अर्थशास्त्र

भारत की विदेशी व्यापार नीति 2015-20 के उद्देश्य | विदेशी व्यापार नीति 2015-20 के मुख्य बिन्दु

भारत की विदेशी व्यापार नीति 2015-20 के उद्देश्य | विदेशी व्यापार नीति 2015-20 के मुख्य बिन्दु | Objectives of India’s Foreign Trade Policy 2015-20 in Hindi | Highlights of Foreign Trade Policy 2015-20 in Hindi

भारत की विदेशी व्यापार नीति 2015-20 के उद्देश्य

भारत की विदेश व्यापार नीति 2009-14 के दो प्रमुख उद्देश्य रहे-

(i) भारत के वस्तु व्यापार को 2010-11 में 200 अरब डालर करना। (ii) 15% की वार्षिक वृद्धि दर के साथ 2014 तक निर्यात को दोगुना करना। 2004-2005 से 2007-08 के बीच निर्यात निष्पादन निर्धारित लक्ष्य से अधिक लक्ष्य से अधिक रहा। 2004-05 में निर्यात का लक्ष्य 75 बिलियन डालर रखा गया जिसे धीरे-धीरे बढ़ाकर 2007-08 में 160 बिलियन डालर कर दिया गया। 2008-09 के लिए निर्यात का लक्ष्य मूलतः 200 बिलियन डालर रखा गया पर इसे घटाकर 175 बिलियन डालर कर दिया गया परन्तु वास्तविक निर्यात का मूल्य, वैश्विक मंदी के बावजूद भी 3.6% वृद्धि के साथ 168.7 विलियन डालर रहा। परन्तु वैश्विक मंदी के प्रबल अवमन्दन प्रभाव के कारण जनवरी से अप्रैल 2009 के बीच भारतीय निर्यात काफी नकारात्मक हो गया और इस अवधि में यह वृद्धि दर 32.2% ऋणात्मक हो गयी। अप्रैल-सितम्बर 2009-10 के दौरान प्रत्येक निर्यात समूह की वृद्धि दर ऋणात्मक रही।

भारत में 2009-10 की दूसरी छमाही से 2010-11 के आरंभ में निर्यात वृद्धि में आमूल-चूल परिवर्तन पहले की गिरावट जैसी ही तीव्र था, जो आंशिक रूप से निम्न आधार और आंशिक रूप से वैश्विक प्रवृत्तियों को दर्शाता है। निर्यात के क्षेत्र में सरकार द्वारा कुशल संचालन से भी निर्यातकों को इन कठिन महीनों में दिक्कतों को कम करने में मदद मिली।

फरवरी 2010 से जून 2010 तक उच्च वृद्धि के बाद जूलाई से नवम्बर 2010 तक निर्यात वृद्धि में गिरावट आयी। अप्रैल-दिसम्बर 2010 में संचयी निर्यात वृद्धि 29.5% पर अच्छी थी जबकि इसी अवधि के दौरान संचयी निर्यात 164.7 बिलियन डालर पर पहुँच गए। वर्तमान संकेत है कि भारत न केवल 2.00 बिलियन डालर के लक्ष्य को प्राप्त कर लेगा बल्कि 2010-11 में इससे आगे निकल जाएगा।

वर्ष 2002-03 के बाद भारत की व्यापार वृद्धि 20% से अधिक पर सुदृढ़ रही है। भारत की व्यापार वृद्धि का जहाँ विश्व व्यापार वृद्धि के साथ सुदृढ़ सह संबंध रहा है, यह विशेषकर दो समयावधियों में विश्व व्यापार वृद्धि की अपेक्षा काफी अधिक रही है। पहला 1990 के सुधारों के ठीक बाद और दूसरा 2003 के बाद।

अनेक अन्य देशों के विपरीत वैश्विक मंदी ने भारत के निर्यात क्षेत्र में निरन्तर वृद्धि के रूझान पर केवल मामूली रूप से प्रतिकूल प्रभाव डाला। निर्यात में 2008-09 में 13.6% की अच्छी दर से वृद्धि हुई। 2004-05 से 2008-09 की 5 वर्ष की अवधि के लिए निर्यात की वार्षिक वृद्धि दर 14% से बढ़कर 22% हो गयी। तथापि 2009-10 में निर्यात वृद्धि -3.5% पर ऋणात्मक थी, जो आंशिक रूप से वैश्विक मंदी के प्रभाव और आंशिक रूप से 2008-09 के पिछले बकाया निर्यात आंकड़ों के कारण उच्चतर आधार प्रभाव को दर्शाता है। इस ऋणात्मक वृद्धि के बावजूद, पण्य व्यापार में प्रमुख निर्यातकों में भारत का रैंकिग जो 2007 में 26वें से मामूली घटकर 2008 में 27वें स्थान पर पहुंच गयी थी 2019 मे सुधरकर 21वीं हो गई है।

वर्ष 2008-09 में डालर की दृष्टि से निर्यात वृद्धि में कमी हुई, जबकि रुपये की दृष्टि से इसके विपरीत वृद्धि परिलक्षित हुई जिससे रुपये के 12.5% तक उच्च मूल्य हास का सीधा प्रभाव देखा गया है। वर्ष 2009-10 में डालर की दृष्टि से, निर्यात वृद्धि नकारात्मक थी जबकि रूपये की दृष्टि से 3.1% तक रुपये का बहुत कम मूल्य ह्रास देखा गया। वर्ष 2010-11 (अप्रैल-दिसम्बर) में डालर और रुपया दोनों की दृष्टि से निर्यात वृद्धि में मजबूती रही। रुपये की दृष्टि से रुपये का मूल्य 5% बढ़ जाने के कारण यह वृद्धि थोड़ी कम रही। इस अवधि के दौरान डालर एवं रुपये की दृष्टि से आयात-वृद्धि में घट-बढ़ वैसी ही दिखाई दी।

देश के वस्तुगत एवं सेवाओं से निर्यात के गति प्रदान कर वैश्विक व्यापार में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए अगले पाँच व्यापार नीति की घोषणा सरकार ने 1 अप्रैल, 2015 को की थी। इस नीति के जरिए मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, डिजिटल इंडिया, कौशल भारत तथा व्यापार करने की सुगमता (ईज ऑफ डूइंग बिजनेस) जैसे प्रयासों को भी प्रोत्साहित करने के उपाय किए गए हैं। जिससे निर्यातों में वृद्धि के साथ-साथ रोजगार के नए अवसरों का सृजन भी हो सकेगा। नई नीति के तहत् किए गए उपायों की मदद से वर्ष 2020 तक देश के निर्यात को 900 अरब डॉलर के सालाना स्तर पर ले जाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इससे विश्व व्यापार में भारत की हिस्सेदारी 2 प्रतिशत से बढ़कर 3.5 प्रतिशत तक हो सकेगी। विदेश व्यापार नीति (FTP) के तहत किए गए प्रावधानों की निरन्तरता बनाए रखने के लिए तथा निर्यातकों व आयातकों को लम्बी अवधि की रणनीति बनाने में मदद के लिए यह नीति पाँच वर्ष के लिए घोषित की गई है तथा इसमें प्रतिवर्ष परिवर्तन करने के स्थान पर केवल ढाई वर्ष बाद ही इसकी मध्यावधि समीक्षा करने की बात सरकार ने कही थी। जिसे सरकार द्वारा दिसम्बर, 2017 में जारी किया गया। अभी तक 5-5 वर्ष के लिए विदेश व्यापार नीति की घोषणा के पश्चात् प्रतिवर्ष 1- 1 वर्ष के लिए अनुपूरक नीति की घोषणा सरकार द्वारा की जाती थी।

विदेश आर्थिक जोनों (Special Economic Zones-SEZs) के साथ-साथ ई-कॉमर्स के लिए विशेष प्रोत्साहनों की घोषणा नई नीति में की गई है। सेवाओं एवं वस्तुओं के निर्यात को प्रोत्साहित करने के लिए कारोबार की दशाओं को आसान बनाने के प्रयास इसमें किए गए हैं। इस नीति की एक बड़ी विशेषता यह है कि पहले से चल रही पांच विभिन्न निर्यात प्रोत्साहन योजनाओं का विलय कर दो प्रमुख योजनाओं को शुरु किया गया है। इनमें से एक वस्तुओं के निर्यात से सम्बन्धित भारत से वस्तु निर्यात स्कीम (Merchandise Exports from India Scheme-MEIS) जो निर्दिष्ट उप्पादों के निर्दिष्ट बाजारों (देशों) में निर्यात को बढ़ावा देने के लिए है, वहीं दूसरी भारत से सेवाओं की निर्यात स्कीम (Services Export from India Scheme-SEIS) सेवाओं के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए है। इन दोनों ही योजनाओं के तहत् पुरस्कार स्वरूप जारी किए जो वाले ‘ड्यूटी क्रेडिट स्क्रिप्स’ (Duty Credit Scrips) को पूरी तरह हस्तान्तरणीय बनाया गया है। इन स्क्रिप्स का इस्तेमाल आयात शुल्क, उत्पाद शुल्क या सेवा कर के भुगतान के लिए किया जा सकेगा। इसके लिए किसी भी तरह की शर्त आरोपित नहीं की जाएगी। ड्यूटी क्रेडिट स्क्रिप्स की वैधता अवधि को 18 माह से बढ़ाकर 24 माह मध्यावधिक समीक्षा के दौरान कर दी गयी है। जिससे कि GST ढाँचे में उनकी उपयोगिता में वृद्धि की जा सके। वर्तमान में स्क्रिप्स के बिक्री/अंतरण पर GST दर को घटाकर शून्य कर दिया  गया है, जबकि इसके पूर्व इसकी दर 12 प्रतिशत थी। MEIS व SEIS के तहत् दिए जाने वाले पुरस्कारों के लिए विभिन्न देशों को जिन्हें भारत से निर्यात किया जाता है, तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया है। पहली श्रेणी अमेरिका, यूरोपीय संघ व कनाडा जैसे परम्परागत बाजारों की है। इन देशों की संख्या 30 है। दूसरी श्रेणी उभरते हुए बाजारों की है, जिनमें अफ्रीकी व लैटिन अमेरीकी देशों के अतिरिक्त पूर्व सोवियत संघ से विघटित देश आदि 139 देश शामिल किए गए हैं, जबकि तीसरी श्रेणी में 90 अन्य बाजार शामिल किए गए हैं।

निर्यातों में वृद्धि के लिए केन्द्र सरकार के प्रयासों में राज्यों को भी साथ लेकर चलने की बात नई नीति के मसौदे में कही गई है। इसके लिए केन्द्र व राज्य सरकारों के एक संयुक्त प्रोत्साहन मिशन का गठन किया गया है। सरकार का मानना है कि निर्यातों को बढ़ाने तथा गैर जरूरी आयातों को कम करने में राज्य सरकारें अहम् भूमिका निभा सकती हैं। इसलिए निर्यात सम्बर्द्धन के लिए एक व्यापार विकास और प्रोत्साहन परिषद् के गठन की बात भी नीति में शामिल है। इसमें केन्द्र व राज्यों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। राज्यों व केन्द्रशासित क्षेत्रों के अतिरिक्त केन्द्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों को भी अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार से जोड़ने की दिशा में कदम नई विदेश व्यापार नीति में उठाए गए हैं।

विदेशी व्यापार नीति 2015-20 : मुख्य बिन्दु

  1. वाणिज्यिक माल और सेवाओं के निर्यात के लिये पूर्ववर्ती विदेश व्यापार नीति (2009-14) की 6 योजनाओं यथा-फोकस प्रोडक्ट स्कीम (FPS), मार्केट लिंक्ड फोकस प्रोडक्ट स्कीम (MLFPS), फोकस मार्केट स्कीम (FMS), एग्री इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्सेटिव स्कीम (AIIS), विशेष कृषि और ग्राम उद्योग योजना (VKGUY) एवं वृद्धि सम्बन्धी निर्यात प्रोत्साहन स्कीम (IEIS) को विदेश व्यापार नीति (2015-20) की दो अलग-अलग योजनाओं तथा भारत योजना से वाणिज्यिक माल का निर्यात (MEIS) एवं भारत योजना से सेवाओं का निर्यात (SEIS) में समाहित कर दिया गया है।
  2. विदेश व्यापार नीति की विभिन्न योजनाओं का उद्देश्य सीमा शुल्क समस्याओं का ‘निराकरण और प्रौद्योगिकी उन्नयन को बढ़ावा देना है, ताकि निर्यातकों को बराबरी का अवसर देने वाला कार्यक्षेत्र उपलब्ध करवाते हुये आधारभूत ढाँचे की अक्षमता में सुधार और लागत को कम रखते हुए भारत से निर्यात को बढ़ाया जा सके।
  3. अधिसूचित उत्पादों के अधिसूचित बाजारों (देशों) में निर्यात के लिए MEIS के तहत् देय पुरस्कार निर्यात के fob मूल्य की प्राप्ति के प्रतिशत के रूप में विदेशी मुद्रा में ही देय होगा। सेवाओं के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए सर्ल्ड फ्रॉम इंडिया स्कीम (SEIS) के स्थान पर नई सर्विस एक्सपोर्ट्स फ्रॉम इंडिया स्कीम (SEIS) लाई गई। नई SEIS योजना भारतीय सेवा प्रादाताओं (Indian Service Providers) की बजाय भारत से सेवा प्रादाताओं (Service Providers Located in India) पर लागू होगी। इसके तहत् देय पुरस्कार राशि निर्यातित सेवा से अर्जित निवल विदेशी मुद्रा के आधार पर देय होगी।
  4. MEIS के तहत् इनाम की दरें 2% से लेकर 5% कर दी गई हैं जो कि पूर्व में 2 से 7% थी।
  5. SEIS के तहत् चुनिंदा सेवाओं को 3% से 5% की दर पर पुरस्कृत किया जायेगा। पूर्व में यह दर 5 से 10% थी।
  6. पूँजीगत सामान घरेलू उत्पादों से ही खरीदने की स्थिति में EPCG योजना के तहत् निर्यात दायित्व 90 प्रतिशत से घटाकर 75 प्रतिशत किया गया। इससे ‘मेक इन इंडिया’ को बढ़ावा मिलेगा।
  7. पूँजीगत सामान के देश में ही उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए EPCG अथॉराइजेशन, योजना के तहत् किए गए आयातों को एण्टी डम्पिंग ड्यूटी, सेफगार्ड ड्यूटी व ट्रांजिशनल प्रोडक्ट स्पेसिफिक सेफगार्ड ड्यूटी से छूट नहीं दी जाएगी।
  8. कारोबारी दशाएं आसान करने के लिए अधिकांश आवेदन व अन्तरमंत्रालयिक कार्यवाहियाँ 27×7 घण्टे ऑनलाइन करने की सुविधा तथा प्रत्येक निर्यात और आयात के लिये अनिवार्य प्रमाण-पत्रों की संख्या घटाकर वर्तमान में 3 कर दी गयी है। ध्यातव्य है कि पहले निर्यात के लिये 7 एवं आयात हेतु 10 प्रमाण-पत्रों की आवश्यकता होती थी।
  9. एक्सपोर्ट ओरिएंटेड यूनिट व निर्यात गृहों के लिए विशेष सुविधाएँ।
  10. एडवांस अथॉराइजेशन के तहत् किए गए आयात पर भी अब ट्रांजिशनल प्रोडक्ट स्पेसिफिक सेफगार्ड ड्यूटी।
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Pankaja Singh

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