राजनीति विज्ञान

प्राचीन भारतीय राजनीति में धर्म का संबंध | Relation of religion in ancient Indian politics in Hindi

प्राचीन भारतीय राजनीति में धर्म का संबंध | Relation of religion in ancient Indian politics in Hindi

प्राचीन भारतीय राजनीति में धर्म का संबंध

प्राचीन भारत में राज्य और शासन की अनेक संस्थाओं का विकास हुआ और साथ ही राज्य व शासन के विषय के प्राचीन आचार्यों ने अनेक मूल्यवान विचार दिए। उन सभी संस्थाओं और विचारों का आधार (धर्म) था। यह एक आकाश सत्य है कि प्राचीन भारत में धर्म व राजनीति एक दूसरे से किसी भी क्षेत्र में पृथक नाते। इस दृष्टि से प्राचीन भारतीय राजनीति आधुनिक राजनीति से पूर्णतया विनती। हमारे पूर्वजों ने धर्म को ही सर्वोपरितामाना और जीवन के प्रत्येक कार्य को धर्म से सुशोभित रखा। प्राचीन भारत में राजा धर्म से बंधा था तथा राजा का व्यक्तिगत जीवन और उसकी दैनिक दिनचर्या धर्म से विनियमित  परिजन तथा पुरजनयहां तक कि शत्रु के साथ उसका संबंध धर्म के आधार पर था। और युद्ध विषयक नीति भी धर्म निर्दिष्ट थी।केवल राजा ही नहीं प्रजा भी अपने व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन में सदा ही धर्म का पालन करती थी।

भीष्म ने धर्म की व्याख्या करते हुए कहा है कि धर्म शब्द ‘धृ’ धातु से बना है। जिसका अर्थ है धारण करना। अभ्युदय पीड़न और धारण अर्थात संरक्षण जिस उपाय से हो वही धर्म है। इसका स्पष्टीकरण करते हुए कृष्ण आयंगार ने लिखा है कि धर्म का तात्पर्य है-मर्यादा बनाए रखना, पोषण करना तथा सम पालन करना लेखक के अनुसार धर्म पांच प्रकार का है-

  • स्वधर्म
  • आश्रम धर्म
  • वर्णाश्रम धर्म
  • नैमित्तिक धर्म
  • गुणधर्म

जिसका प्रथम और अंतिम वेद और श्रुति है। हिंदुओं के लिए वेद ही संपूर्ण ज्ञान और स्रोत है। महाभारत में कहा गया है कि सीलिंग धर्म का कारण है,सील से ही तीनो लोक जाएगी किए जा सकते हैं इस लोक में शीलवान मनुष्यों के लिए कोई भी कार्य असाध्य नहीं।

भारतीय मानीबियों ने व्यक्ति और समाज दोनों की पूर्णता एवं अभ्युदय हेतु स्वधर्म-पालन अर्थात वर्णाश्रम धर्म पर विशेष बल दिया। महाभारत में भीष्म के स्वधर्म की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा है कि चारों वर्णों की धर्म संकट होने से प्रजा को बचाना राजा का धर्म है। दूसरे स्थान पर यह भी कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति धर्म मार्ग से विचलित हो तो उसे दंड देना भी राजा का कर्तव्य है। कौटिल्य ने भी कहा है- ‘स्वधर्म पालन से स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति होती है। स्वधर्म के उल्लंघन से सर्वथा अव्यवस्था उत्पन्न हो जाएगी। अतः राजा को चाहिए कि वह प्रजा को स्वधर्म का अतिक्रमण न कर दें।’

शुक्र नीति में भी कहा गया है कि राजदंड के भाई से समस्त जन अपने अपने धर्म में तत्पर रहते हैं राजा के लिए आवश्यक है कि वह प्रजा को स्वधर्म में विरत रखें। इसी कारण राजा ‘धृत वृत्त’ कहां गया। यहां पर यह भी कहना उचित होगा कि यद्यपि प्राचीन भारत में राजा को शासन की सर्वोच्च सत्ता प्राप्त की। फिर भी वह स्वयं धर्म के अधीन था। राधा कुमुद मुखर्जी ने सच ही कहा है- ‘हिंदू विचारों के अनुसार विधि के शासन के रूप में धर्म राज्य का सच्चा प्रभु है। राजा कार्यपालिका है जो दंड कहलाता है और जो आध्यात्मिक प्रभु (धर्म) के आदेशों को स्थिर रखता है एवं लागू करता है। इस प्रकार हिंदू राज्य में विधि का श्रोत लौंकिक प्रभु नहीं है विधि के श्रोत उससे ऊपर और आगे है वे उनकी रचना नहीं है। वह तो उनके पालन को देखता है।’

घोषाल के अनुसार प्राचीन भारतीय विचारकों की एक आधारभूत (मूल) धारणा स्मृतियों में प्रतिपादित सामाजिक व्यवस्था में धर्म की सर्वोच्चता का सिद्धांत था। स्मृतियों में कहा गया है कि स्थूल रूप में सामाजिक पद्धति की इकाइयों के लिए निहित कर्तव्यों की संपूर्ण योजना है जिसे वे दो पवित्र परंपराओं और अच्छी प्रथाओं से लिया गया है।

चूंकिप्राचीन भारतीयों का मुख्य झुकाव धर्म की ओर था। अतः यह स्वाभाविक ही है कि उनका राजनीतिक जीवन धर्म से मिश्रित था अथवा उनके राजनीतिक जीवन अधिकांशतः धार्मिक भावनाओं एवं रूपों से मिश्रित था। यह बात मुख्य रूप से एन.एन.लाल के मतानुसारइन तीन बातों में स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है-प्रथम राजा वह उसके आदर्श और राजा तथा प्रजा के बीच संबंधों के विषय में उनकी धारणाएं दूसरे राज्य के कल्याण के प्रोत्साहन हेतु जो प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में राजा के कल्याण द्वारा ही संभव था। किए जाने वाले कर्म महत्व की क्रिया- कांड और तीसरे सम्राटराजा युवराज और राज्य अधिकारियों द्वारा अपने वेदों को धारण करते समय तथा अन्य अवसरों पर किए जाने वाले राजनीतिक धार्मिक यज्ञ व समारोह। राजा का ध्येय धर्म, अर्थ, काम, की प्राप्ति द्वारा मोक्ष प्राप्त करने में सहायक होना था साथ ही राजा के पद को देवी समझा जाता था परंतु राजा का पद देवी होते हुए भी सीमाओं के अधीन था राजा को इंद्र की भांति अपने राज्य पर नियंत्रण रखना चाहिए। वरुण की भांति अपराधी को दंड देना चाहिए। इस प्रकार राजा में प्रायः सभीप्रमुख देवताओं के गुण होने चाहिए ऐसा ही राजा देवांश होता है जिसे धार्मिक राजा भी कहा जाता था। सत्य तो यह है कि राज्य के अंतर्गत राज्य की संप्रभुता न सौंपकर धर्म को संप्रभुमाना जाता था पूर्णविराम उस आधार पर कुछ विद्वानों ने यह कहा है कि प्राचीन हिंदू राज्य धर्मतंद्रा थे। वास्तव में यूरोप में इस्लाम और ईसाई धर्म के अनुयायियों ने धर्म तंत्र के स्वरूप को देखा था और उसी आधार पर उन्होंने यह विचार व्यक्त किया कि भारत में भी धार्मिक राज्यों की स्थापना की गई थी। यह बात ठीक नहीं प्रतीत होती है।

कौटिल्य ने धर्म के तीन रूप बताए हैं

  • सामाजिक कर्तव्यों के रूप में धर्म
  • नैतिक कानून के रूप में धर्म
  • दीवानी कानूनों के रूप में धर्म

उसने धर्म को रीति जन के रूप मेंकभी प्रयुक्त नहीं किया धर्म का प्रयोग कर्तव्यों कानूनों राज्य के कार्यों आदि के संबंध में किया जाता था। भारतीय विचारकों की यह मान्यता थी कि भारत में राज्यों की स्थापना धर्म के अनुसार हुई है और अर्थव्यवस्था जनकल्याणकारी है। कौटिल्य ने लिखा है- “जब धर्म की अपेक्षा की जाती है तो उसे अधर्म द्वारा समाप्त कर दिया जाता है और उसके परिणाम स्वरूप शासन करता भी समाप्त हो जाता है।” शुक्रनीतिसार ने कहा गया है कि-

“अधर्मी राजा को धर्मवानराजा के द्वारा उसी तरह दंड दिया जाए जिस तरह एक चोर को दंड दिया जाता है।” वह प्रजा को भी सलाह देता है “वह अपने राजा को सुधारने तथा नाश करने हेतु धर्मशील और बलवान शत्रु से सहायता ले सकता है।”प्राचीन भारत में यह मान्यता थी कि राजा का उदय धर्म पालन के लिए हुआ है। धर्म पालन के अंतर्गत सबसे बड़ी बात प्रजा के कल्याण की थी सत्य तो यह है कि भारतीय विचारकों ने धर्म में राज्य की कल्पना, राज्य की शक्ति, सुरक्षा, सुव्यवस्था और प्रगति के लिए की थी। किसी सांप्रदायिक विशेष को महत्व प्रदान करने के हेतु नहीं।

भारतीयों की धर्म में राज्य के प्रति यह धारणा

भारतीयों की धर्म में राज्य के प्रति यह धारणा का उल्लेख यहां संक्षेप में किया जा रहा है।

  • सांस्कृतिक परंपराओं की निरंतरता

सभी धर्म शक्तियों ने यह स्वीकार किया है कि वेश, जाति,कुल की परंपराओं को आधार बनाकर उसके अनुसार आचरण करना चाहिए यही बात प्राचीन भारत की राज्य की धर्म की धारणा के संबंध में भी सत्य थी। मनु का कहना है कि “धर्म में राज्य नियम एवं कानून उन सामाजिक परंपराओं एवं नियमों के अनुसार है जो सामाजिक नियमों द्वारा घोषित किए गए हैं अथवा समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा जिनका प्रयोग किया जाता है।”

महाभारत के शांति पर्व में युधिष्ठिर से कहा गया है कि वह “वेद रचनाओं के रामायण और शास्त्र का ज्ञान का उल्लंघन ना करें।” शुक्रनीतिसार में लिखा है कानून बनाने वाले व्यक्तियों के अंतर्गत कुछ गुण होने चाहिए इन गुणों में सबसे बड़ा गुण धर्म की समुचित जानकारी है। उसने लिखा है राजा को ऐसे धर्मो या कानूनों की सिफारिश करनी चाहिए जो संसार इस लोक और परलोक दोनों में ही सुख प्रदान करने वाले हो।

  • सामाजिक परंपराओं की निरंतरता

कौटिल्य धर्म में राज्य का दूसरा लक्षण और वर्णों तथा आगमों मैं नागरिकों के कर्तव्यों की व्यवस्था बतलाया है।यह समाज में शांति का इच्छुक है और पुरानी सामाजिक परंपराओं को बनाए रखने का पक्षपाती है। यही कारण है कि उसने राजा को स्वर धर्म पालन तथा वर्णाश्रम धर्म का पालन कराने का कार्य सौंपा है। महाभारत में कैकेय राजा से कहा लाया गया है उसके राज्य में सभी वर्णो तथा धर्मों के लोग अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं।

  • सुव्यवस्थित न्यायपूर्ण एवं सुख शांति का शासन-

प्राचीन भारत की यह मान्यता थी कि वही राज्य धर्म पर चल रहा है जहां सदैव आस्था है जहां न्याय प्रशासन होता है और जहां सर्व शक्ति है।महाभारत में शांतिपूर्ण में यह कहा गया है कि राजा का सबसे बड़ा कर्तव्य धर्म पालन है। राजा को स्वयं धर्मानुसार चलना चाहिए औरदूसरों को धर्मानुसार आचरण करने हेतु प्रेरित करना चाहिए। प्राचीन धर्म शास्त्र में लिखा है कि यदि राजा न्याय प्रिय है तो वह अपने और जनता के लिए धर्म एवं काम की प्राप्ति करता है।

  • राजा का सील युक्त होना

प्राचीन भारत में यह मान्यता थी कि राजा का शीलयुक्त होना अच्छे राज्य का लक्षण है। धर्म युक्त राजा ही शीलयुक्त होता है। शुक्र ने लिखा है जो राजनीति के मार्ग को छोड़कर स्वच्छंदता पूर्वक व्यवहार करता है वह दुख पाता है।राजा को सदा ही नहीं अपने धर्म में लगे रहना चाहिए धर्म या कर्तव्य को छोड़ने से राजा तेज हिना हो जाता है।

  • हिंदू राज्य किसी संप्रदाय विशेष का राज्य न था-

प्राचीन हिंदू राज्य को धर्म तंत्र या सांप्रदायिक राजी नहीं कहा जा सकता वह राज्य धर्म का पालन करने वाला व्याख्या करने वाला एवं रक्षा करने वाला था। किंतु उसे किसी भी रूप में सांप्रदायिक राज्य नहीं माना जा सकता वह मानवीय और किसी विश्वास को पालन करने को बाध्य नहीं करता था। सभी विश्वासों को मानने वालों को पूर्ण स्वतंत्रता थी। कौटिल्य ने लिखा है कि “प्रत्येक वर्ण और प्रत्येक आश्रम का धर्म है कि वह किसी प्रकार की हिंसा ना करें। दयावान एवं क्षमाशील बने।”

प्राचीन भारत में राजा को जनता का सेवक कहा जा सकता था जनता की खुशी में ही उसकी खुशी थी और जनता के हित में ही उसका हित था। शुक्र ने लिखा है कि राजा को प्रजा के आनंद में संतुष्ट रहना चाहिए और उसके दुख में दुखी होना चाहिए। पूर्व विवेचना से स्पष्ट है कि प्राचीन भारत की राज्य शास्त्र के विकास में सबसे महत्वपूर्ण देन धर्ममय

अथवा धर्म पर आधारित राजनीति कही जा सकती है। राज्य संबंधी सिद्धांतों में केंद्रित स्थान धर्म के लिए आरक्षित था। राज्य को उसी मात्रा तक अच्छा या बुरा माना जाता था जहां तक कि वह धर्म के पालन और अभिवृद्धि में सहायक होता था। अतएव राज्य का ध्येय केवल धर्म का पालन ही नहीं वरन लैकिक सुख और आर्थिक कल्याण की प्राप्ति भी थी।

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Pankaja Singh

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