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ब्रिटेन में संसदीय शासन-व्यवस्था | Parliamentary Form of Government in Great Britain in Hindi

ब्रिटेन में संसदीय शासन-व्यवस्था | Parliamentary Form of Government in Great Britain in Hindi

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ब्रिटेन में संसदीय शासन-व्यवस्था

(Parliamentary Form of Government in Great Britain)

ब्रिटेन संसदीय शासन-व्यवस्था का उसी प्रकार सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है जिस प्रकार अध्यक्षीय शासन व्यवस्था का संयुक्त राज्य अमेरिका। ब्रिटेन में कार्यपालिका के दो रूप विद्यमान हैं-एक नाममात्र की कार्यपालिका (सम्राट् या साम्राज्ञी) और दूसरी वास्तविक कार्यपालिका (मन्त्रिमण्डल) है। वास्तविक शासन-शक्ति का उपभोक्ता मन्त्रिमण्डल है जिसके सदस्य संसद से लिये जाते हैं और जो लोकप्रिय सदन (हाउस ऑफ कॉमन्स या लोकसभा) के विश्वास-पर्यन्त अपने पद पर बने रहते हैं। ब्रिटिश मन्त्रिमण्डल का जीवन संसद की सद्भावना पर निर्भर है, जिसका अर्थ है-लोकसभा का विश्वास और अन्तिम विश्लेषण में जिसका मतलब यह है कि नियन्त्रण निर्वाचकगण के हाथों में है। दलीय प्रणाली संसदीय व्यवस्था का जीवनाधार होती है। ब्रिटिश संसदीय शासन-व्यवस्था में दलीय प्रणाली ही मन्त्रिमण्डल को उसकी एकरूपता प्रदान करती है और प्रधानमन्त्री की स्थिति से उसको दृढ़ता प्राप्त होती है।

मॉण्टेस्क्यू ने ब्रिटिश संसदीय शासन-व्यवस्था के बारे में कहा था कि ब्रिटेन में शासन के तीनों अंगों का कार्य-क्षेत्र पृथक्-पृथक् है। पर वास्तव में ब्रिटेन में तो शासन की शक्ति केन्द्रीभूत है। यद्यपि ऑग एवं जिंक के अनुसार इंग्लैण्ड में ‘शक्ति-पृथक्करण’ का सिद्धान्त आंशिक रूप में लागू हुआ है जिसका प्रयोग केवल न्यायपालिका के सम्बन्ध में होता है। पर आज प्रवृत्ति यह है कि व्यवस्थापन के विस्तार के कारण न्यायपालिका की शक्ति भी कार्यपालिका में केन्द्रित होती जा रही है। इन सब. व्यवस्थाओं के कारण यह कहना भ्रान्तिपूर्ण है कि इंग्लैण्ड में शक्ति का पृथक्करण है। पर इसका यह आशय नहीं है कि ब्रिटेन में कार्यपालिका निरंकुश है अथवा नाजी या फॉसिस्ट सरकार के पद-चिह्नों पर चल सकती है। ब्रिटिश संसद कार्यपालिका की निरंकुशता के प्रति सदैव जागरूक होती है और कार्यपालिका भी अनुत्तरदायी बनने की प्रवृत्ति प्राय: नहीं रखती।

ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था की एक विशेषता इस बात में है कि यद्यपि न्यायपालिका को संसदीय कानूनों की समीक्षा करने का अधिकार नहीं है और कार्यपालिका के कार्यों की वैधता या अवैधता पर विचार कर उन्हें अवैधानिक घोषित करना उसके क्षेत्र के बाहर है, तथापि न तो संसद ही निरंकुश आचरण करती है और न कार्यपालिका ही। क्योंकि कानून का शासन (Rule of Law) व्यक्ति के अधिकारों का रक्षक है। कानून के शासन का सामान्यतः यह अभिप्राय समझा जाता है कि देश में शासन वहाँ के कानून के अनुसार चलता है, किसी व्यक्ति विशेष की इच्छानुसार नहीं । कानून का शासन नागरिकों के स्वेच्छाचारी शासन के विरुद्ध रक्षा और कानून की सर्वोच्चता स्थापित करता है और सभी वर्गों के व्यक्तियों की समानता स्थापित करते हुए अन्ततोगत्वा संविधान को देश के सामान्य कानून पर आधारित करता है। कानून के शासन को नागरिकों की स्वतन्त्रता का ‘महान् प्रतीक’ कहा जाता है।

ब्रिटिश संसदीय शासन-प्रणाली में भी अवरोध और सन्तुलन के सिद्धान्त का समावेश है। उदाहरणार्थ, संसद के दोनों सदन कोई भी नियम पारित कर सकते हैं, पर अधिनियम के लागू होने के लिए. सम्राट् की स्वीकृति आवश्यक है। यद्यपि परम्परा के अनुसार सम्राट् अपनी, स्वीकृति देने से इन्कार नहीं करता, लेकिन सम्राट् की चेतावनी और उसके परामर्श का रचनात्मक प्रभाव बड़ा व्यापक होता है। इस तरह सम्राट् की कोई आज्ञा तब तक कानूनन मान्य नहीं होती जब तक कि उस पर किसी मन्त्री के हस्ताक्षर नहीं हो जाते | इसके मूल में भावना यह कि मन्त्री वास्तव में जनता का निर्वाचित प्रतिनिधि होता है।

ब्रिटेन में संसद द्वि-सदनीय है-निम्न सदन अर्थात् लोकसभा लोकप्रिय सदन है जिसके सदस्य पृथक्-पृथक् निर्वाचन क्षेत्रों से ‘एक व्यक्ति एक मत’ के आधार पर वयस्क मताधिकार द्वारा निर्वाचित होते हैं। मन्त्रिमण्डल का उत्तरदायित्व इस सदन के प्रति है। लॉर्ड सभा उच्च सदन है जिसकी रचना में पैतृकता, नियुक्ति और निर्वाचन तीनों ही सिद्धान्तों का समन्वय किया गया है। अधिकांश सदस्य पैतृक या वंशानुगत रूप से सदस्यता प्राप्त करते हैं।

लॉर्ड सभा की वंशानुगत रचना का प्रमुख कारण यही है कि अंग्रेज रूढ़िवादी हैं और अपनी प्राचीन संस्थाओं के प्रति उनमें भारी श्रद्धा है। ब्रिटेन वस्तुतः एक ऐसा महान संसदीय लोकतन्त्र है जिसके अन्तर्गत ‘प्रगतिशील तथा अनुदार दृष्टिकोणों का अपूर्व सम्मिलन’ दिखाई देता है। लोकप्रिय सदन (हाउस ऑफ कॉमन्स) को ही शक्तियों की दृष्टि से प्रबल बनाया गया।  है, लॉर्ड सभा इतनी शक्तिसम्पन्न नहीं है कि वह लोकप्रिय सदन की अवहेलना कर सके।

ब्रिटिश राजनीति की यह विशेषता है कि संगठित विपक्ष को राजकीय मान्यता प्रदान की गई है। सरकार मुख्य विपक्ष का पूरा आदर करती है और उसे ‘राजा या रानी का विरोधी दल’ कहा जाता है। राजा या रानी द्वारा संसद का उद्घाटन करते समय विपक्ष का नेता प्रधानमन्त्री के साथ खड़ा होता है। उसकी स्थिति वैकल्पिक प्रधानमन्त्री की होती है।

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Pankaja Singh

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