अर्थशास्त्र

भुगतान शेष हमेशा संतुलन में होते है | “भुगतान संतुलन हमेशा संतुलित होना चाहिए” इस कथन की विवेचना | भुगतान संतुलन को संतुलित करने के उपाय | भुगतान-शेष का समायोजन अथवा असंतुलन ठीक करने के उपाय

भुगतान शेष हमेशा संतुलन में होते है | “भुगतान संतुलन हमेशा संतुलित होना चाहिए” इस कथन की विवेचना | भुगतान संतुलन को संतुलित करने के उपाय | भुगतान-शेष का समायोजन अथवा असंतुलन ठीक करने के उपाय | Balance of payments are always in balance in Hindi | Discuss the statement “Balance of payments should always be balanced” in Hindi | Measures to balance the balance of payments in Hindi | Measures for adjustment of balance of payments or correction of imbalance in Hindi

भुगतान शेष हमेशा संतुलन में होते है

(Balance of Pay- ments always in Equilibrium)

भुगतान शेष में घाटा या अतिरेक रहता ही है। जब B=Rf Pf तो भुगतान-शेष संतुलन में होते हैं। यहाँ B भुगतान-शेष को, Rf विदेशियों से प्राप्तियों को, और Pf विदेशियों को किए गए भुगतानों को व्यक्त करते हैं। जब Rf – Pf > 0, तो इसका मतलब है कि विदेशियों को किए गए भुगतानों की अपेक्षा विदेशियों से हुई प्राप्तियाँ अधिक हैं। और भुगतान-शेष में अतिरेक (surplus) है। दूसरी ओर जब Rf – Pf <0, अथवा Rf Pf तो भुगतान-शेष में घाटा है क्योंकि विदेशियों को जो भुगतान किए गए हैं, वे विदेशियों से हुई प्राप्तियों से अधिक है।

यदि निवल विदेशी उधार, दान तथा विदेशों में निवेश को लिया जाए, तो लोचदार विनिमय दर निर्यात को आयात से बढ़ा देती है। अन्य करेन्सियों के दामों में घरेलू करेन्सी का मूल्य घट जाता है। आयात की सापेक्षता में निर्यात अधिक सस्ते हो जाते हैं। इसे समीकरण के रूप में यों दिखाया जा सकता है –

X + B = M+ If

जहाँ X निर्यात को, M आयात को, If विदेशी निवेश को और B विदेश से उधार लेने को व्यक्त करते हैं

अथवा X – M = If – B

अथवा (X-M) = (If – B) = 0

यह समीकरण बताता है कि भुगतान शेष संतुलन में है। चालू लेखा के धनात्मक का उसके पूँजी लेखा का ऋणात्मक शेष पूर्ण रूप से क्षतिपूर्ति कर देता है, और उलट भी लेखांकन की दृष्टि से, भुगतान-शेष हमेशा संतुलन में होता है। इसे निम्न समीकरण की सहायता से स्पष्ट किया जा सकता है

C+S+T=C+I+G+ (X-M)

अथवा

Y = C +I+G + (X – M)

जहां C उपभोग व्यय को, S घरेलू बचत को, T कर प्राप्तियों को, I निवेश व्यय को, G सरकारी

 व्यय को, X वस्तुओं तथा सेवाओं के निर्यात को और M वस्तुओं तथा सेवाओं के आयात को व्यक्त करते हैं।

ऊपर दिए गए समीकरण में C+S+T सकल राष्ट्रीय उत्पाद (GNI) अथवा राष्ट्रीय आय (Y) है; और C +I+G=A, जहां A को अवशोषण (absorption) कहा जाता है। लेखांकन की दृष्टि से, यह आवश्यक है कि कुल घरेलू व्यय (C+I+G) और चालू आय (C +I+G) बराबर हों अर्थात् A=Y; तो घरेलू बचतें (Sd) और घरेलू निवेश (Id) भी बराबर होने चाहिए। इसी तरह, आवश्यक है कि चालू खाते में निर्यात अतिरेक (X>M) को निवेश से बढ़ी हुई घरेलू बचत (Sd > Id) क्षतिपूर्ति कर दें। इस प्रकार, लेखांकन की दृष्टि से, भुगतान-शेष सन्तुलन में होता हैं।

यदि भुगतान शेष हमेशा सन्तुलित रहता है, तो किसी देश के भुगतान-शेष में घाटा या अतिरेक क्यों प्रकट होता है? घाटे या अतिरेक की सम्भावना केवल उस स्थिति में नहीं होती, जब भुगतान-शेष में सब मदें शामिल कर ली जाएं। यदि किसी देश में भुगतान-शेष में से कुछ मदें निकाल दी जाएं, और फिर शेष निकाला जाए, तो इसमें घाटा या अतिरेक आ सकता है।

भुगतान-शेष में घाटे या अतिरेक को मापने के तीन तरीके हैं। प्रथम, बुनियादी शेष (basic balance) होता है जिसमें चालू लेखा शेष और दीर्घावधि पूंजी शेष शामिल हैं। दूसरा, निवल तरलता शेष (net liquidity balance) है जिसमें बुनियादी शेष तथा अल्पावधि निजी अतरल पूंजी शेष शामिल हैं। तीसरा, सरकारी भुगतान शेष (official settlements balance) है। जिसमें कुल निवल तरल शेष तथा अल्पावधि निजी तरल पूंजी शेष शामिल हैं।

इन शेषों के बीच सम्बन्ध को संक्षिप्त रूप में तालिका A में दिया गया है।

तालिका A

व्यापार शेष..

a

हस्तान्तरण भुगतान शेष……

b

चालू लेखा शेष …..

c (=a+b)

दीर्घावधि पूंजी शेष

d

बुनियादी शेष…….

e (=c+d)

अल्पावधि निजी अतरल पूँजी

f

SDRs का आबंटन…

g

अशुद्धियाँ और भूल-चूक…

h

निवल तरलता शेष….

i(=e+f+g+h)

अल्पावधि निजी तरल पूंजी शेष….

j

सरकारी भुगतान शेष…

k (=i+j)

प्रत्येक शेष, घाटे का अलग-अलग चित्र प्रस्तुत करेगा। जो मदें एक विशिष्ट शेष में शामिल की जाती हैं, वे ‘रेखा के ऊपर’ रखी जाती हैं और जो मदें निकाल दी जाती हैं, वे रेखा के नीचे’ रखी जाती हैं। जो मदें रेखा के नीचे रखी जाती हैं वे निपटारा (settlement) अथवा समायोजक (accommodating) अथवा क्षतिपूरक (compensatory) मदें कहलाती है। दूसरी ओर, जो मदें रेखा के नीचे रखी जाती हैं, वे स्वायत्त (autonomous) मदें कहलाती हैं। सैद्धान्तिक विश्लेषण में, भुगतान-शेष में असंतुलन का अर्थ है स्वायत्त मदों का शेष। अल्पावधि पूंजी लेन-देन के क्षतिपूरण का उद्देश्य भुगतान-शेष की स्वायत्त मदों में असंतुलन को दूर करना है।

परन्तु इस बात का निर्णय करना कठिन है कि कौन-सी मद क्षतिपूरक है और कौन-सी स्वायत्त है। उदाहरणार्थ, ऊपर दी गई तालिका में तीनों शेषों में प्रमुख अन्तर इस बात का है कि वे अल्पावधि में पूंजी गतियों को किस प्रकार लेती हैं, क्योंकि ये गतियां भुगतान शेष में घाटे के लिए उत्तरदायी होती हैं। बुनियादी शेष तो अल्पावधि में निजी अतरल पूंजी गतियों को रेखा के नीचे रखता है। जबकि निवल तरल शेष उन्हें रेखा के ऊपर रखता है इसी प्रकार निवल तरल अल्पावधि में निजी तरल पूँजी गतियों को रेखा के नीचे रखता है और सरकारी भुगतान शेष उन्हें रेखा के ऊपर रखता है।

उपर्युक्त विश्लेषण स्थिर विनिमय दरों की मान्यता पर आधारित है। इस प्रकार, स्थिर विनिमय दरों की प्रणाली के अन्तर्गत विनिमय-शेष में घाटा (या अतिरेक) संभव है। परन्तु स्वतन्त्र रूप से कार्यशील विनिमय दरों की प्रणाली के अन्तर्गत विनिमय शेष में सिद्धान्त में कोई घाटा (या अतिरेक) नहीं हो सकता। और फिर लेखांकन के आधारभूत नियम के अनुसार वास्तविक लेखांकन की दृष्टि से, भुगतान शेष हमेशा संतुलन में होता है। अन्तिम बात यह है कि इस तरह का भुगतान-शेष केवल तभी संतुलन सकता है, जब क्षतिपूरक लेन-देन न हों।

भुगतान-शेष का समायोजन अथवा असंतुलन ठीक करने के उपाय

(Adjust- ment in Balance of Payments or Measures to Correct Disequilibrium)

  1. विनिमय मूल्यह्रास के माध्यम से समायोजन (कीमत प्रभाव)

(Adjust- ment through Exchange Depreciation (Price Effect) )-

लचीली विनिमय दरों के अन्तर्गत, विदेशी विनियम की मांग और पूर्ति की शक्तियाँ अपने आप भुगतान-शेष के असंतुलन को ठीक कर देती हैं। विनिमय दर करेन्सी की कीमत है जिसे अन्य वस्तुओं की कीमत की भांति मांग और पूर्ति निर्धारित करते हैं। बदलती हुई पूर्ति एवं मांग की स्थितियों के साथ-साथ विनिमय दर बदलती रहती है, परन्तु ऐसी विनिमय दर निकाल पाना सदैव सम्भव है जो विदेशी विनिमय बाजार का समाशोधन करे और बाह्य संतुलन स्थापित करे। यदि देश के भुगतान-शेष में घाटा हो तो देश की करेन्सी का मूल्यह्रास और यदि देश के भुगतान-शेष में अतिरेक हो तो देश की करेंसी की मूल्यवृद्धि करने पर अपने आप संतुलन स्थापित हो जाता है। करेन्सी के मूल्यह्रास का मतलब  है कि उसका सापेक्ष मूल्य घट जाता है और मूल्यवृद्धि का अर्थ है कि उसका सापेक्ष मूल्य बढ़ जाता है। मूल्यह्रास से निर्यात को प्रोत्साहन मिलता है और आयात हतोत्साहित होते हैं जबकि मूल्यवृद्धि की स्थिति इसके उलट होती है। जब विनिमय मूल्यह्रास हो तो विदेशी कीमतें, घरेलू कीमतों में रूपान्तरित हो जाती हैं।

  1. अवमूल्यन या व्यय-परिवर्तन नीति

(Devaluation or Expenditure Switching Policy )-

अवमूल्यन को व्यय-परिवर्तन नीति भी कहा जाता है क्योंकि यह व्यय को आयातित वस्तुओं और सेवाओं से घरेलू वस्तुओं और सेवाओं की ओर मोड़ देता है। जब कोई देश अपनी करेंसी का अवमूल्यन करता है तो विदेशी करेंसी की कीमत बढ़ जाती है जो आयात को महंगा और निर्यात को सस्ता कर देती है। इसके कारण जब देश के निर्यात में वृद्धि होती है तो व्यय विदेशी वस्तुओं से घरेलू वस्तुओं की ओर मुड़ जाते हैं और आयातों में कटौती से देश घरेलू और विदेशी मांग को पूरा करने के लिए अधिक उत्पादन करता है। परिणामस्वरूप, भुगतान-शेष घाटा समाप्त हो जाता है।

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Pankaja Singh

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