इतिहास

शाहजहाँ का चरित्र तथा व्यक्तित्व | शाहजहाँ के चरित्र का मूल्यांकन | शाहजहाँ के व्यक्तित्व का मूल्यांकन

शाहजहाँ का चरित्र तथा व्यक्तित्व | शाहजहाँ के चरित्र का मूल्यांकन | शाहजहाँ के व्यक्तित्व का मूल्यांकन

शाहजहाँ का चरित्र तथा व्यक्तित्व

शाहजहाँ का चरित्र और व्यक्तित्व विद्वानों में विवाद का विषय रहा। विवाद का कारण बहुत कुछ विद्वानों का अपना-अपना दृष्टिकोण है।

शाहजहाँ शासक के रूप में

(1) प्रतापी शासक- शाहजहाँ अपने दादा अकबर की भांति प्रतापी पुरुष था। वह महत्वाकांक्षी और साम्राज्यवादी शासक था। राज्य विस्तार के लिए उसने युद्ध करने में संकोच नहीं किया। उसे विजय भी मिली। यह दूसरी बात है कि उन विजयों को स्थायी नहीं बनाया जा सका । मध्य युग में वही एक भारतीय सम्राट था, जिसने भारत से बाहर मध्य एशिया में बल्ख और बदख्शां पर अधिकार किया। उसका विजय प्राप्त करने का आमह इससे स्पष्ट है कि उसने कन्धार को जीतने के लिए तीन बार प्रयास किया ।

(2) योग्य सेनानायक- शाहजहां अच्छा प्रशासक होने के अतिरिक्त कुशल सेनानायक भी था। अपने पिता जहांगीर के शासन काल में उसने मेवाड़ और अहमदनगर को जीत कर भारी यश कमाया था और शाहजहाँ को उपाधि प्राप्त की थी। उसने जुझार सिंह और खानजहां लोदी के विद्रोहों का दमन भी किया था।

(3) धार्मिक सहिष्णुता और असहिष्णुता का मिश्रण- शाहजहाँ स्वयं कट्टर सुन्नी मुसलमान था। अकबर ने धार्मिक सहिष्णुता की जो नीति प्रारम्भ की थी, वह जहाँगीर के समय कुछ कम हुई और शाहजहाँ के समय कुछ और कम हो गई। फिर भी वह औरंगजेब के शासन काल की भांति एकदम समाप्त नहीं हो गई। औरंगजेब की तुलना में शाहजहाँ धार्मिक दृष्टि से सहिष्णु प्रतीत होता है। यों वह शिया मुसलमानों से द्वेष भी करता था। दक्षिण के शिया राज्यों पर उसके आक्रमण का कारण धार्मिक द्वेष भी था। उसने हिन्दुओं के कई मंदिर तुड़वा दिये। अनेक मन्दिरों का निर्माण स्थगित करा दिया और हिन्दुओं पर अनेक प्रतिबन्ध लगाये ।

(4) न्यायप्रिय शासक- अकबर और जहाँगीर की भाँति शाहजहाँ भी न्याय की उचित व्यवस्था का बहुत ध्यान रखता था। अपराधी को दण्ड देते समय वह उसकी प्रतिष्ठा या पद के कारण किसी प्रकार की रियायत न करता था। उसके दण्ड कठोर एवं अन्य लोगों के लिए शिक्षाप्रद होते थे।

(5) महान् कला प्रेमी- शाहजहाँ की गणना भारत के महानतम् कला प्रेमी सम्राटों में की जाती है। ताजमहल, जामा मस्जिद, आगरा की मोती मस्जिद आदि सुन्दर भवनों के कारण तो वह इतिहास में विख्यात है ही, चित्र तथा संगीत कलाओं का भी वह बड़ा पारखी और आश्रयदाता था। अनेक साहित्यकार उसके दरबार की शोभा बढ़ाते थे। वह स्वभाव से ही कला, वैभव तथा सौन्दर्य का प्रेमी था।

शाहजहाँ व्यक्ति के रूप में

(1) परिवार वत्सल- शाहजहाँ को अपने परिवार के लोगों से बहुत प्रेम था। अपनी पत्नी मुमताज महल की स्मृति को तो उसने ताजमहल बनवा कर अमर ही कर दिया। दारा, जहांनारा तथा अपनी अन्य सन्तानों से भी उसे बहुत प्रेम था।

(2) सुसंस्कृत पुरुष- शाहजहाँ विद्वान् और सुशिक्षित व्यक्ति था। उसका स्वभाव मधुर और नम्र था। वह शालीनता और शिष्टाचार की मूर्ति था।

(3) वैभव का शौकीन- शाहजहाँ का शासन काल आर्थिक समृद्धि का काल था। वह अपनी सम्पत्ति को तहखाने में छिपा कर रखने के बजाय उसका प्रदर्शन करना पसन्द करता था। उसने अनेक भव्य इमारतें तो बनवाई ही, एक मयूर सिंहासन (तख्ने ताउस) भी बनवाया, जिसकी लागत उस काल में दो करोड़ रुपये थी। इसमें अनेक बहुमूल्य रत्न जड़े थे। उसका दरबार ऐश्वर्य का नमूना था।

(4) स्वच्छता का पुजारी- शाहजहाँ को स्वच्छता का बहुत ध्यान रहता था। कहते हैं कि होरे या मोतियों के स्पर्श करने के बाद भी वह हाथ धोता था।

(5) पुरुषोचित व्यायामों का शौकीन- शाहजहाँ स्वस्थ, बलिष्ठ तथा उत्साही पुरूष था। घुड़सवारी, शस्त्राभ्यास, शिकार आदि पुरुषोचित व्यायामों में उसकी बहुत रूचि थी।

(6) घोर परिश्रमी- वैभवशाली सम्राट होने पर भी शाहजहाँ कठिन परिश्रम का जीवन व्यतीत करता था। प्रातकाल से सायंकाल तक वह राजकाज में व्यस्त रहता था।

(7) स्वाभिमानी- शाहजहाँ के जीवन के अन्तिम आठ वर्ष अपने पुत्र की कैद में बीते । इस अवधि में उसे भीषण मानसिक कष्ट सहना पड़ा। परन्तु इस दुर्दशा में भी उसने धैर्य नहीं खोया और अपना स्वाभिमान बराबर बनाये रखा।

(8) क्रूरता- शाहजहाँ कितना क्रूर था, यह इससे स्पष्ट होता है कि सिंहासन पर बैठने के समय उसने उन सब राजकुमारों को मरवा दिया था, जो किसी भी ढंग से सिंहासन के उत्तराधिकारी हो सकते थे। परन्तु डा. ईश्वरी प्रसाद ने उसे स्वभाव से क्रूर नहीं माना। उन्हीं के शब्दों में, “ऐसी क्रूरता उस युग की माँग थी, अन्यथा वह स्वभाव से क्रूर नहीं था।”

(9) विलासी प्रवृत्ति- शाहजहाँ शान-शौकत एवं विलासी प्रवृत्ति का पुरुष था। पर्यटन मनूची ने लिखा है कि वह अपनी कामुकता की पूर्ति के लिए स्त्रियों की खोज में रहता था। उसका अपने कई दरबारियों की पत्नियों से अनुचित सम्बन्ध था। मनूची ने तो यहां तक लिखा है कि अपनी पुत्री जहाँनारा से उसका अनुचित प्रेम सम्बन्ध था। परन्तु डा. ईश्वरी प्रसाद ने इसे केवल ‘बाजारू गप’ माना है।

(10) दुर्बल चित्त- प्रारम्भ में शाहजहाँ दृढ़ संकल्प वाला पुरुष रहा था। परंतु जब उत्तराधिकार के प्रश्न को लेकर उसके पुत्रों में युद्ध छिड़ा, तब उसने चित्त की बड़ी दुर्बलता प्रदर्शित की। वह उनमें युद्ध को रोक नहीं सका। उसने दारा का पक्ष लिया, किन्तु वह दृढ़तापूर्वक उसका समर्थन नहीं कर सका। यदि वह स्वयं रणभूमि में नाम के लिए ही पहुँच जाता, तो औरंगजेब विजयी नहीं हो सकता था। इसी दुर्बलता के कारण वह अपने पुत्र का कैदी बना।

(11) शासकीय कर्तव्यों की उपेक्षा- वृद्धावस्था में वह शासकीय कार्यों की उपेक्षा करने लगा था। इस त्रुटि के लिए बाद में औरंगजेब ने उसको फटकारा भी था।

(12) अपव्ययी- कुछ इतिहासकारों ने शाहजहाँ को अपव्ययी सम्राट कहकर उसकी आलोचना की है। उसने सरकारी पैसे को ऐसे कार्यों में खर्च किया जिससे जनता को कोई लाभ नहीं हुआ। उसने दरबार की शान-शौकत और इमारतों के बनवाने में अपार धनराशि व्यय कर डाली।

(13) पक्षपाती- शाहजहाँ अपने सब पुत्र-पुत्रियों के साथ समान व्यवहार नहीं करता था। दारा से उसे विशेष प्रेम था। इस कारण शाहजहाँ के अन्य पुत्र दारा के शत्रु बन गए थे।

(14) स्वार्थी- शाहजहाँ के कुछ कार्यों से उसके स्वार्थी स्वभाव का आभास होता है। उसने गद्दी पर बैठने के बाद अपने सभी पुरुष रिश्तेदारों को इस कारण मरवा डाला ताकि उसकी गद्दी सुरक्षित बनी रहे। उसमें अपने सगे-सम्बन्धियों के लिए बाबर, अकबर और जहाँगीर जैसी प्रेम और दया की भावना का अभाव था।

इस प्रकार शाहजहाँ का चरित्र गुणों और दोषों का एक विचित्र मिश्रण है।

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