व्यय को एक स्थान से दूसरे स्थान को हस्तान्तरित किया जा सकता है। जिस क्षेत्र का औद्योगिक विकास करना हो उस क्षेत्र में उद्योगों के विकास की ओर सरकार पर्याप्त ध्यान देती है तथा जनता को ऋण व पूँजी आदि की अनेक सुविधायें प्रदान की जाती हैं।

(द) वर्तमान से भविष्य को हस्तान्तरण- सरकार आर्थिक साधनों को भविष्य के लिए व्यवस्थित ढंग से रखती है और इसी कारण बाँध, नहरें एवं विद्युत योजनाओं पर धन व्यय किया जाता है। नागरिकों में अल्प बचत योजना, बीमा एवं पेंशन फण्ड आदि रीतियों की सहायता से वर्तमान आय की भविष्य में व्यय के लिए हस्तान्तरित कर दिया जाता है। डाल्टन का मत है कि “मानव पूँजी का ज्ञान के स्थान पर भौतिक पूँजी के विकास को बढ़ावा देना एक त्रुटिपूर्ण नीति है, जो उत्पादन को घटायेगी।”हेन्सन का मत है कि “वर्तमान समय में पहले की अपेक्षा, अभौतिक सम्पत्ति जैसे- वैज्ञानिक ज्ञान, योग्यता, तकनीक प्रशिक्षण, व्यक्तिगत स्वास्थ्य एवं कार्यक्षमता, सामाजिक एकता और सहयोग स्थापित करने की क्षमता, अधिक महत्त्व रखती है।” डाल्टन का कथन है कि “जब सरकार स्वास्थ्य, मकानों और सामाजिक सुरक्षा पर व्यय करती है या बच्चे को निःशुल्क शिक्षा प्रदान करती है तो यह एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विनियोग होता है जो भौतिक पूँजी के स्थान पर मानवीय पूँजी का निर्माण करता है।”

(ii) सार्वजनिक व्यय का वितरण पर प्रभाव-

सार्वजनिक व्यय के द्वारा धनी एवं गरीब के मध्य धन व आय के वितरण में व्याप्त असमानता को दूर किया जा सकता है। अमीरों पर प्रगतिशील दर से करारोपण करके उससे प्राप्त धन को गरीबों के कल्याण पर व्यय किया जाता है। प्रो. पीगू का मत है कि “कोई भी कार्य जो गरीबों की वास्तविक आय के कुल भाग में वृद्धि करता हो सामान्यतया आर्थिक कल्याण में वृद्धि करता है।” सरकार प्रत्येक नागरिक को एक न्यूनतम जीवन- स्तर का आश्वासन देती है और यह कार्य तथा समाज की बढ़ती विषमता को दूर करने का कार्य करारोपण तथा सार्वजनिक व्यय द्वारा पूरा किया जा सकता है। यद्यपि दोनों की क्रियायें एक-दूसरे पर अवलम्बित है परन्तु यहाँ पर केवल सार्वजनिक व्यय के प्रभावों का ही अध्ययन करेंगे। सार्वजनिक व्यय की यह पद्धति उत्तम मानी जाती है जो आय की असमानता को कम करने की शक्तिशाली क्षमता रखती है।”

सरकार धन के वितरण में समानता दो प्रकार से स्थापित कर सकती है- करारोपण द्वारा एवं सार्वजनिक व्यय द्वारा। सार्वजनिक व्यय का वितरण पर अनुकूल या प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। डाल्टन ने राजकीय व्ययों को करों की भाँति तीन प्रकार का बताया है- आनुपातिक, प्रतिगामी एवं प्रगतिशील

(i) आनुपातिक- यदि समाज में विभिन्न व्यक्तियों को उनकी आय के अनुपात में ही सार्वजनिक व्यय सम्बन्धी लाभ दिये जायें तो उन्हें आनुपातिक व्यय कहेंगे, जैसे- मकान भत्ता 10 प्रतिशत दिया जाये।

(ii) प्रतिगामी- यदि किसी वर्ग से जिस वर्ग से जितनी आय प्राप्त हो सके अनुपात में कम लाभ सार्वजनिक व्यय के रूप में प्राप्त हो तो ऐसे व्यय को प्रतिगामी व्यय कहते हैं, जैसे- भारत की गरीबी के लिए शिक्षा पर व्यय न करके सरकारी व्यय को अमीरों के लिए किया जाये तो उसे प्रतिगामी व्यय कहेंगे।

(ii) प्रगतिशील- समाज में जिस वर्ग की आय कम हो उसे उसी अनुपात में व्यय कर अधिक लाभ प्रदान किया जाये तो उसे प्रगतिशील व्यय कहेंगे, जैसे- निर्धनों के लिए निःशुल्क शिक्षा, चिकित्सा पर व्यय आदि।

समाज में असमानता को कम करने के लिए प्रगतिशील व्यय को उत्तम माना जाता है। सार्वजनिक व्यय जितना तीव्र प्रतिगामी होगा, आय की असमानता उतनी ही अधिक बढ़ेगी तथा व्यय जितना प्रगतिशील होगा, आय की असमानता उतनी ही अधिक तेजी से कम होगी। सामाजिक कल्याण की दृष्टि से यह आवश्यक है कि सार्वजनिक व्यय प्रगतिशील आधार पर किया जाये।

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Pankaja Singh

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