अर्थशास्त्र

भारत में गरीबी या निर्धनता की धारणा | भारत की गरीबी के प्रमुख कारण | गरीबी दूर करने के सरकार के प्रयास

भारत में गरीबी या निर्धनता की धारणा | भारत की गरीबी के प्रमुख कारण | गरीबी दूर करने के सरकार के प्रयास | Perception of poverty or poverty in India in Hindi | Major causes of poverty in India in Hindi | Government’s efforts to eradicate poverty in Hindi

भारत में गरीबी या निर्धनता की धारणा

(Concept poverty in india)-

गरीबी या निर्धनता का अर्थ उस सामयिक क्रिया से हैं जिसमें समाज का एक भाग अपने जीवन की बुनियादी अवश्यकताओं को भी पूरा नहीं कर सकता। जब समाज का एक बहुत बड़ा अंग न्यूनतम जीवन स्तर से बंचित रहता हैं और केवल निर्वाह-स्तर पर गुजारा करता हैं तो यह कहा जाता है कि निर्धनता या गरीबी शब्द का प्रयोग निम्नलिखित दो अर्थों में किया जाता हैं –

  1. सापेक्ष गरीबी- सापेक्ष गरीबी के सम्बन्ध में विभिन्न वर्गों या देशों के निर्वाह-स्तर की तुलना करके गरीबी का पता लगाया जा सकता हैं। जिस देश या वर्ग में लोगो का निर्वाह स्तर नीचा होता है, वे उच्च निर्वाह स्तर वाले लोगों की तुलना में गरीब माने जाते हैं। निर्वाह-स्तर को आय या उपभोग-व्यय के रूप में मापा जाता हैं। इस दृष्टि से भारतीय बहुत गरीब ठहरते हैं। भारत में इस मापदण्ड का अपनाया जाना तर्कसंगत भी हैं क्योंकि यहाँ बहुत बड़ी संख्या में लोगों को न्यूनतम आहार नहीं मिल पाता है।
  2. निरपेक्ष गरीबी- निरपेक्ष निर्धनता से तात्पर्य उस न्यूनतम आय से हैं जिसकी एक परिवार के लिए आधारभूत न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु आवश्यकता होती हैं तथा जिसे वह परिवार जुटा पाने में असमर्थ होता है, उस परिवार को गरीबी की रेखा से नीचे जीवन बिता रहे कहा जाता है।

विश्व बैंक रिपोर्ट, 2011-12 के अनुसार, 2010-11 में विकाशील देशों की कुल जनसंख्या का एक तिहाई भाग निर्धनता-रेखा से नीचे थी और इनकी लगभग 18 प्रतिशत जनसंख्या अति-निर्धन थी। निर्धनता-रेखा का आधार गरीबों के लिए 370 डालर प्रति व्यक्ति वार्षिक और अति-गरीबों के लिए 275 डालर माना गया। पाँच वर्ष से कम शिशु मृत्यु दर प्रति व्यक्ति वार्षिक 71 थी और जीवन-प्रत्याशा 65.3 वर्ष अनुमानित की गयी। फिर, इन देशों में ‘निरपेक्ष निर्धनता’ भी देखने में आती हैं। दो समय का भोजन इनके लिए विलासिता हैं। अपने स्वामियों के उतरे हुए कपड़े और बचा-खुचा भोजन इनकी खुशकिस्मती हैं, मिट्टी के टूटे बर्तन  इनकी सम्पत्तियाँ हैं, आवास के अंभाव में यह प्रकृति की गोद में जन्म लेते हैं और इनकी निकली हड्डियाँ, पीली आँखें, सूखी खाल, फोड़े युक्त पैर और मुरझाये चेहरे, इनके आर्थिक दृष्टि अपाहिज होने की कहानी प्रस्तुत करते हैं।

विश्व बैंक रिपोर्ट 2000 के अनुसार अल्पविकसित देशों में कुल जनसंख्या के निम्नतम 40 प्रतिशत पविवारों को GNP का औसतन 14 प्रतिशत भाग और उच्चतम 20 प्रतिशत परिवारों को GNP का 47 प्रतिशत भाग प्राप्त होता हैं। विकसित देशों के लिए यह अनुपात क्रमश: 18 तथा 41 हैं। इससे एक बात तो जाहिर हैं कि गरीबी और आय-विषमताएँ विश्व के लगभग सभी देशों में विद्यमान हैं। हाँ, उसकी गहनता विकासशील देशों में अपेक्षाकृत अधिक हैं। उल्लेखनीय, बात यह हैं कि धनी तथा निर्धन देशों की प्रति व्यक्ति आय में निरपेक्ष अन्तर अधिक तेजी से बढ़ा हैं और यह लगातार बढ़ने की प्रवृत्ति बनाए हुए हैं। उदाहरणार्थ, निम्न आय देशों में प्रति व्यक्ति औसत आय 1981 में 270 डालर से बढ़कर 1998 में 520 डालर हो गयी जबकि उच्च आय देशों में यह 11.120 डालर से बढ़कर 25,510 डालर हो गयी, जबकि इन दोनों प्रकार के देशों की आय में 1981 में 41 गुना अन्तर था, 1998 में यह बढ़कर 49 गुना हो गया। अतः स्पष्ट हैं कि पिछले पाँच दशकों की विकास यात्रा के बावजूद गरीबी का भूत और वर्तमान एक ही धरातल पर खड़ा हैं अर्थात् उसमें कोई सुधार नहीं आ सका। सच तो यह हैं कि गरीबी के पंख पिछले काल में और भी अधिक फैल गये है।

भारत की गरीबी के प्रमुख कारण

भारत की गरीबी के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-

  1. बढ़ती हुई जनसंख्या- भारत का क्षेत्रफल विश्व का लगभग 2.4% हैं, किन्तु यहाँ विश्व की 16% जनसंख्या निवास करती हैं। 1981 से 1991 तक की अवधि में जनसंख्या 186.64 करोड़ से बढ़कर 254.00 करोड़ हो गयी। 1986 में जन्म दर 32.4 प्रति हजार एवं मृत्यु-दर 11.9 व्यक्ति प्रति हजार रही। परिणामस्वरूप जनसंख्या में वृद्धि की दर 2% से कुछ आर्थिक रही। ऐसी परिस्थिति में निर्धन देश पर उपभोग का दबाव बढ़ता जा रहा हैं।
  2. कृषि एवं खाद्य समस्या – भारत में 67% जनसंख्या कृषि पर निर्भर हैं वर्तमान में कुल राष्ट्रीय आय का लगभग 35.4% कृषि एवं उससे सम्बन्धित क्रियाओं से प्राप्त हो रहा हैं। यहाँ कृषि की उत्पादकता बहुत कम होने के कारण खाद्यात्रों का भारी मात्रा में आयात करना पड़ता हैं। 1989-90 में खाद्यान्न आयात का मूल्य रु० 378 करोड़ का हैं जिसके कारण भारत के… औद्योगिक ढाँचे पर भी प्रभाव पड़ता है।
  3. ऋणग्रस्ता- अधिकांश भारतीय चाहे वह गाँव में रहता हो या शहर में ऋणग्रस्तता का शिकार हैं। ये लोग साहूकारों और ऋणदाताओं से कर्ज प्राप्त करते हैं जिससे इन लोगों को कर्ज से छुटकारा पाना कठिन हैं। भारत के कृषक परिवारों में से लगभग 69% परिवार ऋणग्रस्त हैं। अतः ऋणग्रस्तता गरीबों का जीवन-स्तर ही नहीं बनाती, बल्कि उनको और नीचे ढकेलाती हैं।

गरीबी दूर करने के सरकार के प्रयास

1951 से नवीं योजना के निर्माण की अवस्था तक गरीबी उन्मूलन प्रत्येक योजना का लक्ष्य रहा हैं। अभी तक के विभिन्न अवधियों में ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में प्रारम्भ किये गये कार्यक्रम निम्मानुसार हैं-

ग्रामीण गरीबी को दूर करने के लिए किये गये सरकार के उपाय

  1. अन्त्योदय योजना- यह योजना 1977-78 में प्रारम्भ की गयी। गाँव के सबसे गरीब परिवारों को आर्थिक दृष्टिसे स्वावलम्बी बनाना इस योजना का उद्देश्य हैं।
  2. लघु किसान विकास कार्यक्रम- यह योजना 1974-75 में प्रारम्भ हुई। इसका उद्देश्य हैं छोटे किसानों को तकनीकि एवं वित्तीय सहायता प्रदान करना।
  3. सूखा क्षेत्र कार्यक्रम- इसका आरम्भ वर्ष 1973 में हुआ एवं उद्देश्य सूखाग्रस्त क्षेत्रों में पर्यावरण सन्तुलन, भूमि जल और अन्य प्राकृतिक संसाधनों को विकसित करके सूखे (Drought) या अवर्षा से बचाव के उपाय करना हैं।
  4. बीस सूत्रीय कार्यक्रम- 1975 में आरम्भ इस कार्यक्रम का उद्देश्य गरीबी निवारण एवं जीवन स्तर में सुधान करना हैं।
  5. काम के बदले अनाज कार्यक्रम- यह कार्यक्रम 1977-78 में शुरू किया गया। उद्देश्य हैं विकास परियोजनाओं में श्रम कार्य के पारिश्रमिक के रूप में खाद्यान्न प्रदान कराना।
  6. न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम- इस कार्यक्रम का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में गरीब कार्यक्रम की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति करना तथा इस हेतु उनकी क्रय-क्षमता को स्थापित करना है।
  7. समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम (IRDP)- 2 अक्टूबर, 1980 में आरम्भ इस कार्यक्रम का उद्देश्य ग्रामीण गरीब परिवारों को स्व-रोजगार हेतु ऋण की व्यवस्था करना है।
  8. राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम (NREP)- 1980 में आरम्भ कार्यक्रम का उद्देश्य हैं। ग्रामीण गरीबों को लाभकारी रोजगार के अवसर उपलब्ध करवाना।
  9. ग्रामीण खेतिहर मजदूर रोजगार गारण्टी कार्यक्रम (RLEGP)- 15 अगस्त, 1983 को आरम्भ। इस कार्यक्रम का उद्देश्य भूमिहीन कृषकों को रोजगार उपलब्ध कराना।
  10. जबाहर रोजगार योजना (JRY)- अप्रैल 1989 में आरम्भ। कार्यक्रम का उद्देश्य हैं ग्रामीण बेरोजगारों को रोजगार प्रदान करना।
  11. ट्राइसेम (TRYSEM)- 15 अगस्त, 1979 में आरम्भ। इस कार्यक्रम का उद्देश्य हैं राष्ट्रीय युवा वर्ग की बेरोजगारी को दूर करने हेतु प्रशिक्षण देना।
  12. रोजगार आश्वासन योजना (EAY) ।
  13. जनसंख्या नियन्त्रण हेतु परिवार नियोजन कार्यक्रम।
  14. ग्रामीण कारीगारों को उन्नत औजार किटों की आपूर्ति योजना- जुलाई, 1992 में आरम्भ। उद्देश्य हैं ग्रामीण शिल्पकारों एवं अन्य समस्त प्रकार के कारीगरों को आधुनिक औजारों की आपूर्ति करना।
  15. अन्य उपाय- अन्य, उपायों में बंधुआ मजदूरी को कानूनन समाप्त किये गये तथा धन के केन्द्रीकरण को रोकने हेतु सम्बन्धित कानूनों में संशोधन किये गये।

शहरों में गरीबी को दूर करने के लिए किये गये सरकार के उपाय

  1. नेहरू रोजगार योजना (NRY)-अक्टूबर, 1989 में आरम्भ की गयी। उद्देश्य हैं शहरी क्षेत्रों के बेरोजगारों को रोजगार उपलब्ध करवाना।
  2. शहरी गरीबों के लिए स्वरोजगार कार्यक्रम (SEPUP)-सितम्बर, 1986 में कार्यक्रम आरम्भ किया गया। उद्देश्य हैं शहरी गरीबों को स्व-रोजगार हेतु वित्तीय एवं तकनीकी सहायता देना।
  3. शहरी आवासों के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करने की व्यवस्था की गयी तथा शहरी आवास और आश्रम सुधार स्कीम (SHASU) 1990 में आरम्भ की गयी। एक लाख से बीस लाख की आबादी वाले नगरों, शहरों में आश्रम (आवास) उन्न्यन के माध्यम से रोजगार प्रदान करने का लक्ष्य रखा गया।
  4. शिक्षित शहरी युवाओं के लिए स्व-रोजगार (SEEVY) कार्यक्रम – 1983-84 में आरम्भ इस कार्यक्रम का उद्देश्य हैं-स्वरोजगार हेतु वित्तीय एवं तकनीकि सहयोग प्रदान करना।
  5. प्रधानमन्त्री की रोजगार योजना (PMRY)- आठवीं योजना के दौरान उद्योग, सेवा तथा कारोबार में सात लाख लघुतर इकाइयाँ स्थापित करके 10 लाख से भी अधिक व्यक्तियों को रोजगार देने का लक्ष्य रखा गया। इसके लिए चुने हुए आठवीं कक्षा उत्तीर्ण शिक्षित बेरोजगारों (ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों के) की जिनकी आयु 18 से 40 वर्ष के बीच हैं तथा जिनकी पारिवारिक आयु 40,000 रु० वार्षिक से कम हैं, को व्यापारिक कारोबार के लिए एक लाख तथा अन्य गतिविधियों के लिए 2 लाख तथा भागीदारी में 10 लाख के ऋण प्रदान करने की व्यवस्था हैं। 1993-94 से यह पहले शहरी तथा बाद में ग्रामीण क्षेत्रों में भी लागू कर दी गयी। 1994 की शिक्षित बेरोजगार योजना को इसमें एकीकृत कर दिया गया हैं।
  6. तीन घटकों वाली राष्ट्रीय सामाजिक सहायता योजना- इस योजना में ग्रामीण एवं शहरी गरीबों को सहायता प्रदान करने की व्यवस्था हैं।
  7. प्रधानमंत्री का समन्वित शहरी गरीबी निवारण कार्यक्रम-18 नवम्बर, 1995 में आरम्भ 50 हजार से 1 लाख तक जनसंख्या वाले 345 छोटे शहरों में निर्धनता निवारण तथा मूल नागरिक सुविधाएं उपलब्ध करवाना उद्देश्य हैं।
  8. स्वर्ण जयन्ती शहरी रोजगार योजना (SISRY)- दिसम्बर, 1997 में आरम्भ। यह शहरी क्षेत्रों में गरीबी उन्मूलन का कार्यक्रम हैं।
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Pankaja Singh

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