अर्थशास्त्र

गुणक की आलोचनां | गुणक के सिद्धान्त का महत्त्व

गुणक की आलोचनां | गुणक के सिद्धान्त का महत्त्व

गुणक की आलोचनां

(Criticism of Multiplier)

आधुनिक अर्थशास्त्रियों ने केन्ज द्वारा प्रतिपादित गुणक की धारणा की कटु आलोचनाएँ की हैं। केन्ज की इस धारणा की आलोचना इस आधार पर की जाती है कि केन्ज का गुणक सिद्धान्त इस साधारण मान्यता पर आधारित है। आय में वृद्धि होने के कारण उपभोग में वृद्धि होती है और सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति इकाई से कम होती है। परंतु वास्तविक अध्ययनों से यह ज्ञात होता है कि आय और उपभोग के बीच सम्बन्ध इतना सरल नहीं कि जितना कि केन्ज ने माना है और न ही उपभोग केवल मात्र आय का फलन है। गुणक बहुत-सी सीमाओं या पूर्व धारणाओं जैसे उपभोग वस्तुओं की उपलब्धता, निवेश की दिशा, निवेश क्रम को बनाए रखना, गुणक-अवधि आदि पर निर्भर करता है। इसी प्रकार केन्ज की गुणक की धारणा निवेश पर प्रेरित उपभोग के पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन नहीं करती। इसके अतिरिक्त यह धारणा आय प्रजनन की प्रक्रिया में समय- अन्तराल (Time-lags) को भी विशेष महत्त्व नहीं देती। प्रो० स्टिगलर ने गुणक को धारणा की आलोचना करते हुए कहा है कि “यह केन्ज के अर्थशास्त्र की विचित्रतम धारणा है।” प्रो० हट्ट ने अपनी पुस्तक “Keynesianism Retrospect and Prospect” में गुणक की धारणा की आलोचना करते हुए कहा है कि “केन्ज का गुणक सिद्धान्त “कचरा सिद्धान्त” है।

प्रो० केन्ज के निवेश गुणक की मुख्य आलोचनाएँ निम्नलिखित हैं-

(1) केन्ज की गुणक की धारणा निवेश, उपभोग और आय के बीच क्षणिक (Instants ncous) के सम्बन्ध पर आधारित है और इस प्रकार यह एक समय-रहित (Timeless) धारणा है।

(2) केन्ज की गुणक की धारणा स्थैतिक प्रकृति (Static nature) की धारणा है इसलिए यह धारणा गत्यात्मक समाज की परिवर्तनीय अवस्थाओं के लिए उपयुक्त नहीं है। यह धारणा इस बात की व्याख्या नहीं करती कि प्रारम्भिक विनियोग में वृद्धि कैसे और कितने समय-अन्तराल (Times lags) से होती है।

(3) केन्ज की गुणक की धारणा इस मान्यता पर आधारित है कि उपभोग केवल आय का ही फलन है और सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति स्थिर रहती है। परन्तु आलोचकों के अनुसार केन्ज की यह मान्यता गलत है क्योंकि उपभोग केवल आय का ही फलन नहीं है बल्कि उपभोग पर अन्य तत्वों का भी प्रभाव पड़ता है और दीर्घकाल में सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति के स्थिर रहने की संभावना नहीं रहती। आय में वृद्धि के साथ-साथ सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति कम होती जाती है।

(4) केन्ज का गुणक प्रेरित निवेश पर प्रेरित उपभोग के पड़ने वाले प्रभावों की अवहेलना करता है अर्थात् केन्ज का गुणक सिद्धान्त निवेश में होने वाली वृद्धि के परिणामस्वरूप उपभोग में होने वाली वृद्धि पर ही ध्यान केन्द्रित करता है परन्तु उपभोग में वृद्धि के कारण निवेश में हुई वृद्धि की चर्चा नहीं करता। संक्षेप में केन्ज का गुणक सिद्धान्त त्वरक (Accelerator) के प्रभाव की अवहेलना करता है।

(5) केन्ज का गुणक सिद्धान्त केवल ‘उपभोग’ को ही विशेष महत्त्व देता है जो कि आलोचकों के अनुसार उचित नहीं है। इन आलोचकों के अनुसार सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति (MPC) की अपेक्षा सीमान्त व्यय प्रवृत्ति (Marginal Propensity to spend) शब्द का प्रयोग अधिक उचित प्रतीत होता है।

(6) यदि सरकारी निवेश से निजी उद्योगों की निवेश प्रवृत्ति कम हो जाती है तो रोजगार में वृद्धि की संभावनाएं कम हो जाता है और उस स्थिति में गुणक का महत्त्व व्यर्थ हो जाता है।

(7) गुणक के मूल्य का अनुमान लगाना कठिन है क्योंकि यह एक गणितीय उपकरण है।

(8) प्रो० हेबरलर ने अपने एक लेख “Mr. keynes thoery of multiplier : A methodological criticism” में केन्ज द्वारा प्रतिपादित गुणक की धारणा की आलोचना करते हुए इसे एक समानार्थक (Tautological) धारणा कहा है। समानार्थक का अर्थ होता है, “किसी एक ही बात को विभिन्न शब्दों में अनावश्यक रूप से दोहराना। केन्ज का गुणक सिद्धान्त, सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति का दूसरा नाम है। हेन्सन के अनुसार, “इस प्रकार का गुणक तो अधिकांश रूप में गणित का गुणक है अर्थात् स्वयं सिद्ध है। गणित का गुणकमान समानार्थक है। इससे कोई बात सिद्ध नहीं होती।

(9) सोलनियर के अनुसार प्रो० केन्ज ने गुणक की धारणा की जो परिभाषा दी है उससे यह स्पष्ट नहीं होता कि आय में परिवर्तन क्यों होता है?

(10) प्रो० ए० जी० हार्ट ने गुणक की धारणा को व्यर्थ बताते हुए लिखा है कि “यह गाड़ी के पांचवें बेकार पहिये के समान है और इससे हमारे ज्ञान में, जो उपभोग प्रवृत्ति द्वारा प्राप्त होता है, तनिक भी वृद्धि नहीं होती है।”

(11) प्रो० एल० आर० क्लेन का मत है कि उपभोग और आय के मध्य सम्बन्ध इतना सरल और सीधा नहीं है जितना कि केन्ज ने माना है। उपभोग केवल आय स्तर पर ही निर्भर नहीं करता बल्कि उपभोग पर आय के अलावा अन्य तत्वों का भी प्रभाव पड़ता है।”

गुणक के सिद्धान्त का महत्त्व

(Importance of the Multiplier)

गुणक अर्थशास्त्र की एक महत्त्वपूर्ण धारणा है। यह केन्ज की रोजगार के सिद्धान्त को एक महत्त्वपूर्ण देन है। प्रो० हेन्सन, हैरोड, सैम्युल्सन आदि अर्थशास्त्रियों ने इस धारणा का समर्थन करते हुए इसे एक सक्रिय तथा क्रान्तिकारी विचार बताया है। इस धारणा का सैद्धान्तिक महत्त्व के साथ-साथ इसका व्यावहारिक महत्त्व भी है। प्रो० गुडविन (Goodwin) के अनुसार, “यद्यपि अर्थशास्त्र में गुणक की खोज का श्रेय प्रो० केन्ज के स्थान पर आर० एफ० काहन को जाता है, परन्तु आज जो गुणक को धारणा का महत्त्व है वह इसे केन्ज की ही देन है। केन्ज ने गुणक की धारणा को सड़क बनाने के विश्लेषण के स्थान पर आय में वृद्धि करने के विश्लेषण का यन्त्र बना दिया है।

संक्षेप में, गुणक की धारणा का रोजगार सिद्धान्त में महत्त्व निम्नलिखित है-

(1) विनियोग का महत्त्व- गुणक की धारणा के अध्ययन से विनियोग के महत्त्व की जानकारी प्राप्त होती है। विनियोग में की जाने वाली वृद्धि के फलस्वरूप ही आय में कई गुणा वृद्धि होती है। वास्तविक रूप में निवेश ही एक ऐसा गत्यात्मक तत्व है जिस पर रोजगार स्तर में होने वाले परिवर्तन निर्भर करते हैं।

(2) व्यापारिक उतार-चढ़ाव- व्यवसाय में निरन्तर उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। कभी व्यापार में बहुत अधिक मंदी तथा कभी बहुत अधिक तेजी आ जाती है। व्यावसायिक उतार- चढ़ावों को गुंक की सहायता से समझने में सहायता मिलती है। यदि किसी अर्थव्यवस्था में मंदी की अवस्था है तो मंदी की अवस्था को दूर करने के लिए गुणक के सिद्धान्त से यह ज्ञात होता है कि विनियोग में जितनी अधिक वृद्धि की जाएगी गुणक प्रक्रिया के फलस्वरूप आय में उससे अधिक वृद्धि होगी और मंदी की अवस्था को नियंत्रित किया जा सकेगा।

(3) पूर्ण रोजगार सम्बन्धी नीति बनाने में सहायक- गुणक की धारणा पूर्ण रोजगार से सम्बन्धित नीति बनाने में भी सहायक सिद्ध हो सकती है। ये धारणा बताती है कि किसी अर्थव्यवस्था में पूर्ण रोजगार की अवस्था प्राप्त करने के लिए निवेश में बहुत अधिक वृद्धि की जानी चाहिए।

(4) आय प्रसारण की प्रक्रिया- गुणक की धारणा से स्पष्ट होता है कि आय प्रसारण की प्रक्रिया एक प्राकृतिक प्रकिया है। जिस प्रकार झील में पत्थर फेंकने से छोटी-छोटी लहरों का समूह उमड़ता है उसी प्रकार किसी अर्थव्यवस्था में निवेश करने से आय में वृद्धि होती है। अत: इस धारणा से यह ज्ञात होता है कि किसी अर्थव्यवस्था में उत्पादन, रोजगार तथा आय में वृद्धि निवेश की जाने वाली वृद्धि के परिणामस्वरूप होती है।

(5) घाटे की वित्त व्यवस्था- गुणक की धारणा घाटे की वित्त व्यवस्था के महत्त्व को स्पष्ट करती है। प्रो० सैम्युल्सन के अनुसार गुणक की धारणा यह स्पष्ट करती है कि मंदी के दिनों में कम ब्याज की दर या सस्ती मुद्रा नीति क्यों अप्रभावशील होती है तथा घाटे की वित्त व्यवस्था मंदी के प्रभावों को दूर करने में प्रभावशाली होती है इसका कारण यह है कि घाटे के व्यय के फलस्वरूप निवेश में वृद्धि होती है और निवेश में वृद्धि होने पर गुणक प्रकिया द्वारा आय में कई गुणा वृद्धि होती है।

(6) सरकारी हस्तक्षेप- गुणक की धारणा आय व रोजगार से सम्बन्धित आर्थिक क्रियाओं में सन्तुलन लाने तथा बेकारी को दूर करने में सरकारी हस्तक्षेप का समर्थन करती है। किसी अर्थव्यवस्था में सरकार सार्वजनिक निवेश में वृद्धि करके गुणक प्रक्रिया द्वारा आय में कई गुणा वृद्धि कर सकती है।

(7) बचत तथा निवेश में संतुलन- केन्ज के अनुसार संतुलन वहां होता है जहां बचत और निवेश एक-दूसरे के बराबर होते हैं। गुणक की धारणा बचत व निवेश में संतुलन प्राप्त करने में सहायक सिद्ध हो सकती है। केन्ज के अनुसार बचत व निवेश आय सापेक्ष (Income elastic) होते हैं अर्थात् आय में होने वाले परिवर्तन के फलस्वरूप बचत व निवेश में संतुलन प्राप्त किया जा सकता है। यदि किसी अर्थव्यवस्था में बचत कम हो तो गुणक की धारणा से यह ज्ञात किया जा सकता है कि बचत में वृद्धि हेतु आय में कितनी वृद्धि की जरूरत है। आय में वृद्धि हेतु निवेश में कितनी वृद्धि की आवश्यकता है इसका अनुमान गुणक की धारणा से लगया जा सकता है।

(8) सार्वजनिक निवेश- केन्ज ने सार्वजनिक निवेश के महत्व को प्रकट करने के लिए भी गुणक की धारणा का प्रयोग किया है। गुणक की धारणा से यह सिद्ध होता है कि मंदी की अवस्था में सार्वजनिक निवेश में वृद्धि की जायेगी तो गुणक प्रक्रिया द्वारा आय में कई गुणा वृद्धि होगी जिससे मंदी की अवस्था व बेकारी को नियंत्रित किया जा सकता है।

(9) मुद्रा स्फीति व मुद्रा विस्फीति- मुद्रा स्फीति की अवस्था में अर्थव्यवस्था में वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि हो जाती है। अतएव कीमतों में होने वाली वृद्धि को रोकने के लिए निवेश क्रिया में कमी की जानी चाहिए। इसी प्रकार मंदी या मुद्रा-विस्फीति की स्थिति में किसी अर्थ- व्यवस्था में कीमतें कम हो जाती हैं। अतएव कीमतों में होने वाली कमी को रोकने के लिए निवेश में वृद्धि की जानी चाहिए। इसलिए गुणक की धारणा से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि मुद्रा स्फीति या मुद्रा विस्फीति को नियंत्रित करने के लिए निवेश में कितनी कमी या वृद्धि की जानी चाहिए। सारांश में गुणक प्रक्रिया एक स्वजनित एवं स्वचालित प्रक्रिया के रूप में आर्थिक विकास की गति को प्रभावित करती है।

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Pankaja Singh

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