शिक्षाशास्त्र

शिक्षा में अस्तित्ववाद का मूल्यांकन | अन्य वादों से अस्तित्ववाद का सम्बन्ध

शिक्षा में अस्तित्ववाद का मूल्यांकन | अन्य वादों से अस्तित्ववाद का सम्बन्ध

शिक्षा में अस्तित्ववाद का मूल्यांकन

शिक्षा में अस्तित्ववाद की अभिकल्पना पूर्णतया नवीन है। विदेशों में तथा भारत में भी इस विचारधारा का स्वागत एवं अध्ययन बहुत कम हुआ, फलस्वरूप जीवन एवं शिक्षा के प्रति अस्तित्ववादी दृष्टिकोण का निर्माण अभी तक समुचित ढंग से न हो सका। इसका सबसे बड़ा प्रमाण है पुस्तकों का अभाव। फिर भी शिक्षा में अस्तित्ववादी अवधारणा पायी जाती है।

शिक्षा को व्यक्तिवादी दृष्टि से अस्तित्ववाद देखता है। यह तो बहुत प्राचीन मत अपने देश में तथा पाश्चात्य देशों में भी मिलता रहा। ऐसी दशा में शिक्षा आत्म-विकास के लिए किया जाने वाला मनुष्य का प्रयल है जिससे केवल अपने आपके लिए मानवीय गुणों का विकास होता है। विदेशों में व्यक्तिगत गुण भौतिक धरातल पर समझे गये और भारत में उसे आध्यात्मिक धरातल भी दिया गया तभी अपने देश में ‘सा विद्या या विमुक्तये’ की ध्वनि गुंजरित हुई। आज भी जनतंत्र के फलस्वरूप वैयक्तिकता के विकास पर शिक्षा का ध्यान रहता है। अस्तु अस्तित्ववादी शिक्षा जनतंत्रवादी शिक्षा के समान ही है केवल इसमें एकान्त दृष्टिकोण अधिक सबल है।

शिक्षा में सामूहिक की अपेक्षा वैयक्तिक शिक्षण की ओर अधिक ध्यान दिया जाता है। यह अस्तित्ववाद का बड़ा प्रभाव है। वैयक्तिक स्वतन्त्रता का प्रयोग करके लोग अन्तरिक्ष की यात्रा करते हैं। इसका परिणाम प्रगति है। अस्तित्ववाद शुभ की अपेक्षा वैयक्तिक दृष्टि से रखता है। इससे एक शुभ समाज बनने की आशा की जा सकती है और यदि प्रत्येक व्यक्ति शुभ बनने की सोचने लगे तो अशुभ अपने आप दूर हो जावेगा। अपने देश में बेकारी दूर करने में इस स्थिति से सहायता ली जा सकती है। प्रत्येक शिक्षित व्यक्ति ऐसी दशा में अपने अस्तित्व को रखने के लिए यदि स्वयं उघोग करने लगे तो निश्चय ही एक नव निर्माण किया जा सकता है। बीस सूत्री कार्यक्रम में भी अस्तित्वबादी दृष्टिकोण की कुछ झलक मिलती है। जैसे कठिन परिश्रम, दूर दृष्टि, अनुशासन, नैतिकता आदि के संदेश में।

अस्तित्ववादी शिक्षा में कुछ खटकने वाली चीजें भी हैं जैसे अनुभूति पर अत्यधिक बल देना। इससे मनमाना आचरण सम्भव होगा जो अन्य लोगों के लिए अशुभ उदाहरण भी हो सकता है। उदाहरण के लिए “आत्महत्या’ की भावना अथवा अपनी इच्छाओं की सन्तुष्टि की भावना है। यदि आत्मसन्तुलन न होगा तो उसका बुरा प्रभाव पास-पड़ोस के लोगों पर अवश्य पड़ेगा। इसी प्रकार से विज्ञान के युग में वैज्ञानिक अध्ययन एवं वैज्ञानिक विधियों के तिरस्कार की बातें भी खटकती हैं। सभी प्रगति विज्ञान एवं तकनीकी विषयों के कारण हुई है और इन्हें छोड़ देने से या अलग कर देने से जीवन पुनः अविकसित या अर्द्ध विकसित होगा, तो फिर हम अन्य प्रगतिशील देशों के साथ कैसे कदम मिला सकेंगे?

अस्तित्ववाद की सबसे सबल देन स्वतन्त्रता का उद्घोष है। यह तो मान्य है लेकिन आज के युग में जब सह-अस्तित्व का विचार एवं भाव पाया जाता है तो हम वैयक्तिक स्वतन्त्रता लेकर “असम्भव” की ओर चल रहे हैं। व्यक्ति और समाज एक सिक्के के दो पहलू हैं, ‘एक पहलू व्यक्ति के आधार पर आगे चलना असम्भव है। अतः आज की शिक्षा में व्यक्ति एवं समाज के समन्वय पर ही ध्यान रहता है। अस्तित्ववादी शिक्षा दर्शन में हमें दोनों के समन्वय का प्रयल करना होगा अन्यथा ऐसा शिक्षादर्शन केबत विचार जगत में रहेगा, वास्तविक जगत से बह अलग ही रखा जायेगा।

अन्त में अस्तित्ववाद को शिक्षा के क्षेत्र में लाने का प्रयल करना आवश्यक भी है। प्रो० राजनारायण व्यास ने लिखा है कि “मानवीय जीवन को किसी विषय से अधिक महत्व जीवन में दिया ही जाना चाहिए। व्यक्ति के संवेगात्मक पक्ष की उपेक्षा भी शिक्षा के क्षेत्र में नहीं की जानी चाहिए। बहकी सामाजिकता ने अन्धी राष्ट्रीयता तथा धर्म के रूप में मानवता का बड़ा नुकसान किया है। इस स्थिति का सामना प्रत्येक छात्र की प्रमुख विवेकशक्ति को जाग्रत करके ही किया जा सकता है। हम अब इन परिस्थितियों के सामने आ गये हैं जहाँ हमें अपने व्यक्तित्व या अन्धी सामूहिकता में से एक को चुनना है। अस्तित्ववादी शिक्षा एक प्रकार की चुनौती है।”

अन्य वादों से अस्तित्ववाद का सम्बन्ध

अस्तित्ववाद स्वतन्त्रताधारित व्यक्तिवादी विचारधारा है। (Existentialism is individualistic philosophy based on freedom)। ऐसी स्थिति में इसका सम्बन्ध आदर्शवाद एवं प्रकृतिवाद से पाया जाता है। आदर्शवाद व्यक्ति के विकास पर अत्यधिक बल देता है। दूसरी ओर आदर्शवाद व्यक्ति में सत्यं शिवं सुन्दरं जैसे शाश्वत् मूल्यों के विकास पर भी जोर देता है, यह अवश्य है कि अस्तित्ववादी की भाँति वह अपने आप इनकी अनुभूति न करने का विचार रखता है। अनुभूति आदर्शवाद एवं अस्तित्ववाद दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसी प्रकार से प्रज्ञा और अन्तःज्ञान पर दोनों का ध्यान पाया जाता है। व्यक्ति के ‘आत्म’ को अस्तित्ववाद तथा आदर्शवाद दोनों ही उच्च स्थान देते हैं, इसीलिए शिक्षा का लक्ष्य भी इन दोनों वादों के अनुसार व्यक्ति का सर्वोच्च विकास कहा जाता है।

अस्तित्ववाद प्रकृतिवाद से भी सम्बन्ध रखता है क्योंकि अस्तित्वंवाद प्रकृतिवाद के समान ही व्यक्ति को निर्बाध स्वतन्त्रता देता है। प्रकृतिवाद छात्र को स्वतन्त्र अनुभूति में कोई बाधा न डालने को कहता है तभी वास्तविक अनुभूति होती है। खेल एवं क्रिया इसके माध्यम हैं। अस्तित्ववाद प्रकृतिवाद से एक सीढ़ी आगे बढ़ गया है और उसने व्यक्ति को समाज से अलग करके एकान्त-सुख प्राप्त करने को कहा है। एकान्त सुख आदर्शवाद में भी महत्वपूर्ण माना गया है।

अस्तित्ववाद, आदर्शवाद एवं प्रकृतिवाद इस प्रकार परस्पर सम्बन्धित पाये जाते हैं। और इस आधार पर यदि यह निष्कर्ष निकाला जावे कि अस्तित्ववाद आदर्शवाद और प्रकृतिवाद का उत्पाद्य है तो कथन अनुपयुक्त न होगा।

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Pankaja Singh

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