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अल्पाधिकार के कीमत नेतृत्व मॉडल | कीमत नेतृत्व क्या है? | कीमत-नेतृत्व की सीमाएँ

अल्पाधिकार के कीमत नेतृत्व मॉडल | कीमत नेतृत्व क्या है? | कीमत-नेतृत्व की सीमाएँ

अल्पाधिकार का कीमत नेतृत्व मॉडल

अल्पाधिकारी फर्मों में ‘अपूर्ण या अनौपचारिक गठबन्धन’ दो कारणों का परिणाम हो सकता है-(1) एक कार्टेल की स्थापना नहीं की जा सकती है क्योंकि वह गैर-कानूनी (illegal) | अथवा, कुछ फर्मे अपने कार्य करने की स्वतन्त्रता का पूर्ण त्याग करने को तैयार न हों, कार्टेल के अन्तर्गत फर्मों की स्वतन्त्रता पूर्ण रूप से समाप्त हो जाती है। (2) कार्टेल की अनुपस्थिति (absence) में, फर्मों का स्वार्थ इस बात में है कि वे कीमत, प्रतियोगिता में न उलझें । कार्टेल की स्थापना न हो सकने की दशा में फर्मे आपस में एक ‘गुप्त सज्जनता का समझौता’! (a’tacit gentilman’s agreement’) कर लेती हैं ताकि कीमत युद्धों (price-wars) के प्रभावों से बचा जा सके। ‘सुरक्षा के साथ बने रहने’ (playing it safe) के लिए इस प्रकार के ‘सज्जनता के समझौतों’ में ‘कीमत नेतृत्व’ (price leadership) एक प्रमुख रूप है। वह फर्म कीमत- नेता’ (price-leader) होती है जो कि उद्योग के बाजार की दशाओं का मूल्यांकन (assessment) करती है तथा एक कीमत निश्चित करती है जिसको अन्य सभी फर्मे स्वीकार (agree or follow करती है, परन्तु ध्यान रहे कि ‘कीमत नेता फर्म’ तथा अन्य सभी फर्मों में किसी प्रकार का कानूनी या औपचारिक समझौता’ (legal or formal agreement) नहीं होता है। केवल एक ‘गुप्त सज्जनता का समझौता’ होता है। कीमत-नेतृत्व अल्पाधिकार उद्योग में कुछ लचीलापन (flexibiliry) ले आता है और एक अधिक वास्तविक व्याख्या (a more real explanation) प्रदान करता है।

एक अल्पाधिकारी उद्योग में एक फर्म ‘कीमत-नेता’ का कार्य दो रूपों में कर सकती है। (1) वह फर्म नेता फर्म हो सकती है जो कि उत्पादन में अधिक कुशल (more efficient) हो अर्थात् ऐसी फर्म हो सकती है जिसकी लागत बहुत कम हो। अत: कीमत-नेतृत्व का एक रूप ‘एक नीची लागत वाली फर्म के द्वारा कीमत-नेतृत्व’ (price leadership by a low-cost firm) हो सकता है। (2) यह सम्भव है कि एक अल्पाधिकार उद्योग में एक फर्म बड़ा या प्रमुख (large or dominant) हो तथा अन्य फर्मे छोटी हों। ऐसी स्थिति में कीमत-नेतृत्व का एक रूप ‘प्रमुख या प्रधान फर्म के द्वारा कीमत-नेतृत्व’ (price-leadership by a dominant firm) हो सकता है।

उपर्युक्त दोनों रूपों का, चित्रों की सहायता से, नीचे विस्तृत विवेचन प्रस्तुत किया गया है।

  1. एक नीची लागत वाली फर्म के द्वारा कीमत नेतृत्व

(Price-Leadership by a Low-Cost Firm)

मान्यताएँ (i) उद्योग में केवल दो फर्मे (अर्थात् द्वयाधिकार Duopoly) है) । (ii) फर्मों में इस बात का गुप्त समझौता (Tacit agreement) है कि दोनों बाजार में बराबर-बराबर के हिस्सेदार हैं; अर्थात् प्रत्येक फर्म के लिए बाजार का आधा हिस्सा निर्धारित किया गया है। (iii) वस्तु एक-रूप (Homogeneous) है। (iv) दोनों फर्मों के लागत ढाँचे में अन्तर है, अर्थात् एक फर्म की लागत दूसरी से कम है।

चित्र नं0 8.1 में, माना कि फर्म नं0 1 ऊँची लागत वाली फर्म है और उसकी अल्पकालीन औसत लागत तथा सीमान्त लागत रेखाएँ SAC1 है। फर्म नं0 2 नीची लागत वाली फर्म है और उसकी लागत रेखाएँ SAC2 तथा SMC2 हैं।

चित्र में AD बाजार माँग वक्र (market demand curve) है: AD से सम्बन्धित सीमान्त आगम रेखा (Marginal revenue curve) Ad हैं। चूकि मान्यता नं० (ii) के अनुसार प्रत्येक फर्म के लिए बाजार का आधा हिस्सा निर्धारित है, इसलिए Ad रेखा। प्रत्येक फर्म के लिए मांग रेखा भी हैं। प्रत्येक फर्म के लिए इस मांग रेखा Ad से सम्बन्धित सीमान्त आगम रेखा को चित्र में mr रेखा द्वारा दिखाया गया है।

ध्यान देने से पता चलता है कि कीमत के सम्बन्ध में हित-विरोध (conflict of interest) है। ऊँची लागत वाली फर्म P1 (या BQ1) कीमत लेना चाहेगी और वस्तु की Q1 मात्रा उत्पादित करना चाहेगी। इसके विपरीत नीची लागत वाली फर्म P2 (या CQ2) कीमत लेना चाहेगी और Q2 मात्रा का उत्पादन करना चाहेगी।

चूँकि नीची लागत वाली फर्म, ऊँची लागत वाली फर्म की तुलना में, कम कीमत पर वस्तु बेच सकती है, इसलिए ऊँची लागत वाली फर्म के लिए नीची लागत वाली फर्म के द्वारा निर्धारित कीमत (अर्थात् P1) पर वस्तु को बेचने के अलावा और कोई रास्ता नहीं रहता है। इस प्रकार नीची लागत वाली फर्म कीमत का नेतृत्व करने लगती है, और P2 कीमत निर्धारित हो जाती है। इस कीमत P2 पर नीची लागत वाली फर्म अपने लाभ को अधिकतम कर लेती है और उसकी उत्पादन की प्रति इकाई पर CF के बराबर लाभ प्राप्त होता है। ऊँची लागत वाली फर्म को P2 (याCQ2) कीमत पर अपेक्षाकृत कम लाभ प्राप्त होता है; अर्थात् उसकी प्रति इकाई पर CE के बराबर लाभ मिलता है।

  1. प्रमुख या प्रधान फर्म के द्वारा कीमत नेतृत्व

(Price Leadership by a Dominant Firm)

एक अल्पाधिकारी उद्योग में एक फर्म बहुत बड़ी हो सकती है तथा प्रमुख अन्य सभी फर्मे छोटी हो सकती हैं। उत्पादन क्षमता की पिछली या वर्तमान मितव्ययिताओं वित्तीय शक्ति या केवल पहले आरम्भ करने के कारण एक बड़ी फर्म ‘प्रमुख फर्म’ का दर्जा प्राप्त कर सकती है। दूसरे शब्दों में, कुशलता तथा नीची लागत के परिणामस्वरूप एक फर्म प्रमुखता (dominance) की स्थिति प्राप्त कर सकती है, तो इस दृष्टि से ‘प्रमुख फर्म द्वारा कीमत नेतृत्व’ वास्तव में ‘नीची लागत वाली फर्म द्वारा कीमत-नेतृत्व का ही एक भिन्न रूप कहा जा सकता है।

छोटी फर्मों का अस्तित्व (existence) बड़ी या प्रमुख फर्म के लिए उपयोगी रहता है, क्योंकि वे (अर्थात् छोटी फर्मे) उद्योग को एक स्पर्धात्मक उद्योग (competitive industry) का रूप प्रदान करती है और इस प्रकार अल्पाधिकारी उद्योग ‘ट्रस्ट विरोधी नियमों’ (antitrust laws) में बचा रहता है। एक गुप्त समझौते (tacit understanding) द्वारा प्रमुख फर्म वस्तु की कीमत निर्धारित करती है और छोटी फर्मों को इस बात की आज्ञा देती है कि निर्धारित कीमत पर वे वस्तु की जितनी मात्रा चाहें बेच सकती हैं। इसके बाद शेष बाजार की माँग को पूर्ति प्रमुख द्वारा की जाती है। इसका चित्रीय निरूपण निम्नवत् है-

चित्र में ID वक्र उद्योग का माँग वक्र है। प्रधान फर्म कीमत युद्ध के द्वारा कीमत में कमी करके अपने प्रतिद्वन्द्वियों को समाप्त करके एकाधिकारी बन सकती है। परन्तु व्यवहार में ऐसा करने में कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं तथा सरकार हस्तक्षेप कर सकती है इसलिए प्रधान फर्म अपनी कीमत निर्धारित करने में सावधानी से कार्य करेगी तथा ऐसी कीमत निर्धारित करेगी कि उसके प्रतिद्वन्द्वी उस कीमत पर कुछ उत्पादन कर सकी जहाँ तक छोटी फर्म का प्रश्न है छोटी फर्म के लिए प्रधान फर्म द्वारा निर्धारित कीमत स्थिर कीमत हो जाती है। तथा वह उस मात्रा के उत्पादन करेगी जिसके तदनुरूप इसकी सीमान्त लागत इस कीमत के बराबर होगी। परिणामस्वरूप छोटी फर्म का सीमान्त लागत वक्र इसका पूर्ति वक्र हो जाता है तथा सब छोटी फर्मों की पूर्तियों का योग MC2 वक्र द्वारा प्रदर्शित होता है। OP1 कीमत अथवा OP1 से अधिक कीमत पर प्रधान फर्म कुछ नहीं बेचेगी क्योंकि सम्पूर्ण बाजार माँग की पूर्ति छोटी फर्मों द्वारा हो सकती है। PO2 कीमत पर छोटी फर्म P2J तथा प्रधान फर्म JR (=P2K) मात्रा बेच सकती है। P1 तथा K को मिलाने से P2D2 प्रधान फर्म का माँग वक्र व्युत्पन्न हो जाता है। बिन्दुकित MP1 वक्र प्रधान फर्म के माँग वक्र तदनुरूपी सीमान्त आय वक्र है प्रधान फर्म का सीमान्त लागत वक्र MC1 है। MR तथा MC1 वक्र एक-दूसरे को E बिन्दु पर काटते हैं-अर्थात् E बिन्दु पर सीमान्त आय तथा सीमान्त लागत बराबर हैं। इसलिए प्रधान फर्म OP3 कीमत निर्धारित करेगी तथा इस कीमत पर OQ1 मात्रा उत्पादन करेगी। छोटी फर्मे (OP3) को स्वीकार करेंगी तथा 0Q2 मात्रा का उत्पादन करेगी। कुल मात्रा OQ3 होगी जो OQ1 तथा OQ2 के योग के बराबर होगी।

कीमत नेतृत्व को एक अन्य वैकल्पिक चित्र द्वारा निम्नवत् प्रस्तुत किया जा सकता है।

उपर्युक्त चित्र में OP2 मूल्य पर P2D2 कुल मांग का P2A भाग छोटी फर्मों द्वारा तथा AD2 भाग प्रधान फर्म द्वारा आपूर्त किया जायेगा तथा OP3 मूल्य पर कुल माँग P3D3 की पूर्ण आपूर्ति प्रधान फर्म द्वारा की जायेगी तथा छोटी फर्मों को योगदान शून्य हो जायेगा। परन्तु OP मूल्य एक ऐसी दशा होगी जिस पर लघु फर्मे मिलकर कुल माँग PC का आधा भाग PB तथा आधा भाग BC प्रधान फर्म द्वारा आपूर्त किया जायेगा। संयोगवश OP मूल्य पर सीमान्त लागत सीमान्त आगम के बराबर है तथा उत्पादन की मात्रा Ox है जो कि BC के बराबर है। अत: इस मूल्य पर प्रधान फर्म लाभ महत्तम होगा।

कीमत-नेतृत्व की सीमाएँ

(Limitations of Price Leadership)

वास्तविक जीवन में कीमत-नेतृत्व की अनेक कठिनाइयाँ तथा सीमाएँ होती हैं। कुछ कठिनाइयाँ निम्नलिखित हैं:

(1) यदि ‘कीमत नेता’ (price leader) द्वारा ऊँची कीमत निर्धारित की जाती है तो अन्य फर्मे ‘कीमत में अप्रत्यक्ष कमी’ (indirect price cuts) करके अपनी बिक्री को बढ़ाने का प्रयत्न करती है। कीमत में अप्रत्यक्ष कमी के कई रूप हो सकते हैं, जैसे फर्मे निर्धारित कीमत पर बिक्री दिखाकर क्रेताओं की छूट के रूप में द्रव्य की मात्रा वापस कर सकती है, फर्में क्रेताओं से वस्तुओं की कीमतें किश्तों में ले सकती हैं, इत्यादि। इस प्रकार फर्मे क्रेताओं की कीमत में छूट या रियायतें दे सकती हैं। इनका सामना करने के लिए कीमत-नेता फर्म स्पष्ट रूप से वस्तु की कीमत को कम कर सकती हैं। ऐसी परिस्थितियों में कीमत-नेतृत्व असफल हो सकता है।

(2) निर्धारित कीमत पर वस्तु को बेचते हुए भी, छोटी फर्मे गैर-कीमत प्रतियोगिता (non- price competition) का सहारा लेकर अपनी बिक्री को बढ़ाने को प्रयत्न कर सकती हैं । गैर कीमत प्रतियोगिता का अभिप्राय है विज्ञापन तथा प्रचार पर फर्मे अधिक धन व्यय करके अपनी बिक्री को बढ़ाने का प्रयत्न कर सकती हैं। परिणामस्वरूप कीमत-नेता फर्म भी गैर मूल्य प्रतियोगिता पर अधिक धन व्यय करके अपनी बिक्री को बढ़ाने का प्रयत्न करेगी। ऐसी परिस्थितियों में कीमत-नेतृत्व का बना रहना कठिन हो जाता है।

(3) फर्मों की लागतों में अन्तर होने के कारण भी कीमत-नेतृत्व का बना रहना कठिन हो जाता है। यदि कीमत-नेता फर्म की लागत नीची है और वह नीची कीमत निर्धारित करता है तो छोटी फर्मे बुरा मान सकती हैं क्योंकि उनको लाभ बहुत कम होगा अपेक्षाकृत कीमत-नेता के। इसके विपरीत यदि कीमत-नेता फर्म की उत्पादन-लागत ऊँची है और वह ऊँची कीमत निर्धारित करती है, तो अन्य फर्मे ‘कीमत में अप्रयत्क्ष कमी’ कर सकती हैं, या नयी फर्मों के प्रवेश की सम्भावना बढ़ सकती है।

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Pankaja Singh

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