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भाषाओं का पारिवारिक वर्गीकरण | भाषाओं के पारिवारिक वर्गीकरण का सिद्धान्त

भाषाओं का पारिवारिक वर्गीकरण | भाषाओं के पारिवारिक वर्गीकरण का सिद्धान्त

भाषाओं का पारिवारिक वर्गीकरण

जिस प्रकार आकृतिमूलक या रचनात्मक वर्गीकरण में भाषावेत्ता भाषा की आकृति, रूप और रचना पर ही अपना ध्यान केन्द्रित करता है तथा सम्बन्ध तत्वों की विविधता तथा इनके प्रयोग की विवेचना कर वर्गीकरण के सिद्धान्तों का निर्धारण करता है, उसी प्रकार पारिवारिक वर्गीकरण के वह उपर्युक्त तत्वों के अतिरिक्त अर्थ-तत्व का विवेचन कर शब्द तथा भाषा के इतिहास, उद्भव और विकास का निरीक्षण कर उनके साम्य की भावना से सिद्धान्तों का प्रतिपादन करता है। अतः पारिवारिक विभाजन की ऐतिहासिक उत्पत्तिमूलक तथा वंशानुक्रमिक नाम से भी पुकारा जाता है। मानव वंशपरम्परा में पीढ़ी-दर-पीढ़ी व्यक्ति का अंकन होता है और तदनुसार परिवार में केवल वे भाषाएँ स्थान पाती हैं जिनमें रूप-रचना के अतिरिक्त शब्दार्थ और ध्वनि की दृष्टि से भी साम्य होता है।

प्रायः एक ही प्रकार की भाषा में 1. शब्द समूह (शब्द और अर्थ) 2. व्याकरण या रचना (सम्बन्ध तत्व) और 3. ध्वनि की समानता हो सकती है। शब्द-समूह और व्याकरण की दृष्टि से व्याकरण की अपेक्षा अधिक द्रुतगति से परिवर्तन होता है। व्याकरण की दृष्टि से समता रखने वाले शब्द क्रिया और सर्वनाम हैं, क्योंकि अन्य भाषा में संज्ञा या विशेषण की अपेक्षा कर्म ही ग्रहण किया जाता है। शब्द-साम्य में शब्दों के तद्भव रूप पर ही अधिक विचार किया जाता है। व्याकरण की समानता में तीन बातें विचार्य हैं-

  1. धातु स शाद बनाने की समानता 2. मूल शब्द से पूर्वसर्ग (Prefix) मध्य सर्ग (Infix) तथा अन्तसर्ग (suffix) के योग से अन्य शब्द की रचना तथा 3. वाक्य रचना की समानता। इन सब संकेतों के आधार पर दो भागों को एक परिवार को सिद्ध करने के लिए निम्न तथ्य विचारणीय हैं-

(क) ध्वनियों की समता (ख) ध्वनियों की विभिन्नता में अन्य भाषा के प्रभाव या उनके स्वाभाविक विकास के आधार पर नवीन ध्वनियों के प्रवेश के इतिहास का निरीक्षण। (ग) शब्दों प्रमुखतः मौलिक शब्द-भण्डार को संज्ञा क्रिया (धातु), सर्वनाम और संख्यावाचक विशेषण में ध्वनि और अर्थ की समानता। (घ) धातु या मूल शब्द में व्याकरणिक तत्वों का विश्लेषण कर शब्द-निर्माण की प्रक्रिया की समानता। (ङ) वाक्य-रचना की समानता। इन सिद्धान्तों के अनुसार भाषा की तुलना और इतिहास के आधार पर भाषा के मूल और उत्पत्ति की खोज करके अनेक भाषाओं के परिवार की कल्पना की जाती है। एक देश के लोग दूसरे देश में आकर भी अपनी पूर्व-भाषा की अक्षुण्णता बनाये रखते हैं। दूर होते हुए भी भाषा के परिवर्तित रूप में सजातीयता की झलक स्पष्ट रहती है।

स्पष्टत और सुबोधता की दृष्टि से भूगोल के आधार पर संसार की भाषाओं को बांट लेना समीचीन होगा। इन खण्डों में अनेक भाषा परिवार सम्मिलित है। इस दृष्टि से भाषा के चार खण्ड हैं- (1) अफ्रीका खण्ड, (2) यूरेशिया खण्ड, (3) प्रशान्त महासागरीय खण्ड तथा (4) अमरीका खण्ड।

अफ्रीका खण्ड

अफ्रीका खण्ड में भाषा-परिवार की संख्या पांच है- (क) बुशमैन, (ख) वाण्टू, (ग) सूडान, (घ) हेमेटिक तथा (ङ) सेमेटिक ।

(क) बुशमैन भाषाएँ प्राचीनता और जंगली भाषाएँ हैं। इन्होंने सूडान तथा बाण्टू परिवार को भी प्रभावित किया है। अब इनकी प्रवृत्ति व्यास प्रधान हो रही है। क्लिक तथा अन्तः स्फोटात्मक ध्वनियाँ इस भाषा में मिलती हैं। इनमें पुल्लिंग, स्त्रीलिंग, न होकर सजीव और निर्जीव तत्वों से लिंग का ज्ञान होता है। एक वचन की पुनरुक्ति से बहुवचन शब्द बन जाता है; यथा घोडा घोड़ा (अनेक घोड़े) आदि।

(ख) बाण्टू परिवार की भाषाएँ मध्य तथा दक्षिणी अफ्रीका में मिलती हैं। पदों की रचना उपसर्ग जोड़कर होती है। इन भाषाओं में लिंग भेद का अभाव है। कभी-कभी स्वर-भेद से अर्थ विपरीत हो जाता है। जैसे होफिनेल्ला का अर्थ बाँधना है, परन्तु होफिनेल्ला का अर्थ खोलना है। इस भाषा का प्रधान गुण कोमलता, माधुर्य तथा काव्यात्मकता है। दक्षिणी पूर्वी भाषाओं में क्लिक ध्वनियाँ भी प्राप्त होती हैं।

(ग) सूडान परिवार की भाषाओं का प्रचलन भूमध्य-रेखा के उत्तर तथा हेमेटिक परिवार दक्षिण में है। कुछ भाषाएँ लिपिबद्ध हैं तथा बण्टू से साम्य रखती हैं। चीनी भाषा की भांति अयोगात्मक तथा एकाक्षर हैं। इस परिवार की भाषाएँ ध्वन्यात्मक हैं तथा सुर तथा तान के साथ अर्थ बदल जाता है। विभक्तियों का नितान्त अभाव है।

(घ) हेमेटिक परिवार का विस्तार सम्पूर्ण अफ्रीकी देश में है। इस परिवार की कतिपय भाषाओं में धार्मिक साहित्य तथा प्राचीन शिलालेख भी उपलब्ध हैं। इस परिवार की भाषाएँ श्लिष्ट योगात्मक हैं। पद-रचना प्रत्यय तथा उपसर्ग दोनों का प्रयोग होता है तथा स्वर-परिवर्तन से अर्थ बदल जाता है। पुनरुक्ति का प्रयोग बल देने के लिए होता है, जैसे गोई (काटना) से गोगोई (बार-बार काटना) बनता है।

(ड.) सेमेटिक परिवार की भाषाओं का प्रयोग मोरक्को से स्वेज नहर तक होता है। इसका प्रधान क्षेत्र एशिया है। सेमेटिक और हेमेटिक में पद-रचना की दृष्टि से पर्याप्त साम्य है। इनमें धातु प्रायः तीन व्यंजनों की होती है और स्वर तथा पप्रत्यय स शब्द-निर्माण होता है, जैसे क त ल से हिक्वितल। समास केवल व्यक्तिवाचक संज्ञाओं में मिलता है। ‘त’ स्त्रीलिंग का चिन्ह है यह कहीं ‘थ’ या ‘ह’ हो गया है जैसे मलक (राजा) से मलकह (रानी)। इस वर्ग की अरबी, भाषा, धर्म, ज्योतिष, गणित, दर्शन साहित्य और रसायन की दृष्टि से धनी हैं।

यूरेशिया खण्ड

यूरेशिया खण्ड संसार भर में मानव सभ्यता और संस्कृति का स्रोत तथा केन्द्र रहा है। इस क्षेत्र की साहित्य निधि विकसि और सुव्यवस्थित रही है, अतः इस खण्ड की भाषाओं का अध्ययन और विवेचन विस्तृत तथा वैज्ञानिक रूप से हुआ है। वास्तव में भाषा-विज्ञान के उदय की प्रवृत्ति इसी खण्ड को समूह साहित्य भाषा की प्रेरणा है। इस वर्ग के अन्तर्गत न आने वाली भाषाओं को विविध समुदाय में रखा गया है। इस खण्ड को आठ भाषा परिवारों में विभक्त किया गया है-

(1) सेमेटिक, (2) काकेशस (3) यूराल-अल्टाई, (4) एकाक्षर या चीनी (5) द्रविड़, (6) आग्नेय, (7) भारोपीय तथा, (8) विविध।

  1. सेमेटिक परिवार- के साहित्य ने भारोपीय परिवार की भाषाओं को अधिक प्रभावित किया है। अनेक लिपियों का आदि स्रोत भारत और चीन को छोड़कर सेमेटिक परिवार ही रहा है। इस परिवार की भाषाओं में पारस्परिक साम्य अधिक मिलता है। इस परिवार का कुछ विवरण अफ्रीका खंड में दे दिया गया है। अरबी इस खण्ड की प्रतिनिधि तथा परिनिष्ठित भाषा है।
  2. काकेशस परिवार- इस परिवार की भाषाएँ कृष्णसागर और कैस्पियन सागर के मध्य काकेशस पर्वत पर बोली जाती हैं। पर्वतीय स्थल की अधिकता से अनेक बोलियों का यहाँ विकास हो गया है। ये भाषाएं अतः अश्लिष्ट योगात्मक है और इनमें प्रत्यय और उपसर्ग दोनों ही लगाये जाते हैं। संज्ञा में अधिक विभक्तियों तथा कहीं छ. लिंगों का प्रयोग भी होता है। बास्क की भांति सर्वनाम और क्रिया का योग भी इस परिवार में होता है। इस वंश में क्रिया के रूप जटिल हैं। जार्जियन भाषा के अतिरिक्त इनकी कोई लिपि और साहित्य नहीं है।
  3. यूराल अल्टाई समुदाय- इस समुदाय के अन्य नाम सीथियन, तूरानी तथा फिनो तातारिक भी हैं। इस कुल की भाषाएँ टर्की और फिनलैण्ड से लेकर पूर्व में ओखेत्स्क सागर तक तथा भूमध्य सागर से उत्तरीय सागर तक फैली हुई है। क्षेत्र विस्तार में भारोपीय परिवार ही इसके समकक्ष रखा जा सकता है। इन भाषाओं में अधिक भिन्नता मिलती है। ये भाषाएँ अश्लिष्ट अन्तःयोगात्मक हैं। धातु में प्रत्यय के योग से पद-रचना की जाती है। कुछ भाषाएँ अश्लिष्ट से श्लिष्ट हो रही हैं, जैसे फिनिस आदि। धातु का प्रयोग अव्यय के समान अधिकारी रूप में किया जाता है। उच्चारण की सुविधा के लिए धातुओं के ‘वजन’ पर प्रत्ययों के स्वर लघु तथा गुरु कर दिये जाते हैं। जैसे अटू के साथ ‘लर मिलकर अलर (घोड़े) पद बनता है पर ‘एव’ के साथ एवलर (= अअने घर)। यह परिवार फिनिस, तुर्की, हंगरी, साहित्य तथा समृद्धि की दृष्टि से प्रसिद्ध है।
  4. एकाक्षर या चीनी परिवार- चीनी भाषा की प्रमुखता के कारण इनको चीनी परिवार भी कहते हैं। इसका क्षेत्र चीन, स्याम, तिब्बत और बर्मा तक विस्तृत है। भारोपीय परिवार के पश्चात् भाषा-भाषियों की दृष्टि से सबसे बड़ा है। चीनी भाषा में विश्व का सर्वप्राचीन साहित्य प्राप्त होता है। चीनी भाषा में इतनी क्षमता है कि सूक्ष्मातिसूक्ष्म विचारों को सरलता से अभिव्यंजित कर सकती है। इस समुदाय की भाषाएँ अयोगात्मक तथा स्थान प्रधान है। प्रत्येक शब्द एकाक्षरात्मक तथा अव्यय के रूप में किसी भी स्थान पर प्रयोग किया जा सकता है। इन शब्दों की संख्या पाँच सो से एक सहस्र के मध्य है। अधिक तथा अनेक अर्थ को प्रकट करने के लिए सुर या तान का उपयोग होता है। स्पष्टता के लिए द्वित्व का प्रयोग किया जाता है, जैसे ताओलृ के एक साथ प्रयोग से अनेकार्थों में सड़क का अर्थ ले लिया गया है। एक ही शब्द, स्थान और आवश्यकतानुसार संज्ञा, क्रिया, विशेषण आदि बन जाता है। यहाँ अनुनासिका ध्वनियों का अधिकतर प्रयोग होता है ‘ड’ और ‘ञ’ के उच्चारण बाहुल्य इस चीनी भाषा में मिलता है। अनामी और स्यामी पर चीनी तथा तिब्बत और बर्मा पर भारतीय प्रभाव अधिक पड़ा है। बौद्ध धर्म सम्बन्धी साहित्य इन भाषाओं में सुरक्षित है।
  5. द्रविड़ परिवार- यह वर्ग नर्मदा, गोदावरी के दक्षिण दिशा में समस्त भारत में फैला हुआ है। इसको तमिल परिवार भी कहते हैं। यह वाक्य और स्वर की दृष्टि से यूराल-अल्टाई परिवार के अनुरूप है। ये भाषाएँ अश्लिष्ट योगात्मक हैं प्रत्यय और समास का प्राधान्य है। इस परिवार की विशेषताएँ मूर्धन्य ध्वनियाँ (हवर्ग) हैं। इन भाषाओं में दो वचन और तीन लिंग होते हैं। नपुंसक शब्द प्रायः एकवचन होते हैं। मलयालम, कन्नड, तमिल तथा तेलगु इस परिवार को विकसित भाषाएँ हैं। आर्य भाषाओं में सोलह पर आधारित (सेर, छटाँक, रुपया, आना) माप तथा मूर्धन्य ध्वनियों तथा अलि, नोर, मीन, अटवी, कठिन, कोण आदि इसी परिवार की देन हैं।
  6. आग्नेय परिवार- इसको आस्ट्रिक पारवार भी कहा गया है। यह शान्त सागर के द्वीपों, स्याम, बर्मा के जंगलों में, नीकोबार, आसाम की पहाड़ियों पर बंगाल, बिहार, मध्य प्रदेश तथा मद्रास (चेन्नई) के कुछ भागों तक फैला हुआ है। इस परिवार की भाषाएँ अश्लिष्ट योगात्मक हैं, पर कुछ वियोगावस्था की ओर बढ़ रही हैं। धातु द्वि-अक्षरात्मक है। पद-रचना में योग आदि, मध्य अन्त स्थानों पर होता है। इस परिवार को मुंडा भाषा अधिक प्रसिद्ध है। चीनी भाषा की तरह एक शब्द ही यथा स्थान संज्ञा, क्रिया का रूप धारण कर लेता है। ध्वनियों में यह परिवार भरतीय भाषाओं के तुल्य है दो लिंग, तीन वचन और दस तक संख्याएं होती हैं। कोड़ी शब्द तथा वस्तुओं की कोटी (बोस के वर्ग) में गिनना मुंडा भाषा से ही भारतीय भाषाओं में आया है।
  7. भारोपीय परिवार- इस परिवार में संसार को सर्वोन्नत तथा विकसित भाषाएँ आती हैं। यह परिवार साहित्य, क्षेत्र और स्वीकृति की दृष्टि से सर्वोपरि है। इस परिवार के अन्य नाम, आर्य या भारत-ईरानी वर्ग, भारत-जर्मन आदि प्रसिद्ध हैं। इनकी विभक्तियाँ बहिर्मुखी हैं। धातुएँ एकाच हैं। समास रचना का बाहुल्य है। ये सभी भाषाएँ संहित से व्यवहित हो रही हैं। इनकी नौ शाखाएं है-केल्टिक, जर्मन, इटालिक, पीक, तोखारी, अल्बेनियम, लैटोस्लाव्हक, अमानियन तथा आर्य वर्ग।
  8. विविध समुदाय- निश्चित परिवार के अन्तर्गत न आने वाली भाषाएँ इस समुदाय में आती हैं। इसके दो भेद हैं। प्राचीन और आधुनिक प्राचीन भाषाओं में इटली को एनुस्कन, सुमेरियन, मितानी, कोसी, बन्नी, एलामाइट आती हैं। आधुनिक भाषाओं में कोरियाई, एन, वास्क जापानी, अण्डमानी आदि प्रमुख हैं। फ्रांस और स्पेन की सीमा पर बास्क बोली जाती है इसका वाक्य-विन्यास सरत और सुगम है।

प्रशांत महासागरीय खण्ड

इस खण्ड की भाषाओं का विस्तार प्रशांत महासागर, हिन्द महासागर में तथा मेडागास्कर से ईस्ट द्वीप तक है। इस खण्ड में पांच परिवार हैं-

  1. इण्डोनेशियन या मलायन परिवार,
  2. मेलेनेशियन परिवार,
  3. पालिनेशियन परिवार,
  4. पापुअन परिवार,
  5. आस्ट्रेलियन परिवार।

इन परिवारों को आस्ट्रोनेशियन परिवार या मलय पालिनेशियन परिवार के नाम से अभिहित किया जाता है। प्रथम तीन परिवार को मलय-पालिनेशियन परिवार भी कह दिया जाता है। इन परिवारों का एक स्रोत होने के कारण से बहुत सी बातों में समानता है। प्रायः इस खंड की भाषाएँ अश्लिष्ट योगात्मक है। प्रायः धातुएँ दो अक्षरों की होती हैं। स्वराघात बलात्मक है। पद-रचना के लिए आदि, मध्य तथा अंत में शब्दों का योग कर दिया जाता है। ये सभी भाषाएँ शनैः शनैः वियोगात्मक हो रही है।

अमरीका खण्ड

इस खंड के अंतर्गत उत्तरी तथा दक्षिणों अमरीका की भाषाएं आती है। इस खंड को चार सौ भाषाओं को तीस वर्गों में विभाजित किया जा सकता है। ये सभी भाषाएं अश्लिष्ट योगात्मक है। चाक्य रचना के लिए शब्दों की प्रधान ध्वनि या अंश  के योग से वाक्य एक लंबे शब्द रूप में बन जाता है। चेरोकी भाषा का नाधोलिनिन (हमारे पास नाव लाओ) इसका एक उदाहरण है। कुछ भाषाओं में लिपि और साहित्य दोनों को उपलब्ध होते हैं। इन भाषा परिवारों का सम्यक् अध्ययन न होने के कारण इसका वैज्ञानिक विभाजन या वर्गीकरण सम्भव नहीं हो सका है। अध्ययन की सामग्री का भी इस खंड में अभी नितान्त अभाव है।

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Pankaja Singh

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