शिक्षाशास्त्र

शिक्षा में प्रकृतिवाद का मूल्यांकन | प्रकृतिवादी शिक्षा के लक्षण

शिक्षा में प्रकृतिवाद का मूल्यांकन | प्रकृतिवादी शिक्षा के लक्षण

शिक्षा में प्रकृतिवाद का मूल्यांकन-

आलोचनात्मक दृष्टि डालने से हमें शिक्षा में प्रकृतिवाद का मूल्यांकन करने को मिलता है। इस क्रिया के फलस्वरूप हमें कुछ तथ्य दिखाई देते हैं जिन पर नीचे प्रकाश डाला जा रहा है।

(अ) शिक्षा के स्वरूप निर्धारित करने में संकुचित दृष्टिकोण होना- शिक्षा केवल मूल प्रवृत्तियों का उदात्तीकरण ही नहीं है बल्कि उससे भी अधिक शिक्षा मनुष्य को एक अपूर्व मानव बनाती है। (Education makes man a super-man)| प्रकृतिवाद इस ऊँचाई तक शिक्षा को नहीं ले गया है।

(ब) शिक्षा के उद्देश्य में अभाव होना प्रकृतिवाद शिक्षा का उद्देश्य मानव की मूल शक्तियों का मार्गानरीकरण करना, पर्यावरण के साथ अनुकूलन करना और सुख प्रदान करना मानता है। परन्तु यही एकमात्र उद्देश्य नहीं है। इससे भी आगे आध्यात्मिक ज्ञान एवं उससे मुक्ति प्रदान करना भी शिक्षा का उद्देश्य है। अतः यहाँ भी एक प्रकार का अभाव दिखाई देता है।

(स) पाठ्यक्रम का उचित न होना- विज्ञानों एवं खेल-कूद, भ्रमण, क्रिया आदि को पाठ्यक्रम में शामिल करना अधिक उपयुक्त नहीं है। धर्म, आध्यात्म, दर्शन, साहित्य आदि को पाठ्यक्रम में स्थान न देने से पाठ्यक्रम दोषयुक्त हो गया है। यहाँ भी एक कमी प्रकृतिवादी शिक्षा दर्शन में आ गई है।

(द) अनुशासन सम्बन्धी विचार अनुपयुक्त- प्राकृतिक परिणामों एवं सुखवादी नियमों से अनुशासन स्थापित करने में सच्चा अनुशासन नहीं होता है। सामाजिक अनुशासन एवं अनुदेशात्मक अनुशासन भी जरूरी है। यहाँ दमनबादी एवं प्रभाववादी सिद्धान्त काम में लाये जाते हैं। इनकी और प्रकृतिवादियों का ध्यान न होने से एक कमी पाई जाती है।

(य) शिक्षक तथा विद्यालय सम्बन्धी विचार दोषयुक्त- शिक्षक को गौण स्थान देना ठीक नहीं है। विद्यालय प्राकृतिक पर्यावरण में रहेंगे तो वे सामाजिक आवश्यकता को कैसे पूरा करेंगे जो आधुनिक युग की माँग है। अतएव प्रकृतिवादी विचार इस दिशा में भी दोषयुक्त हो जाते हैं।

गुण एवं देनों के रूप में हमें प्रकृतिवाद को नीचे लिखी बातें मिलती हैं :-

(अ) नवीन शिक्षा विधियों को जन्म देना- प्रकृतिवादी विचारधारा के फलस्वरूप मनोवैज्ञानिक शिक्षाविधियों का जन्म हुआ जैसे यूरिस्टिक विधि, डाल्टन विधि, निरीक्षण विधि, प्रत्यक्ष विधि, माण्टेसरी विधि।

(ब) शिक्षा का पाठ्यक्रम विद्यार्थी की रुचि के अनुकूल होना- आज विद्यार्थी अपनी रुचि के अनुसार विषय का चुनाव करता है और शिक्षा लेता है। इस प्रकार पाठ्यक्रम व्यापक एवं विविध हो गया है। यह प्रकृतिवाद की देन है।

(स) विद्यार्थियों का उत्तरवायी पूर्व सहयोग विद्यालय व्यवस्था में होना- इस देन के कारण विद्यालय चलाना सरल एवं सफल हो गया है। विद्यार्थी के द्वारा उत्तरदायित्व लेने से विद्यालय में समय सारणी, परीक्षा आदि के बन्धन भी ढीले हो गये हैं।

(द) शिक्षा के विकास में सहयोग देना- प्रकृतिवादियों ने स्त्री-शिक्षा एवं जन-शिक्षा के लिए आवाज उठाई और आज के युग में यह एक बड़ी माँग है। अतएव इस दिशा में भी प्रकृतिवाद का महत्व मिलता है।

(य) पुस्तकीय शिक्षा का विरोध करना- वास्तविक शिक्षा के लिए यह एक बड़ी बात थी जिसका श्रेय प्रकृतिवाद को ही दिया जाता है।

इसके सम्बन्ध में यह कहा जाता है कि “प्रकृतिवाद हमें इस संसार और दूसरे संसार में जीवन के प्रति स्पष्ट दृष्टिकोण व उद्देश्य देने में असमर्थ रहा- लेकिन बालकों की प्रकृति के अनुसार उसमें उत्तम शिक्षा विधियों को प्रदान किया है। यह एक बड़ा कार्य है।”

“Naturalism became incapable to provide an attitude and aim clearly for a life in this world and here after, but it provided best methods of education according to the nature of children.”)

प्रकृतिवादी शिक्षा के लक्षण

विचारकों ने प्रकृतिवादी शिक्षा के बारे में अपने जो मत दिये हैं उनके आधार पर हम प्रकृतिवादी शिक्षा के विभिन्न लक्षणों को नीचे दे रहे हैं :-

(i) शिक्षा का आधार प्रकृति और मानव प्रकृति का होना ।

(ii) शिक्षा की प्रक्रिया का केन्द्र शिक्षार्थी और बालक होना ।

(iii) बालक को बालक समझना न कि छोटा-सा प्रौढ़।

(iv) बालक को अनुभव प्राप्त करने के लिए स्वतन्त्र करना ।

(v) वर्तमान के परिप्रेक्ष्य में शिक्षा की व्यवस्था करना न कि भविष्य के विचार से।

(vi) बालक को सूचना के भार से मुक्त रखना तथा स्वाभाविक विकास में बाधा न डालना।

(vii) बालक के पशु व्यवहार को मानवीकृत करना (To humanize child’s animal behaviour)|

(viii) ज्ञानेन्द्रियों के प्रशिक्षण द्वारा वास्तविक ज्ञान देना।

(ix) मानव व्यक्तित्व को शिक्षा के द्वारा पूर्णता प्रदान करना (To provide fullness to human personality)

(x) व्यक्ति की सभी शक्तियों को स्वतन्त्र ढंग से विकसित करने के अवसर देना।

(xi) विद्यार्थियों में जन के दृष्टिकोणों का विकास करना।

(xii) पाठ्यक्रम में विज्ञान तथा तकनीकी विषयों को आधुनिक समय के अनुसार महत्वपूर्ण स्थान दिया जाना।

(xiii) शिक्षकों व शिक्षार्थियों में भौतिक, वैज्ञानिक एवं विकासवादी दृष्टिकोण लाना।

(xiv) शिक्षा को मनोवैज्ञानिक बनाना (To psychosis education) |

(xv) शिक्षा-विधियों में नवीन-खोज करना तथा नई शिक्षा-विधियों के निर्माण को प्रेरणा देना।

(xvi) विद्यालय व्यवस्था में छात्रों को भी कार्य करने का अधिकार-उत्तरदायित्व देना।

(xvii) व्यावहारिक शिक्षा प्रदान करके जीवन के सच्चे सुख-आनन्द को प्रदान करना।

उपर्युक्त लक्षणों को देखने से ज्ञात होता है कि प्रकृतिवादी शिक्षा आधुनिक युग के लिए एक वरदान है। इस शिक्षा में एक नई दिशा दी, मानव को ऊँचा उठाया और जनसमूह को सभी प्रकार से सुखद स्थिति में रखा। शिक्षा केवल सूक्ष्म ज्ञान का प्राप्त करना न रह गई बल्कि उसने जीवन को व्यावहारिक बनाने का प्रयल किया और उसमें सफल भी रही। प्रकृतिवादी शिक्षा के कारण शिक्षाशास्त्रियों का ध्यान उसको नये तरीकों से विकसित करने की ओर गया। प्रो० मनरो का विचार है कि प्रकृतिवाद ने शिक्षा के मनोवैज्ञानिक, समाजशास्त्रीय और वैज्ञानिक निर्माण करने में प्रेरणा दी है। बात बिल्कुल सही है।

अपने देश में भी प्रकृतिवादी दृष्टिकोण से शिक्षा प्रदान करने पर जोर दिया गया। इस विचार से अपने देश में बहुधन्धी पाठ्यक्रम को आरम्भ किया गया। कोठारी कमीशन के सुझावों द्वारा माध्यमिक कक्षाओं में विज्ञान का अध्ययन अनिवार्य किये जाने पर बल दिया गया। जीवन को सुखी बनाने के लिए माध्यमिक शिक्षा का और उसके आगे की शिक्षा का व्यावसायीकरण करने पर जोर दिया गया। अन्त में कोठारी कमीशन में ‘कार्य- अनुभव’ (Work-Experience) पर जोर दिया गया है। कार्य अनुभव एक प्रकार की व्यावहारिक शिक्षा है और रूसो के शब्दों में ‘जीवन की कला’ है जो वह एमील को बताना चाहता था। कोठारी कमीशन ने अन्तर्राष्ट्रीय विकास के लिए शिक्षा को साधन बताया है। यहाँ पर हम टैगोर के विचार पाते हैं जिन्होंने शिक्षा के द्वारा मानवीय सद्भावना को विकसित करना बताया है। अब स्पष्ट हो जाता है कि प्रकृतिवाद ने आधुनिक भारतीय शिक्षा को भी प्रभावित किया है और कई दृटियों से हमें उसमें प्रकृतिवादी शिक्षा के लक्षण मिलते हैं।

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