अर्थशास्त्र

संयुक्त लाभ महत्तमीकरण कार्टेल के अन्तर्गत कीमत-निर्धारण | बाजार सहभागी कार्टेल के अन्तर्गत कीमत-निर्धारण | संयुक्त लाभ महत्तमीकरण तथा बाजार सहभागी कार्टल के अन्तर्गत मूल्य निर्धारण की व्याख्या

संयुक्त लाभ महत्तमीकरण कार्टेल के अन्तर्गत कीमत-निर्धारण | बाजार सहभागी कार्टेल के अन्तर्गत कीमत-निर्धारण | संयुक्त लाभ महत्तमीकरण तथा बाजार सहभागी कार्टल के अन्तर्गत मूल्य निर्धारण की व्याख्या

गठबन्धन युक्त अल्पाधिकार की विशिष्ट व्याख्या प्रस्तुत करने का श्रेय प्रो० डब्ल्यू फेलनर (W. Fellner) की है। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक Conpetition Among the few में इस गठबन्धन को पूर्ण गठबन्धन अथवा कार्टेल की संज्ञा दी है।

फर्मों में पूर्ण गठबन्धन का रूप मुख्यतया कार्टेल होता है। “कार्टेल एक दिये हुए उद्योग से उत्पादकों का एक औपचारिक (Formal) संगठन होता है। इसका उद्देश्य कुछ प्रबन्धकीय निर्णय एवं व्यक्तिगत फर्मों के कार्यों को एक केन्द्रीय संगठन को इस आशा से हस्तान्तरित (transfer) करना होता है जिससे व्यक्तिगत फर्मों की लाभ की स्थिति में सुधार हो। “A cartel is formal organization of the producers within a give industry. Its purpose is to transfer certain management decision and functions of individual firms to a central association with the expectation that profit positions of individual firms will be improved.” एक केन्द्रीय संगठन को हस्तान्तरित किये जाने वाले कार्यों की सीमा विभिन्न कार्टेल- स्थितियों के अनुसार भिन्न-भिन्न होता है। यहाँ पर हम कार्टेल की दो मुख्य स्थितियों को लेते हैं :

(i) संयुक्त लाभ महत्तमीकरण कार्टेल (Joint profit maximisation cartel) इसके अन्तर्गत केन्द्रीय संगठन का सदस्य फर्मों पर लगभग पूर्ण नियन्त्रण होता है। (ii) बाजार सह-भागी कार्टेल (Market sharing cartel): इसके अन्तर्गत केन्द्रीय संगठन को अपेक्षाकृत कम कार्य हस्तान्तरित किये जाते हैं। इस प्रकार का कार्टेज कुछ ढीला संगठन होता है।

(क) संयुक्त लाभ महत्तमीकरण कार्टेल के अन्तर्गत कीमत-निर्धारण

(Pricing under joint profit maximization cartel)

कार्टेल गठबन्धन का पूर्णतम रूप है। कार्टेल के इस रूप में अन्तर्गत कीमत, उत्पादन, बिक्री तथा मुनाफों का वितरण एक केन्द्रीकृत संगठन को सौंप दिया जाता है जिसमें सदस्य फर्मों का प्रतिनिधित्व होता है। कार्टेल की नीतियाँ सदस्य फर्मों के आपसी बातचीत व समझौते से तय होती हैं।

हमारा विश्लेषण निम्न मान्यताओं पर आधारित है-(i) केन्द्रीय संगठन कीमत व उत्पादन के सम्बन्ध में निर्णय करता है। (ii) यह अर्थात् केन्द्रीय संगठन फर्मों के लिए उत्पादन अभ्यंश निर्धारित करता है। (iii) यह ऐसी नीतियाँ अपनाता है जिससे ‘उद्योग का कुल लाभ’ अधिकतम हो; अथवा यह कहा जा सकता है कि इसका उद्देश्य फर्मों के संयुक्त लाभों’ (Joint profit of the firms) को अधिकतम करना होता है। यह ‘उद्योग के लाभ’ वितरण के सम्बन्ध में भी निर्णय करता है। (iv) उद्योग में दो फर्मे हैं; अर्थात् काल एक द्वयाधिकार (Duopoly) है, अथवा यह कहिए कि उद्योग दो फर्मों का एक अल्पाधिकार (An oligopoly of two firms) है। मान्यताऐं (iii) तथा (iv) हमारे विश्लेषण को सरल बनाती हैं।

उपर्युक्त मान्यताओं के आधार पर यह स्पष्ट है कि कार्टेल एक विशुद्ध एकाधिकार (Pure monopoly) की भाँति यह कार्य करता है। दूसरे शब्दों में कार्टेल के लाभों के अधिकतम करने की समस्या अनिवार्य रूप से एकाधिकार की समस्या ही है क्योंकि वास्तव में एक ही एजेंसी (या केन्द्रीय संगठन) सारे उद्योग के सम्बन्ध में निर्णय लेती है। लाभ उद्योग की उस उत्पादन मात्रा व कीमत पर अधिकतम होंगे जहां कि ‘उद्योग का सीमान्त आगम’ (MR) बराबर होगा उद्योग का सीमान्त लागत (MC) के; अर्थात् उद्योग के लाभ के अधिकतम होने के लिए MR=MC की दशा पूरी होनी चाहिए।

केन्द्रीयकृत कार्टेल के अन्तर्गत कीमत व उत्पादन के निर्धारण को चित्र द्वारा स्पष्ट किया गया हैं। चित्र में ‘उद्योग की माँग रेखा’ को D=AR’ द्वारा दिखाया गया है; तथा उद्योग की ‘सीमान्त आगम रेखा’ को MR द्वारा दिखाया गया है। ‘उद्योग को लागत रेखा’ फर्म 1 तथा फर्म 2 की अल्पकालीन सीमान्त लागत रेखाओं MC1 तथा MC2 की सहायता से निकाली जाती है; अर्थात् MC1 तथा MC2 का क्षैतिज योग उद्योग व सीमान्त लागत रेखा MC का निर्माण करता है

उत्पादन के किसी भी एक स्तर के लिए केन्द्रीय संगठन उद्योग की लागत को न्यूनतम करेगा; दूसरे शब्दों में, “ऐसा करने (अर्थात् उद्योग की लागत को न्यूनतम करने) के लिए सदस्य फर्मों का ‘उत्पादन का हिस्सा’ या ‘कोटा’ (Quota) इस तरह से वितरित (allocate) करना होगा कि अपने कोटा’ को उत्पादित करते समय प्रत्येक फर्म की सीमान्त लागत दूसरी फर्मों के द्वारा ‘अपने कोटा’ को उत्पादित करते समय आने वाली सीमान्त लागत के बराबर हो। यदि व्यक्तिगत फर्मों को कोटा  का वितरण किसी अन्य तरीके से किया जाता है तो उद्योग की लागत (अर्थात् सब फर्मों की सम्मिलित लागत) न्यूनतम नहीं हो पायेगी।

कीमत P तथा उत्पादन OQ के स्तर पर कार्टेल उद्योग के लाभ को अधिकतम करेगा क्योंकि इस कीमत व उत्पादन पर उद्योग का सीमान्त आगम (MR) बराबर है उद्योग की सीमान्त लागत (MC) के चित्र के सबसे दायें भाग में बिन्दु S पर MR=MC के है। प्रत्येक फर्म अपना वह कोटा उत्पादित करेगी जिस पर कि उसकी सीमान्त लागत (MC) बराबर हो। उद्योग के सीमान्त लागत SQ के। अतः फर्म 1 का कोटा Oq1 मात्रा है; इस उत्पादन की मात्रा पर MC1 =MR के। फर्म 2 का कोटा Oq2 मात्रा है; इस उत्पादन की मात्रा पर MC2 =MR के। दूसरे शब्दों में जब फर्म 1 मात्रा 0q2 तथा फर्म 2 Oq2 उत्पादित करती है, तब उद्योग की लागत को न्यूनतम करने (और लाभ को अधिकतम करने) की यह दशा पूरी होती है। MC1 MC2 =MR यह स्पष्ट है कि बाजार (या उद्योग) का साम्य ठीक उसी प्रकार की स्थिति को बताता है जैसा कि एक एकाधिकारी के अन्तर्गत होती है। केन्द्रीयकृत संगठन (central agency) का पूर्ण नियन्त्रण होता है और वह एक एकाधिकार की भाँति कार्य करती है जिसके अन्तर्गत दो प्लान्ट (two plants) होते हैं। प्रत्येक प्लान्ट की एक दी हुई सीमान्त लागत रेखा होती है।

उद्योग के लाभ (या कुल संयुक्त लाभ) को चित्र के सबसे दायें भाग के द्वारा नहीं बताया या निकाला जा सकता है। प्रत्येक फर्म के लाभ को मालूम करना होगा और फिर दोनों फर्मों के लाभों को जोड़कर उद्योग के कुल लाभ को मालूम किया जा सकेगा। कीमत P पर, जिस पर कि प्रत्येक फर्म अपनी वस्तु को बेचती है फर्म 1 क्षेत्रफल (area) AKLP के बराबर लाभ उत्पन्न करती है; तथा फर्म 2 क्षेत्रफल EFGP के बराबर लाभ उत्पन्न करती है। उद्योग का कुल लाभ =AKLP +EFGP | चूँकि फर्मों की लागतों में अन्तर है, इसलिए फर्म 1 अधिक लाभ उत्पन्न करती है अपेक्षाकृत फर्म 2 के।

परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि प्रत्येक फर्म का मालिक उतना ही लाभ प्राप्त करता है जितना कि वह वास्तव में उत्पन्न करता है। प्रत्येक फर्म को कितना लाभ मिलेगा यह उनमें पहले से किये गये आपसी समझौते व इकरार पर निर्भर करेगा, सदस्य फर्मों द्वारा उत्पन्न किये गये समस्त लाभ को एक जगह एकत्रित (pool) किया जाता है तथा इसके बाद केन्द्रीयकृत संगठन उस लाभ को समझौते के अनुसार सदस्य फर्मों में बाँटता है। निस्सन्देह (indeed) अधिक अकुशल (inefficient) फर्मां को, उनकी लागतों को देखते हुए, अपेक्षाकृत अधिक लाभ प्राप्त हो सकता है।

इस प्रकार के ‘आदर्श’ प्रकृति के कार्टेल सामान्यतया व्यवहार में नहीं पाये जाते हैं। अनेक कठिनाइयों (difficulties) के कारण ये बहुत अस्थिर होते हैं।

(ख) बाजार सहभागी कार्टेल के अन्तर्गत कीमत-निर्धारण

(Pricing under the market sharing cartel)

संयुक्त लाभों (joint profits) को अधिकतम करने के लिए कार्टेल की नीतियों को कड़ाई के साथ लागू करने में कठिनाइयों के परिणामस्वरूप कार्टेल का एक दूसरा रूप पाया जाता है जो कि संगठन का कुछ ढीला रूप होता है। दूसरा रूप है बाजार सहभागी कार्टेल, इस रूप के अन्तर्गत सदस्य फर्मे बाजार में हिस्से (market sharing) के लिए सहमत हो सकती हैं, ऐसा वे कीमत के सम्बन्ध में समझौते या बिना समझौते के कर सकती हैं। प्रत्येक फर्म अपने लाभ को अपने पास रखती है।

(i) उद्योग की फर्मे एकरूप वस्तु उत्पादित करती हैं। वस्तु की एकरूपता के कारण वस्तु की एक कीमत होती है। (ii) उद्योग में केवल दो फर्मे हैं। (iii) दोनों फर्मों की उत्पादन लागतें बराबर या समान हैं। (iv) प्रत्येक सम्भव कीमत पर वे बाजार को आधा-आधा बाँटने के लिए सहमत हैं। ये सब मान्यताएँ विश्लेषण को सरल बनाने के लिए मान ली जाती हैं। इन विशेष मान्यताओं के अन्तर्गत बाजार सहभागी कार्टेल (market-sharing cartel) कीमत व वस्तु की मात्रा उसी प्रकार से निर्धारित करेगा जिस प्रकार से एक एकाधिकारी निर्धारित करेगा। बाजार सहभागिता दो प्रकार के समझौतों पर आधारित होती हैं-(i) गैर मूल्य प्रतियोगिता समझौता, (ii) अभ्यंश अथवा कोटा निर्धारण समझौता।

(i) गैर-मूल्य प्रतियोगितासमझौता (Non-Price Competition Agreements)- ये विशिष्ट समझौता एक विशेष प्रकार के लचीले कार्टेल के अन्तर्गत किया जाता है जिसमें कि सदस्य फर्मे एक सर्वमान्य सामान्य मूल्य पर अपनी उत्पादन की कोई भी मात्रा विक्रय कर सकती है तथा ये मूल्य न्यूनतम लागत वाली फर्म के मूल्य तथा अधिकतम लागत वाली फर्म के मूल्य के बीच समझौते द्वारा तय किया जाता है। ऐसे गैर मूल्य प्रतियोगिता वाले समझौते की दशा में मूल्य निर्धारण निम्नवत् होगा-

उपर्युक्त रेखाचित्र में A फर्म की तुलना में B फर्म की लागत कम है, अत: B फर्म को यह छूट होगी कि वह एकाधिकारी स्तर से नीचे मूल्यों को कम रख सके जिसके परिणामस्वरूप अधिक लागत वाली प्रतियोगी फर्म A व्यवसाय से बाहर हो जायेगी। यदि कोई फर्म कार्टेल से अलग होकर एकाधिकारी मूल्य Pm से कम मूल्य लेने लगे तो अन्य फर्मे भी उद्योग से बहिर्गमन करने लगेंगी जिसके परिणामस्वरूप माँग वक्र अधिक लचीला हो जायेगा तथा इसके लाभ की मात्रा में वृद्धि हो जाएगी। संक्षेप में इस लचीलें काल में आन्तरिक अस्थिरता उत्पन्न होने के कारण इसका स्वरूप विलीन हो जायेगा।

(ii) अभ्यंश निर्धारण (Quota Sharing Agreement)

कभी-कभी बाजार सहभागिता ऐसे कार्टेल पर भी आधारित होती है जिनमें अभ्यंश प्रधान  समझौते किये जाते हैं अर्थात् बाजार की मांग को निश्चित अभ्यंश के आधार पर कार्टेल की फमें आपस में परस्पर विभाजित कर लेती हैं तथा मूल्य सम्बन्धी समझौता भी सम्पादित करती हैं। इस समझौते का एक लोकप्रिय रूप क्षेत्रीय आधार पर बाजारों के मध्य किया गया भौगोलिक समझौता भी होता है।

उपर्युक्त रेखाचित्र में भौगोलिक आधार पर बाजार प्रधान अथवा क्षेत्र प्रधान अध्यंश सम्बन्धी कार्टेल की दशा दर्शायी गयी है। रेखाचित्र के अनुसार कार्टेल द्वारा निर्धारित मूल्य Pm होगा तथा एक फर्म एक बाजार में OX मात्रा तथा दूसरी फर्म दूसरे बाजार में OX2  मात्रा के बराबर अभ्यंश के विक्रय का समझौता करेंगी। चित्र के अनुसार कुल विक्रय की मात्रा OXm है जिसमें कि दोनों फर्मों के अभ्यंश X1  तथा X2 बराबर दर्शाये गये हैं।

बाजार सहभागी कार्टेल के अस्तित्व (existence) के रास्ते में अनेक कठिनाइयाँ या बाधक तत्त्व (difficulties or obstacules) हैं जिनके कारण वे प्राय: अस्थायी (unstable) होते हैं। मुख्य कठिनाइयाँ निम्नलिखित हैं-

(i) यह आवश्यक नहीं है कि व्यक्तिगत फर्मों को उत्पादन लागतें समान हों (जैसा कि हमने माना है) प्रायः उनमें अन्तर होता है। लागतों में अन्तर की दशा में नीची लागत वाली फर्म कार्टेल से अलग होने की प्रवृत्ति रखेगी।

(ii) कुछ फर्मे जान-बूझकर या गलत अनुमान लग जाने के कारण अपने कोटा से अधिक उत्पादन कर सकती हैं और इस प्रकार वे अन्य फर्मों के बाजारों में हस्तक्षेप कर सकती हैं।

(iii) व्यक्तिगत फर्मों के पास स्वतन्त्र कार्य का जो अंश (degree) छोड़ा जाता है उससे उनकी कार्टेल से अलग होने की इच्छा बढ़ सकती है और उनके अलग होने की सम्भावना बहुत अधिक हो सकती है।

(iv) यह आवश्यक नहीं है कि फर्मों में बाजार का विभाजन बराबर-बराबर हो। उदाहरणार्थ, ऊँची क्षमता वाली फर्मों (high capacity firms) को नीची क्षमता वाली फर्मों की तुलना में बाजार का एक बड़ा हिस्सा मिल सकता है। बाजार का विभाजन प्रादेशिक आधार (regional basis) पर हो सकता है जिसके अन्तर्गत प्रत्येक फर्म एक विशेष भौगोलिक क्षेत्र की माँग को पूरा कर सकती है।

संक्षेप में, कार्टेल के निर्माण तथा उसके बने रहने के सम्बन्ध में अनेक प्रकार की बाधाएँ रहती हैं, जैसे लागतों में अन्तर, स्वार्थों में टकराव, कुछ फर्मों के हिस्से में घटिया क्षेत्रों का आना, एक- दूसरे के प्रवेशों में हस्तक्षेप, इत्यादि। इन सब विभिन्न प्रकार की कठिनाइयों के कारण कार्टेल प्राय: असफल और अस्थायी रहते हैं। कुछ विशेष दशाओं को छोड़कर प्राय: सरकारों द्वारा कार्टेल के विरुद्ध नियम भी बनाये जाते हैं।

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Pankaja Singh

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