इतिहास

सिकन्दर के आक्रमण का भारत पर प्रभाव | Effect of Alexander’s invasion on India in Hindi

सिकन्दर के आक्रमण का भारत पर प्रभाव | Effect of Alexander’s invasion on India in Hindi

सिकन्दर के आक्रमण का भारत पर प्रभाव-

सिकन्दर के आक्रमण के प्रभाव के सम्बन्ध में इतिहासकारों के विभिन्न मत हैं। कुछ विद्वान् इसके व्यापक प्रभावों को प्रमाणित करने के अतिवादी हैं तो कुछ अन्य सिकन्दर के आक्रमण को अर्थहीन घटना मात्र मानते हैं। भारतीय इतिहास पर, सिकन्दर के आक्रमण के प्रभावों की विवेचना करने से पूर्व, हम कुछ विशिष्ट विद्वानों की विभिन्न धारणाओं का वर्णन उन्हीं के शब्दों में कर लें तो वास्तविक निर्णय पर पहुँचना कोई कठिन कार्य नहीं रह जायेगा।

(1) श्री हर्रनिस (Hermiese) के अनुसार, सिकन्दर के आक्रमण के पश्चात् भारतीय जनजीवन के सारे कृत्यों पर यूनानी प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। उनके मतानुसार, “चन्द्रगुप्त मौर्य यूनानी शासक सेल्यूकस निकेटर से बड़ा प्रभावित था।” परन्तु यह मत अतिवादी है। किसी अन्य लेखक ने न तो इस मत का समर्थन ही किया है और न ही हमें प्रमाणस्वरूप कोई ऐसी सामग्री ही प्राप्त हुई है जिसके आधार पर इतने विकट यूनानी प्रभाव को स्वीकार किया जा सके। ऐसा प्रतीत होता है कि श्री |Herniese यूनान एवं सिकन्दर के परम उपासक हैं।

(2) डॉ० विन्सेट का मत वास्तविक भारतीय परम्परा के अनुकूल है। सत्य तो यह है कि प्राचीन-काल से ही भारतीय प्रवृत्ति का मुख्य गुण यही रहा है कि वह भीषण झंझावात आक्रमणों के सामने चाहे रुक भले ही गयी हो परन्तु पीछे नहीं हटी। उसने प्रभावित भले ही किया हो पर स्वयं अविचलित रही। निरन्तर बहने वाली भारतीय संस्कृति के इस गुण का स्रोत उसकी उदारता एवं सहिष्णुता है। एक आक्रमणकारी की संस्कृति का मोल ही क्या होता है। उसके प्रभाव को ग्रहण करने का अर्थ नृशंसता, अत्याचार, बर्बरता ग्रहण करना है। बौद्ध, जैन एवं हिन्दू धर्म को मानने वाले किसी आक्रमणकारी से प्रभावित होंगे इसकी तो कल्पना भी नहीं की जा सकती।

(3) कई यूनानी एवं पाश्चात्य लेखकों ने भी सिकन्दर के आक्रमण द्वारा भारत पर व्यापक प्रभाव का वर्णन किया है।

अतः सिकन्दर ने भारत की वास्तविक सैन्य शक्ति का तो सामना ही नहीं किया। कोई विदेशी यदि मुख्य भूमि पर पहुँचने से पहले ही लौट जाये तो उसके व्यापक प्रभाव की चर्चा करना हास्यास्पद सा प्रतीत होता है।

(4) डा० राधाकुमुद मुखर्जी के अनुसार, “सिकन्दर का यह साहसिक कार्य प्रशंसनीय तो अवश्य था परन्तु उसे महान् सफल कार्य नहीं माना जा सकता। क्योंकि सिकन्दर ने किसी महान् भारतीय सम्राट का तो सामना ही नहीं किया। यह आक्रमण राजनैतिक दृष्टि से भी अधिक सफल नहीं हो पाया क्योंकि मकदूनियावासी, पंजाब पर स्थायी अधिकार नहीं जमा पाये और जनता के साहित्य जीवन, संस्कृति एवं शासन प्रणाली पर इसकी कोई छाप नहीं पडी।”

हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि सिकन्दर के आक्रमण का कोई अति व्यापक एवं महान् प्रभाव नहीं पड़ा। कुछ इतिहासकारों एवं विद्वानों ने अपनी धारणाओं एवं विचार प्रवृत्ति के अनुसार, अतिरंजित तथा अति महत्वहीन घटनाओं का आश्रय लेकर अवास्तविकता का प्रतिपादन किया है। हम उपरोक्त मतों में, श्री पाल मैसन, श्री एच०जी० रालिन्सन एवं कुछ अन्य इतिहासकार, जिनमें डा० राय चौधरी, डॉ० मजूमदार, डॉ० आर०एस० त्रिपाठी आदि के मत से सहमत हैं, क्योंकि उन्होंने सिकन्दर के आक्रमण के प्रभावों का निरूपण करने में मध्य मार्ग का अनुसरण किया है।

तत्कालीन भारतीय परम्परा, संस्कृति, समाज एवं राजनीति को दृष्टिगत करते हुए सिकन्दर के आक्रमण का भारत पर जो कुछ भी प्रभाव पड़ा उसका वर्णन इस प्रकार किया जा सकता है

राजनैतिक प्रभाव-

सिकन्दर के आक्रमण ने भारत के पश्चिमोत्तर प्रदेश की दुर्बलता एवं क्षीणता को प्रकट कर दिया। इस प्रदेश के शासक एवं वीर जातियाँ अब समझ गयीं कि अनेक भागों में विभक्त होने के कारण एक संगठित शक्ति के सामने कितनी हानि उठानी पड़ती है। अतः इस प्रदेश में सर्वप्रथम तो राजनैतिक एकता के उदय का सूत्रपात हुआ।

सिकन्दर के आक्रमण ने उत्तरी भारत के छोटे-छोटे राज्यों का अन्त करके चन्द्रगुप्त मौर्य के लिए एक विशाल साम्राज्य स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त कर दिया।

डॉ० राधाकुमुद मुखर्जी ने इस विषय में बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा-“सिकन्दर के आक्रमण द्वारा भारत को राजनैतिक एकीकरण की प्राप्ति का प्रोत्साहन मिला। छोटे-छोटे राज्य जो इस एकीकरण में बाधक थे, बड़े राज्यों में विलीन हो गये।….ये परिस्थितियाँ एक महान् भारतीय साम्राज्य के उदय में बड़ी सहायक हुईं तथा चन्द्रगुप्त मौर्य ने शीघ्र ही ऐसे साम्राज्य की स्थापना की।”

भारत के उत्तरी-पश्चिमी भाग में अपनी विजयों के स्मारक रूप में, यूनानियों द्वारा कुछ बस्तियाँ स्थापित कर, उनमें क्षत्रिय नियुक्त किये गये। इस प्रणाली का अनुसरण कालान्तर में मौर्य तथा गुप्त सम्राटों ने भी किया।

कुछ विद्वानों ने कहा है कि सिकन्दर की सैन्यशक्ति के गुणों से प्रभावित होकर, भारतीय सम्राटों ने यूनानी प्रणाली को अपनाया। हम किसी सीमा तक इस विचार से सहमत हो सकते हैं। पोरस ने सिकन्दर के विरुद्ध संघर्ष में इस तथ्य को अवश्य ही स्वीकार किया होगा कि युद्ध में हाथियों एवं रथों की अपेक्षा अश्वारोही अधिक सफलता पा सकते हैं। कालान्तर में हमें मौर्य सेना में अश्वारोहिणी सेना की प्रमुखता दृष्टिगोचर होती है।

आर्थिक प्रभाव-

सिकन्दर के आक्रमण से पूर्व भी भारत एवं यूनान के मध्य व्यापारिक सम्बन्धों के काफी प्रमाण प्राप्त होते हैं परन्तु अब यह सम्बन्ध और भी घनिष्ठ हो गया। सिकन्दर ने भारत आने के लिए दो मार्ग तथा जाने के लिये तीन मार्गों का अनुसरण किया। इसके परिणामस्वरूप अब एक जलमार्ग तथा तीन स्थल मार्ग खुल गये। पूरब और पश्चिम के बीच का आवरण उठ गया तथा व्यापारिक आदान-प्रदान तीव्रगति से प्रारम्भ हुआ। डा० स्मिथ के अनुसार- सिकन्दर के आक्रमण ने “पूर्व और पश्चिम के मध्य की दीवार गिरा दी तथा आवागमन के चार रास्ते निकले तीन स्थल मार्ग तथा चौथा सामुद्रिक मार्ग।” श्री पाल मेसन ने इस विषय में कहा है कि “भूमध्य सागरीय सभ्यता का पंजाब तथा मध्य एशिया से सीधा सम्पर्क स्थापित हो गया। पूरब तथा पश्चिम के मध्य सेमेटिक बेबीलोनिया तथा ईरानी साम्राज्य भित्ति के रूप में खडे न रह सके।”

स्ट्रैबो का कथन है कि कैस्पियन एवं कालासागर के मार्ग से यूरोप को भारतीय माल निर्यात करने में आमू नदी विशेष उपयोगी थी। इस मार्ग का तीसरी शताब्दी ई०पू० बड़ा महत्व था। सैल्यूकस निकेटर का पुत्र अन्तियोक प्रथम इसी मार्ग से नौ सेनाध्यक्ष बनकर आया था।

तत्कालीन बेबीलोनिया के ढले हुए यूनानी सिक्कों की प्राप्ति उत्तर-पश्चिमी भारत से हुई है जिससे प्रकट होता है व्यापार की दशा उन्नत थी। कुछ भारतीय सिक्कों पर यूनानी प्रभाव भी दृष्टिगोचर होता है।

सांस्कृतिक प्रभाव-

सिकन्दर के भारत आगमन से पूर्व कई भारतीय दार्शनिक, यूनान के प्रसिद्ध दार्शनिक सुकरात से मिल चुके थे। उनके वैचारिक आदान-प्रदान से नये दृष्टिकोणों का जन्म होना स्वाभाविक ही है। सिकन्दर स्वयं भी महान् दार्शनिक अरस्तू का शिष्य था तथा अरस्तू सुकरात का शिष्य था। संभवतः सुकरात ने अरस्तू तथा अरस्तू ने सिकन्दर को उन भारतीय दार्शनिकों एवं साधुओं के बारे में बताया होगा जो संसार से विरक्ति लेकर, केवल दार्शनिक चिन्तन ही करते हैं। सिकन्दर जब भारत आया तो उसने कुछ भारतीय दार्शनिकों एवं साधुओं से साक्षात्कार किया तथा ‘कालानास’ (संस्कृत ग्रन्थों के चन्द्रभागा) नामक साधु को अपने साथ ले गया था। इससे प्रतीत होता है कि सिकन्दर के हृदय में भारतीय दर्शन के प्रति सम्मान की भावना थी। यूनानी दार्शनिक पाइथागोरस के आत्मा, पुनर्जन्म तथा कर्म-सम्बन्धी विचारों पर भारतीय दर्शन का प्रभाव परिलक्षित होता है।

यद्यपि भारतीय ज्योतिष अपनी गणना पद्धति में सर्वश्रेष्ठ था परन्तु यूनानी ज्योतिष अपने क्रम में काफी विकसित था। अतः दोनों ने एक-दूसरे को अपनी-अपनी विशेषताओं से प्रभावित किया होगा।

भारतीय उत्तर-पश्चिमी सीमान्त के क्षेत्र में यूनानी साम्राज्य काफी दिनों तक जीवित रहा तथा यूनानी शिल्पियों ने भारतीय वास्तुकला के माध्यम से एक नयी कला शैली को जन्म दिया जो ‘गान्धार शैली’ के नाम से प्रसिद्ध है। इस शैली की विशेषता यह है कि भव्यता तो भारतीय किन्तु अलंकरण यूनानी प्रथा के अनुसार है। कई मौर्य प्रासादों पर भी यूनानी कला धका प्रभाव दृष्टिगोचर होता है।

भारतीय वेशभूषा पर भी यूनानी प्रभाव के कतिपय उदाहरण प्राप्त होते हैं। मौर्यकालीन मुद्राओं से विदित होता है कि भारतीय नरेश पायजामे तथा कोट का प्रयोग करने लगे थे-ये दोनों वस्त्र यूनानी प्रथा के अनुकूल

अन्य प्रभाव-

सिकन्दर के आक्रमण से प्राचीन भारत के इतिहास पर प्रचुर प्रकाश पड़ता है। उसके साथ अनेक लेखक एवं विद्वान् भी भारत आये थे जिन्होंने अपने ग्रन्थों में भारत सम्बन्धी विवरण दिये हैं। बाद में भारतीय सम्राटों ने भी इसी प्रथा का अनुसरण किया तथा महत्वपूर्ण घटनाओं को लेखबद्ध करने की प्रवृत्ति ने जन्म लिया।

उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट होता है कि भारत पर सिकन्दर के आक्रमण का कोई प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं पड़ा। यद्यपि अप्रत्यक्ष रूप से भारतीय राजनीति, व्यापार एवं सांस्कृतिक क्षेत्र में कुछ उपलब्धियां अवश्य प्राप्त हुईं।

सत्य यह है कि भारतीय आत्मा को कोई आक्रमणकारी प्रभावित ही नहीं कर सकता। प्राचीन काल से ही हमारा भारत मानवता, विश्व कल्याण की भावना एवं सहिष्णुता के भावों से ओत-प्रोत रहा है। हमने शान्तिदूत के स्वागत में अपने हृदय बिछाये परन्तु आक्रमणकारी के विरुद्ध शस्त्र उठाये हैं। शान्तिदूत हमें बहुत कुछ दे सकता है परन्तु आक्रमणकारी केवल घृणा, हिंसा, द्वेष भाव ही देगा। अतः सिकन्दर आक्रमणकारी के रूप में आया और चला गया। जब वह आया तो कृषक का हल पल भर को रुक गया, लोहार का हथौड़ा थम गया। वह चला गया तो कृषक के बैल के गले में पड़ी घन्टियाँ फिर बज उठी होंगी, लोहार का हथौड़ा ठकाठक बजने लगा होगा। हाँ! कृषक बालाओं के गीतों में आक्रमणकारी अत्याचार की गाथाओं का बखान अवश्य होने लगा होगा।

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Pankaja Singh

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