अर्थशास्त्र

द्वयाधिकार की समस्या | कूर्नो का द्वयाधिकार मॉडल | कूर्नो का हल | प्रतिक्रिया वक्रों द्वारा सन्तुलन | कूर्नो के हल की आलोचना

द्वयाधिकार की समस्या | कूर्नो का द्वयाधिकार मॉडल | कूर्नो का हल | प्रतिक्रिया वक्रों द्वारा सन्तुलन | कूर्नो के हल की आलोचना

द्वयाधिकार की समस्या

(Duopoly Problem)

द्वयाधिकार उस बाजार स्थिति को कहते हैं जिसमें केवल दो विक्रेता होते हैं। यह अल्पधिकार की ही एक सीमावर्ती स्थिति है तथा बहुधा द्वयाधिकार व अल्पाधिकार की व्याख्या एक साथ की जाती है। बाजार के केवल दो विक्रेता होने के कारण प्रत्येक विक्रेता पूर्णत: यह जानता है कि उसकी क्रियाओं का प्रभाव उसके प्रतिद्वन्द्वी पर पड़ेगा। द्वयाधिकार में प्रत्येक विक्रेता अपने प्रतिद्वन्द्वी की क्रियाओं तथा लक्ष्यों के बारे में सही अनुमान लगाने का प्रयास करता है। द्वयाधिकार में अन्त में यह सम्भव है कि दोनों विक्रेता परस्पर प्रतियोगिता की हानियों का अनुभव करने के पश्चात् आपस में सहयोग करने के लिए सहमत हो जावें। परन्तु यह भी सम्भव है कि वे एक ही कीमत निर्धारित करके प्रतियोगिता को केवल विज्ञापन तक ही सीमित रखें। इसलिये यह कहना कठिन है कि द्वयाधिकार में सामान्य कीमत क्या निर्धारित होगी। द्वयाधिकार में कीमत निर्धारण की समस्या के हल के सम्बन्ध में फ्रान्सीसी अर्थशास्त्री कोर्नो तथा अंग्रेज अर्थशास्त्री ऐजवर्थ के हल महत्त्वपूर्ण हैं। यहाँ हम इन दोनों अर्थशास्त्रियों द्वारा प्रतिपादित हलों की व्याख्या करेंगे।

कूर्नो का हल

(Cournot’s Solution)

1938 ई० में फ्रान्सीसी अर्थशास्त्री आगस्टिन कूर्नो ने द्वयाधिकार के अन्तर्गत कीमत निकरेंगे की समस्या का समाधान’ इस मान्यता के अन्तर्गत प्रस्तुत किया था कि प्रत्येक विक्रेता अपने प्रतिद्वन्द्वी द्वारा उत्पादन-मात्रा में परिवर्तन करने की आशा नहीं करता है। कोर्नो ने इस सम्बन्ध में A तथा B दो व्यक्तियों द्वारा एक-दूसरे के समीप स्थित खनिज पदार्थों से मिश्रित शैलोदक स्रोतों का उदाहरण दिया है। दोनों व्यक्तियों को ये स्रोत प्रकृति के निःशुल्क उपहार के रूप में प्राप्त होने के कारण इनकी कोई उत्पादन लागत नहीं है। कोर्नो का समाधान अथवा हल रेखाचित्र में प्रदर्शित किया गया है।

रेखाचित्र में DD, सूते के पानी का बाजार माँग वक्र है तथा DD2 इस मांग वक्र कै तदनुरूपी सीमान्त आय वक्र है कोर्नो के अनुसार आरम्भ में बाजार में A एकमात्र विक्रेता है तथा वह 0Q मात्रा का उत्पादन करके इसे QP कीमत पर बेचकर अधिकतम लाभ प्राप्त करता है। 0Q उत्पादन मात्रा के तदनुरूप सीमान्त आय सीमान्त लागत (जो शून्य है) के बराबर है। A की कुल लाभ मात्रा OQRR आयत के बराबर है। अब मान लीजिए कि B बाजार में प्रवेश करता है तथा यह आशा करता है कि A सदा OQ मात्रा का उत्पादन करेगा। B यह विचार करता है कि उसकी माँग वक्र PD1 है तथा PD1 को अपना माँग वक्र मानकर वह वस्तु को QQ1 मात्रा का उत्पादन करेगा। यदि माँग वक्र PD1 होगा तो इस माँग वक्र के तदनुरूप सीमान्त आय वक्र (PD3) सीमान्त लागत वक्र (X-अक्ष) को Q1 बिन्दु पर काटेगा तथा B कुल QQ1 मात्रा का उत्पादन करके इस उत्पादन मात्रा को Q1P1 कीमत पर बेचकर OQ1P1M अधिकतम कुल लाभ राशि को प्राप्त करने का प्रयास करेगा।

यदि B वस्तु की कीमत P1O1 (अर्थात् OR1) निर्धारित करेगा तो A को भी यही कीमत निर्धारित करनी पड़ेगी। ऐसा करने से A की कुल लाभ राशि OQPR से घटकर OQMR1 हो जायेगी। A की यह मान्यता होगी कि B सदा QQ1 (=Q1D1) मात्रा को बेचेगा। इसलिये A को अब यह ज्ञात होगा कि उसकी वस्तु की बाजार माँग OD1 से घटकर OQ1 हो जाती है। परिणामस्वरूप A की कल्पनानुसार उसका नया माँग वक्र तथा सीमान्त आय वक्र क्रमशः चित्र में प्रदर्शित D4Q1 तथा D4D5 होंगे। ये वक्र रेखीय तथा आरम्भिक माँग वक्र व सीमान्त आय वक्र के समानान्तर हैं। अब A की अधिकतम लाभ राशि के तदनुरूपी उत्पादन मात्रा OQ2 होगी जो आरम्भिक उत्पादन मात्रा OQ1 की आधी है।A कुल 0Q1 मात्रा का उत्पादन करेगा तथा इसे OR2 कीमत पर बेचेगा। उसकी कुल लाभ राशि OQ2 NR2 होगी। B अब यह अनुभव करेगा कि बाजार स्थिति में परिवर्तन हो गया है तथा अब वह बाजार में अधिक मात्रा में बेच सकता है। B अब Q2D2 मात्रा की आधी मात्रा का उत्पादन करेगा। इस प्रकार A की उत्पादन मात्रा में कमी तथा B की उत्पादन मात्रा में वृद्धि होती जायेगी तथा अन्त में A तथा B दोनों को कुल बाजार माँग का आधा-आधा हिस्सा प्राप्त हो जायेगा। जैसा कि चित्र में प्रदर्शित किया गया है अन्त में सन्तुलन उस समय स्थापित होता है जब कीमत OR5 हो जाती है। इस कीमत पर A बाजार में OQ4 मात्रा तथा B बाजार में Q4Q5 मात्रा बेचेगा। इस स्थिति में A तथा B दोनों बराबर मात्राएँ बेचते हैं (OQ4 = 24Q5) | A का कुल लाभ OQ4RL1 तथा B का कुल लाभ Q4Q5Q5L होगा। ये दोनों लाभ राशियाँ बराबर हैं। इस प्रकार एकाधिकार में कुल उत्पादन मात्रा 0Q5 है जो प्रतियोगी उत्पादन मात्रा OD1 की तुलना में कम परन्तु एकाधिकार उत्पादन मात्रा 0Q की  तुलना में अधिक है। OR5 कीमत पर दोनों फर्म सन्तुलन में है क्योंकि दोनों को बराबर लाभ राशि प्राप्त होती है।

कूर्नो द्वारा द्वयाधिकार के अन्तर्गत कीमत निर्धारण के उपरोक्त विश्लेषण की प्रमुख त्रुटि यह है कि प्रत्येक विक्रेता अपने प्रतिद्वन्द्वी की उत्पादन मात्रा को स्थिर विचारता है यद्यपि वह स्वयं यह अनुभव करता है कि उत्पादन मात्रा में निरन्तर परिवर्तन होते हैं। फ्रान्सीसी अर्थशास्त्री बर्टरेंड ने कोर्नो के समाधान को अवास्तविक मान्यताओं पर आधारित होने के कारण अस्वीकार कर दिया था। बर्टरेंड ने यह सुझाव दिया था कि द्वयाधिकार में कीमत तथा उत्पादन निर्धारण की समस्या का अध्ययन प्रतिद्वन्द्वी द्वारा स्थिर कीमत की मान्यता के अन्तर्गत किया जाना चाहिए।

उपर्युक्त परिस्थिति में कूर्नो द्वारा प्रस्तुत हल यह स्पष्ट करता है कि चरणबद्ध स्तर पर फर्म A कुल उत्पादित मात्रा का आधा भाग 0Q स्वत: उत्पादित करेगी तथा B फर्म शेष का आधा उत्पादन करेगी। इस क्रम आगामी चरण में पुनः A फर्म ½(1-1/4)=3/8 भाग का उत्पादन करेगी तथा B फर्म 1/2 (1-3/8)=5/16 का ही उत्पादन करेगी। इस क्रम में द्वयाधिकारी बाजार में दोनों फर्मों के मध्य उत्पादन का विभाजन कालान्तर में होता रहेगा। कू! के हल को निम्नलिखित अभिव्यक्तियों में प्रस्तुत किया जा सकता है-

A फर्म का चरणबद्ध उत्पादन-

प्रथम चरण 1/2

द्वितीय चरण 1/2 (1- (1/4))=3/8

तृतीय चरण 1/2 (1- (5/16))=11/32

चतुर्थ चरण 1/2 (1- (42/128))=43/128

इस प्रकार A फर्म का उत्पादन अंश क्रमशः ह्रासमान हो जायेगा जिसे कि निम्नवत् प्रस्तुत किया जा सकता है।

सन्तुलन में A फर्म का उत्पादन =1/2-1/8-1/32-1/128……. में

=1/2- [ . 1/8 + 1/8 . 1/4 + 1/8  (1/4)+ 1/8 (1/4)3 +……1/8 (1/4)]

ज्यामितीय सारणी में निम्नलिखित सूत्र के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है-

{=a/(1- r)

यदि r = 1/4 हो तो-

सन्तुलन में A फर्म का उत्पादन 1/2 – (1/8/ 1-(1/4)) = 1/2 – (1/8/3/4) = 1/2  – 4/24 = 8/24 = 1/3

B फर्म का चरणबद्ध उत्पादन

प्रथम चरण 1/2 (1/2 ) = 1/4

द्वितीय चरण 1/2  (1-(3/8)) = 5/16

तृतीय चरण 1/2 ( 1- (11/32)) = 21/64

चतुर्थ चरण 1/2  (1- ((43/128)) = 85/256

इस प्रकार B फर्म का उत्पादन क्रमशः ह्रासमान दर पर बढ़ेगा। इसे निम्नवत् प्रस्तुत किया जा सकता है-

सन्तुलन में B फर्म का उत्पादन = 1/4 + 1/4 . 1/4  +  1/4 (1/4 )2 + 1/4 ( 1/4 )3 + …..1/4 ( 1/4 )h

अत: ज्यामितीय सारणी के अनुसार-

सन्तुलन में B फर्म का उत्पादन = 1/4 / 1- 1/4 = 1/4/3/4 = 1/3

इस प्रकार कूर्नो का हल एक स्थिर हल है क्योंकि दीर्घकाल में दोनों फर्मे बाजार के 1/3 भाग का उत्पादन करती है तथा उभयनिष्ठ मूल्य लेती है जो कि एकाधिकारी मूल्य से कम होता है तथा पूर्ण प्रतियोगी मूल्य से अधिक होता है।

वास्तव में कू! के समाधान में उत्पादकों अथवा विक्रेताओं की संख्या तथा उनके द्वारा उत्पादित कुल उत्पादन को एक सामान्य समीकरण के रूप में अभिव्यक्त किया जा सकता है। अत: यदि उत्पादकों की संख्या n है, तो कूर्गों के समाधान में दोनों उत्पादकों द्वारा उत्पादित कुल उत्पादन का कुल उत्पादन OD1 का n/n+1 होगा अधिकतम सम्भव उत्पादन है। अतः कुल उत्पादन उत्पादन, यथार्थतः सम्पूर्ण प्रतियोगी उत्पादन होगा और कीमत पूर्ण प्रतियोगी कीमत (शून्य लागत की पूर्वकल्पना में शून्य कीमत) के बराबर। अनिवार्य शर्त, जिसका पता चलता है, यह है कि, “जैसे-जैसे विक्रेताओं की संख्या एक से अनेक की ओर बढ़ती है तो कीमत एकाधिकारी स्तर से निरन्तर गिरती रह कर पूर्ण प्रतियोगिता के कीमत-स्तर पर पहुंच जायेगी और उत्पादकों के लिए यह कीमत पूर्णतया निश्चित होगी।”

उपर्युक्त कुनों के अल्पाधिकारी समाधान में उत्पादक लागत को शून्य मान लिया गया। फिर भी यह ध्यान देने योग्य है कि हम जिस अनिवार्य निष्कर्ष पर पहुँचे हैं उसमें, उस समय भी, कोई परिवर्तन नहीं होगा, जबकि हम उत्पादन लागतों को धनात्मक मान लेंगे। प्रो० चैम्बरलिन को पुन: उद्धृत करते हुए : ‘विक्रेताओं की किसी भी दी हुई संख्या के लिए, द्वि-अधिकार में सन्तुलन कीमत, स्थिर लागत की तुलना में ह्रासमान प्रतिफल दशा में पूर्ण प्रतियोगी कीमत के निकट होगी और वर्तमान लागत की तुलना में स्थिर लागत दशा में पूर्ण प्रतियोगी कीमत के निकटतर होगी।”

प्रतिक्रिया वक्रों द्वारा सन्तुलन

(Equilibrium through Reaction curve)

कूों ने स्थिर सन्तुलन को दर्शाने हेतु प्रतिक्रिया वक्रों का प्रयोग किया है। ये प्रतिक्रिया वक्र उत्पादन प्रतिक्रिया वक्र हो सकते हैं या कीमत प्रतिक्रिया वक्र भी। वह वक्र कौन सा है इस पर निर्भर करेगा कि समायोजन चर (adjustment variable) उत्पादन है अथवा कीमत। कुर्नो के मॉडल में चूँकि समायोजक चर उत्पादन है, इसलिए यहाँ उत्पादन प्रतिक्रिया वक्र ही प्रासंगिक हैं।

यह विशेष ध्यान देने योग्य है कि ये प्रतिक्रिया वक्र उन प्रतिक्रियाओं को नहीं बताते जिनकी विक्रेता अपने प्रतिद्वन्द्वियों से अपेक्षा करते हैं बल्कि ये तो विक्रेता की स्वयं की प्रतिक्रियाओं को बताते हैं जो उसके प्रतिद्वन्द्वी की क्रिया के परिणामस्वरूप होती हैं। रेखाकृति में दो उत्पादकों (या विक्रेताओं) A तथा B के प्रतिक्रिया वक्रों को दिखाया गया है। MN उत्पादक A का उत्पादन प्रतिक्रिया वक्र है और RS उत्पादक B का उत्पादन प्रतिक्रिया वक्र है। उत्पादक A के उत्पादन प्रतिक्रिया वक्र MN से पता चलता है कि उत्पादक B द्वारा उत्पादन में परिवर्तन के कारण उत्पादक A को क्या प्रतिक्रियाएँ होंगी अर्थात् A के उत्पादन प्रतिक्रिया वक्र से पता चलता है कि B के प्रत्येक उत्पादन स्तर पर A कितनी मात्रा का उत्पादन करेगा। अन्य शब्दों में, A का उत्पादन प्रतिक्रिया वक्र B के प्रत्येक उत्पादन स्तर पर, A के अधिकतम लाभ वाले उत्पादन को बताता है। इसी प्रकार उत्पादक B का उत्पादन प्रतिक्रिया वक्र बताता है कि B कितनी मात्रा का उत्पादन करने का निर्णय करेगा (अर्थात् A के प्रत्येक दिए हुए उत्पादन पर B को अधिकतम लाभ करने का उत्पादन क्या होगां)। उदाहरण के लिए, यदि B का उत्पादन OB1 है, तो A का उत्पादन प्रतिक्रिया वक्र MN बताता है कि A का उत्पादन OA2 होगा (B OB1 के उत्तर में)। इसी प्रकार अन्य उत्पादन स्तरों के विषय में भी कहा जा सकता है। दूसरी ओर, A यदि OA2 का उत्पादन करता है तो B के उत्पादन प्रतिक्रिया वक्र से पता चलता है कि B का उत्पादन OB2 होगा। इसी प्रकार से अन्य उत्पादन स्तरों के सम्बन्ध में भी कहा जा सकता है।

रेखाकृति से यह पता चलता है कि उत्पादन प्रतिक्रिया वक्रों को रेखीय बनाया गया है। इसका कारण यह है कि हम यह मान रहे हैं कि द्वि-अधिकारी के पदार्थ का माँग वक्र सरल रेखा है और दोनों उत्पादकों-A तथा B-की सीमान्त उत्पादन लागत शून्य पर स्थिर है। यह उल्लेखनीय है कि OM  उत्पादन एकाधिकारी उत्पादन है क्योंकि उत्पादक A वस्तु की OM मात्रा का उत्पादन तभी करेगा जबकि उत्पादन B का उत्पादन शून्य होगा। अन्य शब्दों में, उत्पादक A, यदि एक एकाधिकारी होता तो OM मात्रा का उत्पादन करके बेचता। दूसरी ओर उत्पादक B यदि यह चाहता है कि उत्पादक Aशून्य मात्रा का उत्पादन करे तो उसको ON मात्रा का उत्पादन करना होगा। सीमान्त लागत के शून्य दिया होने पर, जब कीमत गिर कर शून्य हो जाएगी, तो उत्पादक A शून्य उत्पादन करने के लिए बाध्य हो जाएगा और उस स्थिति में उत्पादन लाभप्रद नहीं होगा। शुद्ध प्रतियोगिता की दशाओं में ON मात्रा का उत्पादन किया जाएगा क्योंकि ON उत्पादन पर कीमत शून्य होगी और इसीलिए सीमान्त लागत के बराबर होगी जिसको वर्तमान स्थिति में शून्य मान लिया गया है । इस प्रकार, जबकि OM एकाधिकारी उत्पादन है, ON शुद्ध प्रतियोगिता उत्पादन है। हम मान लेते हैं कि A व B दो उत्पादक पूर्णरूप से समान हैं, इसलिए, OR बराबर होगा OM के तथा OS बराबर होगा ON के।

उत्पादन प्रतिक्रिया वक्र जिस रूप में उनकी व्याख्या ऊपर की गई है, का उपयोग कूर्नो के द्वयाधिकारी समाधान को समझाने के लिये किया गया है। प्रत्येक उत्पादक, पहले की तरह, यह कल्पना कर लेता है कि वह चाहे जिस मात्रा का उत्पादन करे परन्तु उसका प्रतिद्वन्द्वी पदार्थ की उसी मात्रा का उत्पादन करता रहेगा। प्रारम्भ करने के लिये मान लीजिये कि उत्पादक A पहले उत्पादन प्रारम्भ करता है और इसलिये प्रारम्भ में एकाधिकारी है। इसलिये, प्रारम्भ में ‘A’ उत्पादक OM मात्रा का उत्पादन करेगा। अब मान लीजिये कि ‘B’ भी उद्योग में प्रवेश कर जाता है। ‘B’ यह मान लेगा कि A अपना उत्पादन OM पर स्थिर रखेगा। B के उत्पादन प्रतिक्रिया वक्र RS से पता चलता है कि A का उत्पादन OM होने पर, वह OB1 मात्रा का उत्पादन करेगा। परन्तु जब A देखता है कि B उत्पादक OB1 मात्रा का उत्पादन कर रहा है तो वह अपने पिछले निर्णय पर फिर से विचार करेगा, परन्तु वह भी यह भी मान लेना कि B उत्पादक OB1 मात्रा का उत्पादन करता रहेगा, A उत्पादक के उत्पादन प्रतिक्रिया वक्र NM से पता चलता है कि उत्पादक B के OB1 उत्पादन की प्रतिक्रिया में उत्पादक A मात्रा OA1 का उत्पादन करेगा। अब जबकि B यह देखता है कि A उत्पादक OA2 मात्रा का उत्पादन कर रहा है तो वह अपने उत्पादन को बदलने की सोचेगा, परन्तु मान लेगा कि A उत्पादक OA2 मात्रा का ही उत्पादन करता रहेगा। उत्पादक B का उत्पादन प्रतिक्रिया वक्र RS बताता है कि उत्पादक A के OA2 मात्रा का उत्पादन करने पर वह (B) मात्रा OB2 का उत्पादन करेगा। परन्तु जब A को पता चलता है कि B उत्पादक OB3 मात्रा का उत्पादन कर रहा है तो वह पुन: अपने उत्पादन का समायोजन अथवा परिवर्तन करेगा और OA2 मात्रा का उत्पादन करेगा। परिवर्तन और पुनः परिवर्तन की यह प्रक्रिया चलती रहेगी जब तक कि ऐसा बिन्दु नहीं आ जाता कि दोनों के प्रतिक्रिया वक्र एक-दूसरे को काटते हों और उत्पादक A तथा B क्रमशः 0An तथा OBn मात्रा का उत्पादन कर रहे हों। प्रतिच्छेद बिन्दु पर द्वि-अधिकारी स्थाई सन्तुलन को प्राप्त कर लेते हैं क्योंकि इस बिन्दु पर पहुँचने के उपरान्त वे अपने उत्पादनों में पुनः समायोजन अथवा परिवर्तन नहीं चाहते। B द्वारा OBn का उत्पादन किये जाने पर, A का अधिकतम लाभप्रद उत्पादन, जैसा कि उसके प्रतिक्रिया वक्र से पता चलता है, OA2 है। A के द्वारा OAn मात्रा का उत्पादन करने पर B के लिए अधिकतम लाभप्रद उत्पादन, जैसा कि उसके प्रतिक्रिया वक्र से पता चलता है, OBn है। इस प्रकार प्रतिक्रिया वक्रों के विश्लेषण से यह स्पष्ट है कि कू! का समाधान, द्वि-अधिकार में विलक्षण (Unique) तथा स्थिर सन्तुलन की प्राप्ति को बताता है।

कूर्नो के हल की आलोचना-

(i) कूर्नो ने फर्मों की व्यावहारिक पद्धति को अत्यंत सरल माना है।

(ii) प्रायः मात्रा प्रतियोगिता के परिणामस्वरूप भी मूल्यों में कमी आती है जो कि मॉडल से परे है।

(iii) कूर्नो का मॉडल एक बन्द-मॉडल है अत: आगामी धारणों में भी फर्मो की संख्या यथावत् मानी गई है।

(iv) शून्य लागत परिकल्पना अवास्तविक है।

(v) मॉडल फर्मो के उत्पादन समायोजन की प्रक्रिया के समय को स्पष्ट नहीं करता।

(vi) प्रतिक्रिया वक्र उपागम अल्पाधिकारी बाजार हेतु अधिक शक्तिशाली एवं उपयुक्त तकनीक प्रतीत होती है।

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Pankaja Singh

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