समाज शास्‍त्र

जातिवाद के परिणाम | जातिवाद का निवारण

जातिवाद के परिणाम | जातिवाद का निवारण

जातिवाद के परिणाम

(Consequences of Casteism)

जातिवाद के परिणाम निम्नलिखित हैं-

  1. देश की एकता में बाधा- राष्ट्रीय एकता समय की माँग है। किन्तु आज जातिवाद राष्ट्रीय एकता के मार्ग में सबसे अधिक बाधा उपस्थित कर रहा हैं। हर जाति अपने स्वार्थों की पूर्ति हेतु सही एवं गलत तरीकों को अपना कर राष्ट्रीय एकता एवं हितों को ठुकरा रही है।
  2. प्रजातंत्र के लिए घातक- जातिवाद स्वस्थ प्रजातंत्र के लिए घातक है। प्रजातंत्र समानता एवं बन्धुत्व की भावना में विश्वास करता है जब कि जातिवाद जाति के निजी स्वार्थों को प्राथमिकता देता है। आज राजनैतिक दलों के निर्माण एवं निर्वाचन में जातिवाद का नग्र रूप दिखलाई पड़ता है जिससे स्वच्छ, सुन्दर एवं लोक हितकारी प्रशासन का निर्माण नहीं हो पाता।
  3. नैराश्य एवं मानसिक तनाव- जातीय आधार पर अयोग्य व्यक्तियों का चयन होने के कारण अधिक योग्य एवं सक्षम युवकों को सेवा एवं व्यापार में अवसर नहीं मिलता तो उनमें निराशा एवं कुण्ठा का भात पैदा होता है जो कि कभी-कभी ध्वंसात्मक रूप लेकर बड़ा नुकसान पहुंचाता है। आज युवक वर्ग में तनाव का एक प्रमुख कारण जातिवाद भी है।
  4.  अपराधी प्रवृत्ति को प्रोत्साहन- जातिवाद कभी-कभी आपसी मारपीट, संघर्षों एवं बलबों का रूप भी ले लेता है। निम्न वर्ग में संघर्ष इसका ज्वलंत उदाहरण है। दहेज जैसे दानव से लड़ने के लिए कितने ही लोगों को अनैतिकता एवं अपराधों जैसे घूस लेना एवं गबन आदि तक का सहारा लेना पड़ता है।
  5. नैतिक पतन- जातिवाद ने मानवता तथा नैतिकता की उच्च मान्यताओं को पतन के गर्त में ढकेल दिया है। आज व्यक्ति स्वार्थी, लोभी, लालची एवं छुद्र भावना का शिकार होकर नैतिकता से दूर हो रहा है। वसुधैव कुटुम्बकम् की महान भावना में विश्वास करने वाला व्यक्ति आज व्यक्तिवाद के अन्दर सिमट कर अनैतिकता को गले लगा रहा है।
  6. औद्योगिक कुशलता में बाधा- आज जातिवाद के कुप्रभाव के कारण अकुशल किन्तु अपनी जाति के व्यक्तियों को उच्च स्थानों पर नियुक्त कर औद्योगिक कुशलता का गला घोटा जा रहा है।
  7. भारतीय संविधान की अवहेलना- भारतीय स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात एक धर्म निरपेक्ष गणराज्य बना। भारतीय संविधान जाति, लिंग, धर्म, गोत्र आदि में विश्वास न करके समानता पर आधारित है। जातिवाद के कुप्रभाव से उपरोक्तं सिद्धान्तों का सही अर्थों में पालन नहीं हो पाता।
  8. पक्षपात एवं भ्रष्टाचार को प्रोत्साहन- जातिवाद ने आर्थिक, राजनैतिक शिक्षा एवं धर्म के क्षेत्र में पक्षपात एवं भ्रष्टाचार को प्रोत्साहन देकर हमारी भावनाओं को अपनी जाति के स्वार्थों तक ही संकुचित कर दिया है। चाहे शिक्षण संस्थायें हों अथवा सरकारी या गैर सरकारी कार्यालय प्रत्येक जगह जातीय आधार पर पक्षपात की भावना देखने को मिलती है।
  9. धर्म परिवर्तन में प्रेरक- अपनी जाति को कमजोर पाकर या अपनी जाति का अन्य जातियों द्वारा शोषण किया जाना, सदस्यों को धर्म परिवर्तन तक कर डालने की प्रेरणा देता है। यह जातीय भावना का ही दुष्परिणाम है कि लाखों भारतीयों ने ईसाई, मुसलमान धर्म स्वीकार कर लिया।
  10. विदेशों से सम्पर्क में बाधक- जातिवाद की रूढ़िवादी एवं सनातन भावना हमें बाह्य सम्पर्क करने को निरुसाहित करती है – आज की महती आवश्यकता है कि हम ज्ञान विज्ञान एवं तकनीक के प्रसार हेतु अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग का सहारा है।

सरकारी प्रयत्न

(Efforts of the Government)

स्वाधीनता की प्राप्ति के पश्चात् भारत में एक प्रजातान्त्रिक गणतन्त्र की स्थापना हुई तथा एक धर्म निरपेक्ष राज्य की स्थापना के साथ-साथ नवीन संविधान का निर्माण किया गया। संविधान में धर्म निरपेक्षता एवं प्रजातन्त्रिक मूल्यों को ध्यान में रखते हुए भारत को एक कल्याणकारी राज्य बनाने का उद्देश्य समक्ष रखा गया। इसीलिए भारत के नवीन संविधान के अनुच्छेद 1 में यह स्पष्ट रूप से घोषित किया गया, “सभी नागरिकों के लिए समानता, स्वतन्त्रता तथा न्याय प्रदान करना तथा भ्रातृत्व की भावना को प्रोत्साहन देना है।” इसका उद्देश्य यह था कि जाति, लिंग, धर्म या क्षेत्र के आधार पर किसी व्यक्ति के साथ किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जायेगा। समानता की भावना को अव्यावहारिक बनाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 15 में यह भी स्पष्ट किया गया कि – (1) राज्य जाति के आधार पर किसी व्यक्ति के साथ कोई भेदभाव नहीं करेगा। (2) राज्य जाति के आधार पर कोई भी नागरिक दुकानों, जलपानगृहों, सार्वजनिक कुओं तथा तालाबों के प्रयोग तथा प्रवेश के संबंध में किसी तरह के प्रतिबन्ध का शिकार नहीं होगा। (3) अस्पृश्यता की प्रथा पूर्णतया निषिद्ध है।

जातिवाद का निवारण

(Removal of Casteism)

राष्ट्रीय एकता को मजबूत बनाने, राष्ट्रीय विकास को सुनिश्चित दिशा दिखाने तथा सम्पूर्ण सामाजिक जीवन को शान्तिमय एवं सहयोगी बनाने के लिए आवश्यक है कि जातिवाद की भावना को अमूल नष्ट किया जाये। इस संदर्भ में निम्न सुझाव दिये जा सकते हैं-

(1) जाति विरोधी शिक्षा- जाति विरोधी शिक्षा जातिवाद की कलुषित भावना को समाप्त करने में बहुत बड़ा योगदान दे सकती है। बालक में आधारभूत मनोवृत्तियों का निर्माण विद्यालय शिक्षा काल में होता है। अतएव ऐसी व्यवस्था की जाय कि बालक को जाति के विषय में कुछ भी न मालूम होने पाये और वे भविष्य में एक जातिविहीन समाज के निर्माण में योगदान दे सकें।

(2) संयुक्त परिवार का विघटन- संयुक्त परिवार ही विभिन्न रूढ़िवादी प्रवृत्तियों को बढ़ावा देता रहा है। संयुक्त परिवारों में व्यक्ति गुलामी का दास रहता है। एकल परिवार व्यक्ति को वैचारिक एवं कार्य सम्बन्धी स्वतन्त्रता प्रदान करते हैं। अग्रवाल ने सत्य ही लिखा है “जातीय बन्धन तभी टूटेंगे, जब संयुक्त परिवार टूटेगा।”

(3) जाति विरोधी प्रचार- जातिवाद को धराशायी करने के लिए जाति विरोधी प्रचार भी अत्यन्त सहायक हो सकता है। भाषण, मेलों, तथा सभाओं के द्वारा लोगों को दूसरी जाति के लोगों के साथ स्वच्छन्द रूप से मिलने का अवसर प्रदान किया जाये।

(4) जाति सूचक शब्दों के प्रयोग पर प्रतिबन्ध- व्यक्तियों को अपने जाति सूचक शब्दों के प्रयोग से रोका जाये जिससे कि जातीय पक्षपात न पैदा हो और न ही जातिवाद को प्रोत्साहन मिले।

(5) जातीय संगठनों को निरुत्साहित करना- आज देश में विभिन्न जातियों के छोटे-मोटे सैकड़ों संगठन बने हुए हैं ऐसे क्षत्रिय महासभा, कायस्थ एसोसियेशन तथा कान्य-कुब्ज सभा आदि। सरकार को ऐसे संगठनों को मान्यता नहीं प्रदान करनी चाहिए तथा हमें जनमत के द्वारा इन्हें निरुत्साहित करना चाहिए। इसके स्थान पर अन्तर्जातीय एवं परोपकारी सामाजिक संगठनों को प्रोत्साहन देना चाहिए।

(6) अन्तर्जातीय विवाह- जाति सम्बन्धी ऊंच-नीच की भावना को समाप्त करने के लिए शिक्षित युवक एवं युवतियों को अन्तर्जातीय विवाह के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। सरकार को ऐसे साहसी युवकों को जो अन्तर्जातीय विवाह करें, सरकारी सहायता, अनुदान, छात्रवृत्तियाँ तथा सरकारी नौकरियों आदि में प्राथमिकता देने के साथ ही विशेषरूप से पुरस्कृत भी करना चाहिये जिससे अन्य लोग भी उस ओर आकर्षित हों।

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Pankaja Singh

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