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अमेरिका की अध्यक्षात्मक सरकार | प्रधानमन्त्री एवं राष्ट्रपति में समन्वय के प्रमुख आधार

अमेरिका की अध्यक्षात्मक सरकार | प्रधानमन्त्री एवं राष्ट्रपति में समन्वय के प्रमुख आधार

अमेरिका की अध्यक्षात्मक सरकार

(Presidential Form of Government in U.S.A.)

अमेरिका संविधान एक ऐसा संघात्मक संविधान है जिसका अनुकरण अन्य संघीय संविधान वाले देशों ने किया है और जिसके आधार पर संघीय संविधानों के गुणों तथा दोषों का विवेचन किया जाता है।

अमेरिकी शासन के अध्यक्षात्मक स्वरूप के तत्त्व निम्नलिखित हैं:-

  1. संविधान के अन्तर्गत जनता को आत्म-निर्णय का अधिकार प्राप्त है एवं द्वितीय, सांविधानिक सम्प्रभुता देश की जनता में निहित है। शासन पर जनता की सर्वोपरिता बनाये रखने के लिए यह व्यवस्था है कि कार्यपालिका और व्यवस्थापिका जनता के प्रति उत्तरदायी रहें और निश्चित समय पर जनता से पुनः आदेश लेने के लिए प्रस्तुत हों।
  2. अमेरिकी शासन-व्यवस्था स्थायी कार्यपालिका के सिद्धान्त का सर्वोत्तम प्रयोग किया गया है। संविधान निर्माताओं की इच्छा के विरुद्ध यद्यपि राष्ट्रपति का निर्वाचन आज अप्रत्यक्ष की अपेक्षा प्रत्यक्ष हो गया है, लेकिन इससे शासन के अध्यक्षीय स्वरूप और स्थायी कार्यपालिका के सिद्धान्त को आघात नहीं पहुंचा है। राष्ट्रपति राज्य का वास्तविक प्रधान है, जिसे कांग्रेस (व्यवस्थापिका) से स्वतन्त्र रखा गया है। यद्यपि नियन्त्रणों की ऐसी व्यवस्था रखी गई है कि राष्ट्रपति ‘हिटलर’ बनने से बचा रहे । संविधान द्वारा राष्ट्रपति का कार्यकाल चार वर्ष का निश्चित कर दिया गया है। इस अवधि में वह स्वयं त्यागपत्र देकर या मृत्यु हो जाने पर या महाभियोग द्वारा ही अपने पद से पृथक् हो सकता है या किया जा सकता है। महाभियोग की प्रक्रिया अत्यन्त दुष्कर है।
  3. अमेरिकी राष्ट्रपति का मन्त्रिमण्डल उसका परिवार मात्र है जिसके सदस्यों की बात को मानना या ठुकरा देना पूरी तरह उसकी मर्जी निर्भर पर है। यद्यपि अपने मन्त्रियों अर्थात् सचिवों की नियुक्ति पर वह सीनेट की स्वीकृति लेता है, किन्तु यह केवल मात्र औपचारिकता है।
  4. राष्ट्रपति और उसके मन्त्री जिन्हें सचिव (Secretaries) कहा जाता है, कांग्रेस के सदस्य नहीं होते, कांग्रेस की कार्यवाहियों में भाग नहीं लेते और न ही वे उसके प्रति उत्तरदायी ही होते हैं। संविधान के अनुसार जो स्वतन्त्रता राष्ट्रपति और कांग्रेस दोनों को प्राप्त है, वह उन्हें परस्पर अधिक निकट नहीं आने देती। दोनों ही जनता द्वारा निर्वाचित होते हैं; अतः वे स्वयं को एक-दूसरे से अधिक महत्वपूर्ण समझते हैं तथा अपने अपने अधिकारों और सम्मान के लिए एक-दूसरे के प्रति विशेष सतर्क रहते हैं। व्यवस्थापिका कार्यपालिका को भंग नहीं कर सकती और न कार्यपालिका को ही व्यवस्थापिका को भंग करने का अधिकार है। राष्ट्रपति अपने पद पर राष्ट्रीय निर्वाचन के परिणामस्वरूप आता है; अतः अधिकांश समस्याओं पर उसका दृष्टिकोण राष्ट्रीय होता है।

प्रधानमन्त्री एवं राष्ट्रपति में समन्वय के प्रमुख आधार

(i) राष्ट्रपति राज्य का अध्यक्ष तथा राज्य की सर्वोच्च कार्यपालिका है। परन्तु कार्यपालक शक्तियों का वह एकच्छत्र स्वामी नहीं है। उनके प्रयोग में कांग्रेस राष्ट्रपति की सहभागी है। मुख्य कार्यपालक के रूप में राष्ट्रपति जो उच्च-वर्गीय नियुक्तियाँ करता है उन पर सीनेट की स्वीकृति आवश्यक होती है। सीनेट कहीं राष्ट्रपति की नियुक्तियों पर मनमाने रूप से अस्वीकृत न करने लगे, इसके लिए यह व्यवस्था भी की गई है कि कुछ वर्गों के पदों (सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश, कांग्रेस द्वारा स्थापित आयोगों आदि के सदस्य तथा लोक सेवा के नियमों के अनुसार नियुक्त पदाधिकारी) को छोड़कर अन्य अधिकारियों को राष्ट्रपति स्वेच्छा से हटा सकता है और ऐसा करने में उसे सीनेट की स्वीकृति की आवश्यकता नहीं होती।

(ii) पर-राष्ट्रनीति के संचालक के रूप में राष्ट्रपति विदेशों से सन्धियाँ करता है और आवश्यकता पड़ने पर युद्ध का संचालन भी करता है। परन्तु अपने इन कार्यों के सम्पादन में भी वह किसी न किसी रूप में कांग्रेस पर निर्भर है। सन्धियाँ देश पर लागू तभी हो सकती हैं जबकि सीनेट बहुमत से उनकी पुष्टि कर दे। इसी तरह विदेशों के साथ युद्ध की घोषणा करने से पूर्व भी राष्ट्रपति के लिए यह आवश्यक होता है कि वह कांग्रेस के दोनों सदनों की सम्मिलित स्वीकृति प्राप्त कर ले । परन्तु इससे यह नहीं समझना चाहिए कि कांग्रेस इस क्षेत्र में राष्ट्रपति को पूरी तरह नियन्त्रित रखती है। अपनी महान शक्तियों के बल पर और एक राष्ट्र वास्तविक प्रधान के रूप में राष्ट्रपति ऐसे कूटनीतिक सम्बन्ध स्थापित कर सकता है या ऐसी विषम परिस्थितियाँ पैदा कर सकता है अथवा सेना को ऐसी अवस्था में खड़ा कर सकता है कि युद्ध अनिवार्य हो जाय । आधुनिक समय में राष्ट्रपति की युद्ध करने की शक्ति ने वास्तविक रूप से कांग्रेस के युद्ध की घोषणा के अधिकार को निगल लिया है। फिर भी अन्ततोगत्वा कांग्रेस के दृढ़ निश्चय के सामने उसे झुकना पड़ता है।

(iii) संविधान द्वारा शक्ति-विभाजन के अनुसार व्यवस्थापन के क्षेत्र में कांग्रेस का एकाधिकार है और राष्ट्रपति को उससे कोई प्रयोजन नहीं है। परन्तु व्यवहार में राष्ट्रपति एक बड़ी सीमा तक कांग्रेस के व्यवस्थापन कार्य का सहभागी होता है। स्वयं संविधान की व्यवस्था के अनुसार राष्ट्रपति को अधिकार है कि वह समय-समय पर कांग्रेस को लिखित या मौखिक सन्देश भेजता रहे। चूँकि प्रशासन और विदेशी मामलों में राष्ट्रपति का अनुभव प्रायः बड़ा ही गहन होता है और देश का वह मुख्य कार्यपालक है; अतः कांग्रेस राष्ट्रपति के सन्देशों को बड़ा महत्व देती है और प्रायः बहुत से कानूनों का सूत्रपात तक इन्हीं सन्देशों से होता है। अपने सन्देशों के अन्तर्गत राष्ट्रपति विशिष्ट कानूनों के निर्माण का भी सुझाव भेज सकता है।

(iv) व्यवस्थापन कार्यक्रम को अपनी इच्छा से प्रभावित करने की दृष्टि से राष्ट्रपति अनेक प्रकार से सक्षम होता है। प्रथम, प्रमुख कांग्रेस सदस्यों की इच्छानुकूल नियुक्तियाँ करके वह उन्हें व्यवस्थापनसम्बन्धी कार्य के लिए अपने अनुकूल बना सकता है; द्वितीय विरोधी सदस्यों को वह उसके द्वारा दिये गये लाभों को छीन लिए जाने का भय दिखाकर अपने अनुकूल कर सकता है; एवं तृतीय, सदस्यों से व्यक्तिगत सम्पर्क स्थापित करके उन्हें प्रभावित कर सकता है। कांग्रेस के व्यवस्थापन के एकाधिकार को नियन्त्रित करने की राष्ट्रपति के पास सबसे बड़ी शक्ति ‘निषेधाधिकार’ है। विधि-निर्माण कार्य कांग्रेस का है, परन्तु कांग्रेस द्वारा पारित कोई भी विधेयक कानून तभी बन सकता है जब राष्ट्रपति उस पर हस्ताक्षर कर दे। राष्ट्रपति कांग्रेस द्वारा पारित विधेयक पर अपना विलम्बन प्रतिषेध लगा सकता है। किन्तु कांग्रेस के दोनों सदनों द्वारा 2/3 बहुमत से उन विधेयकों को पारित कर देने पर राष्ट्रपति उसे रोक नहीं सकता।

(v) संविधान के अनुसार वित्तसम्बन्धी अधिकार पूर्णतः कांग्रेस को ही प्राप्त है। व्यवहार में यद्यपि बजट राष्ट्रपति के संरक्षण में तैयार किया जाता है, किन्तु उसे स्वीकार, अस्वीकार या उसमें कटौती करना पूर्णतः कांग्रेस पर ही निर्भर है।

राष्ट्रपति और कांग्रेस दोनों सांवैधानिक व्यवस्थाओं और प्रथाओं के अनुसार एक-दूसरे के कार्यों को प्रभावित करते हैं और अपने सम्बन्धों में, अवरोध तथा सन्तुलन-प्रणाली के कारण, अन्योन्याश्रित हैं। यहाँ व्यवहार में अपनी विशेष स्थिति के कारण कांग्रेस की अपेक्षा राष्ट्रपति को अधिक महत्व और शक्तियाँ प्राप्त हैं और आधुनिक समय में राष्ट्रपति के अधिकारों में व्यापक वृद्धि हुई है। वहाँ एक अत्यन्त दुराग्रही राष्ट्रपति को नियन्त्रित करने के लिए कांग्रेस के पास महाभियोग का अमोघ अस्त्र रहता है।

(vi) व्यवस्थापिका और कार्यपालिका पर न्यायपालिका का भी नियन्त्रण रहता है। संविधान के किसी शब्द की व्याख्या करने अथवा संविधान के अनुच्छेद का अर्थ लगाने की अन्तिम प्राक्ति सर्वोच्च न्यायालय को ही है। साथ ही यदि सर्वोच्च न्यायालय यह समझता है कि कांग्रेस अथवा राष्ट्रपति ने संविधान के किसी अनुच्छेद के विरुद्ध कार्य किया है तो वह उस कार्य को अवैध घोषित कर सकता है और उसका यह निर्णय अन्तिम माना जाता है। निर्विवाद रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका की शासन व्यवस्था अध्यक्षीय अथवा स्थायी या राष्ट्रपतीय शासन प्रणाली का सर्वोत्तम रूप है। जिसमें शक्ति पृथक्करण तथा नियन्त्रण एवं सन्तुलन की प्रणाली का सुन्दर और व्यावहारिक सम्मिश्रण है। संविधान-निर्माताओं ने यद्यपि शासन के तीनों विभागों का पृथक्करण कर दिया है, पर वे इस तथ्य को भूले नहीं कि तीनों अंगों के मध्य पारस्परिक सम्पर्क और सम्बन्ध स्थापित करना भी सफल शासन के लिए परमावश्यक है। अतः उन्होंने शक्ति-विभाजन को व्यावहारिक बनाने के लिए ऐसा प्रतिबन्ध कर दिया है कि तीनों अंग एक- दूसरे पर इस तरह का नियन्त्रण बनाये रखें जिससे शक्तियों का सन्तुलन बना रहे।

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Pankaja Singh

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