राजनीति विज्ञान

मैकियावेली एक मूल्यांकन | मैकियावेली के चिन्तन के दोष | मैकियावेली के राजनीतिक योगदान | पहला आधुनिक राजनीतिक विचारक मैकियावेली

मैकियावेली एक मूल्यांकन | मैकियावेली के चिन्तन के दोष | मैकियावेली के राजनीतिक योगदान | पहला आधुनिक राजनीतिक विचारक मैकियावेली

मैकियावेली एक मूल्यांकन

सेबाइन के शब्दों में जो राजनीतिक चिन्तन के इतिहास के कुशलतम भाष्यकारों में से एक हैं, “उन्हें एक पक्के दोषदर्शी एक उत्तेजित (Impassioned) देश-भक्त, एक उत्साही राष्ट्रवादी (Nationalist), एक राजनीतिक भविष्यवक्ता, एक निश्चयी लोकतन्त्रवादी तथा निरंकुश राजाओं के अनुग्रह (Favour) के लिए लालयित रहने वाले चरित्रहीन चाटुकार के रूप में चित्रित किया गया है। इन सभी दृष्टिकोणों में, यद्यपि वे एक दूसरे से परस्पर विरोधी हैं, कुछ न कुछ सच्चाई का तत्त्व है। जो सुस्पष्टतः असत्य है वह यह है कि उनमें से एक में मैकियावेली या उनके चिन्तन का सम्पूर्ण चित्र देखा जा सकता है।” आद्योपान्त इन सभी युगों में मैकियावेली एक पहेली ही रहे हैं। इस विषय में कोई सन्देह नहीं है कि उनके राजनीतिक चिन्तन में गम्भीर कमियां हैं। लेकिन उनके साथ न्यायोचित बर्ताव करने के लिए हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उन्होंने अपने ग्रन्थों को राजनीतिक दर्शन पर निबन्धों के रूप में नहीं लिखा था। उन्होंने उन ग्रन्थों को राजनीतिक पुस्तिकाओं के ही रूप में लिखा था। उनके लेखों में से राजनीतिक विचार परवर्ती शताब्दियों के लेखकों ने खोज निकाला था। तब भी यह अनुभव किया गया कि उन्होंने राजनीतिक चिन्तन के विकास में भी बहुत बड़ा योगदान दिया था। अपने कई विचारों में वे ‘प्रथम’ थे। आगामी पृष्ठों में हम देखेंगे कि राजनीतिक चिन्तन के लिए उनका योगदान उनकी कमियों से बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण है।

मैकियावेली के चिन्तन के दोष-

(1) फोस्टर (Foster) ने उनमें यह असंगति देखी है कि जब वे गणतन्त्रवाद से राजतन्त्रवाद की ओर गुजरते हैं तो ‘सद्गुण’ सम्बन्धी उनकी धारणा से सम्पूर्ण (Complete) कायापलट हो जाता है। जैसे हम जानते हैं ‘डिस्कोर्सेस’ में वे मुख्य रूप से गणतन्त्रों पर विचार करते हैं जब कि ‘प्रिंस’ में वे राजतन्त्रवाद की मुख्य रूप से चर्चा करते हैं। पहले में ‘सद्गुण’ का अर्थ वे व्यक्तियों में शासकीय (Public) कर्तव्यों के पालन करते समय ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, नागरिक सद्गुण, विधिपालन, वफादारी तथा विश्वसनीयता के गुणों से लेते हैं। ये गुण व्यक्तियों में सार्वजनिक कर्त्तव्यों के पालन करने के समय अवश्य होने चाहिए। लेकिन जब वे इस बात की चर्चा करते हैं कि राजा अपने आप को कैसे सत्तारूढ़ रख सकता है तो ‘सद्गुण’ का अर्थ बिल्कुल बदल जाता है। यहाँ सद्गुण का अर्थ केवल बुद्धि एवं बल के मिश्रण से है। बर्कखार्ट छल-कपट, मिथ्यावादिता, धूजी, धोखा आदि सद्गुण के अंशभूत तत्त्व बन जाते हैं।

(2) वे एक पारंगत (Profound) दार्शनिक नहीं थे। सेबाइन कहते हैं, “वे शायद इतने व्यावहारिक थे कि वे पारंगत दार्शनिकों हो ही नहीं सकते थे।” स्वभावतः वे राजनीतिक दार्शनिक नहीं थे। उनकी मुख्य दिलचस्पी राजनीति शास्त्र की मीमांसात्मक समस्याओं के बजाय उसके व्यावहारिक प्रश्नों में थी। उनकी मुख्य दिलचस्पी (Concern) इस विषय में थी कि कोई शासक अपने आपको सत्तारूढ़ कैसे रख सकता है। “वे व्यावहारिक राजनीति, शासन-कला तथा युद्ध की कला के सिवाय और किसी विषय पर न विचार करते हैं और न ही लिखते हैं। गहन सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक प्रश्नों में वे उतनी ही दिलचस्पी लेते थे जितनी से वे व्यावहारिक राजनीति को प्रभावित कर सकते थे।” (सेंबाइन) जहाँ तक राजनीतिक सिद्धान्तों का प्रश्न है उनके विचार अधिकतर छिछले हैं। जो दर्शन राजनीति में सफलता अथवा पराजय के लिए राजनेता के चातुर्य या अकुशलता को उत्तरदायी ठहराता है वह छिछला ही होगा। उनकी रचनायें कूटनीतिक साहित्य के नमूने (Type) की हैं। उनके पास कोई तार्किक या दार्शनिक संरचना (Structure) नहीं थी जैसी कि प्लेटो या हॉब्स के पास थी।

(3) उनका दर्शन संकीर्णतया स्थानिक और कालांकित था। ऐलेन भी उनसे सहमत हुए हैं। उनका कथन है कि सोलहवीं शताब्दी की मुख्य राजनीतिक विचारधाराएँ तथा विवाद के विषय मैकियावेली के चिन्तन की पहुँच पर थे। उस शताब्दी की सर्वोपरि दो समस्याओं में ही उनकी दिलचस्पी थी; (क) राज्य और गिरजाघर अथवा धर्म के पारस्परिक सम्बन्ध का प्रश्न । (ख) शासक एवं शासितों के सम्बन्ध का प्रश्न जिसमें यह प्रश्न भी सम्मिलित था कि नियुक्त सत्ता का कभी भी विरोध किया जाना न्यायसंगत है अथवा नहीं। पहले प्रश्न का मैकियावेली का उत्तर अत्यन्त निराशाजनक तथा अपर्याप्त था। उन्होंने धर्म का अनुदार निरूपण (Treatment) किया है। मैकियावेली के मतानुसार शासक द्वारा गिरजाघर का उपयोग प्रचार के उपकरण मात्र के रूप में किया जाना चाहिए जिससे राज्य विरोधी विस्फोटों को रोका जा सके। वे इस तथ्य से पूर्णतया अनभिज्ञ रहे कि विगत शताब्दियों में धर्म ने कितनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी तथा वे यह पूर्वविचार भी नहीं कर सके कि धर्म सुधार आन्दोलन के समय धर्म को कितनी और अधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका सम्पन्न करनी थी। सेबाइन के शब्दों में, “यह सर्वथा सत्य है कि सब घटनाओं के बारे में सोलहवीं शताब्दी के आरम्भ में यूरोपीय राजनैतिक चिन्तन की अवस्था का मैकियावेली ने मिथ्या-निरूपण किया था।”

(4) “लक्ष्य साधन का औचित्य सिद्ध करता है।” यह एक सही सिद्धान्त नहीं है। कोई भी राजनीतिक अपराध उससे भी बड़े अपराध और प्रत्याक्रमण की ओर ले जायेगा और अन्ततोगत्वा अनर्थ का कारण बन जाएगा। एक राजनीतिक भाष्यकार ने ठीक ही कहा है कि “जो नैतिक दृष्टि से गलत है वह राजनीतिक दृष्टि से कभी सही नहीं हो सकता।” उनका सिद्धान्त वास्तव में एक अनैतिक तथा झूठा सिद्धान्त है। उनका सिद्धान्त ही राजसी अपराधियों के एक वर्ग के उदय का कारण बना था।

(5) मानव प्रकृति अन्ततः इतनी बुरी नहीं है जितनी कि मैकियावेली हमें बताते हैं। कुछ लोग नितान्त धूर्त और दुष्ट हो सकते हैं। कुछ बुरे व्यक्तियों के उदाहरण से इस निष्कर्ष पर पहुँचने का कोई औचित्य नहीं हो सकता कि सभी मानव प्राणी बुरे हैं। मैकियावेली ने वास्तव में उस जमाने के अपभ्रष्ट इटालीय समाज के उदाहरण से यह सामान्य निष्कर्ष निकाला था कि सारी मानव जाति बुरी है। यह सामान्यीकरण अनुचित है।

(6) मैकियावेली कोई व्यवस्था बद्ध या तर्क संगत विचारक नहीं थे। वे एक व्यवस्थित चिन्तक बिल्कुल नहीं थे। हम केवल एक ही उदाहरण देते हैं। उन्होंने कहा था कि मानव प्रकृति बुरी है। परन्तु यह स्पष्ट करने की उन्होंने कभी चेष्टा नहीं की थी कि वह क्यों बुरी है। उन्होंने कभी उसका कोई कारण भी नहीं बताया। यों ही कोई बात कह देने से कोई तथ्य प्रमाणित नहीं हो जाता। मैकियावेली के इस मत का कोई पक्का आधार ही नहीं है।

(7) जनता के नैतिक, धार्मिक तथा आर्थिक उपादानों के निर्माण में शासक अथवा विधायक की भूमिका का उन्होंने अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन किया है। उनका वर्णन ऐसा किया गया है कि वे उपादान राज्य के लिए निरन्तर लाभकारी होते हैं। परन्तु साधारणतः ये उपादान ही शासक के चरित्र को गढ़ते हैं, शासक उनको नहीं गढते। यहां इस गलती करने के दोषी हैं कि उन्होंने ‘मूल्यों के सन्तुलित क्रम’ तथा “कारण कार्य सम्बन्धी प्रभावोत्पादकता के साधारण क्रम” को उल्टा कर दिया।

(8) मैकियावेली का यह विचार कि बल ही समाज को एकत्र कर दृढ़ रख सकता है, पूर्णतः गलत था। समाज के सदस्यों के संसक्तिशील तथा असंजक सीमेण्ट कभी बल नहीं हो सकता। सामाजिक सहजवृत्ति ही जो सभी मानव प्राणियों में प्रकृति द्वारा रोपी गई है, समाज को संगठित रखती है। मैकियावेली के अनुसार मानव प्राणी जो स्वार्थी, महत्त्वाकांक्षी तथा झगड़ालू होते हैं, सबसे बढ़कर एक वस्तु चाहते अर्थात् सुरक्षा और सुरक्षा की यह आवश्यकता ही राज्य को अस्तित्व और प्रचलन में ला देती है। राज्य अपनी सारी अवपीडक शक्ति के साथ समाज-विरोधी सहज वृत्तियों का निग्रह करता है जिससे समाज में एकता कायम रहती है। लेकिन जैसे एक भाष्यकार ने संकेत किया है, यद्यपि सुरक्षा की जरूरत के कारण ही राज्य का आविर्भाव हुआ था तो भी वह (सुरक्षा) उसकी अवस्थिति का पर्याप्त कारण नहीं बन सकती।

(9) मैकियावेली के इस सिद्धान्त की भी आलोचना की जा सकती है कि राजा तथा प्रजा दोनों के हित अभिन्न हैं। मैकियावेली राजा को सभी प्रकार के अन्याय पूर्ण उपाय प्रयोग करने का अधिकार देते हैं-हत्याकाण्ड, लूटमार, आदि केवल राज्य के हितं बढ़ाने के लिए। और उन्होंने राजा को जोरदार शब्दों में यह निर्देश दिया है कि वह अपने (राज्य के हितों को प्रजा के हितों से अभिन्न मानें।

(10) मैकियावेली के राजतन्त्रवादी सरकार की प्रशंसा और दूसरी ओर गणतन्त्रवादी सरकार के गुण-गान किए जाने में एक प्रत्यक्ष अन्तर्विरोध है। जैसे सेबाइन उल्लेख करते हैं उनकी दो प्रशंसाओं से प्रभावित है। एक साधन-सम्पन्न निरंकुश शासक की और दूसरी स्वयं शासित जनता की । ये दोनों प्रशंमाएँ परस्पर सुसंगत नहीं हैं।

मैकियावेली के योगदान (राजनीतिकाचन)

प्रमुख योगदान निम्नलिखित हैं-

(1) राजनीतिक चिन्तन के इतिहास में मैकियावेली ही प्रथम विचारक थे जिन्होंने क्षेत्रीय, राष्ट्रीय तथा प्रभुसत्ता सम्पन्न राज्य की कल्पना की थी। वे सापेक्षतः स्वायत्ताधिकार प्राप्त सत्ताओं से बने हुए जटिल श्रेणी बद्ध संगठन की सामन्ती अवधारणा पूर्ण रूप से अस्वीकार करते हैं उसके स्थान पर वे एक सर्वशक्ति सम्पन्न केन्द्रीय सत्ता को स्थानापन्न कर देते हैं जो समाज में सभी संस्थाओं से उच्च है। मैकियावेली के राजनीतिक चिन्तन में इस प्रसंग की उपस्थिति से वे राजनीतिक चिन्तन के इतिहास में अमर बन गए हैं क्योंकि यही विचार प्राचीन सिद्धान्त को आधुनिक सिद्धान्त से अलग करता है। सेबाइन के शब्दों में, “वर्तमान राजनीतिक प्रचलन में राज्य को जो अर्थ दिया जा रहा है उसे अन्य किसी भी विचारक की अपेक्षा मैकियावेली ने ही प्रदान किया था। एक प्रभुसत्ता सम्पन्न राजनीतिक निकाय के अर्थ में ‘राज्य’ शब्द को भी मैकियावेली ने मुख्यत: अपने लेखों तथा रचनाओं द्वारा आधुनिक भाषाओं में प्रचलित किया था। उन्होंने प्रथम बार आधुनिक अर्थ में ‘राज्य’ शब्द का प्रयोग किया था जिससे उस राजनीतिक सत्ता का बोध होता था जो एक निश्चित राज्य क्षेत्र तथा जातीय संयोग के और आन्तरिक और विदेशी मामलों में पदाधिकार-सम्पन्न भी थी।

(2) मैकियावेली ने राजनीति को नीति शास्त्र के चंगुल से मुक्त किया था। उनसे पहले राजनीति को नीति-विज्ञान की दासी समझा जाता था। उन्होंने प्रथम बार दो सुस्पष्ट भिन्न-भिन्न मान-दण्ड को निर्धारित किया था-एक राज्य के लिए और दूसरा व्यक्ति के लिए। यद्यपि सभी राज्य मैकियावेली के विवरण के अनुसार ही बर्ताव कर रहे हैं तो भी बहुत कम लेखकों को ही राज्यों के सदाचार निरपेक्ष आचरण का खुले आम समर्थन करने का साहस हुआ है। मैकियावेली ने राजनीति-शास्त्र तथा नीति-विज्ञान को एक दूसरे से पृथक् करके उनकी महान् सेवा की है। उनकी मुख्य सेवा यह भी थी कि उन्होंने शासन-कला के मार्गदर्शक सिद्धान्त के रूप में कार्य साधकता के नियम का प्रस्ताव किया था। उन्होंने राजनीति को यथार्थवाद का पुट दिया।

(3) मैकियावेली प्रथम धर्म-निरपेक्ष विचारक हैं। मार्सिलियो जैसे उनके कुछ पूर्ववर्ती विचारकों ने भी धर्म निरपेक्षवाद का प्रस्ताव किया है, परन्तु उनका उपागम ढीला था। वे ही पहले विचारक थे जिन्होंने गिरजाघर की सत्ता की भर्त्सना की थी। वे इसके लिए भी श्रेयष्कर हैं कि उन्होंने उसी राज्य में रह कर गिरजाघर का खंडन किया था जो प्रबल कैथोलिक ईसाई- साम्राज्य का मुख्यालय था। उन्होंने गिरजाघर का वर्णन इटली पर रखा हुआ महा-भार उसके विच्छेद का मुख्य कारण एवं धर्म-निरपेक्ष राज्य के विकास में बाधा के रूप में किया था। उन्होंने जोर देकर सुझाया था कि किसी गिरजाघर या किसी भी धार्मिक संस्था को सरकार का केवल उपकरण बनाया जा सकता है और बनाया जाना चाहिए।

(4) राज्य की मौलिक उत्पत्ति के सिद्धान्त का प्रतिपादन कर मैकियावेली ने कार्ल मार्क्स जैसे विचारकों को प्रभावित किया था। उनके विचार में राज्य भौतिक-शक्तियों की अन्तक्रिया का परिणाम है अर्थात् व्यक्तियों के हितों के अन्तर्विरोध को न कि किसी अलौकिक तथा अभौतिक विधि का। निःसन्देह यह तो सत्य है कि मैकियावेली तथा मार्क्स के विचारों में मौलिक अन्तर है। मार्क्स ने मैकियावेली से जो कुछ सीखा था वह यही था कि “मनुष्य तथा ब्राह्मण केन्द्रित ईश्वर की बनाई हुई किसी योजना के अनुसार वस्तुओं का कोई दैवी क्रम नहीं है। इन सभी अन्तरों के होते हुए भी दोनों के दृष्टिकोण में एक मौलिक अभिन्नता है। मैकियावेली की यह अर्न्तदृष्टि कि राज्य को मनुष्य की लालसाओं तथा अभिलाषाओं के आधार पर ही समझा जा सकता है।

(5) मानव प्रकृति सम्बन्धी अपनी अवधारणा में उन्होंने हॉब्स को प्रभावित किया था। हाँब्स ने मैकियावेली से मानव प्रकृति की अन्तनिहित बुराई, दुष्टता, स्वार्थपरता, तथा धूर्त्ताता का दृष्टिकोण भारी मात्रा में ग्रहण किया था। हॉब्स मैकियावेली के इस मत को पूर्णतया स्वीकार कर लेते हैं।

(6) मैकियावेली ही शक्ति राजनीति के प्रथम तथा सबसे स्पष्ट प्रतिवादक थे। राज्य एक दूसरे के प्रति ठीक मैकियावेली के निधारित किये हुए नियमों के अनुसार ही आचरण करते हैं। यदि वे ऐसा आचरण न करें तो वे चिरकाल तक टिके नहीं रहेंगे। मैकियावेली का विवर्धन सिद्धान्त अत्यन्त व्यावहारिक है। आजकल की दैनंदिन अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में हम देखते हैं कि प्रत्येक राज्य अपने पड़ोसी राज्यों के हितों की आहुति देकर अपने बल की वृद्धि करना चाहता है और उन्हें अपने शासन में भी रखना चाहता। यदि कभी कोई आदर्शवादी राजनीतिक मैकियावेली के विचारों का महत्त्व पहचानने से इन्कार करे तो वह मानव जाति के लिए कल्पनातीत व्यथा पैदा कर देगा। प्रोजोन्स एक अत्यन्त उचित उदाहरण देते हैं यदि नैविल चैम्बरलेन ने मैकियावेली का अध्ययन किया होता तो हिटलर के बारे में बहुत कुछ मालूम कर लिया होता।

(7) प्रो० ऐलेन ने उल्लेख किया है, “मैकियावेली में सबसे नया तथा मौलिक विचार शायद उनका तरीका अथवा राजनीति की समस्याओं के प्रति उनका उपागम था। उनका तरीका सामान्य बोध तथा इतिहास द्वारा पथ-प्रदर्शित निरीक्षण का है

(8) राजनीतिक चिन्तन के इतिहास में मैकियावेली ही प्रथम परिणामवादी हैं। प्रो० मैक्सी कहते हैं, “सैद्धान्तिक तत्त्वों की अपेक्षा व्यावहारिक तत्त्वों के प्रति उनके अधिक अनुराग ने निःसन्देह राजनीतिक चिन्तन को मध्य युग के वितण्डावाद पुराण ग्रन्थ से उद्धार करने में एक बड़ी भूमिका अदा की थी। यह भूमिका उनको संसार के महान् परिणामवादियों में सबसे उत्कृष्ट तो नहीं, परन्तु उनमें सर्वप्रथम होने के सम्मान का अधिकारी बना देती है। इस विचार का समर्थन करते हुए प्रो० ऐलेन कहते हैं, “उनके कारण ही राजनीतिक-चिन्तन ने अधिकाधिक एक व्यावहारिक सामान्य बोध का तथा अवसरवादी-स्वरूप धारण कर लिया था तथा ऐसे लोकातीत और आध्यात्मिक प्रश्नों से मुंह मोड़ लिया था जिसका वह उत्तर नहीं दे सकता था।”

(9) मैकियावेली ही प्रथम राजनीतिक मनोवैज्ञानिक । शासक को उनका सुझाव है कि उसे सत्तारूढ़ रहने के लिए अपनी जनता की मनोवृत्ति का अध्ययन करना चाहिए। उसे लोगों की मनोदशा की जानकारी अवश्य रखनी चाहिए और फिर उस अपनी नीतियों को बनाना चाहिए। राजनीतिक योजनाओं को कार्यान्वित करने की अवस्था में भी राजा को जन सम्पत्ति का पता लगाना चाहिए। यह एक आधुनिकतम विचार है कि जिसकी कल्पना कठिनाई से ही कोई कर सकता है।

(10) वे एक सच्चे तथा उत्साही देश भक्त एवं आधुनिक राष्ट्रवाद के पूर्वजों में से एक थे-प्रिंस का अन्तिम अध्याय उनकी सच्ची इटालियाई राष्ट्रवादी मनोवृत्ति का सबसे बड़ा प्रमाण हैं। उन्होंने राजनीति में अन्यायपूर्ण उपायों का सुझाव दिया क्योंकि वे उत्सुकता से आशा करते थे कि उनका प्रयोग करने से एक शक्तिशाली राष्ट्रवादी राजा इटली में एकता लाकर उसे विदेशी प्रभुत्व से मुक्त कर सकता है। राजनीतिक मतों के बारे में उनकी दूरदर्शिता को उनक राष्ट्रीय देश भक्ति के मनोभाव तथा इटली के एकीकरण की उनकी तीव्र इच्छा और आन्तरिक अव्यवस्था तथा विदेशी आक्रमण से उनकी सुरक्षा की अभिलाषा ने कम कर दिया था। उधर वे इतने स्पष्टतावादी थे कि वे अकसर कहते थे कि “अपने राज्य के प्रति व्यक्ति के कर्तव्य सभी अन्य कर्तव्यों तथा नैतिक संकोच को अभिभूत कर देते हैं और इटली का एकीकरण भी किया गया था जो उनकी भविष्यवाणी थी, उनके जमाने में तो नहीं परन्तु उन्नीसवीं शताब्दी में। इससे सम्बन्धित दो महान् व्यक्ति थे कैवोर तथा एक राष्ट्रीय राजा एम्मानुएल ।

निष्कर्ष-

मैकियावेली ही आधुनिक काल में प्रथम राजनीतिक दार्शनिक थे। उनके बारे में ऐसा कहना कि उन्होंने मध्य युग का अन्त किया था और आधुनिक युग का आरम्भ किया था दोनों समान रूप से सही है।” (प्रो० डनिंग)। मैकियावेली अपने काल तथा पुनर्जागरण के श्रेष्ठ प्रतिनिधि हैं। उनकी शान्त, स्वार्थी, दूरदर्शिता, स्पष्टवादी और प्रत्यक्ष, प्रकृतिवाद, उनका तीव्र व्यक्तिवाद, परिणामवाद, शास्त्रीय, प्राचीनता के प्रति उनकी श्रद्धा ऐहिक दर्शन के मुकाबले में धर्म तथा अलौकिक आदेशों का निराकरण तथा उनकी सुखवादी नैतिकता में वे पुनर्जागरण के और यथेष्ठ मात्रा में आधुनिक मन के भी अभिलक्षक हैं।

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Pankaja Singh

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