अर्थशास्त्र

बजेटरी व्यवस्था | निजी वस्तुओं की अवधारणा | सार्वजनिक वस्तुओं की अवधारणा | सार्वजनिक वस्तुओं की विशेषतायें | निजी एवं सार्वजनिक वस्तुओं में अन्तर

बजेटरी व्यवस्था | निजी वस्तुओं की अवधारणा | सार्वजनिक वस्तुओं की अवधारणा | सार्वजनिक वस्तुओं की विशेषतायें | निजी एवं सार्वजनिक वस्तुओं में अन्तर | मिश्रित वस्तुयें | मेरिट वस्तुओं की अवधारणा | निजी, सार्वजनिक, मिश्रित एवं मेरिट वस्तुओं के अर्थ

बजेटरी व्यवस्था

जब अर्थव्यवस्था पूर्णतया बाजार क्षेत्र पर आधारित हो और राज्य की भूमिका हो ही नहीं तो अर्थव्यवस्था में उपभोक्ताओं को उपभोग के लिए प्राप्य सभी वस्तुयें तथा सेवायें बाजार में माँग एवं पूर्ति द्वारा निर्धारित कीमत पर उपलब्ध होंगी, सभी वस्तुओं की व्यवस्था बाजार द्वारा होगी, प्रत्येक उपभोक्ता द्वारा दी जाने वाली कीमत उस वस्तु के सम्बन्ध में उपभोक्ता के उपभोग में कमी के नहीं लायी जा सकती ऐसी वस्तुओं को हम निजी वस्तु कहते हैं। बाजार यंत्र के साथ राज्य के मिश्रण के साथ ही अर्थव्यवस्था में वस्तुओं तथा सेवाओं की आपूर्ति की बाजार व्यवस्था के अतिरिक्त एक नई व्यवस्था सामने आती है जिसे हम ‘बजेटरी व्यवस्था’ कहते हैं अर्थात् जिन वस्तुओं की उपभोक्ताओं के लिए आपूर्ति बजट में सार्वजनिक व्यय के प्रावधान के द्वारा हो। बाजार राज्य मिश्रित व्यवस्था में हम उपभोक्ताओं को प्राप्त वस्तुओं तथा सेवाओं को चार भागों में रख सकते हैं-

(क) विशुद्ध निजी वस्तु

(ख) विशुद्ध सार्वजनिक या सामाजिक वस्तु

(ब) मिश्रित वस्तु

(घ) मेरिट वस्तु

निजी वस्तुओं की अवधारणा-

निजी वस्तुयें उनको कहते हैं जिनके उत्पादन से आन्तरिक लाभ प्राप्त होता है तथा उपभोग में प्रतिद्वन्द्रिता रहती है। वही व्यक्ति इन वस्तुओं का उपभोग कर सकते हैं जो इसके लिए बाजार कीमत का भुगतान करते हैं। निजी वस्तु का कुल उत्पादन विभिन्न उपभोक्ताओं द्वारा उपभोग की गयी मात्रा के योग के बराबरक होता है। माना कि निजी वस्तु का कुल उत्पादन X है तथा समाज के A व B दो उपभोक्ता हैं, अतः X=XA+ XB I यहाँ XA उपभोक्ता A द्वारा X वस्तु का उपभोग तथा XB द्वारा X वस्तु का उपभोग।

सार्वजनिक (सामाजिक) वस्तुओं की अवधारणा-

सार्वजनिक वस्तुयें वे हैं जिनके उत्पादन से बाह्य लाभ का पजन होता है और ऐसे लाभ का उपयोग अनेक व्यक्तियों के द्वारा किया जाता है। यदि इन वस्तुओं का उत्पादन एक व्यक्ति द्वारा किया जाये तो इसके लाभ अनेक लोगो में बिखर जाते हैं। यह प्रभाव ऐसा होता है कि इनके उत्पादनकर्ताओं के द्वारा बाह्य लाभ प्रदान करने के बदले में क्षतिपूर्ति के ख्याल से ऐसे लाभ पर सम्पत्ति का अधिकार स्थापित नहीं किया जा सकता है। ऐसे लाभ का विभाजन भी संभव नहीं होता है। अतः इनके लिए कीमत नहीं ली जा सकती है। परिणामस्वरूप उन व्यक्तियों को भी इन वस्तुओं के उपभोग से वंचित नहीं किया जा सकता है जो कीमत का भुगतान नहीं करते हैं।

जिन वस्तुओं के उत्पादन से बाह्य हानि होती है उन्हें सार्वजनिक हानि की संज्ञा दी जाती है। सार्वजनिक हानि उन क्रियाओं को कहा जाता है जिनके उत्पादन या उपभोग से उन सभी को प्रभावित करते हैं। सार्वजनिक वस्तुओं को एक उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है। माना कि कुछ व्यक्ति एक कमरे में बन्द हैं यह भी मान लेते हैं कि इन व्यक्तियों द्वारा लिए गये निर्णय के प्रभाव केवल इन्हीं लोगों पर पड़ते हैं किसी अन्य व्यक्ति पर नहीं। इस कमरे के निवासियों को प्रतिदिन एक निश्चित मात्रा में रोटी भोजन के लिए । जलावन कमरे को गरम करने के लिए दी जाती है। रोटी को निजी वस्तु माना जा सकता है क्योंकि इन्हें टुकड़ों में विभाजित कर उपभोक्ताओं के बीच बाँटा जा सकता है। सभी व्यक्तियों के उपभोग द्वारा उपयोग की गयी रोटियों का योग उपभोग की गई कुल रोटियों की मात्रा के बराबर होगा। अतः यदि किसी दिन एक व्यक्ति को अधिक रोटी दी गयी तो दूसरे के लिए कम ही उपलब्ध होगी। लेकिन कमरे को जिस परिमाण में गरम किया जाता है उसका विभाजन व्यक्तियों के मध्य सम्भव नहीं होता। इस कमरे के सभी व्यक्ति एक ही परिमाण में गर्मी का उपभोग करते हैं उनके लिए अलग- अलग पैमाने में गर्मी का उपभोग करना सम्भव नहीं है.

उपर्युक्त को आधार मानकर सैम्युलसन ने सार्वजनिक वस्तुओं की परिभाषा देते हुए लिखा है कि “सार्वजनिक वस्तु वह है जिस संतुलन की स्थिति में जितना उत्पादन होता है उतनी ही मात्रा में सभी उपभोक्ता मिलकर तथा अलग-अलग उपभोग करते हैं।

सार्वजनिक वस्तुओं की विशेषतायें

  1. सार्वजनिक वस्तुयें वे हैं जिनके उत्पादन से बाह्य लाभ का सृजन होता है और इस लाभ का प्रयोग अनेक व्यक्तियों द्वारा किया जाता है।
  2. सार्वजनिक वस्तुओं के उत्पादन को सभी वर्गों में वितरित किया जाता है अर्थात् इससे प्राप्त लाभ सभी लोगों में फैल जाते हैं।
  3. सार्वजनिक वस्तुओं से उन लोगों को भी लाभ प्राप्त होते हैं जो उसके बदले कीमत का भुगतान नहीं करते।
  4. सार्वजनिक वस्तुओं का प्रावधान बजट द्वारा होता है।
  5. सार्वजनिक वस्तुओं का प्रत्येक उपभोक्ता अपने मूल्यांकन के अनुसार कीमत अदा कर सके।

सार्वजनिक एवं निजी वस्तुओं में अन्तर-

सामाजिक वस्तुयें उन वस्तुओं को कहते हैं जिनके उत्पादन से बाह्य लाभ का सृजन होता है तथा इस लाभ का उपभोग अनेक व्यक्तियों द्वारा किया जाता है। ऐसे लाभ का विभाजन सम्भव नहीं होता। इस वस्तु का उपभोग वे व्यक्ति भी कर सकते हैं जो कीमत का भुगतान नहीं करते हैं। निजी वस्तुयें उन वस्तुओं को कहते हैं जिनके उत्पादन से आन्तरिक लाभ प्राप्त होता है तथा उपभोग में प्रतिद्वन्द्विता रहती है। वही व्यक्ति इन वस्तु का उपभोग कर सकते है जो इसके लिए बाजार कीमत का भुगतान करते हैं। सार्वजनिक एवं निजी वस्तुओं में प्रमुख अन्तर निम्नलिखित हैं-

  1. सार्वजनिक या सामाजिक वस्तुयें बाह्य लागत एवं लाभ के आधार पर उत्पादित की जाती है जबकि निजी वस्तुयें निजी लागत एवं लाभ के आधार पर उत्पादित की जाती हैं।
  2. सार्वजनिक वस्तुओं के उपभोग में प्रतिद्वन्द्विता का अभाव रहता है जबकि निजी वस्तुओं के उपभोग में प्रतिद्वद्विन्ता रहती है।
  3. सार्वजनिक वस्तुओं में भुगतान व लाभ साथ-साथ प्राप्त नहीं होते जबकि निजी वस्तुओं में भुगतान व लाभ साथ-साथ प्राप्त होते हैं।
  4. सार्वजनिक वस्तुओं से प्राप्त लाभ अस्पष्ट होता है जबकि निजी वस्तुओं से प्राप् लाभ स्पष्ट होते हैं।

मिश्रित वस्तुयें-

वास्तविक संसार में न तो शुद्ध निजी वस्तुयें मिलती हैं और न ही शुद्ध सार्वजनिक वस्तुयें मिलती हैं बल्कि दोनों के मिश्रण से युक्त वस्तुयें मिलती हैं जिन्हें हम मिश्रित वस्तु कह सकते हैं। एक मिश्रित वस्तु वह है जिसमें निजी वस्तु तथा साथ ही सार्वजनिक वस्तु की विशेषताओं का मिश्रण हो। जब वस्तु न तो शुद्ध निजी वस्तु हो और न ही शुद्ध रूप से सार्वजनिक वस्तु हो बल्कि उसमें सार्वजनिकता तथा निजीपन का अंश विद्यमान हो तो उसे हम मिश्रित वस्तु कहते हैं। जैसे हम लोगों ने देखा कि स्थानिक सीमा क्षमता सम्बन्धी प्रतिबन्ध के कारण सार्वजनिक वस्तु में निजी वस्तु का लक्षण आ जाता है। इसी प्रकार हम यह भी देख सकते हैं कि निजी वस्तुओं में भी सार्वजनिकता का अंश आ सकता है। उदाहरण के लिए टेलीविजन को लीजिए। टेलीविजन जब आप अपने घर में अपने परिवार के सदस्यों के साथ देखते हैं तो यह एक निजी वस्तु है पर जब आप बाहर अपने लान में लगाकर अपने मित्रों तथा पड़ोसियों के साथ टेलीविजन पर क्रिकेट मैच देखते हैं और आने वाले मैच भी देखते हैं तो यह अर्द्ध सार्वजनिक वस्तु बन जाती है क्योंकि इसमें सार्वजनिकता का अंश आ जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि व्यावहारिक संसार में मिश्रित वस्तुयें ही अधिकांशतया पायी जाती है, शुद्ध सार्वजनिक वस्तुयें तथा शुद्ध निजी वस्तुयें इन्हीं की अन्त्य स्थितियाँ हैं।

मेरिट वस्तुओं की अवधारणा-

मेरिट वस्तुयें उन वस्तुओं को कहते हैं जिनसे प्राप्त लाभ आन्तरिक या बाह्य हो सकते हैं किन्तु मात्रा में उपभोग किया जाये। इसका निर्धारण व्यक्ति नहीं करता है बल्कि सरकार द्वारा किया जाता है। इस प्रकार जहाँ सामाजिक वस्तुओं का उत्पादन व्यक्तियों के अधिमान के अनुसार होता है वहाँ मेरिट वस्तुओं का उत्पादन शासक वर्ग के अधिमान के अनुसार होता है और यह अधिमान व्यक्तियों पर उनकी इच्छा के विपरीत भी डाला जाता है।

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Pankaja Singh

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