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उत्सर्ग एकाकी की व्याख्या | रामकुमार वर्मा की एकाकी उत्सर्ग

उत्सर्ग एकाकी की व्याख्या | रामकुमार वर्मा की एकाकी उत्सर्ग

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रामकुमार वर्मा-उत्सर्ग

  1. “तुमने कभी स्त्री के हृदय की थाह नहीं ली कि वह प्रेम करते समय समुद्र से भी अधिक गहरी और गम्भीर हो जाती है और निराशा होने पर आग की लपट से भी अधिक भयानक, जिसकी एक-एक चिनगारी से सारा जीवन जल-जलकर बुझता है, जिससे उसे बार-बार जलना पड़े। जैसे हृदय के पास निकलता हुआ एक फोड़ा हो, जो हृदय की धड़कन से दर्द करे।’

सन्दर्भ – प्रस्तुत गद्य अवतरण सुप्रसिद्ध एकांकीकार डॉ. रामकुमार वर्मा द्वारा रचित ‘उत्सर्ग’ शीर्षक एकांकी से-

व्याख्या – छाया वैज्ञानिक को शुष्कता का प्रतिरूप कहती है। वह डॉ, शेखर पर अपने प्रति उपेक्षा, अवमानना, तिरस्कार का आरोप लगाते हुए कहती है कि वैज्ञानिक चाहे जितना यन्त्रों के आविष्कार करने में सफलता प्राप्त कर लें, सुख-सुविधा के नये-नये आयाम खोज लें, कल्पनातीत क्षितिज को छू लें, लेकिन प्रेम में अनुरक्त नारी के हृदयस्थल की गहराई को छू पाने में असफल रहते हैं। डा. शेखर तुम चाहे कितने महान वैज्ञानिक क्यों न बन जाओ लेकिन नारी हृदय के मर्म को समझने की शक्ति तुममें नहीं है। प्रेम विह्वल नारी का हृदय कितना गहरा होता है? उसमें कितना असीम प्रेम भरा है। तुम इसे नहीं जानते हो। इस तथ्य को भली-भांति समझ लें कि समुद्र में जितना जल है और उसकी गहराई जितनी अधिक होती है- यही प्यार-असीम और गहरा प्यार नारी के मन में अपने प्रियतम के लिये होता है। नारी का प्यार सर्न समर्पण में प्रतिफुलित होता है। वह जिसे प्यार करती उस पर अपना सर्वस्व न्यौछावर करने में भी नहीं हिचकती, पूर्ण समर्पिता होकर अपना प्यार अभिव्यक्त करती है। ऐसी स्थिति में जब उसे अपने प्यार में उपेक्षा और असफलता मिलती है तो उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप उसमें जन्मा प्रतिशोध भी बड़ा भयंकर होता है। वह प्रतिशोध लेने के लिए विवश हो जाती है। उसकी प्रतिशोध की भावना ऐसी लपलपाती आग बन जाती है जिसमें पुरुष का  सब कुछ भस्म हो जाता है। उसकी प्रतिशोधात्मक प्रवृत्ति की एक चिंगारी उसके सारे जीवन को जला देने के लिए काफी है। वह अपने प्रिय से अपने प्रति की गयी उसकी अपेक्षा पूरा-पूरा बदला लेती है और उसे बार-बार पीड़ा पहुँचाती रहती है। छाया आगे डा. शेखर को सावधान करती हुई कहती है कि जैसे हृदय के पास निकला हुआ फोड़ा या घाव हर क्षण मनुष्य को कष्ट पहुँचाता रहता है, पीड़ा देता है उसी प्रकार नारी का प्रतिशोध भी उसकी हर धड़कन के साथ उसे कचोटता, मथता रहता है। तुम्हारी भी परम उपेक्षा ने मेरे मन में भयानक प्रतिशोध को जन्म दे दिया है।

  1. “हँसने से मुझे कौन रोकता है? मैं वहीं तो सिद्ध करना चाहता हूँ कि यह जीवन सदैव हरा-भरा है। सुन्दर है, मधुर है, जैसे चाँद की हँसी, फूल की सुगन्ध, पक्षी का कलरव। नदी की लहर, जो हमेशा आगे बढ़ना जानती हैं, फैलती हैं, तो जैसे पलक खुल रही है और वह पल भर में संसार का तट छू लेती है।”

सन्दर्भ व प्रसंग- पूर्ववत्

व्याख्या- डॉ. शेखर अपनी पुत्री मंजुल को जीवन का मर्म समझाते हुए कहता है कि हँसते-हँसते जीवन बिताते हुए ही मनुष्य सार्थकता प्राप्त कर सकता है। मेरा सारा प्रयास यही है कि मनुष्य हंसता रहे। उसकी जीवन बगिया में हरियाली खिलती रहे। आज जीवन में हरियाली की आवश्यकता है। क्योंकि परिस्थितियों की कडुवाहट और मृत्यु के भय ने मनुष्य को आतंकित कर दिया है। हरियाली और उसकी उजली व शुभ्र मधुरता सदैव ही जीवन की पहली और अन्तिम माँग रही है। चन्द्रमा को ही तो स्पष्ट होगा कि उसके द्वारा बिखेरी गयी चाँदनी में पावन हंसी है, पुष्पों और उसके पराग में भी मादकता है। इतना ही नहीं पक्षियों के मधुर एवं मनमोहक अलख में भी आकर्षक संगीत की लहरियाँ सदैव तैरती रहती हैं। ये प्रकृति के सारे उपकरण जीवन के भी उतने ही महत्वपूर्ण उपकरण हैं। शेखर आगे कहते हैं कि सरिता के ऊपर तैरती बिलखती उर्मियाँ या लहरें जिस प्रकार हँसते-हँसते उसके किनारे को स्पर्श कर लेती हैं उसका आलिंगन करती है वैसे ही मनुष्य भी हँसते हुए जीवन के विविध किनारों को आलिंगन कर लेता है। कहने का तात्पर्य है कि हंसना ही जीवन का मूलमंत्र है।

  1. “स्त्री के सच्चे प्रेम की सीमा नहीं जानते और मृत्यु के रहस्य को खोजने में व्यस्त हो? कभी मेरे रहस्य की ओर भी दृष्टि करते। लेकिन मकड़ी की तरह जाले को बुनकर उसके बीच में बैठकर पृथ्वी की गोलाई नहीं देखी जा सकती। जुगनू के जीवन की चिनगारी से ज्वालामुखी की आग की कल्पना नहीं हो सकती।”

सन्दर्भ व प्रसंग- पूर्ववत्

व्याख्या- डा. शेखर अपने ‘एपराट्स’ के द्वारा अपनी मृत प्रेमिका छाया देवी की आत्मा को आकार देकर प्रार्थना करते हैं, अनुरोध करते हैं कि छाया देवी ने मंजूल को चार महीने बाद अपने साथ बीकेश ले जाने की जो योजना बनायी है उसे रद्द कर दे। इस सम्बन्ध में बातचीत हो रही है और छायादेवी डा. शेखर को स्मरण दिलाती है कि उन्होंने उसे क्या दिया, उसके प्रेम को ठुकरा दिया, उसे निराशा और विषाद के गर्त में ढकेल दिया। अन्त में उसे आत्म-हत्या कर लेनी पड़ी, इन अत्याचारों से मनुष्य को बड़ी सुखद अनुभूति होती है। उस समय समस्त जीवन की चिन्तायें, थकान और समस्यायें पल भर में ही समाप्त हो जाती हैं और मनुष्य विश्राम की सुखद अनुभूति पाता है। उसका यह अनुभव ऐसा ही है जैसे कोई पनिहारिन सिर का घड़ा उतार कर राहत की सांस लेती है। आत्मा भी पनिहारिन है जो जीवन और शरीर का समूचा बोझ उतार कर स्वतन्त्रता, मुक्ति और आजादी अनुभव करती है। शरीर से चिपकी सारी चिन्तायै मिट जाती हैं। सिर का घड़ा उतार कर राहत की सांस लेती हैं। आत्मा भी पनिहारिन है जो जीवन और शरीर का समूचा बोझ उतार कर स्वतंत्रता, मुक्ति और आजादी अनुभव करती है। शरीर से चिपकी सारी चिन्तायें मिट जाती हैं। सिर का घड़ा उतार कर पनिहारिन का मन्दिर में प्रवेश पाकर पुजारी को जो सुखद शान्ति मिलती है, जो निर्विकारता व क्लान्ति हीनता की अनुभूति होती है वही मृत्यु के पश्चात् जीवात्मा को प्राप्त होती है। इस सुख की कोई तुलना नहीं है। हाँ जो लोग आत्महत्या करते हैं उन्हें यह गति प्राप्त नहीं होती। वह प्रगति की दौड़ में पीछे छूट जाता है।

  1. हमारा सूक्ष्म शरीर.………..सर्वकालीन सर्वत्र।

प्रसंग- प्रस्तुत गद्यांश रामकुमार वर्मा रचित ‘उत्सर्ग’ एकांकी से अवतरित है। इसमें लेखक ने एक प्रतिभावान युवा वैज्ञानिक व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला है।

व्याख्या- डॉ. शेखर ने वर्षों कठोर परिश्रम और साधना के पश्चात् एक ऐसे ‘एपराट्स’ की खोज की है जो व्यक्ति के सूक्ष्म शरीर को फिर एक आधार दे सकता है। इसी सम्बन्ध में डा. शेखर अपने सहायक विनय से कहते हैं कि अगर हम लोग अपने स्थूल देह से सूक्ष्म देह को अलग कर सकें तो समय का महत्व जीवन में शून्य हो जायेगा। क्योंकि जिस प्रकार समय में ठहराव नहीं है, समय जिस प्रकार किसी की प्रतीक्षा नहीं करता, समय जिस प्रकार निरन्तर आगे बढ़ता है, समय जिस प्रकार गतिवान है, उसकी गति पर अवरोध नहीं लगाया जा सकता। उसी प्रकार सूक्ष्म शरीर, स्थूल शरीर से अलग हो जाने पर गतिशील और प्रवाहमान हो जायेगा। जैसे रेडियो पर दूर-सुदूर नगरों, स्थानों का संगीत हम घर बैठे सुन सकते हैं, जिस प्रकार लन्दन से स्वर लहरी तैरती हुई मंसूरी में सुनायी पड़ती है उसी प्रकार सूक्ष्म शरीर भी समय की लहर की भाँति क्षण भर में जहाँ चाहे जायेगी- न्यूयार्क, लन्दन, टोकियो। समय को जिस प्रकार एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचने में कोई बाधा नहीं, उसी प्रकार सूक्ष्म शरीर के विचारण करने में भी कोई बाधा नहीं रहेगी।

  1. कभी तुमने ………..होनी चाहिए।

सन्दर्भ/प्रसंग- पूर्ववत्

व्याख्या- डा0 शेखर अपने सहायक विनय को बता रहे है कि व्यक्ति के स्थूल शरीर के भीतर सूक्ष्म शरीर का निवास है। व्यक्ति की चलती हुई सांस इसका बड़ा प्रमाण है। डा0 शेखर आगे कहते हैं कि जैसे अन्य काम करने से शरीर थक जाता है और वह थोड़ी देर के लिए ही विश्राम चाहता है वैसी ही स्थिति क्या साँस लेने में भी होती है। साँस तो व्यक्ति बराबर लेता रहता है तभी उसे थकावट क्यों नहीं महसूस होती। सांस लेने में ऊब तथा थकावट की अनुभूति न होना ही इस बात का प्रमाण है कि यह स्थूल शरीर की क्रिया न होकर इससे भिन्न सूक्ष्म शरीर की क्रिया है। एक ही काम लगातार करते रहने से थक जाता है जो कि स्थूल शरीर का अनिवार्य धर्म है।

  1. अन्तर क्या है.……………मरना कहते हैं।

सन्दर्भ व प्रसंग- पूर्ववत् ।

व्याख्या- प्रस्तुत अवतरण में डा0 शेखर अपनी पुत्री मन्जुला को जन्म और मृत्यु का रहस्य बतलाते हुए कहते हैं कि जीवन तथा मृत्यु में कोई विशेष अन्तर नहीं है। जीवात्मा अपने काया को त्याग कर अपने सच्चे आकाशयुक्त संसार में एकान्वित हो जाता है। काया तो मात्र आर्द्रवसन स्वरूप है जो आत्मा के इर्द-गिर्द लिपट जाता है। जीवात्मा समयानुसार एक चंचल बाल-तुल्य काया रूपी सदन के तोरणों को बालात् खोलकर तथा बाह्यगमन कर अपने तेज रूपी अंश में अवस्थित हो जाता है। लोक जीवन में शरीर से आत्मा के बाह्यगमन करने की दशा को ही मृत्यु कहा गया है।

  1. 7. गंगा की पवित्र ……..इच्छा है।

सन्दर्भ व प्रसंग- पूर्ववत् ।

व्याख्या- मंजुल प्रेतात्मा छाया से ऋषीकेश जाने और वहाँ के बारे में जानने की इच्छा व्यक्त करती है। इस पर प्रेतात्मा छाया ऋषीकेश के सौन्दर्य का वर्णन करती हुई कहती है कि वहाँ का दृश्य बड़ा ही मनोहारी और चित्ताकर्षक है। वहाँ गंगा शत-शत् धाराओं में अपने में पूर्ण पवित्रता समेटे प्रवाहित होती रहती है। जिसे देखकर यह अनुभूति होती है मानो साक्षात् स्वर्ण गंगा के पावन जल का रूप धारण कर बह रहा हो। उस जल की पावनता उसमें स्नान करके ही पता चलती है। वहाँ उस धारा में नहाने के बाद ऐसा लगता है मानो सारे शरीर में रक्त की जगह गंगा जल प्रवाहित हो रहा है। इतना ही नहीं ऋषीकेश की प्रकृति भी ऐसी है मानो विधाता ने समुद्र की लहरों को ही एक क्रम या शृंखला से गूंथ कर सजा दिया हो।

  1. वह आकाश हमारे.……….…बहती रहेगी।

सन्दर्भ व प्रसंग- पूर्ववत् ।

व्याख्या- शेखर विनय को सम्बोधित करते हुए कहता है कि मनुष्य ने स्थूल शरीर के भीतर ही सूक्ष्म शरीर का निवास है। उसी को घटाकाश कह सकते हैं। स्पष्टतः हृदयाकाश जैसे एक कोने से दूसेर कोने तक अपनी असीमता के साथ फैला हुआ है वैसे ही स्थूल शरीर के भीतर सूक्ष्म शरीर की स्थिति है। आकाश में वायु की स्थिति चिरन्तन है, अनिवार्य है क्योंकि उसके न रहने से दमघोंटू वातावरण पैदा हो जाता है। वैसे ही सूक्ष्म शरीर में श्वास रूपी वायु है। श्वास-वायु ही मनुष्य के जीवन को जीवित बनाये रखती है। वह जैसे रुकी-चुकी वैसे ही मनुष्य की सांसारिक लीला समाप्त हो जाती है। अतः जीवन को शाश्वतता प्रदान करने के लिए साँस का अस्तित्व बनाये रखना अनिवार्य है। उसमें कोई विकृति न आए तो मनुष्य सैकड़ों हजारों वर्ष तक अपने आपको जीवित बनाये रख सकता है। प्राचीन काल में ऋषि-मुनि श्वास-अवरोध की साधना कर लेते थे। श्वास-क्रिया की साधना कर श्वास को संयमित कर लेते थे तथा तप निरत रहते हुए दीर्घकाल तक जीवित रहते थे। कहने का तात्पर्य यह है कि जीवन बनाये रखने के लिए आवश्यक है कि श्वास पर नियंत्रण हो। यदि इसमें विकृति आती है, कोई बाधा उत्पन्न होती है तभी मृत्यु की प्रक्रिया घटित होने लगती है। श्वासारोध ही सत्य है और उसकी मुक्तगति ही जीवन है। इससे स्पष्ट है कि जीवन की गति-जगति सूक्ष्म शरीर के भीतर प्रवाहित श्वास-प्रवाह पर ही निर्भर है। कहने का तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार प्रकाश एक छोर से दूसरे छोर तक फैला हुआ है उसी प्रकार स्थूल शरीर के भीतर सूक्ष्य शरीर व्याप्त है। आकाश में वायु की विद्यमानता सत्य है, चिरन्तन और अनिवार्य है। उसी प्रकार सूक्ष्म शरीर से श्वास वायु है। जीवन के अस्तित्व के “जीव की चिन्तायें छूट जाती हैं। मालूम होता होगा जैसा किसी पानी भरने वाली ने घर पहुँचकर अपने सिर का घड़ा उतारकर नीचे घर दिया है, या जैसे पुजारी मन्दिर में पहुंच गया है। तभी तो इन आस्थाओं से बात करने में अच्छा लगता है। हाँ, जो आत्महत्या करके मरता है, वह अपनी गति से पिछड़ जाता है और वह अपने सूक्ष्म संसार में एक पत्थर की तरह गिरता है। मैंने सूक्ष्म शरीरों से बात करके यह जान लिया है।”

  1. जीव की सारी…………………..जान लिया है।

सन्दर्भ व प्रसंग- पूर्ववत् ।

व्याख्या- डा0 शेखर मंजुल से कहते हैं कि मृत्यु को पाकर मनुष्य एक विश्रान्ति की अनुभूति से गुजरता है। मृत्यु उपरान्त को वह कैसे भूल सकती है। छाया शेखर पर व्यंग्य करती हुई कहती है कि तुम स्त्री के हृदय में स्थित प्रेम की गहराई तो जान नहीं सके, वह नारी जो तुम्हारी प्रति पूर्णतया अनुरक्त और समर्पित थी, उसके हृदय का रहस्य तो जानने की कोशिश नहीं की तुमने और दावा यह करते हो कि तुमने जीवन और मृत्यु के रहस्य को जान लिया है। इन सब में तो अपने को उलझा रखा लेकिन क्या कभी मेरी ओर, मेरी भावनाओं और समर्पण की ओर भी ध्यान दिया। मेरे अंदर भी झांकने का प्रयास किया होता है। जैसे मकड़ी गोल-गोल जाला बुने और उसके बीच बैठ जाये और अपने जाल की गोलाई से पृथ्वी की गोलाई की समता करे उसे प्रकार तुम भी एक संकुचित दायरे में अपने को एक कमरे में बन्द करके ब्रह्माण्ड का रहस्य खोज रहे हो। जैसे जुगनू के प्रकाश को देखकर ज्वालामुखी के लपट का अनुमान नहीं लगाया जा सकता उसी प्रकार तुम्हारे इस थोथे दावे से कि तुमने एक एपराट्स बना लिया है और उसके माध्यम से जन्म और मृत्यु जैसे गूढ़ विषय को समझ लिया। उसके रहस्य से परिचित हो गये। डॉक्टर! कदाचित तुम नहीं जानते कि नारी जब प्रेम में निराशा होती है तब उसको अपने चारों ओर अन्धेरा ही अन्धेरा नजर आता है। तब इस नारी के हृदय में छिपा हुआ ज्वालामुखी विस्फोटित होता है। प्रतिशोध का लावा फूटता है उस समय उस आग और लावा की लपेट में कौन भस्म हो जाता है, कौन जलता है, उससे उसे कोई मतलब नहीं क्योंकि प्रतिशोध और प्रतिहिंसा सर्वोपरि होती है, मानवीयता या नारीत्व नहीं।

  1. “जो हो, मैने मृत्यु के उस पार देखने की कोशिश की है। जीवन का आदर्श यही है कि जीवन के उस पार देखा जाए। मृत्यु तो सूक्ष्म जीवन का द्वार है। मन शरीर से अलग होकर भी कार्य कर सकता है और शरीर के नष्ट होने पर भी वह गतिशील है। तुम्हें आश्चर्य होगा कि यदि मैं कहूँ मृत्यु में पीड़ा नहीं है। मृत्यु तो जीवन का एक मोड़ है। जिस प्रकार एक चौड़ा रास्ता जंगल में पगडंडी होकर छिप जाता है और हमें नहीं दीख पड़ता, उसी प्रकार मृत्यु के बाद जीवन पथ भी रहस्य के वन में प्रवेश कर जाता है, उसी प्रकार शरीर से वह स्थूल शरीर है। यह सूक्ष्म शरीर हमसे वैसा ही जुड़ा है, जैसे रात्रि के अन्तिम प्रहर से दिन।आज का विज्ञान सिर्फ ‘मैटर’की खोज करता है, स्पिरिट’ की नहीं। मैंने ‘स्पिरिट’ की खोज की है।”

प्रसंग- प्रस्तुत गद्यावतरण रामकुमार वर्मा रचित उत्सर्ग एकांकी से अवतरित है इसमें लेखक ने एक प्रतिभाशाली युवा वैज्ञानिक के व्यक्तित्व व कर्त्तव्य पर प्रकाश डाला है।

व्याख्या- वर्षों के अपने कठोर परिश्रम के बाद शेखर ने एक ऐसे ‘एपराटस’ की खोज की है जो व्यक्ति के सूक्ष्म शरीर को फिर एक आकार दे सकता है। इसी सम्बन्ध में वह अपने सहायक विनय को बताते हैं। वह कहते हैं कि मैंने अपनी खोज के माध्यम से मृत्यु के पश्चात् क्या है इस रहस्य को सुलझा लिया है। जीवन के पार क्या है- मृत्यु और मृत्य के विषय में भी ज्ञान अर्जित करना मनुष्य का लक्ष्य होना चाहिए। आत्मा का एक नूतन शरीर द्वार में प्रविष्ट होना ही मृत्यू है। मन या आत्मा और देह दोनों एक दूसरे से सर्वथा भिन्न है। देह की समाप्ति पर भी आत्मा नहीं मरती, गतिशील रहती है, सामान्यतः लोगों का यह विशवास है कि मृत्यु बहुत ही कष्टदायिनी और पीडापूर्ण होती है, लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता। मृत्यु तो मनुष्य के जीवन को एक नया मोड़ देती है। इसे यों समझो कि जिस प्रकार एक चौड़ा मार्ग घने जंगल में गुजरते-गुजरते एक पगडंडी का रूप ले लेता है और अन्त में उसी जंगल में विलीन हो जाता है, हमारी नजरों से ओझल हो जाता है उसी प्रकार जीवन का मृत्यु में विलीन होना है। जो जीवन हमें कल तक दिखाई पड़ता था वह आज नहीं दिखाई पड़ता। स्थूल शरीर प्रधान जीवन में ही सूक्ष्म शरीर निहित रहता है जैसे सूर्य मण्डल में दिन का प्रकाश। जिस प्रकार रात के अन्तिम पहर में दूसरे दिन उगने वाले सूर्य का प्रकाश छिपा रहता है उसी प्रकार स्थूल शरीर में सूक्ष्म शरीर निहित रहता है। आज के विज्ञान ने केवल बाह्य जगत के भौतिक पदार्थो का अनुसंधान किया है लेकिन मैंने व्यक्ति के अर्न्तजगत में स्थित और निहित स्पिरिट या आत्म पदार्थ को संसार के लोगों के सामने उजागर करने या प्रकाश में लाने का प्रयास किया है।

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Pankaja Singh

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