राजनीति विज्ञान

अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व | आनुपातिक प्रतिनिधित्व | सीमित मत-प्रणाली | एकत्रित मत-प्रणाली | पृथक् या सान्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली | व्यावसायिकता वृत्तिक प्रतिनिधित्व

अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व | आनुपातिक प्रतिनिधित्व | सीमित मत-प्रणाली | एकत्रित मत-प्रणाली | पृथक् या सान्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली | व्यावसायिकता वृत्तिक प्रतिनिधित्व

अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व

सामान्यतया अल्पसंख्यकों को प्रातानाधत्व प्रदान करने के लिए निम्नलिखित पद्धतियों का प्रयोग किया जाता है:-

(1) आनुपातिक प्रतिनिधित्व-

अल्पसंख्यकों को उचित प्रतिनिधित्व प्रदान करने के लिए सामान्यतया जिन प्रणालियों का प्रयोग किया जाता है, उनमें आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली सर्वश्रेष्ठ एवं लोकप्रिय है। इसके द्वारा सभी धर्मों को प्राप्त मतों के अनुपात में प्रतिनिधित्व प्रदान किया जाता है।

आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रदान करने की निम्नलिखित दो पद्धतियाँ हैं:-

(1) एकल संक्रमणीय मत प्रणाली (Single Transferable Vote system),

(2) सूची-प्रणाली (List system)|

यह पद्धति संकीर्ण भावनाओं एवं दलों को उभारकर स्थायी सरकार की स्थापना को कठिन बना देती है, संसद की सत्ता को निर्बल बना देती है तथा सरकारों के स्थायित्व एवं एकरूपता को नष्ट करके संसदीय शासन को भी असम्भव बना देती है। यही कारण है कि लोकप्रिय सदन के निर्वाचन में यह पद्धति अधिकांश देशों में नहीं अपनायी जाती है। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद जिन यूरोपीय देशों ने इसे अपनाया था, द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद उन्होंने इसका परित्याग कर दिया।

(2) सीमित मत-प्रणाली-

सीमित मत प्रणाली में समस्त राज्य-क्षेत्र को बहुसदस्यीय निर्वाचन क्षेत्रों में बाँट दिया जाता है। प्रत्येक मतदाता को एक से अधिक मत देने का अधिकार तो होता है, परन्तु उसके मतों की संख्या उस क्षेत्र से निर्वाचित होने वाले प्रतिनिधियों की संख्या से एक कम होती है। उदाहरण के लिए मान लीजिए किसी क्षेत्र से 4 प्रतिनिधियों का निर्वाचन होता है, तो प्रत्येक मतदाता को 3 मत देने का अधिकार होगा। परन्तु एक प्रतिनिधि को एक ही मत दिया जाता है। इसका परिणाम यह होगा कि अल्पमत दलों को सीमित मात्रा में प्रतिनिधित्व अवश्य मिल जायेगा, क्योंकि तीन सदस्यों नाले निर्वाचन क्षेत्रों से बहुसंख्यक वर्ग को दो और अल्पसंख्यक वर्ग को एक प्रतिनिधि मिल जाता है। इस प्रकार अल्पसंख्यकों को अपने हितों की रक्षा करने का अवसर मिल जाता है।

वर्तमान समय में ब्राजील में इसे अपनाया गया है। परन्तु यह प्रणाली दोषपूर्ण है। वास्तव में इसके द्वारा अल्पसंख्यकों को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाता। दूसरे जहाँ दलों की संख्या अधिक है वहाँ अल्पमतों को प्रतिनिधित्व मिलना ही कठिन हो जाता है। कभी-कभी तो बिल्कुल ही नहीं मिलता।

(3) एकत्रित मत-प्रणाली-

इस प्रणाली के अन्तर्गत भी समस्त देश बहु-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजित कर दिया जाता है। इसमें प्रत्येक मतदाता को उतने मत देने का अधिकार होता है, जितने कि उस क्षेत्र से प्रतिनिधि चुने जाते हैं और वह चाहे तो अपने समस्त मत एक ही उम्मीदवार को दे सकता है अथवा उन्हें कई उम्मीदवारों में बाँट सकता है। इस प्रणाली का सबसे बड़ा गुण यही है कि इसमें छोटे से छोटा अल्पसंख्यक दल भी अपना एक प्रतिनिधि निर्वाचित करा ही सकता है। परन्तु यह प्रथा भी दोषपूर्ण है। इसमें अल्पसंख्यकों को कुछ स्थान तो प्राप्त हो जाते हैं, परन्तु उनकी संख्या के अनुपात में उन्हें फिर भी प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाता है। इसका दूसरा दोष यह है कि इसमें कुछ उम्मीदवारों को बहुत अधिक मत प्राप्त हो जाते हैं। फलस्वरूप अनेक मत व्यर्थ ही चले जाते हैं तथा प्रत्येक दल को आनुपातिक प्रतिनिधित्व नहीं मिलता।

(4) पृथक् या सान्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली-

अल्पसंख्यकों  को प्रतिनिधित्व पृथक् अथवा साम्प्रदायिक निर्वाचन द्वारा भी दिया जा सकता है। इसके अन्तर्गत विधानमण्डल में सम्प्रदायों के अनुसार स्थानों का बँटवारा कर दिया जाता है। एक सम्प्रदाय के मतदाता केवल अपने ही सम्प्रदाय के प्रतिनिधियों को मत दे सकते हैं। इस पद्धति का सर्वप्रथम प्रयोग अंग्रेजों ने भारत में किया। 1909 में लार्ड मिण्टों ने मुसलमानों को साम्प्रदायिक आधार पर पृथक् प्रतिनिधित्व दिया था तथा 1919 के अधिनियम के अन्तर्गत सिक्खों को भी पृथक् प्रतिनिधित्व दिया गया। 1932 में ‘साम्प्रदायिक निर्णय’ (Communal Award) के अन्तर्गत एंग्लो-इण्डियन, भारतीय ईसाई हरिजनों के लिए भी साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था की गई थी।

इस प्रणाली के द्वारा अल्पमतों को प्रतिनिधित्व तो प्राप्त हो जाता है, परन्तु उसके परिणाम बड़े भयंकर होते हैं। यह प्रणाली न केवल दोषपूर्ण है वरन् देश की स्वतन्त्रता एवं अखण्डता के लिए खतरनाक भी है। क्योंकि यह संकीर्ण भावनाओं को उभारती है और देश की एकता को हानि पहुँचाती है। ब्रिटिश प्रधानमन्त्री रेम्जे मेकडोनाल्ड (Ramsay Mac Donald) ने 1930 में कहा था-“यदि जातिगत स्वार्थ के आधार पर निर्वाचित क्षेत्रों का निर्माण किया जायेगा तो शुद्ध राजनीतिक संगठन को, जिसमें सभी जातियाँ, धर्म, वर्ग एवं सभी विश्वासों के मनुष्य सम्मिलित हैं, विकास करने का अवसर ही नहीं मिलेगा।”

(5) व्यावसायिकता वृत्तिक प्रतिनिधित्व-

कुछ विद्वानों का विचार है कि व्यवसाय के आधार पर प्रतिनिधित्व देना बेकार है, क्योंकि एक ही पेशे या व्यवसाय वाले लोगों के हित  एक समान होते हैं, न कि एक ही प्रादेशिक क्षेत्र में निवास करने वाले लोगों के। जिन लोगों के हित समान हैं, उन्हें अपने हितों की रक्षा के लिए विधानमण्डल से प्रतिनिधित्व का समर्थन माण्टेस्क्यू, डिबिन्ट, जी. डी० एच० कोल, ग्राहम बैलास आदि विद्वानों ने किया है।

सैद्धान्तिक रूप में यह प्रणाली उचित प्रतीत होती है, परन्तु वास्तव में इसमें अनेक व्यावहारिक कठिनाइयाँ हैं। यदि व्यवसाय के आधार पर प्रतिनिधित्व होगा तो राजनीति पर धनिक और पूँजीपति वर्ग का आधिपत्य स्थापित हो जायेगा और संसट सर्वसाधारण के शोषण का यन्त्र बन कर रह जायेगा। अतः विश्व के प्रायः सभी देशों में प्रतिनिधित्व प्रणाली क्षेत्र के आधार पर अपनायी गई है, न कि व्यावसायिक आधार पर।

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Pankaja Singh

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