अर्थशास्त्र

ओहलिन के सिद्धान्त की श्रेष्ठता | ओहलिन के सिद्धान्त की आलोचना | प्रतिष्ठित सिद्धान्त तथा हेक्शर-ओहलिन सिद्धान्त 

ओहलिन के सिद्धान्त की श्रेष्ठता | ओहलिन के सिद्धान्त की आलोचना | प्रतिष्ठित सिद्धान्त तथा हेक्शर-ओहलिन सिद्धान्त 

प्रतिष्ठित सिद्धान्त तथा हेक्शर-ओहलिन सिद्धान्त

(Classical Theory and Hecksher Ohlin Theory)

दोनों सिद्धान्त यह स्पष्ट करते हैं कि अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार तभी उत्पन्न होता है, जबकि दो देशों में दो वस्तुओं के उत्पादन में लागत व्ययों में अन्तर पाया जाता है। फिर भी हेवशर-ओहलिन सिद्धान्त ने अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के आधार की व्याख्या को एक नया मोड़ दिया है। इस सिद्धान्त के अन्तर्गत प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों के संकुचित मूल्य के श्रम सिद्धान्त का परित्याग किया गया है और इस सिद्धान्त में आधुनिक माँग और पूर्ति सिद्धान्त पर उचित बल दिया है। इसके विपरीत प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों ने पूर्ति पक्ष पर अधिक जोर दिया तथा माँग पक्ष की पूर्ण रूप से उपेक्षा की। हेक्शर ओहलिंन सिद्धान्त द्वारा राष्ट्रीय बाजार तथा अन्तर्राष्ट्रीय बाजार को एकीकरण करने का श्रेय दिया जा सकता है। सर्वप्रथम ‘एक विश्व’ की विचारधारा देने का श्रेय इसी सिद्धान्त के प्रतिपादकों को है। इस सिद्धान्त द्वारा यह स्पष्ट किया गया है कि विभिन्न कीमत प्रणालियों का एक दूसरी कीमत प्रणाली के साथ किस प्रकार क्रिया-प्रतिक्रिया होती है। यह वस्तुओं की लागतों में होने वाले तुलनात्मक अन्तरों की व्याख्या गहराई से करके अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के आधार को मजबूत बनाता है। अतः इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि यह सिद्धान्त प्रतिष्ठित सिद्धान्त का पूरक है तथा

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के सिद्धान्त के रूप में व्यापक प्रकाश डालता हुआ अधिक स्वस्थ एवं मानसिक  सन्तुष्टि प्रदान करने वाला है।

ओहलिन के सिद्धान्त की श्रेष्ठता

प्रो० ओहलिन द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त की अवास्तविक मान्यताओं को त्याग दिया जाने पर भी उनका सिद्धान्त वास्तविक जीवन में अडिग रहता है। यह निम्न बिन्दुओं से स्पष्ट किया जा सकता है-

(1) कई देशों के साथ क्रियाशीलता- अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का यह आधुनिक सिद्धान्त दो देशों या क्षेत्रों के स्थान पर कई देशों में क्रियाशील होता है। ऐसी स्थिति में निष्कर्ष एक से निकलेंगे, लेकिन अध्ययन की प्रक्रिया जटिल हो जायेगी।

(2) बड़े पैमाने पर उत्पादन एवं विशिष्टीकरण- एक ही समान साधन संम्पन्न देशों के बीच भी बड़े पैमाने पर उत्पादन करके विशिष्टीकरण अपनाया जा सकता है। इससे आन्तरिक तथा बाह्य बचतें (Internal and External Economies) प्राप्त होती हैं। घरेलू तथा विदेशी माँग होने के कारण व्यापार को प्रोत्साहन मिलता है जिसमें बड़े पैमाने पर उत्पादन के अवसर और अधिक बढ़ जाते हैं।

(3) दो देशों में साधनों की गुणात्मक समरूपता होना आवश्यक नहीं- दो देशों में उत्पादन के विभिन्न साधनों में गुणात्मक अन्तर हो सकते हैं और इससे दोनों में सापेक्षिक अन्तरों की तुलना करना कठिन हो सकता है परन्तु यह कठिनाई समस्त साधनों को विभिन्न वर्गों के अन्तर्गत वर्गीकृत करके दूर की जा सकती है। इसके साथ ही यह सिद्धान्त सामान्य मूल्य सिद्धान्त पर आधारित होने के कारण तुलनात्मक अध्ययन हेतु मांग और पूर्ति महत्वपूर्ण होते हैं। यह मान्यता कि दोनों देशों में साधनों की इकाइयां समरूप होनी चाहिए, जरूरी नहीं है।

(4) परिवहन व्यय- प्रारम्भिक विश्लेषण में प्रो० ओहलिन ने परिवहन लागतों की उपेक्षा की है लेकिन इनको भी ध्यान में रखा जा सकता है और इसकी सहायता से यह पता लगाया जा सकता है कि व्यापार और कीमतों पर परिवहन व्यय का क्या प्रभाव पड़ता है।

(5) स्थिर लागत नियम- इस सिद्धान्त की वैधता के लिए यह आवश्यक नहीं है कि दो देशों में वस्तुओं के उत्पादन में स्थिर लागत नियम लागू होने से ही सापेक्ष कीमतों में अन्तर पाया जाता है। दो देशों में दो फर्मे लागत हास नियम अथवा उत्पत्ति वृद्धि नियम (Law of Decreasing Cost or Law of Increasing Returns) के अन्तर्गत उत्पादन कर रही हैं फिर भी सापेक्ष कीमतों में अन्तर हो सकता है। इस प्रकार अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का आधार ज्यों का त्यों बना रहता है। उत्पत्ति वृद्धि नियम के अन्तर्गत उत्पादन होने से अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की मात्रा में वृद्धि होती है जबकि उत्पत्ति ह्रास नियम के अन्तर्गत उत्पादन होने से इसकी मात्रा कम हो सकती है।

ओहलिन के सिद्धान्त की आलोचना (Criticism)

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के वास्तविक आधार की व्याख्या न केवल प्रतिष्ठित अर्थशस्त्रियों ने ही की है बल्कि डेविड रिकार्डो ने एक ऐतिहासिक सिद्धान्त-तुलनात्मक लागत सिद्धान्त-का प्रतिपादन किया है और इसके पश्चात हेक्शर-ओहलिन ने भी अपने सिद्धान्त का प्रतिपादन करके एक पूरक सिद्धान्त का रूप दिया है। फिर भी आधुनिक अर्थशास्त्री इस सिद्धान्त से पूर्ण रूप से संतुष्ट नहीं हैं। उन्होंने इस सिद्धान्त की निम्न बिन्दुओं के आधार पर आलोचना की है-

(1) अवास्तविक मान्यताएँ- यह सिद्धान्त मानकर चलता है कि वस्तु तथा साधन बाजारों में पूर्ण प्रतियोगिता पाई जाती है, उत्पादन के साधन पूर्णतया गतिशील हैं, विनिमय नियन्त्रण अभाव होता है, स्वतंत्र व्यापार होता है, साधनों की माँग और पूर्ति की दशाएँ अपरिवर्तित रहती हैं, यातायात व्यय नहीं होता है, लोगों की रुचियाँ अपरिवर्तित रहती हैं, तथा तकनीकी ज्ञान स्थिर तथा सीमित रहता है। उपरोक्त सभी मान्यताएँ एक प्रावेगिक अर्थव्यवस्था में नहीं पाई जाती है तथा व्यावहारिकता से परे है। व्यावहारिक जीवन में साधन तथा वस्तु बाजार में पूर्ण प्रतियोगिता न होकर एकीधिकारात्मक प्रतिस्पर्धा पाई जाती है। साधनों में पूर्ण गतिशीलता नहीं पाई जाती है क्योंकि साधनों की गतिशीलता सामाजिक, आर्थिक, भाषा, रहन-सहन आदि से भी प्रभावित होती है। आज कोई क्षेत्र ऐसा नहीं हैं जिसमें सरकारी हस्तक्षेप न हो। स्वतंत्र व्यापार तथा विनिमय नियन्त्रण के अभाव की मान्यतायें भी व्यावहारिक जीवन में नहीं पाई जाती है। यातायात व्यय भी पाया जाता है, लोगों की रुचियों में भी समय-समय पर परिवर्तन होता है। तकनीकी ज्ञान विकास की प्रारम्भिक अवस्था में कम होता है लेकिन विकास के साथ-साथ इसमें भी वृद्धि होती रहती है। यदि जब मान्यतायें ही अवास्तविक तथा अव्यवहारिक हैं तो इन पर आधारित सिद्धान्त भी अपनी कसौटी पर सही नहीं उतरता है।

(2) प्रो० ओहलिन ने यह दावा किया है कि उनका सिद्धान्त अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार सिद्धान्त के प्रतिष्ठित सिद्धान्त से भिन्न हैं क्योंकि यह कई बाजारों में कीमत निर्धारण सिद्धान्त का कार्य करता है। इसके अन्तर्गत अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की व्याख्या सामान्य सन्तुलन सिद्धान्त (General Equilibrium Theory) के रूप में करके मूल्य के श्रम सिद्धान्त (Labour Theory of Value) से एक पृथक् दिशा प्रदान की है। लेकिन विनर (Viner) ने आलोचना करते हुए कहा है कि जिन बिन्दुओं की व्याख्या इस सिद्धान्त में की गई है वे पहले से ही प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों द्वारा बता दिये गये हैं। डोनाल्डसन (Donaldson) ने लिखा है कि इस सिद्धान्त में केवल प्रतिष्ठित सिद्धान्त की स्पष्ट व्याख्या मात्र की गई है।

(3) प्रो० ओहलिन यह महसूस करने में असफल रहे हैं कि प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों का तुलनात्मक लागत सिद्धान्त एक कल्याण की प्रणाली थी और यह राष्ट्रीय विशिष्टीकरण की व्याख्या करने का एक वास्तविक सिद्धान्त (Positive Theory) नहीं था। प्रो० विनर (viner) ने कहा है कि प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों ने मूल्य का श्रम लागत सिद्धान्त त्याग करके एक सरल मुद्रा लागतों का उत्पादन सिद्धान्त (Money Cost of Production Theory) के प्रतिस्थापन का प्रयास किया है जिससे कि व्यापार की वास्तविक स्थिति की व्याख्या की जा सके।

(4) प्रो० ओहलिन के अनुसार साधन कीमतों के निर्धारण में माँग की अपेक्षा पूर्ति अधिक महत्वपूर्ण है। परन्तु यह सही नहीं है क्योंकि यदि साधन कीमतों के निर्धारण में मांग पक्ष अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है तो पूँजी प्रधान देश श्रम प्रधान वस्तु का निर्यात करने लगेगा क्योंकि पूँजी की कीमत उसकी अधिक माँग के कारण श्रम की तुलना में अधिक होगी इस प्रकार दो देशों के बीच माँग दशाओं में सापेक्षक भिन्नताएँ भी अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार को प्रोत्साहित करेगी अत: माँग और पूर्ति दोनों ही आर्थिक शक्तियाँ साधन-कीमत निर्धारण हेतु आवश्यक हैं।

(5) उत्पादन के साधन समरूप नहीं होते हैं। इस सिद्धान्त में उत्पादन के किसी भी साधन की सभी इकाईयों को कार्यकुशलता में समरूप माना है लेकिन व्यावहारिकता में यह सही नहीं हैं। उदाहरणार्थ श्रम एक उत्पादन का साधन है जिसमें भी तीन श्रेणिया कुशल, अर्द्धकुशल तथा अकुशल पाई जाती हैं। यह सिद्धान्त उस समय असफल हो जाता है जब दो देशों में उत्पादन फलन भिन्न-भिन्न होते हैं तथा विभिन्न देशों में उत्पादन के साधन एक समान नहीं होते हैं।

(6) दो क्षेत्रों के बीच एक ही साधन गहन वस्तु का आयात निर्यात संभव है। प्रो० ओहलिन के मतानुसार अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार उस समय संभव नहीं होता है जबकि दो देशों के बीच एक ही साधन समान वस्तु का उत्पादन होता है जैसे दोनों देशों में श्रमप्रधान वस्तु अथवा पूँजी प्रधान वस्तु का उत्पादन होना, लेकिन यह सही नहीं है। प्रो० बी०एस० मिन्हास का मत है कि एक श्रम प्रधान देश उसकी पूँजो प्रधान वस्तु का निर्यात कर सकता है और निर्यात तथा आयात प्रतिस्थापन वस्तुओं को तुलनात्मक साधन प्रधानता के विषय में निष्कर्ष निकालना तर्क संगत-नहीं हैं।

(7) ओहलिन ने अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के आधार की व्याख्या में साधन सम्पत्तियों (Factor Endowments) में असमानता को प्रमुख कारण माना है जबकि आलोचकों का कहना है कि अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के अन्तर्गत वस्तु कीमत अन्तरों के अनेक कारणों में से सापेक्षक साधन सम्पत्तियों (Relative Factor endowment) में अन्तर एक कारण है। वस्तु की कीमतों में उस समय भी भिन्नताएँ हो सकती हैं, जबकि दो देशों में साधन गुणों में भिन्नता, उत्पादन तकनीकी में भिन्नता, पैमाने का बढ़ता हुआ प्रतिफल (Increasing Returns of Scale) या वस्तुओं के लिए उपभोक्ता की माँग में भिन्नतायें पाई जायें।

(8) ओहलिन के सिद्धान्त की अलोचना इस आधार पर भी की गई है कि वस्तुओं की कीमतों का निर्धारण साधन-कीमतों द्वारा नहीं होता है। प्रो० विजन होल्ड्स (Wihanholds) का कथन है कि वस्तुओं की कीमतें बाजार में इसकी उपयोगिता अथवा माँग पर निर्भर करती हैं तथा कच्चे माल की कीमत श्रमिकों की मजदूरी अन्तिम रूप से अन्तिम वस्तुओं (Final goods) की कीमतों पर निर्भर करती है। इस प्रकार तुलनात्मक लागत सिद्धान्त तथा साधन अनुपात सिद्धान्त त्रुटिपूर्ण हैं। क्योंकि वे दोनों उत्पादन की लागतों में अन्तरों पर आधारित हैं। वस्तुओं की कीमतें ही मूल रूप से उन स्थानों को निर्धारित करती हैं जहां पर कि श्रम, पूँजी आदि की प्रत्येक इकाई को काम पर लगाना है। एक साधन की प्रत्येक इकाई उस स्थान पर कार्य करेगी जहाँ पर उसे अधिकतम पुरस्कार प्राप्त होता है।

(9) इस सिद्धान्त के अन्तर्गत एक कठिनाई यह भी आती है कि वस्तुओं और उत्पादन के साधनों को भी कभी-कभी पृथक करना संभव नहीं होता है। आज अन्तर्राष्ट्रीय व्यापर में अन्तिम वस्तुओं (Final Products) का ही व्यापार नहीं होता है, बल्कि बीच की वस्तुओं (Intermediate Goods) का भी व्यापार होता है। ये बीच की वस्तुएँ अन्तिम रूप से प्राप्त वस्तुओं के निर्माण करने में काम में लायी जाती हैं आर्थिक इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण विद्यमान हैं। इंग्लैण्ड में रूई का उत्पादन नहीं के बराबर होने पर भी वह रेशों का आयात करके कपड़े का उत्पादन करता है। जापान कच्चा लोहा आस्ट्रेलिया से तथा कोयला संयुक्त राज्य अमेरिका से आयात करता है और फिर भी वह इस्पात से बनी वस्तुओं के उत्पादन में कार्यकुशलता रखता है।

(10) एल्सवर्थ के अनुसार जिन देशों में साधनों के अनुपात समान हैं वे भी आपस में व्यापार करते हैं क्योंकि वस्तुओं की लागतों को प्रभावित करने वाले कई तत्व हैं। लागतों के तुलनात्मक अन्तर वास्तव में विशुद्ध लागत के अन्तर स्वरूप होते हैं। हमें सभी प्रकार की लागतों को जोड़कर देखना चाहिए।

इन लागतों में श्रम की भिन्नता, पूँजी की भिन्नता, प्राकृतिक साधनों की भिन्नता, कच्चे माल के  यातायात की भिन्नता आदि हैं। इसके साथ ही बड़े पैमाने पर उत्पादन करने से प्राप्त आन्तरिक और बाह्य बचतों के कारण लागतों में भिन्नता पाई जाती है। इस समस्त प्रकार की लागतों के सामूहिक प्रभाव की व्याख्या’ हेक्शर-ओहलिन सिद्धान्त में नहीं की गई है।

(11) ओहलिन सिद्धांत की आलोचना इसलिए भी की गई है कि इसमें पैमाने की स्थिरता का प्रतिफल (Constant Returns to Scale) नियम को प्रमुख आधार माना है। अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में प्रारम्भ में उत्पादन बड़े पैमाने पर होने से पैमाने की मितव्ययितायें प्राप्त होंगी। उद्योगों द्वारा खरीदी जाने वाली वस्तुओं की कीमतें अधिक होंगी। इसका अर्थ यह है कि कीमत में और लागत में प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं पड़ता है। दीर्घकाल में पैमाने का उत्पत्ति ह्रास नियम (Diminishing Returns to Scale) लागू होता है। अतः स्थिर पैमाने के प्रतिफल की मान्यता सही नहीं है।

(12) अन्त में यह कहा जा सकता है कि हेक्शर-ओहलिन सिद्धान्त अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की गत्यात्मक समस्याओं (Dynamic Problems of International Trade) का समाधान प्रस्तुत करने में असफल है। व्यापार के अन्तर्गत सापेक्षक साधन पूर्ति, साधनों की सीमितता, साधनों की मात्रा आदि में कभी भी परिवर्तन हो सकता है। इन परिवर्तनों से अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की मात्रा तथा दिशा पर पड़ने वाले प्रभावों की व्याख्या करने में असमर्थ है।

उपरोक्त आलोचनाओं के बावजूद भी। हेक्शर-ओहलिन का सिद्धान्त अन्तर्राष्ट्रीय अर्थशास्त्र का एक अभिन्न अंग है। इस सिद्धान्त की अपनी मौलिकता तथा सरलता है। इस सिद्धान्त से यह स्पष्ट होता है कि विभिन्न उत्पादन के साधनों की उपलब्धियों से उनकी कीमतों में परिवर्तन होता है। कम कीमत वाले साधनों की सहायता से वे देश उन वस्तुओं का उत्पादन करते हैं जो दूसरे देश में उत्पादित वस्तुओं से सस्ती पड़ती है। इस सिद्धान्त के आधार पर अन्तर्राष्ट्रीय अर्थशास्त्र में अन्य सिद्धान्तों का प्रतिपादन हुआ। साधन-कीमत समतुल्यता का सिद्धान्त (Factor Price Equalization Theorem) का जन्मदाता यही सिद्धान्त है। इस सिद्धान्त की भौतिक जाँच विभिन्न अर्थशास्त्रियों द्वारा की गई है।

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Pankaja Singh

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