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वायु प्रदूषण से तात्पर्य | वायु प्रदूषण के स्रोत | वायु प्रदूषण के दुष्प्रभाव | वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के उपाय

वायु प्रदूषण से तात्पर्य | वायु प्रदूषण के स्रोत | वायु प्रदूषण के दुष्प्रभाव | वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के उपाय | Meaning of air pollution in Hindi | Sources of air pollution in Hindi | Effects of Air Pollution in Hindi | Measures to control air pollution in Hindi

भूमिका- धरती पर जीवन के लिए जिस प्रकार शुद्ध जल आवश्यक है, उसी प्रकार शुद्ध वायु भी आवश्यक है। समस्त जीवधारी श्वसन के लिए वायु का उपयोग करते हैं। जीवधारियों द्वारा श्वसन के लिए ऑक्सीजन का उपयोग किया जाता है, इसे प्राण वायु भी कहा जाता है। इस प्रकार जिंदा रहने के लिए शुद्ध वायु का होना जरूरी है। परंतु यह हमारा दुर्भाग्य है। कि वायुमंडल में शुद्ध वायु अथवा प्राण वायु की मात्रा निरंतर घटती जा रही है। इसका मुख्य कारण वायु प्रदूषण ही है।

वायु प्रदूषण से तात्पर्य-

पृथ्वी की सतह से ऊपर वायुमंडल होता है, जिसमें अनेक प्रकार की गैसें जैसे- ऑक्सीजन, कार्बन डाई आक्साइड, नाइट्रोजन, हाइड्रोजन आदि पायी जाती हैं। इन गैसों के  मिश्रण को वायु कहते हैं। वायुमंडल में संतुलन के लिए इन विभिन्न प्रकार की गैसों की मात्रा निश्चित होती है। यदि ये गैसें वायुमंडल में निश्चित मात्रा में पायी जाती हैं, तो वायुमंडल स्वच्छ एवं संतुलित रहता है। परंतु वायुमंडल में गैसों का यह अनुपात गड़बड़ा जाता है, तब वायुमंडल प्रदूषित हो जाता है। इसे ही वायु प्रदूषण कहते हैं। अतः कहा जा सकता है कि वायुमंडल के विभिन्न घटकों के भौतिक, रासायनिक या जैविक गुणों में होने वाले वे अवांछनीय परिवर्तन जो जैव मंडल को किसी-न-किसी रूप में दुष्प्रभावित करते हैं, संयुक्त रूप से वायु प्रदूषण कहलाते हैं। वायु प्रदूषण वायुमंडल में किसी बाहा पदार्थ के मिल जाने से भी होता है ये पदार्थ ही प्रदूषक कहलाते हैं।

प्रो. पार्किन्स के अनुसार- “वायुमंडल में बाह्य स्रोतों से एक या अधिक प्रदूषण, जैसे- धूल, धुआँ, गैस, दुर्गंध अथवा जलवाष्प आदि इतनी अधिक मात्रा तथा अवधि तक उपस्थित हो जायँ कि मानव, वनस्पति तथा जंतु जगत के लिए हानिकारक हों अथवा जिससे सुखी जीवन और संपत्ति में अनुचित बाधा उपस्थित हो जाये, तो इसे वायु प्रदूषण कहते हैं।”

वायु प्रदूषण के स्रोत

(1) वाहनों से प्रदूषण- वायु प्रदूषण अनेक प्रकार के वाहनों जैसे- कार, मोटर, स्कूटर, मोटर साइकिल, बस, हवाई जहाज, टैम्पो आदि से भी उत्पन्न होता है। ये स्वचालित वाहन पेट्रोल या डीजल से चलते हैं तथा गतिशील अवस्था में धुँआ छोड़ते हैं। इनके द्वारा उगले धुएँ में मुख्य रूप से कार्बन मोनो-ऑक्साइड नामक गैस होती है जो कि बहुत ही विषैली होती हैं। इससे वायु प्रदूषण फैलता है।

(2) ताप विद्युत ऊर्जा का उत्पादन- ताप विद्युत गृहों में ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए बड़ी मात्रा में कोयला जलाया जाता है, जिससे अनेक विषैली गैसें उत्पन्न होती हैं तथा कोयले की राख जो व्यर्थ पदार्थ के रूप में बाहर फेंकी जाती है, वायु में मिलकर प्रदूषण उत्पन्न करती है।

(3) परमाणु परीक्षण- आज के आधुनिक युग में परमाणु ऊर्जा विभिन्न रूपों में प्रयुक्त की जाती है। उपयोग करने से पहले इनका परीक्षण किया जाता है, जिससे विभिन्न रेडियोऐक्टिव पदार्थों द्वारा वायुमंडल प्रदूषित होता है।

(4) औद्योगीकरण- औद्योगीकरण वायु प्रदूषण का एक मुख्य स्रोत है। उद्योगों में अपनायी जाने वाली उत्पादन क्रिया के दौरान अनेक प्रकार की विषैली गैसें तथा धुआं निकलता है, जिससे वायुमंडल प्रदूषित होता है। उद्योगों द्वारा वायु प्रदूषण फैलने का एक भयानक उदाहरण

3 दिसंबर, 1984 को यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री भोपाल में MIC (Methyl ISO Cynate) गैस का वायु में प्रवेश है, जिसके कारण 3,000 से अधिक व्यक्तियों की मृत्यु हो गयी थी। कानपुर और कोलकाता जैसे औद्योगिक शहरों का वायुमंडल उद्योगों के कारण ही प्रदूषित है।

(5) कृषि कार्य- आधुनिक कृषि में रासायनिक खादों एवं कीटनाशक औषधियों का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता है। इनके विषैले तत्त्व एवं दुर्गंध वायु को प्रदूषित करते हैं।

वायु प्रदूषण के दुष्प्रभाव

वायु प्रदूषण के दुष्प्रभावों का निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत विस्तृत अध्ययन किया जा सकता है-

(i) मनुष्यों पर दुष्प्रभाव- वायु प्रदूषण का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव मनुष्यों पर पड़ता है। वायु में मिले हुए छोटे-छोटे कण श्वसन क्रिया द्वारा फेफड़ों के वायु कूपों में पहुँच जाते हैं। वहाँ पर ये विशिष्ट कोशिकाओं द्वारा अवशोषित कर लिये जाते हैं, जिससे फेफड़े खराब हो जाते हैं। वायु में मिली हुई सल्फर डाई ऑक्साइड कोमल ऊतकों द्वारा अवशोषित की जाती है, जिसके कारण आँख, कान, नाक प्रभावित होते हैं और इन्हें हानि होती है। इस प्रकार नाइट्रोजन ऑक्साइड तथा कार्बन मोनो ऑक्साइड खून में पहुँचकर हीमोग्लोबिन से मिल जाते हैं, जिसके फलस्वरूप ऑक्सीजन परिवहन में रूकावट होती है। नाइट्रोजन ऑक्साइड की अधिक सांद्रता से फेफड़ों को हानि होती है। इसी प्रकार हाइड्रोकार्बन से कैंसर होने की संभावना होती है।

(ii) जलवायु पर दुष्प्रभाव- वायु प्रदूषण का जलवायु पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। वायु प्रदूषण से वन नष्ट होते हैं। वनों के नष्ट होने से तथा जीवाश्मी ईंधन के अत्यधिक दहन से वायुमंडल में कार्बन डाई-ऑक्साइड की मात्रा बढ़ जाती है। इसी कारण से पृथ्वी का तापमान “ग्रीन हाउस इफेक्ट” द्वारा बढ़ गया है। यदि पृथ्वी का तापमान 2-3 सेंटीग्रेड बढ़ जाता है तो ग्लेशियर पिघलने लगते हैं, जिससे नदियों में बाढ़ आती है, समुद्र में जल की मात्रा बढ़ने से समुद्र तट के स्थल तथा द्वीपों में पानी भर जाता है। तापमान बढ़ने से वर्षा का क्रम भी अव्यवस्थित हो जाता है। इसका फसल, वनस्पति तथा वनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

(iii) पौधों पर दुष्प्रभाव- वायु प्रदूषण का पौधों पर भी दुष्प्रभाव पड़ता है। वायु में मिली हुई सल्फर डाई ऑक्साइड से वनों व पेड़ों पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। इसी कारण फ्लोराइड पत्ती के ऊतकों को हानि पहुंचाते हैं। नाइट्रोजन तथा फ्लोराइड के ऑक्साइड फसल की उत्पादकता को कम करते हैं। हाइड्रो कार्बन से पत्तियाँ समय से पहले ही गिर जाती है और पुष्पों की पंखुड़ियाँ मुड़ जाती हैं तथा कलियाँ खिलने से पहले ही झड़ जाती हैं। प्रकाश रासायनिक स्मोग (धूम कोहरा) से पत्तियों का रंग उड़ जाता है।

(v) यातायात पर दुष्प्रभाव- वायु प्रदूषण के कारण वायुप्रदूषण की दुश्यता प्रभावित होती है। प्रदूषकों की मात्रा अधिक होने पर निकट की वस्तुएँ भी स्पष्ट नहीं दिखाई देती हैं। ऐसी स्थिति में वाहन दुर्घटनाओं में वृद्धि हो जाती है। जाड़ों में वायुमंडलीय व्युत्क्रम के कारण वाहनों से निकलने वाला धुआँ ऊपर उठने की बजाय नीचे ही रह जाता है, अतः महानगरों में प्रायः धूम कोहरा छाया रहता है। इससे वायु परिवहन सबसे अधिक प्रभावित होता है।

(vi) अम्लीय वर्षा- उद्योगों व मोटर वाहनों में जीवाश्म ईंधन के दहन से निकली सल्फर डाई ऑक्साइड तथा नाइट्रोजन ऑक्साइड गैसें वायुमंडल पहुँचकर रासायनिक अभिक्रिया से सल्फ्यूरिक अम्ल तथा नाइट्रिक अम्ल में बदल जाती है। वर्षा के समय बूँदों में घुलकर ये पदार्थ धरातल पर आते हैं। इसे अम्लीय वर्षा कहते हैं। अम्लीय वर्षा का मनुष्यों, पशु-पक्षियों, वनों तथा फसलों सभी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के उपाय

(1) वनों की कटाई रोककर पौध रोपण पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

(2) अधिक धुआं देने वाले वाहनों पर प्रतिबंध लगाना चाहिए। वाहनों को खड़ा रखकर इंजन चलाने पर भी प्रतिबंध लगाना चाहिए।

(3) बस अड्डों तथा मोटर गैरजों को शहर से दूर स्थापित करना चाहिए।

(4) फैक्ट्रियों की चिमनियों को ऊँचा बनाना चाहिए, जिससे नीचे की वायु कम प्रदूषित हो।

(5) कारखानों की चिमनियों में धुआँ कम तथा शुद्ध करने के लिए विशेष प्रकार के शोधन संयंत्रों को लगाना चाहिए।

(6) छोटे तथा बड़े सभी काल-कारखानों को नगरों से बहुत दूर स्थापित करना चाहिए।

(7) कुछ पौधे कार्बन-डाई-ऑक्साइड का अवशोषण करते हैं अतः प्रदूषित स्थानों पर इन्हें लगाना चाहिए। ठीक इसी प्रकार नाइट्रोजन के ऑक्साइडों से प्रदूषित स्थानों पर पाइरस, जूनीरेपस इत्यादि पौधों को लगना चाहिए।

(8) कृषि में रासायनिक खादों एवं कीटनाशक औषधियों का सीमित मात्रा में ही प्रयोग करना चाहिए।

निष्कर्ष-

यह तो ध्रुव सत्य है कि शुद्ध वायु के बिना स्वस्थ शरीर की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। वायु प्रदूषण से अनेक प्रकार के रोग फैलते हैं, जिसके दुष्परिणाम समस्त मानव जाति को भुगतने पड़ते हैं। इसके बावजूद वायु प्रदूषण के विरूद्ध सामाजिक जागरूकता का अभाव है। इसी का परिणाम है कि वायु प्रदूषण तेजी से फैल रहा है। कारखानों, वाहन तथा घरों के चूल्हे लगातार वायुमंडल में जहर उगल रहे हैं। यदि इसे नहीं रोका गया तो एक दिन ऐसा आयेगा कि खुली हवा में भी श्वास लेना दूभर हो जायेगा, तब स्थान-स्थान पर ऑक्सीजन के बूथ खोले जायेंगे, जहाँ पर भरपूर भुगतान करने के बाद प्राणवायु अर्थात् ऑक्सीजन की सीमित मात्रा उपलब्ध होगी। राशन की दुकानों के समान इन ऑक्सीजन बूथों पर ऑक्सीजन लेने वालों की लंबी-लंबी कतारें होंगी। जिनके पास आक्सीजन खरीदने के लिए पैसा नहीं होगा, वे बैमौत मरने लगेंगे। ऐसा क्रूर वक्त आये, इसके पहले ही हमें जाग्रत होना है। सरकार का यह सामाजिक दायित्व है कि वह वायु प्रदूषण के विरूद्ध जन-जागृति पैदा करे तथा वायु प्रदूषण फैलाने वालों के विरूद्ध कठोर कानूनी कार्यवाही करे।

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Pankaja Singh

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