इतिहास

मुगलों के अधीन सामाजिक जीवन | मुगलों के अधीन आर्थिक स्थिति | मुगलों के अधीन शिक्षा एवं साहित्य का विकास

मुगलों के अधीन सामाजिक जीवन | मुगलों के अधीन आर्थिक स्थिति | मुगलों के अधीन शिक्षा एवं साहित्य का विकास

मुगलों के अधीन सामाजिक जीवन

समसामायिक ऐतिहासिक ग्रंथों एवं यात्रा-विवरणों से मुगलकालीन समाज पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। मुगलकालीन सामाजिक जीवन की मुख्य विशेषता सामाजिक विभेद है। एक ओर उच्च वर्ग, चाहे वह शासकवर्ग का हो अथवा शासित वर्ग का, अनेक सुविधाओं एवं विशेषाधिकारों का अधिकारी था तो सामान्यजन की स्थिति कष्टदायक थी। दूसरी विशेषता है भारतीय और विदेशी तत्वों के मिलने से, एक नए प्रकार के सामाजिक जीवन का उदय । इस्लाम ने हिंदू संस्कृति पर और हिंदू संस्कृति ने इस्लाम पर गहरा प्रभाव डाला। एक साथ लंबे समय तक रहने के कारण आपसी एकता एवं समन्वय की भावना प्रचलित थी,सांपादयिक विभेद बहुत कम दृष्टिगोचर होते थे।

सामाजिक संरचना- मुगलकाल में समाज में स्पष्टतः दो प्रमुख संप्रदायों के लोग थे।- हिन्दू और मुसलमान । हिन्दू बहुसंख्यक थे। मुसलमानों की संख्या भी बहुत अधिक थी। मुसलमान के सष्टतः दो वर्ग थे. जन्मजात एवं वंशगत मुसलमान । इसमें अनेक विदेशी भी थे। (अब, ईरानी, तुर्क, अफगान, मंगोल, उजबेग इत्यादि)।ये रक्त की शुद्धता के आधार पर जातीय श्रेष्ठता दावा करते थे। प्रशासन और समाज में उन्हें महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किया गया था। दूसरा वर्ग भारतीय मुसलमानों का था। ये वैसे मुसलमान थे जिन्होंने किसी कारणवश अपना धर्म छोड़कर इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया था; परंतु इन्हें मुस्लिम समाज में पहले वर्ग जैसी इज्जत अथवा सुविधाएँ प्रदान नहीं की गई थीं। मुसलमानों में विभिन्न धार्मिक संप्रदाय के व्यक्ति भी थे जैसे शियासुन्नी,शेख,सैयद् एवं सूफी । हिंदुओं में भी सामाजिक विभेद वर्तमान था। बाहमण और राजपूत हिंदू समाज के प्रमुख अंग थे। इनके अतिरिक्त विभिन्न जातियाँ भी थी। हिंदू समाज अभी भी परंपरागत रूढ़िवादी पद्वति पर ही आश्रित था। छूआछूत की भावना, प्रत्येक जाति के नियम, संस्कारों का पालन कड़ाई पूर्वक होता था। मुगलकाल में हिंदू और मुसलमानों के अतिरिक्त सिख, बौद्ध, जैन, एवं इसाई भी बड़ी संख्या में थे। अनेक यूरोपीय जातियाँ- पुर्तगाली, डच, फ्रांसीसी एवं अंग्रेज भी अच्छी संख्या में यहाँ बस गए थे। प्रत्येक सामाजिक वर्ग अपने-अपने रीति रिवाजों का पालन करने को स्वतंत्र था। राज्य की ओर से इन पर किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं लगाया गया था। सामान्यतः मुगल सम्राटों ने सभी वर्गों के प्रति उदार नीति अपनाई; लेकिन कभी-कभी (जहाँगीर, शाहजहाँ, औरंगजेब) कट्टरता एवं विद्वेषपूर्ण नीति के परिणामस्वरूप, कम से कम राजनीतिक तौर पर प्रतिक्रिया अवश्य हुई। तथापि, मुगलकाल में समाज के सभी वर्ग आपसी मतभेद भुलाकर एक साथ प्रेमभाव से रहते थे।

सामाजिक वर्गीकरण- सामाजिक मान-सम्मान, सुविधाओं एवं आर्थिक आधार पर मुगलकालीन समाज स्पष्टत: तीन वर्गों में विभक्त था। पहला वर्ग शासक,सरदारों एवं सामंतों का था। मुगल सम्राट, हिंदू राजा, प्रशासनिक अधिकारी, मनसबदार, जागीरदार, धार्मिक नेता इत्यादि इस वर्ग में आते हैं। ये सभी व्यक्ति, चाहे हिंदू हों या मुसलमान, मुगल दरबार और प्रशासन से संबद्ध थे। इस वर्ग में सिर्फ उच्च घरानवाले हिंदू-मुसलमानों, राजपरिवार के सदस्यों को ही स्थान दिया गया ।इस घराने को अनेक सुविधाए एवं विशेषधिकार प्राप्त थे। ये शान-शौकत एवं भोग विलास की जिन्दगी व्यतीत करते थे। ये आलीशान महलों में रहते, सर्वोत्तम आभूषण एवं खाद्य-पदार्थों तथा मदिरा का उपयोग करते थे। इनके पास असंख्य सेवक, गाड़ियाँ, बाग-बगीचे होते थे। इस वर्ग के लोग एक से अधिक विवाह करते । प्रत्येक महत्वपूर्ण सरदार का अपना हरम होता था जिसमें अनेक सुंदरियाँ रखी जाती थीं। इस वर्ग ने कला-कौशल, नाच गाना, जुआ, मद्यपान, अफोम के उपयोग को प्रश्रय दिया। इसमें से अधिकांश राजधानी एवं बड़े नगरों में रहते थे। यह वर्ग फिजूलखर्ची का आदी था। अतः ऊपरी तड़क-भड़क के बावजूद इनकी आर्थिक स्थिति कभी-कभी लचर जाती थी। अनेक सरदार तो कर्ज के बोझ से दबे रहते थे; परंतु कुछ सरदार व्यापार-वाणिज्य में धन लगाकर अपनी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ कर लेते थे। यद्यपि यह वर्ग सामंती व्यवस्था के दुर्गुणों का शिकार था तथापि इस वर्ग ने बागवानी, विलासिता की वस्तुओं के आयात, शिल्प, वास्तुकला, शिक्षा, साहित्य एवं संगीत कला के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। समाज के अन्य संपन्न व्यक्ति हइनकी नकल करने का प्रयास करते थे।

समाज का मध्यम वर्ग राजकर्मचारियों, व्यापारियों, व्यवसायियों, भूमिपतियों एवं बुद्धिजीवियों का था। इनका जीवन यद्यपि उच्च वर्ग जैसा नहीं था, तथापि, यह वर्ग भी सुविधाभोगी वर्ग था और आर्थिक संपन्नता का जीवन व्यतीत करता था। राजकर्मचारियों को इतनी अधिक तनख्वाह मिल जाती थी जिससे वे सुख-चैन की जिंदगी व्यतीत कर सकें। जमींदारों की स्थिति भी अच्छी थी। भूमि पर एक प्रकार से उन्हीं का अधिकार होता था। जमींदार अपनी जमींदारियों में गढ़ी अथवा दुर्ग बनवाकर रहते। उनके पास अपनी छोटी-मोटी सेना भी होती थी। बड़े जमींदारों की स्थिति राजा के समान थी जिन्हें कुछ आंतरिक स्वतंत्रता प्रदान की गई थी। जमींदार वर्ग स्थानीय उच्च वर्ग का प्रतिनिधि था। वह भी बड़े मनसबदारों और सरदारों के रहन-सहन की नकल करता था। मुगलकाल में जमीदारों का व्यापक और सशक्त वर्ग बन गया था। व्यापारियों को संख्या भी बहुत अधिक थी। व्यापारियों की अनेक श्रेणियाँ थी, जैसे बोहरा अथवा सेठ (थोक व्यापारी), वणिक, चेटटी, सर्राफ, बंजारे इत्यादि। इन व्यापारियों की आर्थिक स्थिति अच्छी थी। वे भी सामंतों की तरह शान-शौकत की जिंदगी व्यतीत करते थे परंतु अनेक व्यापारी असुरक्षा के भय से सामान्य जीवन भी व्यतीत करते थे। बर्नियर का यह कथन कि व्यापारी गरीबी का दिखवा करते थे जिससे कि उनकी संपत्ति छीनी न जा सके, पूर्णतः सही नहीं है। राज्य व्यापारयों की सुरक्षा का प्रबंध करता था, परंतु युद्ध की स्थिति में व्यापारियों को हानि उठानी पड़ती थी। इस वर्ग के अन्य सदस्य, विभिन्न व्यवसायी इत्यादि भी आराम एवं इज्जत की जिंदगी व्यतीत करते थे।

समाज के सबसे कमजोर स्थिति निम्न वर्ग को घी। इस वर्ग ममें किसान, छोटे व्यवसायी, उद्मी, सेवक, दस्तकार, गुलाम एवं सामान्य जन आते हैं। इनकी स्थिति दयनीय थी। इनका आर्थिक एवं सामाजिक शोषण होता था। किसानों के दो वर्ग थे- ‘पाही’ और ‘खुदकाश्त’ । पाही जमींदार के खेत पर काम कर अपना गुजारा करते थे, उनकी अपनी भूमि नहीं होती थी। खुदकाश्त किसानों के पास अपनी जमीन होती थी। इन पर लगान का बोझ अधिकक्षथा। किसानों की आर्थिक स्थिति असंतोषजनक थी। यही स्थिति दस्तकारों, श्रमिकों की भी थी। अकाल और महामारी की स्थिति में इनकी स्थिति और भी दयनीय हो जाती थी। अतः अनेक किसान और श्रमिक शहरों में जाकर सेना में कुली के रूप में भरती हो जाते, अपना छोटा-मोटा कारोबार करते अथवा संपन्न घरानों में सेवक बन जाते । राजमहलों एवं सामंतों के यहाँ बड़ी संख्या में दास दासियों, गुलामों के रूप में भी इन्हें रोजगार मिलता था। इन्हें कम मजदूरी पर काम करना पड़ता एवं बेगारी भी करनी पड़ती। इनके रहने के मकान, भोजन-वस्त्र अति साधारण किस्म के होते थे।

रहन-सहन के स्तर- आर्थिक स्थिति के अनुरूप ही समाज के विभिन्न वर्गों का रहन-सहन भी था। उच्च वर्ग वाले तड़क-भड़क का जीवन व्यतीत करते थे। उनके आवास भव्य और सुविधाजनक होते। वे रंगीन, फूलदार, रेशमी, ऊनी कढ़ाई वाले वस्त्र पहनते । वस्त्रों पर सोने-चांदी के धागों से काश्तकारी भी की जाती थी ।उनके आभूषण सोने-चांदी और बहुमूल्य जवाहरातों से बनाए जाते थे। वे अच्छी मदिरा, सुगंधित द्रव्यों एवं अच्छे भोजन के शौकीन होते थे। उनके मनोरंजन के साधनों में जुआ खेलना, यात्रा एवं उत्सव मनाना, विहार करना, पशु-पक्षियों का आखेट करना प्रमुख था। ये नृत्य-संगीत में भी गहरी अभिरूचि रखते थे। यह वर्ग सदैव अपने धन एवं वैभव का प्रदर्शन करता था। बड़े-बड़े नगरों-दिल्ली, आगरा, लाहौर की जान उच्चवर्ग ही था। मध्यमवर्ग भी उच्चवर्ग की नकल करने का प्रयास करता था; परंतु उस प्रकार की जिंदगी व्यतीत नहीं कर पाता था जैसा कि उच्चवर्ग वाले करते थे।

शहरों एवं गाँवों की निम्नवर्गीय जनता की स्थिति दयनीय थी। यद्यपि, शहरों में रहने वालों में अधिसंख्या निम्नवर्ग के कुली, दस्तकार, सिपाही, छोटे दुकानदार ही थे, परंतु उनकी स्थिति संतोषजनक नहीं थी। उनका जीवन सादा एवं आडंबर विहीन था। इन्हें भोजन तो उपलब्ध हो जाता था, परंतु सुख-सुविधा की वस्तुएँ नहीं मिल पाती थीं। कितनों के पास तो पहनने के कपड़े और जूते भी नहीं होते थे। बाबर स्वयं कहता था कि भारत में किसान तथा निम्नवर्ग के लोगों के पास पर्याप्त कपड़े नहीं थे। भारत आने वाले अनेक यूरोपीय यात्रियों – राल्फ फिच सलबांके, दिलेत- का भी कहना है कि निम्नवर्ग वालों के पास आवश्यकतानुसार साधारण कपड़े भी नहीं थे,गर्म कपड़ों की तो बात ही अलग है। रूसी यात्री निकितिन का कहना है कि दक्कन के लोग नंगे पाँव रहते थे। गांवों में लोगों का घर मिट्टी एवं फूस-बाँस का बना होता था। फर्नीचर भी ग्रामीणों के पास नाममात्र का होता था। उनका भोज्य पदार्थ चावल,बाजरा और दाल था। घी-तेल सस्ता था परंतु चीनी और नमक महँगा। इस प्रकार, शहरों एवं गाँवों तथा उच्च और निम्न वर्ग के जीवन स्तर में आकाश-पाताल का अंतर था।

विभिन्न सामाजिक वर्गों में इतनी अधिक गहरी खाई होते हुए भी आपसी वैमनस्य की कमी थी। समाज के सभी वर्ग निर्धारित नियमों का पालन करते एवं एक-दूसरे के प्रति सदभावना एवं प्रेम का प्रदर्शन करते थे। हिंदुओं एवं मुसलमानों ने एक-दूसरे की अनेक परम्पराओं को अपना लिया। हिंदू-मुसलमान दोनों अंगरखा, चूड़ीदार पैजामा पहनते, पगड़ी और साफा बाँधते एवं आभूषण पहनते । मद्यपान, जुआ, अफीम, तंबाकू, एवं मांस का उपयोग हिंदू-मुसलमान दोनों ही करते थे। मुगलकाल तुर्क-अफगानकाल में प्रचलित सामाजिक विद्वेष एवं कटुता की भावना से मुक्त था।

स्त्रियों की स्थिति- मुगलकालीन समाज में स्त्रियों की स्थिति लगभग तुर्क-अफगान काल जैसी ही थी, इसमें कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ। स्त्रियों को इस समय भी भोग-विलास को ही वस्तु माना जाता था। उनकी स्वतंत्रता पर अनेक पाबंदियाँ थीं। पर्दा-प्रथा का चलन था। उच्चवर्ग की महिलाओं को इसका कड़ाई से पालन करना पड़ता था। निम्नवर्ग की स्त्रियां इस मामले में अधिक स्वतंत्र थीं। राजघरानों एवं उच्चवर्गों में बहु-विवाह प्रथा प्रचलित थी। हरम में अधिक-से-अधिक सुंदर स्त्रिर्या रखना मान-सम्मान की बात समझी जाती थी। बाल-विवाह का प्रचलन भी था। राजपूत घरानों में सती और जौहर जैसी कुप्रथा भी विद्यमान थी। पुत्री का जन्म अभिशाप माना जाता था। विधवाओं की स्थिति भी दयनीय थी। उच्चवर्ग और विशेषकर राजघरानों में स्त्रियों को संपत्ति-संबंधी अधिकार दे दिये गये थे। कुछ स्त्रियां शिक्षा भी प्राप्त करती थीं। मुगलकाल में अनेक ऐसी स्त्रियाँ भी हुई जिन्होंने तत्कालीन राजनीति में भी महत्वपूर्ण भाग लिया, जैसे नूरजहाँ । प्रबुद्ध स्त्रियों ने राजनीतिक एवं सामाजिक जीवन को प्रभावित किया, परंतु अधिकांश स्त्रियों की स्थिति इस समय भोग्या की ही बनी रही।

मुगलों के अधीनआर्थिक स्थिति

(Economic condition)

मुगलकाल आर्थिक संपन्नता का युग था । तत्कालीन फारसी साहित्य, जैसे आइने-अकबरी, यूरोपीयन यात्रियों के विवरण तथा यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों के दस्तावेजों एवं अन्य विविध स्रोतों से मुगलकालीन अर्थव्यवस्था पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। इस काल में कृषि, उद्योग एवं व्यापार-वाणिज्य का विकास हुआ। बाबर और हुमायूँ के समय तक तो राज्य को आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, परंतु साम्राज्य विस्तार और सुदृढ़ प्रशासन की स्थापना के साथ आर्थिक व्यवस्था में भी परिवर्तन हुआ। औरंगजेब के समय से राज्य की अर्थव्यवस्था गड़बड़ा गयी।

कृषि- मुगलकालीन आर्थिक व्यवस्था का मुख्य आधार कृषि था। भू-स्वामित्व, भू-राजस्व व्यवस्था में मुगलों ने समयानुसार आवश्यक परिवर्तन किए। कृषि के विस्तार, जमीन की उपज बढ़ाने किसानों को खेती के लिए प्रोत्साहन देने की व्यवस्था की गई। परिणामस्वरूप, पहले की अपेक्षा मुगलकाल में पैदावार में वृद्धि हुई। मुगलकाल में विभिन्न प्रकार के अनाज- दलहन, तेलहन, फल, साग-सब्जी और आर्थिक महत्व की फसलें उपजायी जाती थीं। बाग भी बड़ी संख्या में लगवाए जाते थे। उनका भी आर्थिक महत्व था। खाद्यानों में प्रमुख चावल गेहूं, बाजरा, मक्का, दलहन में अरहर, तेलहन में सरसों, एवं तिल मुख्य रूप से उपजाए जाते थे। गन्नाकपास, नील की खेती आर्थिक महत्व एवं विभिन्न उद्योगों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए की जाती थी। साम्राज्य के कुछ भाग विशेष प्रकार के फसलों के लिए विख्यात थे। उदाहरण के लिए, गन्ना मुख्य रूप से बंगाल और बिहार में; गेहूं पंजाब, उत्तर प्रदेश और बिहार में; नील यमुना की घाटी और मध्य भारत में, कपास, तंबाकू, चावल इत्यादि भारत के विभिन्न भागों में उपजाए जाते थे। यद्यपि इस काल में कृषि का विकास हुआ, परंतु उसके स्वरूप को बदलने का प्रयास नहीं किया गया।इस समय भी खेती परंपरागत तरीके से ही होती थी। सिंचाई की पूरी व्यवस्था नहीं थी, इसलिए किसानों को अधिकांशतः वर्षा पर ही निर्भर रहना पड़ता था। वर्षा नहीं होने पर अकाल पड़ जाता था। मुगलकाल में अनेक बार ऐसे दुर्भिक्ष पड़े। आगरा और बयाना में 1556-57 में भयंकर अकाल पड़ा। उस अकाल का वर्णन करते हुए इतिहासकार बदायूँनी कहता है कि उसने स्वयं अपनी आखों से मनुष्य को अपने संबंधियों को खोते हुए देखा। गुजरात और दक्षिण भारत में भी भीषण अकाल पड़े (1573-74,1630-32)। इन भीषण दुर्भिक्षों का वर्णन तत्कालीन इतिहासकारों एवं यात्रियों ने किया है, जो रोंगटे खड़े कर देता है। अकाल का कृषि एवं सामान्य जनता पर बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ता था। यद्यपि राज्य की ओर से जनता को राहत पहुंचाने की व्यवस्था की जाती थी, परंतु इस समस्या के निदान के लिए मुगलों ने कोई स्थायी व्यवस्था नहीं की। बार-बार पड़ने वाले अकालों ने राज्य की अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव डाला।

उद्योग-धंधे- मुगलकाल में विभिन्न उद्योग-धंधों का विकास हुआ। कुटीर और बड़े उद्योग दोनों का विकास हुआ। ज्यादातर उद्योग व्यक्तिगत प्रयासों से चलते थे, परंतु कुछ उद्योगों में राज्य भी दिलचस्पी लेता था। राजकीय नियंत्रण में अनेक कारखाने स्थापित किए गए थे। इस समय का सबसे बड़ा उद्योग वस्त्र उद्योग था। सूती, रेशमी, ऊनी वस्त्र भारत के विभिन्न भागों में तैयार किए जाते थे। सूती वस्त्र के प्रमुख केंद्र पाटन (गुजरात), बुरहानपुर (खानदेश), जौनपुर, बनारस, पटना त्या बिहार-बंगाल और उड़ीसा के अनेक शहर। ढाका में विशेष प्रकार का मलमल तैयार किया जाता था, जिसकी प्रसिद्वि भारत के बाहर भी थी। बंगाल वस्त्र उद्योग का प्रमुख केन्द्र था। बर्नियर बंगाल के वस्त्र उद्योग की प्रशंसा करता है । वस्त्रों को रंगने, छपाई और कशीदा करने का उद्योग भी विकसित था। रेशमी और ऊनी वस्त्र तैयार किये जाते थे। बंगाल, लाहौर, आगरा, फतेहपुर सीकरी और गुजरात में रेशमी वस्त्र; पंजाब, काश्मीर में ऊनी वस्त्र तथा आगरा, मुल्तान में शॉल; दरी और कालीन जौनपुर, लाहौर और आगरा में तैयार किए जाते थे। शोरा का उद्योग जिसका प्रयोग बारूद बनाने में किया जाता था अत्यन्त विकसित अवस्था में था। इसका निर्माण मुख्यतः बिहार और प्रायद्वीपीय भारत में होता था। चीनी एवं खांडसारी उद्योगों के केंद्र बंगाल बिहारगुजरात और पंजाब में थे। इनके अतिरिक्त धातु उद्योग (बरतन एवं अस्त्र-शस्त्र) एवं नौका तथा जहाज बनाने का उद्योग भी उन्नत अवस्था में था। लोहे के अस्त्र पंजाब और गुजरात में तथा अच्छी किस्म की तलवारें सोमनाथ में तैयार की जाती थीं।

इन प्रमुख बड़े उद्योगों के अतिरिक्त लघु उद्योगों के रूप में हाथीदांत का काम लकड़ी का सामान, धातु एवं मिटटी की मूर्तियाँ, कागज, कांच, चमड़ा, सुगंधित द्रव्य, पत्थर तराशना, आभूषण बनाना, हीरे-जवाहुरात का काम करना भी बड़े पैमाने पर होता था। कुशल दस्तकार और कारीगर जो सामान तैयार करते थे उनकी मांग भारत के अतिरिक्त बाहर में भी थी। इसके चलते आंतरिक एवं विदेशी व्यापार का विकास हुआ। औद्योगिक विकास के कारण अनेक नगर उद्योग-धंधों एवं व्यापार-वाणिज्य के प्रमुख केंद्र बन गए । मुगलकाल में अनेक बड़े और विख्यात नगर थे। फिच आगरा और फतेहपुर सीकरी को लंदन से भी बड़ा बताता है। अन्य प्रमुख नगरों में दिल्ली, बनारस, पटना, बर्दवान, ढाका, चटगांव, लाहौर, बुरहानपुर, अहमदाबाद इत्यादि का उल्लेख किया जा सकता है।

व्यापार-वाणिज्य- मुगलकाल में व्यापार-वाणिज्य का भी विकास हुआ। इस समय व्यापार के विकास के अनेक कारण थे। आवागमन की सुविधा एवं व्यापारिक मार्गों को सुरक्षा से व्यापारी करने को प्रोत्साहित हुए। जल एवं स्थलमार्ग से व्यापारी भारत के एक भाग से दूसरे भाग तक सुगमतापूर्वक आ-जा सकते थे। मुद्रा-व्यवस्था के प्रसार ने भी व्यापार को बढ़ावा दिया। यूरापीय व्यापारियों के भारत आकर बसने और उन्हें मुगलों द्वारा व्यापारिक सुविधाएं प्रदान करने से भारत का विदेशी व्यापार बढ़ा। देश में तैयार वस्तुएँ एक भाग से दूसरे भाग में भेजी ही जाती थीं, विदेशों में भी पकी अच्छी मांग थीं। भारत से पर्याप्त मात्रा में वस्त्र, मसाले, नील, अफीम, चीनी, शोरा एशिया, यूरोप और अफ्रीका के देशों में भेजा जाता था। भारत विदेशो से मुख्यतः अच्छी किस्म के ऊनी एवं रेशमी वस्त्र, अच्छी नस्ल के घोड़े, शराब, कांच के बर्तन, हाथीदांत, मूंगा, अफ्रीकी गुलाम, सोना-चांदी इत्यादि मंगवाता था। पश्चिमोत्तर भारत से स्थलमार्ग का मुख्य मार्ग लाहौर से काबुल और मुलतान से कांधार तक जाता था। लाहौरीबंदर (सिंध), सूरत, वेसीन,दाबुल, गोआ,मसुलीपत्तनम,(मछलीपट्टनम), सतगांव, चिटगांव, सोनारगांव इत्यादि प्रमुख बंदरगाह थे, जहाँ से सामुद्रिक व्यापार होता था।

मुद्रा एवं मूल्य- व्यापार-वाणिज्य के विकास के लिए मुगलों ने मुद्रा-व्यवस्था की ओर पर्याप्त ध्यान दिया। सिक्कों के ढालने पर राज्य का नियंत्रण था। राज्य की ओर से प्रमुख नगरों में टकसाल स्थापित किए गए थे जहाँ से निश्चित मूल्य के सोने-चांदी एवं ताँबे के सिक्के ढाले जाते थे। राज्य ने व्यापारियों की सुविधा के लिए चुंगी की दर निश्चित कर दी तथा बाजारों एवं व्यावपारिक केंद्रों की स्थापना की। मूल्यों को नियंत्रित करने का प्रयास भी होता था। इसलिए मुगलकाल में खाद्यान्न एवं आवश्यकता की अन्य वस्तुएं सस्ती थीं। सामान्यतः आम आदमी की जीवन संतोषप्रद था।

मुगलकालीन अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी दुर्बलता यह थी कि इसने समाज में आर्थिक विषमता को जन्म दिया। आर्थिक समृद्वि का लाभ उच्चवर्ग को ही मिला । महलों एवं सामंतों के घरों में धन संग्रहित होने लगा जिसे विलासिता एवं कला-कौशल के विकास पर लगाया गया उत्पादक कार्यों में नहीं। इसलिए, राज्य की अर्थव्यवस्था ठोस धरातल पर खड़ी नहीं की जा सकी। औरंगजेब के समय से अर्थव्यवस्था लड़खड़ाने लगी और उत्तर-मुगलकाल में तो वह पूर्णत: नष्ट हो गयी। यूरोपीय व्यापारियों को संरक्षण एवं व्यापारिक रियातें देने को प्रभाव भी अर्थव्यवस्था पर घातक पड़ा। 18वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक अंग्रेज व्यापारियों ने भारतीय व्यापार पर अधिकार कर लिया एवं यहां के उद्योग-धंधों को, विशेषकर बंगाल में, नष्ट प्राय: कर दिया। अपनी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ कर उन लोगों ने अपना राजनीतिक प्रभाव भी स्थापित कर लिया।

मुगलों के अधीन शिक्षा एवं साहित्य का विकास

(Growth of Education and Literature)

मुगलकाल शैक्षणिक एवं साहित्यिक विकास के लिए भी विख्यात है। मुगलकाल में शिक्षा एवं साहित्य की जितनी प्रगति हुई उतनी तुर्क-अफगानकाल में नहीं हो सकी थी। यद्यपि राज्य की ओर से जनता को शिक्षित करने के लिए नियमित विद्यालयों की स्थापना नहीं की गई थी परंतु मुगल शासकों की अभिरूचि ने शिक्षा एवं साहित्य के विकास को बढ़ावा दिया। मुगल बादशाह स्वयं अधिक पढ़े-लिखे नहीं थे, परंतु उनमें साहित्यिक रूझान था। इसलिए प्रचलित शैक्षणिक संस्थाओं को अनुदान देकर, विद्वानों राज्याश्रय एवं प्रोत्साहन देकर उन्होने इसके विकास में योगदान दिया। इस काल में हिंदू एवं इस्लामी भिक्षा पद्धति दोनों का विकास हुआ। फारसी, उर्दू, हिंदी, संस्कृत और क्षेत्रीय भाषाओं में उत्कृष्ट ग्रंथों की रचना की गई तथा अनेक संस्कृत ग्रंथों का फारसी भाषा में अनुवाद किया गया।

शिक्षा की व्यवस्था- यद्यपि बाबर और हुमायूँ का अधिकांश समय युद्धों एवं संघर्षों में व्यतीत हुआ तथापि उन लोगों ने इस क्षेत्र में रूचि दिखाई। बाबर के एक मंत्री सैयद मुकबर अली का कहना है कि बाबर के समय सुहरत-ए-आम विभाग का कार्य स्कूलों एवं कॉलेजों की स्थापना करवाना था। कहा जाता है कि बावर ने शिक्षा के विकास के लिए दिल्ली में एक मदरसा भी स्थापना करवाई, जहाँ धार्मिक एवं अन्य विषयों की शिक्षा दी जाती थी। हुमायूं स्वयं अध्ययन में गहरी अभिरूचि रखता था। उसके प्रिय विषय भूगोल एवं खगोलशास्त्र थे। वह अपने साथ सदैव अच्छी-अच्छी पुस्तकें रखता था। उसने भी दिल्ली में एक मदरसा की स्थापना करवाई तथा पुराना किला स्थित शेरशाह के आरामगाह को एक पुस्तकालय में परिवर्तित कर दिया। इसी पुस्तकालय की सीढ़यों से गिरकर उसकी मृत्यु भी हुई।

मुगल सम्राटों में शिक्षा के क्षेत्र में सबसे अधिक प्रगति अकबर महान के काल में हुई। यद्यपि अकबर स्वयं अधिक पढ़ा-लिखा नहीं था, तथापि उसके संरक्षण में शिक्षा एवं साहित्य की अभूतपूर्व वृद्धि हुई । अपने दरबार के विद्वानों के प्रभाव में आकर उसने हिंदू-मुस्लिम शिक्षा के विकास के लिए अनेक कदम उठाए। फतेहपुर सीकरी, आगरा एवं अन्य स्थानों पर इस्लामी शिक्षा के प्रसार के लिए विद्यालयों की स्थापना की गई। हिंदुओं को भी नई शैक्षणिक संस्थाओं को खोलने, पुराने विद्यालयों की मरम्मत रने एवं उनका कार्य सुचारु रूप से चलाने के लिए प्रोत्साहित किया गया। अबुलफजल ने भी सीकरी में एवं माहम अनगा ने दिल्ली में एक मदरसा की स्थापना की। अकबर ने प्रचलित इस्लामी शिक्षा के पाठ्यक्रम में भी परिवर्तन किया। विद्यार्थियों को समाजशास्त्र, नैतिक आचरण के नियम, हिसाब, ज्योतिषशास्त्र चिकित्सा शास्त्र, इतिहास, दर्शन शाल जैसे विषयों की शिक्षा दी जाती थी। व्यावसायिक एवं कलात्मक शिक्षा की भी व्यवस्था की गई। अकबर की धार्मिक निरपेक्षता की नीति के कारण इस्लामी शिक्षा के साथ-साथ भारतीय शिक्षा का भी प्रसार इस समय हुआ। हिंदुओं को पूर्ण शैक्षणिक स्वतंत्रता प्रदान की गई। परिणामस्वरूप, व्याकरण, न्याय, मीमांसा, वेद, पुराण-सभी विषयों की शिक्षा की प्रगति हुई।

जहाँगीर और शाहजहाँ ने भी शिक्षा के विकास के लिए प्रयास किए । जहाँगीर स्वयं अनेक भाषाओं का अच्छा शता था। अत: उसने विद्वानों को संरक्षण एवं प्रोत्साहन दिया। उसके समय में भी अनेक शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना हुई। उसने लावारिस संपत्ति का उपयोग शिक्षा के विकास के लिए भी किया। नूरजहाँ ने विभिन्न ललितकलाओं की शिक्षा के विकास को बढ़ावा दिया। जहाँगीर के समय में साम्राज्य की राजधानी आगरा शिक्षा के विकास को बढ़ावा दिया। जहाँगीर के समय में साम्राज्य की राजधानी आगरा शिक्षा के एक प्रख्यात केंद्र के रूप में भी विख्यात हो गई थी। शाहजहाँ ने भी विद्वानों को प्रश्रय दिया। उसने दिल्ली में जामा मस्जिद के निकट एक मदरसा की स्थापना करवाई। शाहजहाँ का पुत्र दाराशिकोह एवं उसकी पुत्री जहाँआरा साहित्यिक अभिरुचि के व्यक्ति थे। दारा की गिनती अपने समय के प्रमुख विद्वानों में होती थी। वह अरबी, फारसी एवं संस्कृत भाषा का ख्याति प्राप्त विद्वान था। उसने अनेक पुस्तकों की रचना की तथा अनेकों का अनुवाद किया। जहाँआरा ने ललितकलाओं की शिक्षा में गहरी अभिरुचि ली तथा आगरा में एक मदरसा की स्थापना करवाई। औरंगजेब यद्यपि स्वयं अनेक भाषाओं एवं इस्लामी धर्म का महान ज्ञाता था, परंतु सामान्य जन के शैक्षणिक विकास के लिए उसने कोई सराहनीय प्रयास नहीं किया। धार्मिक नीतियों के अनुरूप उसने इस्लामी शिक्षा के विकास को बढ़ावा दिया, अनेक मदरसे खुलवाए एवं इस्लामी शिक्षा के प्रसार को राजकीय संरक्षण एवं प्रोत्साहन दिया। उसी के समय में मदरसा-ए-रहीमिया की स्थापना हुई, जो इस्लामी शिक्षा का सबसे बेहतरीन विद्यालय था।अपने पूर्वजों की नीतियों के विरूद्ध औरंगजेब ने हिंदू शिक्षा के विकास को प्रतिबन्धित करने का प्रयास किया, उनके अनुदान बंद कर दिये गये ललितकलाओं की शिक्षा पर पाबंदी लगा दी गई तथा राजकीय इतिहास विभाग को बंद करवा दिया गया। औरंगजेब की नीतियों से हिंदू-शिक्षा की प्रगति को आघात पहुंचा, परंतु देशी राज्यों (राजपूत राज्य) की उदारता एवं संरक्षकता ने अनेक भारतीय शिक्षण संस्थाओं को सुचारू रूप से चलने में सहायता पहुंचाई। औरंगजेब के बाद फारसी भाषा की शिक्षा ही प्रधान हो गई । उत्तर-मुगलकालीन शासक स्वयं इतने संकटों में घिरे हुए थे कि वे शिक्षा के विकास की तरफ ध्यान ही नहीं दे सके।

स्त्री-शिक्षा एवं प्रमुख शैक्षणिक केंद्र- मुगल काल में स्त्रियों की शिक्षा की समुचित व्यवस्था नहीं हुई। यद्यपि शाही परिवार एवं अन्य राजपरिवारों तथा उच्च वर्ग की बालिकाओं एवं स्त्रियों को शिक्षा दी जाती थी, परंतु सामान्यजन के शिक्षा की कोई भी व्यवस्था नहीं थी । इन्हें मुख्यतः धर्म,नैतिकता एवं विभिन्न ललितकलाओं की शिक्षा दी जाती थी। मुगलकाल में शाही परिवार की महिलाएं अपनी विद्गता एवं कला-कौशलप्रियता के लिए विख्यात थीं। इनमें प्रमुख थीं बाबर की पुत्री गुलबदन बेगम, हुमायूँ की भतीजी सलीमा सुल्ताना, नूरजहाँ, मुमताजमहल, जहाँआरा और जेब्बुनिस्सा। इनमें अनेकों ने फारसी और अरबी में कविताएँ एवं ग्रंथ लिखीं। मुगलकाल में शिक्षा के विकास के कारण अनेक नगर शैक्षणिक केंद्र के रूप में विख्यात हुए। इस्लामी शिक्षा के प्रमुख केंद्र दिल्ली, आगरा, फतेहपुर सीकरी, लाहौर एवं भारतीय शिक्षा एवं भाषा के केंद्र बनारस, मिथिला, हरिद्वार, उज्जैन इत्यादि थे। इन शिक्षण संस्थाओं की स्थापना राजवंशों और उच्चवर्गों के व्यक्तियों के निजी प्रयासों से हुआ था उनके ही अनुदान पर ये संस्थाएँ चलती थीं। अत: शिक्षा की जो व्यवस्था हुई उसका लाभ भी उच्च एवं मध्यम वर्ग के लोगों ने ही उठाया, जनसाधारण को इसका कोई लाभ नहीं मिला।

साहित्यिक प्रगति- फारसी साहित्य मुगलकाल में फारसी, उर्दू, संस्कृत, हिंदी एवं क्षेत्रीय भाषाओं बँगला, मराठी, पंजाबी, गुजराती, राजस्थानी, उड़िया, में अनेक ग्रंथों की रचना हुई। फारसी, अरबी, एवं संस्कृत के उत्कृष्ट ग्रंथो का अनुवाद भी किया गया। साहित्यिक विकास को राजदरबारों के संरक्षण से विशेष सहायता मिली। स्वयं मुगल बादशाहों एवं राजपरिवारों के अनेक विद्वानों ने उत्कृष्ट साहित्यिक ग्रंथों की रचना की।

मुगलों के समय में फारसी राजभाषा बन गई थी, अत: साहित्यिक ग्रंथों की रचना फारसी में ही हुई। फारसी भाषा में इतिहास, जीवन-वृतान्त, काव्य, संस्मरण लिखे गए एवं संस्कृत के प्रमुख ग्रंथों का फारसी भाषा में अनुवाद हुआ। भारत के प्रथम मुगल सम्राट बाबर ने स्वयं अपनी जीवनी तुजुक-ए-बाबरी अथवा बाबरनामा तुर्की भाषा में लिखी। इसके अतिरिक्त उसने कुछ कविताएं लिखी तथा बाबरी लिपि का प्रसार किया। उसके समय में मिर्जा हैदर ने तारीख-ए-रशीदी एवं सैयद मुकब्बर अली ने तवारीख नामक ग्रंथों की रचना की। हुमायु के समय में भी अनेक ग्रंथ लिखे गए। उसकी बहन गुलबदन बेगम ने हुमायूँ की जीवनी हुमायूंनामा लिखी जिससे हुमायूँ के कार्यकलापों के विषय में महत्वपूर्ण जानकारियाँ मिलती है । हुमायूँ के समय की अन्य महत्वपूर्ण रचनाओं में खबन्दमीर की कानून-ए-हुमायूँनी, जौहर की तजकीरात-उल वाकयात एवं शेख वजायिद की तारीख-ए-हुमायूँ का उल्लेख किया जा सकता है।

साहित्यिक विकास के दृष्टिकोण से अकबर का शासनकालीन मुगलकालीन भारतीय इतिहास का स्वर्णयुग माना जा सकता है। उसके दरबार में अनेक विद्वान एवं कवि थे। इनमें प्रमुख अबुलफजल, अब्दुर्ररहीम खानखाना, बदायूँनी, गिजाली, फैजी, महेश ठाकुर इत्यादि थे। अकबर ने इन विद्वानों को संरक्षण एवं प्रोत्साहन दिया। उसने प्रमुख साहित्यिक ग्रंथों के लिए एक अनुवाद विभाग की स्थापना भी करवाई। अकबर के समय का फारसी साहित्स मुख्यतय: तीन श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है-ऐतिहासिक ग्रंथ, अनूदित ग्रंथ, कविताएं एवं पद्य। अकबर के समय के सर्वश्रेष्ठ ऐतिहासिक ग्रंथ हैं – आइन-ए-अकबरी एवं अकबरनामा (लेखक-अबुलफजल), मुन्तखाब-उत-तवारीख (लेखक-बदायूनी), तबकात-ए-अकबरी (लेखक- निजामुद्दीन अहमद), अकबरनामा (लेखक-फैज सरहिन्दी), तारीख-ए-सलातीन (लेखक-अहमद यादगार) तथा मासौर-ए-रहीमी (संकलन- अब्दर्ररहीम खानखाना)। अबुलफजल एवं बदायूंनी इस समय के सबसे अधिक ख्याति प्राप्त इतिहासकार थे। इनके अतिरिक्त भी अनेक ऐतिहासिक प्रथों की रचना अकबर के समय में हुई, जैसे-तवारीख-ए-हुमायूँ एवं तारीख-ए-अतल्फी। अकबर के समय में संस्कृत अरबी एवं अन्य भाषाओं की सर्वोत्तम पुस्तकों का अनुवाद भी किया गया। संस्कृत भाषा में रचित रचनाओं – महाभारत (राज्यनामा), रामायण लीलावती, अथर्ववेद राजतरंगिणी, नल दमयंती (नल-दामन) कलिया दमन (आयार दानिश) पंचतंत्र (अनवार सुहैली) तथा हरिवंश– इत्यादि का फारसी भाषा में अनुवाद किया गया। अरबी और तुर्की भाषाओं के अनेक ग्रंर्थों का भी अनुवाद फारसी में हुआ। बाबर की जीवनी एवं बाइबिल का भी फारसी अनुवाद निकाला गया। अकवार के समय में काव्य साहित्य की भी पर्याप्त प्रगति हुई। ख्याति प्राप्त कवियों ने अनेक दीवानों एवं मसनवियों की रचना की। कसीदे, रूबाइयां एवं गजल भी लिखे गए। गिजाली, फैजी और उर्फी का इस क्षेत्र में विशेष योगदान है।

जहाँगौर और शाहजहाँ के काल में भी पर्याप्त साहित्यिक प्रगति हुई। जहाँगीर स्वयं साहित्यिक अभिरुचि का व्यथित था। उसने भी अकबर की तरह विद्वानों एवं कवियों को राज्याश्रय प्रदान किया। जहाँगीर ने स्वयं अपनी आत्मकथा तुजुक-ए-जहाँगीरी लिखना आरंभ किया, परंतु इसे वह पूरा नहीं कर सका। इसे बाद में मोतमिद खाँ ने पूरा किया। मोतमिद खाँ ने इकबालनामा-ए-जहाँगीरी भी लिखी। जहाँगीर के समय की अन्य प्रमुख ऐतिहासिक रचनाएँ हैं मासिर-ए-जहाँगीर (लेखक-ख्वाजा कामगार) तथा तारीख-ए-फरिश्ता (लेखक-फरिश्ता)। जहाँगीर के समय में अनुवाद कार्य धीमा पड़ गया। शाहजहाँ के समय भी अनेक इतिहासकार हुए, जैसे अब्दुल हमीद लाहौरी और इनायत खाँ। लाहौरी ने पादशाहनामा और शाहजहाँनामा लिखीं। कजविनी ने एक दूसरी बादशाहनामा लिखी। एक अन्य विद्वान मुहम्मद सालिह ने अमल-ए-सालिह की रचना की । शाहजहाँ के ज्येष्ठ पुत्र दाराशिकोह ने भीइ कुछ मूल मंथ लिखे एवं अनेकों का अनुवाद फारसी भाषा में किया। दारा का प्रमुख पंथ मज्जमउल बहरीन है। दारा के प्रयासों से अनेक उपनिषों, भागवत गीता, योग वशिष्ट, रामायण एवं प्रबोध चंद्रोदय का अनुवाद भी हुआ। शाहजहाँ के समय में रुबाइयाँ, दीवान गजल एवं कसीदा की भी रचना हुई।

औरंगजेब और उसके पश्चात फारसी साहित्य का विकास धीमा पड़ गया। औरंगजेब इतिहास लेखन को पसंद नहीं करता था। इसलिए इस समय ऐतिहासिक ग्रंथों की रचना कम हुई। काव्य एवं कला-कौशल संबंधी पंथ भी कम ही लिखे गए। औरंगजेब के शासनकाल की रचनाओं में प्रमुख हैं – मुतंखब-उल-लुबाब (लेखक खाफीखा) आलमगीर नामा (लेखक- मिर्जा मुहम्मद काजिम) फतुहात-ए-आलमगीरी (लेखक ईश्वरदास) तथा खुलासत-उत-तवारीख (लेखक-सुजान राय)। उत्तरकालीन मुगलकाल की सर्वाधिक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक रचना है गुलाम हुसैन द्वारा लिखित सियरूलमुताखरीन । औरंगजेब के काल में फारसी भाषा में भारतीय शास्त्रीय संगीत पर भी अनेक पुस्तकें लिखी गई। इस काल में फारसी का स्थान धीरे-धीरे उर्दू ने ले लिया।

उर्दू साहित्य- फारसी के अतिरिक्त मुगलकाल में उर्दू भाषा एवं साहित्य का भी विकास हुआ। यह जनसाधारण की भाषा थी। उत्तर मुगलकाल में इसका अधिक विकास हुआ। उर्दू को सरस एवं लोकप्रिय बनाने का श्रेय मुगल बादशाह मुहम्मदशाह को दिया जाता है। उसने सरकारी कामकाज की भाषा के रूप को अपनाकर इसका प्रसार किया। उर्दू के प्रसिद्ध कवियों एवं विद्वानों में नुसरती बीजापुरी, पली औरंगाबादी, हातिम, अफजली इलाहाबादी के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

हिंदी साहित्य- मुगलकाल हिन्दी भाषा एवं साहित्य के विकास का एक प्रमुख चरण है। हिंदी भाषा एवं साहित्य के विकास को तत्कालीन भक्ति आंदोलन ने गहरे रूप से प्रभावित किया। मुगलकाल में हिंदी साहित्य की विभिन्न धाराओं का विकास हुआ। प्रेममार्गी सूफियों ने प्रेम से ओत-प्रोत ग्रंथों की रचना की प्रेममार्गो सूफी शाखा के सबसे विख्यात कति मलिक मुहम्मद जायसी थे। उन्होंने पदमावत, अखरावट एवं आखिरी कलाम में प्रेम एवं सूफी दर्शन का अनूठा वर्णन किया हैं। इस समय अनेक निर्गुणपंथी कवि भी हुए, जैसे- कबीरदास, दादू दयाल, मलूकदास एवं नरहरि । इन लोगों ने जनसाधारण के बीच अपने दोहों द्वारा निर्गुणपंथी विचारधारा का प्रसार किया। राममार्गी विचारधारा के प्रवर्तक तुलसीदास थे। उन्होने

रामचरितमानस, गीतावली, कवितावली दोहावली और विनयपत्रिका के माध्यम से रामभक्ति के महत्व का प्रचार किया। तुलसी के विपरीत सूरदास ने कृष्ण को अपना आरध्यदेव बनाया और उनके जीवन के माध्यम से कृष्ण भक्ति का प्रचार किया । सूरदास की अमरकृति सूरसागर है। सूर के अतिरिक्त मीराबाई, रसखान, एवं नंददास ने भी कृष्णभक्ति का प्रचार किया। मीराबाई के गीतों , रसखान के सवैयों एवं नन्ददास के भ्रमरगीत से कृष्णभक्ति का विकास हुआ। भक्तिमार्ग के अतिरिक्त मुगलकाल में हिंदी साहित्य के क्षेत्र में रीतिकालीन शाखा का भी विकास हुआ। रीतिकालीन कवियों ने श्रृंगार रस से ओत-प्रोत रचनाएँ लिखीं। रीतिकालीन कवियों में संगसे अधिक विख्यात केशतदास हैं। वे ओरछा नरेश के दरबारी थे। उनकी रचनाएं हैं- कविप्रिया, रिसकप्रिया एवं अलंकार मंजरी। सेनापति, देव, बिहारी, अन्य रीतिकालीन कवि थे। कवि भूषण ने वीर-रस से संबंधित रचनाएँ लिखीं। उनकी प्रसिद्ध कृति है शिवराज भूषण । अदरहीम खानखाना ने फारसी के अतिरिक्त हिंदी में भी दोहे लिखे। जहाँगीर और शाहजहाँ के दरबार में भी हिंदी के विद्वान एवं कवि रहते थे। राजा सूरज सिंह, विशनदास, सुंदर कविराय, चिंतामणि, कवींद्र आयार्य इनमें प्रमुख हैं। मुगलकाल में ही सिंहसनबत्तीसी, बारहमासा, काव्यविवेक इत्यादि हिंदी ग्रंथों की रचना हुई।

संस्कृत साहित्य- फारसी, हिंदी अथवा उर्दू की तरह मुगलकाल में संस्कृत का समुचित विकास नहीं हो सका। अकबर ने संस्कृत के विकास में भीर रुचि ली एवं इसे भी प्रोत्साहन एवं संरक्षण प्रदान किया। अकबर के समय में फारसी-संस्कृत शब्दावली एवं भाषा कोश‌(फारसी प्रकाश) लिखा गया । महेश ठाकुर ने संस्कृत में अकबर के समय का इतिहास लिखा। संस्कृत के विकास में जैनों का भी योगदान था। जैन आचार्य पदमसुंदर एवं सिद्धचंद्र ने क्रमशः अकबरशाही श्रृंगार दर्पण एवं भानुचंद्रचरित लिखी। हरिसौभाग्यम नामक पुस्तक की रचना भी अकबर के समय में ही हुई। अकबर के पश्चात संस्कृत का समुचित विकास नहीं हो सका।

क्षेत्रीय भाषा एवं साहित्य- मुगलकाल में क्षेत्रीय भाषाओं का भी विकास हुआ। बंगला मराठी, पंजाबी, गुजराती, उड़ीया, राजस्थानी, तमिल, तेलगू में काव्य एवं विभिन्न प्रकार के ग्रंथ लिखे गए। वैष्णव धर्म के प्रसार ने बंगला भाषा एवं साहित्य के विकास को विशेष रूप से प्रभावित किया। बंगला भाषा के कवियों में प्रमुख थे- कृष्णदास कविराज, वृंदावनदास, जयनंद, नरहरि चक्रवर्ती एवं मुकुंदराम चक्रवर्ती। बंगला की प्रमुख रचनाओं में उल्लेखनीय हैं- चैतन्य-चरितामृत चैतन्य भागवत चैतन्यमंगल भक्ति रत्नाकर, कवि किंकणचंडी एवं कृतिवास की रामायण । दक्षिण भारत मलयालम में अनेक ग्रंथ लिखे गए। एकनाथ और तुकाराम की रचनाओं से मराठी साहित्य एवं सिख गुरुओं की रचनाओं से पंजाबी भाषा का विकास हुआ।

मुगलकाल में यद्यपि साहित्यिक गतिविधियाँ राजदरबार में धीमी पड़ गयी तथापि बहादुरशाह और मुहम्मदशाह ने साहित्यिक गतिविधियों में रुनि लो । क्षेत्रीय स्तर पर विशेषकर बंगाल में मुर्शिद कुली खाँ, अलीवर्दी खां एवं राजा कृष्णचंद्र ने भी साहित्यिक विकास में अभिरुचि ली।

इतिहास – महत्वपूर्ण लिंक

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