अर्थशास्त्र

तुलनात्मक लागत का सिद्धान्त | तुलनात्मक लागत सिद्धान्त की मान्यताएँ | तुलनात्मक लागत सिद्धान्त की आलोचना | तुलनात्मक लागत में वर्तमान सुधार | अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का तुलनात्मक लागत | रिकार्डो के तुलनात्मक लागत सिद्धान्त की मान्यता

तुलनात्मक लागत का सिद्धान्त | तुलनात्मक लागत सिद्धान्त की मान्यताएँ | तुलनात्मक लागत सिद्धान्त की आलोचना | तुलनात्मक लागत में वर्तमान सुधार | अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का तुलनात्मक लागत | रिकार्डो के तुलनात्मक लागत सिद्धान्त की मान्यता

तुलनात्मक लागत का सिद्धान्त

(The Theory of Comparative Cost)

इस सिद्धान्त के जन्मदाता राबर्ट टोरेन्स है तथा इसकी आधुनिक व्याख्या एवं रूप प्रदान करने का श्रेय डेविड रिकार्डो को दिया जाता है। अपने आन्तरिक मूल्यों के श्रम सिद्धान्त में इन्होंने इस सिद्धान्त की व्याख्या की है। आगे चलकर जे०एस०मिल०, केयरनेस (Cairness), बेस्टेबल (Bastable) आदि अर्थशास्त्रियों ने इस सिद्धान्त का विकास एवं निरूपण किया। इस सिद्धान्त की सबसे नवीनतम एवं आधुनिक विस्तृत व्याख्या अमरीकी अर्थशास्त्री प्रो० टौसिंग (Taussing) तथा जर्मन अर्थशास्त्री प्रो० हैबरलर (Haberler) ने की है। इस सिद्धान्त को प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों का सिद्धान्त भी कहा जाता है।

अतः प्रो० वाइनर (Viner) ने स्पष्ट ही कहा है कि ‘प्रत्येक देश उन्हीं वस्तुओं का उत्पादन करेगा जिसमें उसे अधिकतम श्रेष्ठता एवं न्यूनतम निकृष्टता प्राप्त है।’

तुलनात्मक लागत सिद्धान्त का सबसे पहले रिकार्डो ने प्रतिपादन किया था। रिकार्डो (Ricardo) के इस सिद्धान्त के अनुसार यदि विभिन्न देशों में व्यापार स्वतंत्र है तो प्रत्येक देश उन वस्तुओं के उत्पादन का विशेष प्रयत्न करेगा जिनके उत्पादन के हेतु श्रम को लागत तथा प्राकृतिक साधनों की दृष्टि से वह अधिक लाभदायक स्थिति में हों तथा उन वस्तुओं का आयात करेगा जिसके उत्पादन के हेतु वह इस दृष्टि से सलाभपूर्ण स्थिति में हो। दो अथवा दो से अधिक देशों में कौन देश किन वस्तुओं के उत्पादन में श्रेष्ठता रखता है और किस सीमा तक; इसका वस्तु की लागत के तुलनात्मक अन्तर से निर्धारित होता है।

लागतों के तुलनात्मक अन्तर की स्थिति वह है जिसमें एक देश या दो से अधिक वस्तुएं दूसरे देशों की अपेक्षा कम लागत व्यय पर उत्पन्न करता है, परन्तु फिर भी वह केवल एक ही वस्तु का उत्पादन करता है और दूसरी वस्तु का दूसरे देश से आयात करता है। क्योंकि तुलनात्मक सिद्धान्त (Comparative theroy) से ऐसा करने में ही उसे लाभ होता है। यह विश्वास करने योग्य बात नहीं है कि कैसे एक देश जो दोनों वस्तुएँ दूसरे देश की अपेक्षा सस्ती बनती है। उन दोनों वस्तुओं को न बनाकर एक ही को उत्पन्न करेगा और दूसरे देशों से मँगवायेगा। परन्तु सत्य सही है। इस स्थिति को एक उदाहरण के द्वारा स्पष्ट किया जा रहा है। मान लिया कि अमेरिका में 20 दिन की मेहनत की लागत 40 इकाई कपड़ा और 40 इकाई की ताँबा उत्पादित होता है तथा इंग्लैंड में 20 दिन की मेहनत से 30 इकाई कपड़ा और 20 इकाई ताँबा उत्पादित होता है तो इस स्थित में इंग्लैंड की अपेक्षा अमेरिका में दोनों ही वस्तुओं का उत्पादन अधिक सस्ता है परन्तु अमेरिका को कपड़े की अपेक्षा ताँबे के उत्पादन से अधिक लाभ है। अमेरिका में 40 इकाई कपड़े के बदले 0 इकाई ताँबा उत्पन्न होता है अर्थात् 20 इकाई ताँबे के बदले 30 इकाई कपड़ा उत्पन्न होगा। इस प्रकार अमेरिका ताँबे का अधिक उत्पादन करके उसे इंग्लैंड भेजेगा तथा वहाँ से कपड़ा मँगवाना अधिक अच्छा होगा। यह विनिमय दर (Exchange rate) 20 इकाई ताँबा और 30 इकाई कपड़ा या इनके बीच में अन्य किसी अनुपात पर स्थित होगी। यह अनुपात दोनों देशों की मांग के लोच तथा तीव्रता पर निर्भर करेगा। यदि यह मान लिया जाए कि 20 इकाई ताँबे के बदले 26 इकाई कपड़े का व्यापार हुआ तो भी इससे दोनों देश लाभान्वित होंगे क्योंकि इंग्लैंड में 26 इकाई कपड़ा 8 2/3 दिन में श्रम की लागत पर तैयार हो जायेगा और प्राप्त होने वाला ताँबा 10 दिन के श्रम (Labour) के लागत पर तैयार होगा। इस प्रकार अमेरिका को 40 इकाई ताँबे के बदले में 52 इकाई कपड़ा मिलता है जो 13 दिन की श्रम लागत में तैयार होता है। अत्यन्त संक्षेप में हम कह सकते हैं कि जब किसी देश मैं दो या दो से अधिक वस्तुओं का उत्पादन दूसरे देशों की अपेक्षा सस्ता है परन्तु लागत का अनुपात भिन्न है तो अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार द्वारा उसी वस्तु को उत्पादित करके भेजने में अधिक लाभ होगा, जिसके उत्पादन में अधिक तुलात्मक लाभ (Compartive advantage) है।

रिकार्डो (Ricardo) ने इस सिद्धान्त को अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार पर भी लागू करते हुए बताया कि लागतों में तुलनात्मक अन्तर होने के फलस्वरूप ही अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का श्री गणेश होता है। उसने यह स्पष्ट किया कि आन्तरिक व्यापार तो श्रम की निरपेक्ष लागत (Adsolute cost) के आधार पर होता है परन्तु अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार (International Trade) की स्थिति आन्तरिक व्यापार (Internal Trade) से भिन्न होती है क्योंकि उससे श्रम एवं पूंजी (Labour and capital) गतिशील नहीं होती। हकीम अंतरराष्ट्रीय व्यापार केवल निरपेक्ष लागत (Absolue cost) के आधार पर नहीं होता वरन् तुलनात्मक लागत (Comparative cost) आधार पर होता है।

रिकार्डो (Ricardo) ने एक उदाहरण द्वारा तुलनात्मक लागत के सिद्धान्त को स्पष्ट किया है। उसने लिखा है कि-

“मान लिया जाय कि दो व्यक्ति हैं और वे दोनों ही जूते तथा हैट बना सकते हैं तथा एक व्यक्ति दोनों ही कार्यों में दूसरे से अपेक्षाकृत अधिक श्रेष्ठ है परन्तु हैट बनाने में वह अपने प्रतियोगी से 20% और जूते बनाने में 331/3% अधिक कुशल है। क्या यह दोनों व्यक्तियों के हित में नहीं होगा कि जो व्यक्ति अधिक कुशल है वह स्वयं जूते का उत्पादन करे और दूसरा व्यक्ति हैट का उत्पादन करे।”

रिकार्डो के इसी विचार को प्रो० वाइनर ने इन शब्दों में व्यक्त किया है।

“प्रत्येक देश उन वस्तुओं को उत्पादन करेगा जिनके उत्पादन में उनकी श्रेष्ठता सर्वाधिक है।

प्रो०मार्शल (Ptof. Marshall) ने लिखा है- “यदि ऐसी वस्तुओं का विदेश से निर्बाध आयात किया जाता है जो कि अपने देश में ही उत्पन्न की जा सकती थी तो इससे स्पष्ट होता है कि इन वस्तुओं या देश में अधिक लागत खर्च होती और उसकी अपेक्षा इन वस्तुओं का विदेशों से अन्य वस्तुओं के बदले में मँगवाने से कम लागत खर्च होती है।”

तुलनात्मक लागत सिद्धान्त की मान्यताएँ

(Assumptions of Theory of Comparative Cost).

रिकार्डो (Ricardo) और मिल (Mill) आदि विद्वानों द्वारा प्रतिपादित तुलनात्मक लागत (Comparative cost) का सिद्धान्त निम्नलिखित मान्यताओं पर आधारित है-

(1) इस सिद्धान्त में यह माना गया कि सभी प्रकार के श्रम में समरूपता पाई जाती है।

(2) एक देश के भीतर तो साधन गतिशील होते हैं लेकिन दो देशों के बीच पूर्णत: अगतिशील होते हैं।

(3) यह सिद्धान्त मूल्य निर्धारण के श्रम सिद्धान्त पर आधारित है।

(4) यातायात व्यय पर कोई विचार नहीं किया गया है।

(5) यह सिद्धान्त उत्पादन के स्थिरता नियम (Law of Constant Return) पर आधारित है।

(6) इस सिद्धान्त की व्याख्या में केवल दो देशों एवं दो वनों को ही लिया गया है।

(7) वस्तु की माँग यथास्थिर रहती है।

(8) दोनों देशों में स्वर्णमान प्रचलित है तथा मुद्रा के परिणाम सिद्धान्त को सत्य स्वीकार किया गया है।

(9) अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार पर किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नही लगा हुआ है।

(10) दोनों देश स्थायी साम्य की ओर बढ़ रहे हैं। व्यापार चक्रों का भी हस्तक्षेप स्वीकार न करके दीर्घकालीन समायोजन को ध्यान में रखा गया है।

(11) समान आर्थिक स्थिति वाले दो देशों के बीच समान आर्थिक मूल्य वाली वस्तुओं का व्यापार हो रहा है।

उपरोक्त मान्यताओं के आधार यह सिद्धान्त बताता है कि दो देशों के बीच वस्तुओं का व्यापार लागत अन्तरों के कारण होता है। ये लागत अन्तर तीन प्रकार के होते हैं।

  1. लागतों में निरपेक्ष अन्तर (Absolute Difference in Costs)- कभी-कभी किसी देश को प्रकृतिक एकाधिकार प्राप्त होने के कारण विशेष वस्तुओं के उत्पादन में विशेष लाभ होता है अर्थात् उस वस्तु की उत्पादन लागत प्राकृतिक एकाधिकार के कारण कम हो जाती है। इसे निम्नलिखित उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है।

प्रति इकाई उत्पादन लागत (श्रम इकाइयों में)

देश कपास जूट
भारत 2 1
अमेरिका 1 2

इस उदाहरण के अनुसार भारत में अतिरिक्त की अपेक्षा कपास की उत्पादन दर लागत अधिक है और अमेरिका में भारत की अपेक्षा जूट की उत्पादन लागत अधिक है और अमेरिका में भारत की अपेक्षा जूट की उत्पादन लागत अधिक है। ऐसी स्थिति में यदि अमेरिका केवल कपास का ही उत्पादन करे और भारत केवल जूट का ही उत्पादन करे और दोनों अपने अतिरिक्त उत्पादन को एक दूसरे को बेच दें तो दोनों देशों को लाभ होगा।

  1. लागतों में सापेक्ष या तुलनात्मक अन्तर (Comparative Difference in Costs)- लागतों में सापेक्षिक अथवा तुलनात्मक अन्तर उस समय होता है जब एक देश में दोनों ही वस्तुओं की उत्पादन लागत कम होती है किन्तु दोनों में से वह किसी एक को दूसरे की अपेक्षा अधिक सस्ती उत्पन्न कर सकता है। उसी प्रकार दूसरा देश दोनों वस्तुओं को अधिक लागत पर उत्पन्न करता है किन्तु दोनों में से एक के उत्पादन में उसे अपेक्षाकृत कम हानि रहती है। ऐसी दशा में अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार द्वारा दोनों ही देशों को लाभ प्राप्त होता है। इसको निम्न उदाहरण द्वारा समझाया जा सकता है।

प्रति इकाई उत्पादन लागत (श्रम इकाइयों में)

देश जूट कपास
भारत 80 90
बंगलादेश 120 100

उपरोक्त उदाहरण में भारत दोनों ही वस्तुओं के उत्पादन में अधिक कुशल है परन्तु उत्पादन की यह कुशलता कपास की अपेक्षा जूट में अधिक है। जूट के उत्पादन में भारत को तुलनात्मक लाभ होता है क्योंकि उसका लागत (120-80=40) है जो कपास में उसका लागत अन्तर (100-90=10) की अपेक्षा अधिक है। ऐसी स्थिति में भारत को अपने उत्पादन के सभी साधनों को जूट के उत्पादन में और बंगलादेश को अपने उत्पादन के सभी साधनों को कपास के उत्पादन में लगाना ही लाभदायक होगा अधिकांश अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का आधार उत्पादन लागत में तुलनात्मक अन्तर ही होता है। रिकार्डो द्वारा दी गई अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार सम्बन्धी व्याख्या तुलनात्मक अन्तरों पर आधारित है।

  1. लागतों में समान अन्तर (Equal Differences is Costs)- यदि एक देश में उत्पादन लागत अन्य देशों की अपेक्षा कम होती है परन्तु लागत में अन्तर का अनुपात एक समान होता है तो इसे उत्पादन लागत में समान अन्तर कहते हैं। ऐसी दशा में अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार नहीं होता है क्योंकि इस अवस्था में किसी भी देश को विशिष्टीकरण का लाभ नहीं मिलता। इसको निम्न उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है-

प्रति इकाई उत्पादन लागत (श्रम इकाइयों में)

देश जूट कपास
भारत 50 100
पाकिस्तान 100 200

उपरोक्त उदाहरण में पाकिस्तान में जूट तथा कपास दोनों वस्तुओं की उत्पादन लागत भारत में उन वस्तुओं की उत्पादन लागत से कम है। परन्तु दोनों देशों में लागत अन्तर का अनुपात एक समान है। अत: अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार नहीं होगा।

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि लागतों में अन्तर होने के कारण ही अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार सम्भव होता है।

तुलनात्मक लागत सिद्धान्त की आलोचना

(Criticism of the Comparative Cost Theory)

इस सिद्धान्त की निम्नलिखित आलोचनाएँ की गई हैं।

  1. श्रम लागतों की मान्यता (Assumption of Labour cost)- यह सिद्धान्त मूल्य के श्रम लागत सिद्धान्त पर आधारित है। लेकिन आधुनिक अर्थशास्त्री इससे सहमत नहीं हैं। इनका विचार है कि श्रम में समरूपता नहीं पायी है। इसके अतिरिक्त किसी वस्तु के उत्पादन में श्रम के अलावा पूँजी, भूमि तथा साहस की भी आवश्यकता होती है।
  2. उत्पत्ति के साधनों की गतिशीलता के बारे में भ्रामक मान्यता (Illusionary Assumptions of mobility of Factors of Production)- यह सिद्धान्त इस मान्यता पर आधारित है कि श्रम एवं पूँजी एक देश के अन्तर गतिशील होते हैं। लेकिन दो देशों के बीच पूर्णतया अगतिशील होते हैं परन्तु यह आवश्यक नहीं है बल्कि यह भी हो सकता है कि श्रम एवं पूँजी के साधन एक ही देश में अगतिशील हों तथा विदेशों में उन्हें गतिशील बनाया जा सकता है। केयरनीज के अनुसार “जब हम रिकार्डो और मिल की इन मान्यता को तुलनात्मक लागत सिद्धान्त से हटा भी दें तब भी इस सिद्धान्त में कोई दोष उत्पन्न नहीं होगा।”
  3. अव्यवहारिक सिद्धान्त (Unrealistic Theory)-ओहलिन के अनुसार यह सिद्धान्त अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की विवेचना करने त्रुटिपूर्ण एवं अवास्तविक है यह सीधे तौर पर विभिन्न देशों में लागतों के अन्तर पर विचार नहीं करता।
  4. यातायात व्यय (Transportarion cost)- यह सिद्धान्त यातायात व्यय पर विचार नहीं करता है लेकिन व्यावहारिक रूप में जिन वस्तुओं का यातायात व्यय अधिक होता है उनकी उत्पादन लागत कम होने पर अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार सीमित होता है जैसे कोयला तथा लकड़ी।
  5. उत्पत्ति के नियमों की उपेक्षा’ (Neglect of Laws of Returns)- यह सिद्धान्त इस अवास्ताविक मान्यता पर आधारित है कि उत्पादन में केवल उत्पत्ति समता नियम लाभ होता है जबकि जीवन में उत्पादन उत्पत्ति ह्रास नियम व उत्पत्ति वृद्धि नियम के अन्तर्गत भी हो सकता है।
  6. व्यापार प्रतिबन्ध (Trade Restrictions)- यह सिद्धान्त स्वतन्त्र व्यापार का मान्यता पर आधारित है जबकि आज कल लगभग प्रत्येक देश कुछ न कुछ व्यापारिक प्रतिबन्ध लगाये हुए हैं।
  7. अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की यन्त्र संरचना (International trade mechar nism)- यह सिद्धान्त अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार से प्राप्त लाभों का मूल्यांकन करता है परन्तु यह सिद्धान्त अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की यन्त्र रचना के विषय में प्रकाश नहीं डालता है।
  8. अर्द्ध विकसित देशों के लिए अनुपयुक्त (Unrealistic for under developed countries)- अर्द्ध विकसित देशों को कृषि उत्पादन में तुलनात्मक लाभ प्राप्त होता है। परन्तु कृषि उत्पादन में क्रमश: बढ़ती हुई लागत पर प्राप्त की जा सकती है, इसलिए ऐसे देशों के लिए इस सिद्धान्त के अनुसार विशिष्टीकरण करना लाभदायक नहीं हो सकता।
  9. सिद्धान्त की अयथार्थता (Unrealistic Nature of the theory)- कभी- कभी कुछ विशेष परिस्थितियों में देश का वास्तविक उत्पादन तुलनात्मक लागत सिद्धान्त से मेल नहीं खाता। अर्थात् देश उन वस्तुओं का भी उत्पादन करने लगता है जिनमें उसे तुलनात्मक लाभ प्राप्त नहीं होता है।
  10. माँग की लोच का प्रभाव (Influence of Elasticity of demand)- यह सिद्धान्त माँगो स्थिर मानना है परन्तु आलोचकों का कहना है कि जिस देश में विदेशी माँग की लोच अधिक होती है, व्यापार की शर्ते उसके अनुकूल होती हैं तथा कम अधिक होता है। इसके विपरीत दशा में अपेक्षाकृत कम लाभ प्राप्त होता है। लेकिन यह सिद्धान्त माँग के इस प्रभाव की उपेक्षा करता है।
  11. पूर्ण विशेषज्ञता सम्भव नहीं (Complete specialisation is impo- ssible)- विश्व में पूर्ण रूपेण प्रादेशिक विशिष्टीकरण अथवा श्रम विभाजन सम्भव नहीं होता क्योंकि एक छोटा सा देश विशिष्टीकरण के द्वारा अपनी आवश्यकतायें पूरी कर सकता है परन्तु एक बड़ा देश नहीं।

संक्षेप में यह सिद्धान्त भद्दा एवं अयथार्थ है। इसके निष्कर्ष गलत ही नहीं बल्कि र खतरनाक भी है। यही कारण है कि प्रो० बैरेट ह्वेल (Barredt whale) ने कहा है कि “हमें तो स्वीडन के सुविख्यात अर्थशास्त्री, वर्टिल ओहलिन का अनुसरण करते हुए अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के सिद्धान्त को मूल्य की आधुनिक धारणाओं पर ही निर्मित करना चाहिए।”

तुलनात्मक लागत में वर्तमान सुधार

(Recent Improvement in classical Comparative Cost Theory)

प्रतिष्ठित तुलनात्मक लागत सिद्धान्त में निम्नलिखित सुधार किये गये हैं-

  1. अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में दो या दो से अधिक वस्तुयें तथा दो से अधिक को सम्मिलित किये गये हैं।
  2. अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार पर तुलनात्मक माँग की लोच का भी प्रभाव पड़ता है।
  3. आधुनिक सिद्धान्त में लागत की तुलना श्रम के आधार पर न करके मौद्रिक लागत के आधार पर की जाती है।
  4. वस्तु का उत्पादन स्थिर प्राप्ति नियम पर न होकर वृद्धि नियम तथा उत्पत्ति ह्रास नियम पर भी होता है।
  5. अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में यातायात लागत को भी विचार में रखा गया है।
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Pankaja Singh

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