शिक्षाशास्त्र

शिक्षा में अस्तित्ववाद | अस्तित्ववाद के अनुसार शिक्षा का तात्पर्य | अस्तित्ववाद के अनुसार शिक्षा के उद्देश्य | अस्तित्ववाद के अनुसार शिक्षा का पाठ्यक्रम

शिक्षा में अस्तित्ववाद | अस्तित्ववाद के अनुसार शिक्षा का तात्पर्य | अस्तित्ववाद के अनुसार शिक्षा के उद्देश्य | अस्तित्ववाद के अनुसार शिक्षा का पाठ्यक्रम

शिक्षा में अस्तित्ववाद

अस्तित्ववाद का आरम्भ हीगेल के स्वीकारात्मक आदर्शवाद का विरोध है ऐसा कहा जाता है। वही नहीं इसमें मनुष्य का विश्वास अपने आप ही रहता है न कि ईश्वर जैसी अलौकिक सत्ता में। इस प्रकार से यह अहवादी चिन्तन की एक विशेष धारा है। मनुष्य एकान्तप्रिय होते हुए भी समाज में रहने वाला तो होता है जिसे दूसरों के साथ व्यवहार करना जरूरी है। ऐसी स्थिति में उसे शिक्षा की तो जरूरत पड़ेगी ही । अस्तु अस्तित्ववादी भावना रखने वाले तदनुरूप शिक्षा की परिकल्पना भी करेंगे। शैक्षिक प्रसंगों के संदर्भो में अस्तित्ववादी दर्शन का प्रयोग बहुत ही कम हुआ है। भारत में तो ऐसे शिक्षा दर्शन का नितान्त अभाव है, सम्भवतः इसका कारण यह है कि हमारा ध्यान इस दर्शन की ओर नहीं रहा है। पाश्चात्य देशों में प्रो० मॉरिस और प्रो० नेलर तथा प्रो० बुबेकर के ध्यान इस ओर गये और परिणामस्वरूप इन लोगों के प्रयास से कुछ शिक्षा साहित्य का निर्माण भी हुआ है। इस दृष्टि से कुछ ध्यान अस्तित्ववादी शिक्षा दर्शन पर दिया जाना जरूरी है। हम शिक्षा के तात्पर्य, उद्देश्य, शिक्षाविधि, पाठ्यक्रम आदि के सम्बन्ध में इसे नीचे दे रहे हैं-

अस्तित्ववाद के अनुसार शिक्षा का तात्पर्य-

शिक्षा के क्षेत्र में अस्तित्ववाद का विकास अभी नहीं के बराबर समझा जा रहा है और वास्तविकता भी है। ऐसी स्थिति में शिक्षा का तात्पर्य इस दार्शनिक विचारधारा के अनुसार क्या है यह सही-सही कहना कठिन है। फिर भी अस्तित्ववादी विचारकों के दृष्टिकोण को सामने रख कर हम शिक्षा के तात्पर्य पर ध्यान दे सकते हैं। आधुनिक युग में मानवीय सक्रियता का स्रोत विज्ञान है और इसी सक्रियता ने अहंवेष्ठित मनुष्यता को जाग्रत किया है जो अस्तित्ववाद में मिलता है। यह अहंवेष्ठित सक्रियता मनुष्य जीवन के सभी क्षेत्र में मिलती है। फलतः अस्तित्ववाद के विचार से शिक्षा भी मानव की एक क्रिया या प्रक्रिया है।

शिक्षा एक मानवीय प्रक्रिया है, प्रयास है। परन्तु इसका सम्बन्ध मनुष्य के व्यक्तिगत जीवन से ही होता है, सामाजिक परिप्रेक्ष्य में मनुष्य की शिक्षा का कोई महत्व नहीं है। इसका कारण यह है कि अस्तित्ववादी केवल अहं चेतना से अभिभूत होता है। जब इस प्रकार की चेतना मनुष्य में होती है तो शिक्षा केवल अपनी व्यक्तिगत अनुभूति के रूप में पाई जाती है। यह अनुभूति सुखद, दुःखद, उपेक्षापूर्ण, एकान्तप्रिय या लोकप्रिय भी हो सकती है।

अस्तित्ववाद के अनुसार शिक्षा का एक और तात्प है। अस्तित्ववाद के कारण प्रत्येक व्यक्ति का अपना ही विशेष अस्तित्व होता है और उसे विशिष्टता की अभिव्यक्ति वह शिक्षा की क्रिया के द्वारा करता है। अस्तु अस्तित्ववादी के लिए शिक्षा एक प्रकार से व्यक्तिवादी प्रयत्न कही जा सकती है।

अस्तित्ववादी अपने अहं की अभिव्यक्ति में स्वतन्त्र होता है। यह एक प्रकार से मनोवैज्ञानिक सत्य भी है और विशेष कर शिक्षा के क्षेत्र में। समाज में जनतंत्र के रूप में व्यक्ति की स्वतन्त्र अभिव्यक्ति पाई जाती है। अतः स्पष्ट है कि अस्तित्ववाद शिक्षा को व्यक्ति के अपने निजी अस्तित्व का तादास्य तथा पहचान की स्वतन्त्र अभिमानता है।

निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि अस्तित्ववाद के अनुसार शिक्षा वह प्रक्रिया है जिससे मनुष्य की व्यक्तिगत पहचान संसार में की जाती है।

अस्तित्ववाद के अनुसार शिक्षा के उद्देश्य-

ऊपर के विचारों से हम अस्तित्ववाद के अनुसार शिक्षा के उद्देश्य पर भी दृष्टि डाल सकते हैं। अस्तित्ववाद के विवेचन से हमें शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्य मिलते हैं :-

(क) व्यक्तिगत अस्तित्व को पहचानना अस्तित्ववाद के अनुसार शिक्षा का मुख्य उद्देश्य मनुष्य को अपने आपको जानने-समझने के लिए सक्रिय और सजग करना होता है। शिक्षा मनुष्य क्या है यह बताती है मनुष्य के अस्तित्व के तत्वों को प्रकट करती है। तभी तो वह प्रगति के लिए मृत्यु तक का सामना करते हुए बढ़ता है।

(ब) यक्तिगत गुणों एवं मूल्यों का विकास करना अस्तित्ववादी विचारकों ने मनुष्य में “उत्तरदायित्व”, “स्वतन्त्रता”, “चयन”, “सृजनशीलता” और “आत्म निर्माण” के गुणों एवं मूल्यों की अपेक्षा की है। शिक्षा का उद्देश्य इन व्यक्तिगत गुणों एवं मूल्यों का विकास करना अस्तित्ववाद के अनुसार कहा जा सकता है।

(ग) मनुष्य की अहं भावना और संकल्प का विकास करना  इस सम्बन्ध में हम प्रो० मार्टिन हीडेगर के शब्दों पर विचार करें-“सही व्यक्तिगत अस्तित्व ऊपर से रखे गये और भीतर संकल्प किये गये का एक संश्लेषण है।” इसी प्रकार से प्रो० कार्ल जैस्पर्स ने भी लिखा है कि “अस्तित्व मैं-हूँ यही नहीं है बल्कि मैं-क्या-हूँ? जिसका समाधान मैं-क्या-हूँगा। इसमें होता है?” इससे साफ ज्ञात होता है कि मनुष्य की शिक्षा का उद्देश्य उसकी अहं भावना के साथ संकल्प का भी विकास करना है।

(घ) व्यक्तिगत आत्म-प्रज्ञा का विकास करना  मनुष्य एक पत्थर या एक पौधा नहीं है। इस कथन से दो बातें मालूम होती हैं कि मनुष्य यंत्रवत नहीं बल्कि अपनी मेधा और आत्मप्रज्ञा से काम करता है, और दूसरे वह संकल्प का प्रयोग करके निर्णयपूर्ण ढंग से काम करता है। शिक्षा का उद्देश्य ऐसे ही मनुष्य का निर्माण करना है। अस्तु, अस्तित्ववाद के अनुसार शिक्षा का एक उद्देश्य व्यक्तिगत आत्मप्रज्ञा का विकास करना है तथा मनुष्य को अपने कार्यों के प्रति एक निर्णय लेने की सामर्थ्य प्रदान करना है।

(ड.) व्यक्ति का सामाजिक और नैतिक विकास करना  यद्यपि यह उद्देश्य सभी अस्तित्ववादियों को मान्य नहीं है फिर भी कुछ लोग इसके पक्ष में है। प्रो० मारजरी ग्रीन ने लिखा है कि “अस्तित्ववाद एक नई नैतिक की ओर एक साहसपूर्ण और ईमानदार प्रयल है। इसके अलावा प्रो० हीडेगर ने लिखा है कि “मानवीय अस्तित्व एक भागीदारी अस्तित्व है। प्रो० सात्र ने लिखा है कि “मेरी पहचान दूसरे के साथ होनी चाहिए, ऐसा नहीं है कि मैं केवल मैं ही हूँ दूसरे से विलग होकर ।” इन सबके कथनों से शिक्षा का उद्देश्य सामाजिक एवं नैतिक विकास समझा जा सकता है।

(च) जीवन की पीड़ा यातना के लिये तैयार करना अस्तित्ववाद एक पीड़ा-यातना-युक्त दृष्टिकोण है और इसलिए अस्तित्ववादी के लिए पीड़ा-यातना का भोग ही उसकी नियति है, अन्तिम लक्ष्य है। मानव अस्तित्व का फलागम यही पीड़ा-यातना है, उससे मुक्ति नहीं जैसा कि आदर्शवादी दर्शन मानता है। अतः मनुष्य की शिक्षा का एक उद्देश्य मनुष्य को इस योग्य बनाना है कि वह पीड़ा-यातना भोगने में समर्थ हो सके।

अस्तित्ववाद के अनुसार शिक्षा का पाठ्यक्रम-

अस्तित्ववाद चिन्तन की वह विधा है जो मानव व्यक्तिगत अनुभूति से सम्बन्ध रखता है। इसी आधार पर अस्तित्ववादी दार्शनिक पाठ्यक्रम एवं पाठ्यवस्तु का संगठन करता है। अस्तित्ववादी विचारक के अनुसार शिक्षा का पाठ्यक्रम कितना व्यापक होता है यह प्रो० नीत्से के शब्दों से प्रकट होता है। “जंगल, चट्टानें, हवाएँ, गिद्ध, फूल, तितली, घास के मैदान, पहाड़ के डाल अपनी भाषा में उससे (मनुष्य से) अवश्य कहते हैं, उनमें वह अपने आपको अगणित चिन्तनों और प्रतिमाओं में, परिवर्तनीय दृश्यों के विभिन्न सम्पूर्ण में जैसा कि वे होते हैं, जानता है।”

अस्तित्ववादी पाठ्यक्रम में क्रमशः कला, साहित्य, इतिहास, विज्ञान, धर्म, दर्शन व मनोविज्ञान एवं विभिन्न प्रकार की क्रियाओं को महत्वपूर्ण माना जाता है। कला सबसे अधिक महत्व वाला विषय है क्योंकि कला विद्यार्थी के समक्ष अस्तित्व की समग्रता को प्रकट करती है और आत्मगत दुनिया का ज्ञान देती है तथा स्वतन्त्रता का स्रोत है। साहित्य कला के बाद महत्वपूर्ण विषय है। साहित्य और कला दोनों आत्माभिव्यक्ति के साधन हैं। व्यक्ति के आत्मा का स्वतन्त्र प्रकाशन इन्हीं के माध्यम से होता है।

इनके बाद इतिहास का विषय आता है। इतिहास घटनाओं का वर्णन एवं विवरण मात्र ही नहीं है बल्कि उसमें आत्मगत भावना की अभिव्यक्ति भी होती है। अतः इतिहास भी शिक्षा का एक महत्वपूर्ण विषय है। प्राकृतिक एवं सामाजिक विज्ञान इतिहास के बाद अनुभूतिमूलक विषय हैं। सभी वस्तुएँ मनुष्य को उत्तेजित करती हैं, और उसकी भावनाओं को छूती हैं। सभी विज्ञान व्यवहार के विकास में सहायक होते हैं। अस्तित्ववादी ‘व्यावहारिक विशिष्टीकरण” पर जोर देते हैं जो एक कारखाने में काम करने वाला मजदूर चाहता है। धर्म, दर्शन और मनोविज्ञान वैयक्तिक दृष्टिकोण से अध्ययन के महत्वपूर्ण विषय हैं।

क्रियाओं की ओर भी अस्तित्ववादियों का झुकाव होता है। ऐसी दशा में भ्रमण, मनोरंजन, कार्य आदि से सम्बन्धित क्रियाओं को पाठ्यक्रम में स्थान दिया गया है। ऐसी स्थिति में कुछ लोग धर्म को भी उचित बल देकर पाठ्यक्रम में रखते हैं। जीवन-संघर्ष एवं मृत्यु-आह्वान भी एक प्रकार की वांछनीय क्रियाएँ हैं। इनको पाठ्यक्रम में स्थान दिया गया है।

अस्तित्ववाद के अनुसार शिक्षा की विधि-

अस्तित्ववाद एक प्रकार से चिन्तन का व्यक्तिगत दृष्टिकोण है। अतः स्पष्ट है वह समूहवादी न होकर व्यक्तिवादी ढंग से शिक्षा देने-लेने के पक्ष में है। इस विचार से अस्तित्ववादी शिक्षाशास्त्री (क) वैयक्तिक विधि के प्रयोग पर जोर देते हैं। इनसे स्वतन्त्र चिन्तन एवं क्रियान्वयन सम्भव होता है। (ख) स्वप्रयल की विधि या स्वयं खोज की विधि जिसे अंग्रेजी में “ह्यूरिस्टिक मेथड” कहा जाता है, के प्रयोग पर अस्तित्ववादी बल देते है। इसमें भी शिक्षार्थी एवं शिक्षक को अपने आप अध्ययन करने की स्वतन्त्रता होती है। (ग) अन्तर्ज्ञान की विधि या अंग्रेजी में ”इन्ट्यूटिव मेथड’ भी अस्तित्ववादी को प्रिय होती है क्योंकि इससे आत्म चिन्तन का अच्छा अवसर मिलता है। (घ) प्रयोगशाला विधि के द्वारा मनुष्य के आत्म को अधिक सन्तुष्ट किया जा सकता है। प्रयोग स्थिति में व्यक्ति को स्वतन्त्र निरीक्षण का अवसर मिलता है। मनुष्य बिना दूसरों के बाधा डाले अपने आप कार्य करता है। अस्तु, प्रयोग एवं निरीक्षण की विधि अस्तित्ववादियों को स्वीकार है। परन्तु इस विधि में जड़ता और वस्तुनिष्ठता के स्थान पर अन्तःक्रिया शीतलता, अन्तर्चेतना और अन्तरानुभूति होती है। ऐसी मनोदशा होने से यह एक प्रकार की “आत्म प्रयोग” और “आत्म-निरीक्षण’ विधि हो जाती है जिसमे निजी-आत्मवेछिता होता है। इसका कारण यह है कि “मनुष्य अपने जीवन काल में जो भी अध्ययन करता है, अथवा अनुभव प्राप्त करता है उनके फलस्वरूप उसकी चेतना एवं भावना में जो कुछ माना जाता है वही ज्ञान है” और ज्ञान प्राप्ति की अच्छी विधि आत्म-निरीक्षण एवं आत्म-प्रयोग की है। (ङ) आत्मीयकरण के साथ समस्या विधि के प्रयोग के पक्ष में अस्तित्ववाद है। यद्यपि वैज्ञानिक एवं समस्या विधि का प्रयोग अकेले करने के पक्ष में अस्तित्ववाद नहीं है क्योंकि इसमें निर्वैयक्तिकता होती है। चिन्तन-मनन तथा आत्मीयकरण के साथ समस्या का समाधान होवे ऐसा अस्तित्ववादी मानते हैं। इसमें वैयक्तिकता निहित होती है। अतः आत्मीयकरण के साथ समाधान की विधि के पक्ष में अस्तित्ववादी हैं।

अस्तित्ववाद के अनुसार शिक्षक-

अत्यधिक व्यक्तिवादी दर्शन होने से अस्तित्ववाद शिक्षण के व्यक्तिवादी ढंग को ही स्वीकार करता है जिसमें प्रत्येक छात्र के लिए अलग-अलग शिक्षक होना चाहिए। शिक्षक स्वतन्त्र विचार वाला, स्वेच्छा से कार्य करने वाला, निजी मूल्यों के लिए आग्रह करने वाला, मृत्यु का सामना करने वाला होना चाहिए। अध्यापक वस्तुतः जीवन-मृत्यु के बीच सुख खोजने वाला व्यक्ति होता है और यही कारण एवं विश्वास वह छात्रों में लाने का प्रयास करता है। मृत्यु का सामना करने वाला साहसी होता है और शिक्षक में भी अदम्य साहस होता है, और सहनशीलता (Tolerance) होती है। शिक्षक शिक्षार्थी को अपने ही तरह तैयार करता है अशुभ, अन्याय, अत्याचार और असामाजिक तत्वों को दूर करने में शिक्षक अपने जान की बाजी लगा देता है और शिक्षार्थी से भी वह अपेक्षा रखता है कि वह भी इसे दूर करने में मृत्यु का स्वागत करे। यहाँ पलायनवाद नहीं बल्कि आत्म-नाशवाद है। अतः अहं की संतुष्टि है न कि अहं का प्रकाशन| इन गुणों से युक्त शिक्षक कहा जाता है।

अस्तित्ववादी शिक्षक व्यक्तिवादी चिन्तन एवं कार्यकर्ता होता है, वह अपने गुणों का अवरोपण और अनुकरण नहीं चाहता है। वह तो चाहता है कि छात्र के समक्ष वह विषय-वस्तु को ऐसे ढंग से प्रकट करे कि सत्य प्रकट हो जाये और छात्र स्वतन्त्र साहचर्य से अपने आप ग्रहण कर लें। साथ ही साथ वे सत्य की खोज में लगे रहें। अध्यापक यह भी चाहता है कि छात्रों में स्वतन्त्र, उदार, स्वचालित चरित्र का संगठन हो, उनका मस्तिष्क अपने-आप क्रिया करने में समर्थ हो, तथा छात्रों में आत्म-जाग्रति है। छात्रों को अपने आप सोचने, क्रिया करने में सहायता देना अध्यापक का कार्य है। इस प्रकार अस्तित्ववादी शिक्षक नवीन युग का ही अध्यापक होता है।

अस्तित्ववादी शिक्षक छात्रों को स्वयं अनुभूति करने की ओर ले जाने वाला होता है। ऐसी दशा में छात्र स्वयं खोजने वाला हो न कि दूसरों के निर्णयों एवं पूर्वाग्रहों को स्वीकार करे । अध्यापक यह नहीं चाहता है कि छात्र बिना अनुभूति के कोई र सत्य स्वीकार कर ले। इसके लिए अध्यापक का कर्तव्य है कि वह छात्रों के समक्ष जीवन की एकान्त, कुण्ठा, वैयक्तिकता उपस्थित करे और इनसे प्रभावित होकर जीवन के सत्य की अनुभूति छात्र करे, उसमें आत्मनिर्भरता और दायित्व का विकास हो और वह अपने आपको निर्माण करे। ऐसी दशा में अध्यापक छात्र के लिए कोई सामाजिक आचरण की संहिता नहीं प्रस्तुत करता बल्कि उन परिस्थितियों को उपस्थित करता है जिनमें छात्र आत्म- निरीक्षण करने में समर्थ होता है। इन अनुभूतियों के माध्यम से शिक्षक शिक्षार्थी के व्यक्तित्व का विकास करता है। अस्तु, अस्तित्ववाद के अनुसार शिक्षक का उत्तरदायित्व अत्यधिक होता है, उसका कार्य कठिन होता है तथा सभी लोग शिक्षक होने का दावा भी नहीं कर सकते।

अस्तित्ववाद के अनुसार शिक्षार्थी-

शिक्षक के समान ही शिक्षार्थी के कर्तव्यों की संकल्पना अस्तित्ववाद में हुई। अस्तित्ववाद शिक्षार्थी को सर्वप्रथम एक व्यक्ति मात्र मानता है । अतएव सभी पूर्व धारणाओं को अस्तित्ववाद ठुकरा देता है। वह शिक्षार्थी को भौतिक जैविक एवं मस्तिष्क-युक्त प्राणी नहीं मानता है, न तो वह प्राकृतिक एवं सामाजिक वातावरण के साथ सामंजस्य रखने वाला प्राणी है। वह समूह का सदस्य नहीं है बल्कि एक व्यक्ति ही है जो अपनी अन्तरात्मा की अनुभूति करता है और तदनुसार कार्य-व्यवहार करता है। क्या शुभ है, क्या अशुभ है, कौन भिन्न, कौन सहायक है या बाधक है यह सब उसे चिन्ता नहीं रहती, वह अपने आप में निहित रहता है।

शिक्षार्थी एक स्वतन्त्र क्रियाशील और चिन्तनशील प्राणी है। अनुभूति एवं विचार से युक्त ऐसा प्राणी अपनी शिक्षा स्वयं ले लेता है। अतएव उसे अकेले ही शिक्षा दी जावे ऐसा अस्तित्ववाद मानता है। समूह की न उसे इच्छा है न उसे सामूहिक शिक्षा ही दी जा सकती है क्योंकि प्रत्येक शिक्षार्थी अपने आप में एक विचित्र प्राणी है।

प्रो० मॉरिस ने लिखा है कि “सज्जीवन का मार्ग या अस्तित्ववादी के शब्दों में प्रामाणिक जीवन सामाजिक चुनावों में अपने आपको समाहित करने के बजाय अपनी वैयक्तिकता या मूल्यांकन करके प्रत्येक व्यक्ति अपने आपको आत्म-प्रतीति में निहित है।” इसका तात्पर्य यह है कि अस्तित्ववाद शिक्षार्थी को “आत्म-मूल्यांकन” एवं “आत्म- प्रतीति” के लिए तैयार करने पर जोर देता है। यह कार्य अध्यापक के द्वारा होता है, इसे भी अस्तित्ववाद मानता है।

व्यक्ति अपने दायित्व को समझे, उसे पूरा करे और उसे पूरा करने में सक्रिय बना रहे। अतः आधुनिक दार्शनिक विचारधारा के अनुसार ही अस्तित्ववाद शिक्षार्थी को एक सक्रिय प्राणी मानता है जो अपनी उन्नति, अपना विकास अपने आप के निर्णयों के अनुसार करता है। छात्र अपनी व्यक्तिगत विशेषता का विचार रखता है और यह ध्यान रखता है कि “कहीं वह समाज की भीड़ में खो न जावे’ इसका तात्पर्य यह नहीं है कि उसमें अहंकार होता है, बल्कि अपने-आप पर ही ध्यान देता है चाहे दूसरे को अच्छा लगे या अच्छा न लगे, यह अवश्य है कि छात्र को अच्छा अवश्य लगे।

अपने “व्यक्तित्व” के विकास की ओर प्रत्येक शिक्षार्थी का ध्यान होना चाहिए। प्रो० सार्त्र ने लिखा है कि “….वह अपने आपको जो चाहेगा बना लेगा”। इन शब्दों में यह संकेत है कि शिक्षार्थी में संकल्प की तीव्रतम भावना होती है। इसी तीव्रतम संकल्प से उच्चतम व्यक्तित्व का निर्माण सम्भव होता है। ऐसे व्यक्तित्व में नीचे लिखे गुण अस्तित्ववाद के अनुसार पाये जाने चाहिए-

(क) आत्म चिन्तन की शक्ति होना ।

(ख) भावनाओ व इच्छाओं की स्वतन्त्र अभिव्यक्ति होना।

(ग) क्रियाशील होना, कार्य में लगे रहना।

(घ) स्वतन्त्रता-प्रिय होना, आत्म-प्रकाशन में प्रयल करते रहना।

(ङ) आत्मा को शुद्ध बनाए रखना, आत्म-केन्द्रित रहना।

(च) ज्ञान की खोज में लगे रहना चाहे अन्त ही क्यों न हो जावे।

(छ) शिक्षार्थी एवं शिक्षक में वैयक्तिक सम्बन्ध होना ।

अस्तित्ववाद के अनुसार अनुशासन-

अस्तित्ववाद अनुशासन को भी भावात्मक दृष्टि से देखता है। अस्तित्ववाद ने शिक्षा को आत्म विकास की एक क्रिया माना है जो व्यक्ति की अनुभूतियों से सम्भव होती है। ऐसी दशा में उसका मूल मन्त्र “आत्म- उत्तरदायित्व की भावना” है। अतः यह स्पष्ट हो जाता है कि अस्तित्ववाद के अनुसार “आत्म अनुशासन” की आवश्यकता होती है। इस दशा में व्यक्ति अपने आपको समझने, अभिव्यक्त करने और प्रकाशित करने का प्रयत्न करता है। वह स्वतन्त्र रहता है परन्तु स्वच्छन्द नहीं होता है। इस आधार पर अस्तित्ववाद अनुशासन के “मुक्तिवादी” सिद्धान्त को मानता है।

अस्तित्ववादी विचारकों के अनुसार “स्वतन्त्रता से परे कोई नैतिक गुण नहीं होता है। सर्वोच्च नैतिकता स्वतन्त्रता का प्रतिमान है। दमन निम्नतम नैतिकता है।”

अस्तित्ववादी विचारकों का विश्वास है कि व्यक्ति के “आत्म” की विधेयात्मक स्वीकृति ही शुभ होती है। इसीलिए वे आत्म-उत्तरदायित्व के आधार पर अनुशासन स्थापित करने के पक्ष में हैं। इससे शिक्षार्थी को किसी प्रकार का संवेगात्मक धक्का नहीं लगता है। अस्तित्ववाद निधि ढंग से अनुभूति और व्यवहार की एक प्रवृत्ति है जिसमें आत्मसन्तुष्टि को केन्द्र मानते हैं। यह आत्म-उत्तरदायित्व के आत्म नियंत्रण में पाई जाती है। अतएव अस्तित्ववाद के अनुसार आत्मानुशासन छात्र में होना चाहिए।

अस्तित्ववाव के अनुसार विद्यालय-

प्राचीन दृष्टिकोण के अनुसार विद्यालय समाज से अलग होते थे। अस्तित्ववाद में भी कुछ ऐसी ही धारणा विद्यालय के सम्बन्ध में मिलती है क्योंकि जहाँ व्यक्ति को भीड़ में खो जाने का भय होता है, वहाँ विद्यालय- समाज को संकल्पना करना कठिन है। अतएव विद्यालय का अस्तित्व केवल शिक्षक- शिक्षार्थी के मेल में होता है। ऐसा विचार हमें प्राचीन काल के भारतीय आश्रमों में मिलता या। भारतीय शिक्षा के आश्रमों की झलक सुकरात में भी मिलती है जो अपने आप में एक संस्था था। आज भी भारत के धर्म गुरु अपने आप में एक संस्था होते हैं। इस दृष्टि से आधुनिक समय में पाये जाने वाले संगीत विद्यालय अस्तित्ववाद में नहीं मिलते हैं। विद्यालय समाज की आवश्यकता पूर्ति करने वाले तथा समाज की संस्कृति का संरक्षण एवं हस्तान्तरण करने वाले न होकर अस्तित्ववाद के अनुसार एक छोटे से परिवार, आश्रम या संगोष्ठी है जहाँ व्यक्तिवादी दृष्टि से प्रत्येक छात्र का व्यक्तित्व अलग-अलग विकसित किया जाता है। विद्यालय एक प्रकार का ऐसा वातावरण है जहाँ स्वतन्त्र अनुभूति का प्रत्येक को पूरा अवसर मिलता है। यदि विद्यालय का संगठन नहीं हो सकता तो उसी तरह किसी कक्षा का भी संगठन सम्भव नहीं है। परन्तु शिक्षा के लिए क्रियाओं एवं विषयों का चयन करना तो आवश्यक है। ऐसा अवसर “विश्वभारती” जैसी संस्था में मिलता है। अस्तु, ऐसी “विश्वभारती” संस्था एवं उसकी ‘कक्षा’ की संकल्पना अस्तित्ववाद में सम्भव होती है जहाँ छात्र अपनी स्वेच्छा से आत्म-विकास का अपने आप प्रयत्न करेगा।

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Pankaja Singh

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