इतिहास

मौर्यकालीन गुफाएँ | मौर्यकालीन गुफाओं पर प्रकाश | भाजा का पर्वतीय विहार | बाराबर की गुफाएँ | पश्चिम भारत की गुहाएँ

मौर्यकालीन गुफाएँ | मौर्यकालीन गुफाओं पर प्रकाश | भाजा का पर्वतीय विहार | बाराबर की गुफाएँ | पश्चिम भारत की गुहाएँ

मौर्यकालीन गुफाएँ

चट्टानों को काटकर गुफा बनाने की कला की नींव पूर्व मौर्य युग में रखी जा चुकी थी पर्सिया में चैत्य निर्माण ई०पू० षष्ठ शतक में होता था। पर्सिया से ई०पू० तृतीय शतक में यह परम्परा भारत में आई। इसी के अनुरूप मौर्यकाल में बारबर पहाड़ियों (बिहार) पर चैत्य-गृहों का निर्माण हुआ है। अशोक कालीन चैत्य गृह लघु और सादे होते थे, किन्तु कभी-कभी बाहर की ओर उन्हें अंकित भी कर दिया जाता था।

चैत्य

पश्चिम भारत के सुन्दरतम् चैत्य भाजा, कोंडाने, पीतलखोरा, अजन्ता, विदिशा, नासिक और कार्ली में है। सामान्य रूप से इन सभी चैत्यों की रचना शैली समान है। इन चैत्यों कार्ली चैत्य सुन्दरतम् तथा सर्वश्रेष्ठ है। यह कार्ली चैत्य सबसे बड़ा सर्वाधिक सुरक्षित तथा पूर्ण विकसित शैली का है। इसका हाल 124 फीट 3 इंच लम्बा, 45 फीट 3 इंच चौड़ा है। Apse के पास चैत्य के कक्ष (Nave) और गैलरी के मध्य में एक ही शैली के 37 स्तम्भ खड़े हैं जो कि गुम्बद (Apse) की गोलाई के चित्र रहित और अष्टकोणीय आकृति के हैं। शेष 15 खम्भे हाल या कक्ष के दोनों ओर सतह में मोटे सिर पर खण्डाकृति वाले तथा चोटी पर घुटने टेके हुए हाथी व शेरों के चित्रों से सुसज्जित हैं जिन पर सवार बैठे हैं या पास में खड़े हुए हैं। इन चित्रों के ऊपर 45 फीट ऊँचा गुम्बद है जो अर्धगोलाकार छत पर बनाया गया है। Soffir के नीचे नसें उभरी हुई हैं, जो प्रस्तर में उत्कीर्ण न होकर लकड़ी की बनी है।

बड़े घेरे (Apsidal) के अन्त में गुम्बज Vault समाप्त हो जाता है तथा वहाँ पर गुम्बज अर्धगोलाकृति है। उनके नीचे एक स्तूप है जो कि प्रसिद्ध स्तूपों जैसी आकृति का है, जिस पर एक की छतरी बनी है। हॉल के दरवाजे पर एक-एक काष्ठ का पर्दा है जो कि तीन दरवाजे के बाद है तथा एक रास्ता हॉल की ओर जाता है। शेष दो मार्ग गैलरी की ओर जाते हैं। यह पर्दा खम्भे (pillars) की छत तक ऊँचा है तथा खुला हुआ भाग घोड़े के खुर जैसी आकृति की खिड़की से आवृत्त है। भगवत शरण उपाध्याय ने इस गवाक्ष को पीपलपत्र की आकृति का माना है। इस गवाक्ष के द्वारा ही हॉल में प्रकाश पहुँचता है। स्तूप व Nave दोनों पर अच्छा प्रकाश है, किन्तु गैलरी में अपेक्षाकृत अँधेरा है। हॉल. के मुख्य द्वार के समक्ष एक बरसाती (Porch) बनी हुई है जो 15 फीट लम्बी, 58 फीट ऊँची है। उसकी चौड़ाई भी ऊँचाई के बराबर है तथा पंक्तियों (Tris) अष्टकोणाकृति स्तम्भों से निर्मित हैं। इसके बीच में एक प्रस्तर की शिला है जिसमें लकड़ी की उत्कीर्ण चद्दरें हैं जो कि मुख्य द्वार के फसाद (Facade) तक लम्बी चली गई हैं।

यह सुन्दरतम चैत्य गृह लगभग ई० पू० प्रथम शतक का है। इसका निर्माण कार्य शायद अशोक के काल में ही प्रारम्भ हो गया था। आज भी इस चैत्य का अष्टकोणाकृति स्तम्भ शेष है। यह स्तम्ध आकृति में अशोक के, ईरानी कला से प्रभावित स्तम्भों से मिलता है। इसमें तीन द्वार थे। हॉल में खुलने वाला बीच का द्वार संघ के सदस्यों के लिए था और शेष गृहस्थ उपासकों के लिए थे, वे बायें द्वार से प्रवेश कर संघ के कार्य में विघ्न डाले चैत्य, स्तूप या प्रतीक की प्रदक्षिणा कर दाहिने द्वार से बाहर निकल जाते थे। इस प्रकार के तीन द्वार प्रायः समस्त चैत्य गृहों में हुआ करते थे।

दक्षिण के गुहा चैत्यों में भाजा का चैत्य प्राचीनतम है। यह चैत्य एक ठोस चट्टान को खोखला कर बनाया गया है। एक प्रकार का हाल है। इस हाल की दीवारों के पास अठपहलू, खम्भों की पंक्तियाँ हैं जिन पर टेढ़ी शहतीरें सधी हुई हैं। हाल के अन्तिम भाग में एक स्तूप है वह भी चट्टान को काट-छाँट कर बनाया गया है।

भाजा, कोंडाने के हाल 60 फीट लम्बे हैं, अजन्ता के प्रारम्भिक हाल 96 फीट, नासिक के 45 फीट लम्बे हैं। भाजा, कोंडाने,पीतलखोरा, अजन्ता में द्वार पर पर्दा लकड़ी का है। अजन्ता के हाल के स्तम्भों पर कोई चित्रकारी नहीं है, नीचे का आधार स्थल भी नहीं है, पीतलखोरा की तरह यहाँ भी किनारे की ओर की छत अलंकृत है, ऊपर लकड़ी का प्रयोग नहीं है। सत्यकेतु विद्यालंकार इनके सम्बन्ध में लिखते हैं कि “महाराष्ट्र के गुहा मन्दिरों में अजन्ता की गुफायें सबसे प्रसिद्ध और प्राचीन हैं। इनमें से गुहा नम्बर 10 सबसे पुरानी समझी जाती है। अजन्ता के गुहा-मन्दिर भारतीय वास्तुकला और चित्रकला के अनुपम उदाहरण हैं। पहाड़ों को काटकर बनाए गए विशाल-गुहा-मन्दिरों के दीवारों पर इतने सुन्दर रंगीन चित्र बनाए गए हैं कि हजारों साल बीत जाने पर भी वे अपने आकर्षण में जरा भी कम नहीं हुए। अजन्ता की इन प्रसिद्ध गुफाओं का निर्माण इसी काल प्रारम्भ हुआ था।”

समय की दृष्टि से इन चैत्य गुफाओं का सर जॉन मार्शल ने क्रम निर्धारित किया है। उनके अनुसार सबसे प्राचीन भाषा, कोन्डान, पीपलखोरा और अजन्ता की दसवीं गुफा है। इनके बाद विदिशा का चैत्य बना। इसके बाद अजन्ता की नवम-गुफा, नासिक का चैत्य सबसे अन्त में कार्ली का चैत्य बना है। नासिक के चैत्य का समय वही है जो उसके समीपस्थ विहार का है। यह विहार आन्ध्र नरेश कृष्ण के समय द्वितीय शती ई०पू० के प्रारम्भ में बनाया गया था। यहाँ की चार प्राचीनतम गुफाएँ तृतीय शतक ई०पू० के अन्त की है, विदिशा की द्वितीय शती ई०पू० की है, नासिक की ई०पू० 160 तथा कार्ली की गुफा 80 ई०पू० की है। कार्ली के एक लेख के अनुसार इसे वैजयन्ती के सेठ भूतपाल ने बनवाया था। यह क्षत्रप नहपाल के दामाद उपवदात का सपकालीन था। नासिक के एक गुहा-मन्दिर में एक लेख के अनुसार सातवाहन कुल के राज कण्ह के समय उसके महामात्र ने बनाया था। राजा कण्ह सातवाहन वंश के प्रतिष्ठाता सिमुक का भाई था। इसका काल ई०पू० तृतीय शतक है। नासिक के चैत्य में द्वारमार्ग, कमल की डिजायन, द्वारपालों की आकृति आदि साँची के तोरण की समकालीनता को सूचित करते हैं। सम्भवतः नासिक के चैत्य भरहुत के एक शताब्दी बाद के हैं। फर्गुसन आदि ने नासिक के चैत्य को ई०पू० प्रथम शतक का माना है, जबकि सत्यकेतु विद्यालंकार इसका समय ई०पू० तृतीय शतक मानते हैं।

इसी काल का रामगढ़ में सीताबेंगा नामक स्थान पर एक गुहा-मन्दिर प्राप्त हुआ है। इस गुहा-मन्दिर को सत्यकेतु विद्यालंकार प्रेक्षागार मानते हैं, क्योंकि “उसकी दीवार पर किसी रसिक कवि का एक छन्द खुदा हुआ है।” इस काल में अन्य अनेक स्थान पर गुहा-मन्दिर प्राप्त हैं जो कि तात्कालिक कला की विशेषता के परिचायक हैं।

विहार

स्तूप और चैत्य गृह की भाँति विहार भी बौद्ध जीवन के अंग थे। वास्तुकला की दृष्टि से परस्पर सम्बद्ध होते हुए भी तीनों की अपनी-अपनी विशेषताएँ थीं। विहार वह स्थान था, जहाँ बौद्ध संघ रहता था। दूसरे शब्दों में विहार एक पठ था, जहाँ एक आचार्य का अपना अनुशासन चला करता था। प्रायः बौद्ध चैत्यों और बौद्ध तीर्थों के साथ विहार अवश्य रहते थे। इसीलिए नासिक, अजन्ता और विदिशा आदि स्थानों पर विहार बने हुए थे। कुम्हरा के उत्खनन से अनेक शुंग कालीन विहारों के अवशेष उपलब्ध हुए हैं। ये विहार प्रारम्भिक अवस्था के सूचक हैं, जबकि कुषाण कालीन विहार विकसित अवस्था के सूचक हैं। कुषाण कालीन विहारों के मध्य में एक चतुर्भुजाकार आँगन होता था और तीनों ओर कोठरियों की पंक्ति रहती थीं, जिसके समक्ष एक बरामदा होता था। सामान्यतः सभी कोठरियाँ छोटी होती थीं, किन्तु कोने पर स्थित कोठरी का आकार कुछ बड़ा (15’ x 9’6″) होता था। एक अन्य विहार भी कुम्हार की खुदाई में मिला है, जिसमें 14 छोटे कमरे हैं। और इनके सम्मुख चार संकुचित खुला बरामदा है ये शुंग और कुषाण कालीन भवन पक्की ईंटों से निर्मित हैं इनसे संलग्न नालियों खडंजे ईंटों से निर्मित हैं।

ईसा पूर्व प्रथम-द्वितीय शतक के भरहुत के एक अर्धचित्र में श्रावस्ती के जेतवन के विहार में भिक्षुओं का अंकन है। फाह्यान ने इसी विहार को आठ सौ वर्ष पश्चात् देखा था। फाह्यान के समय में इस विहार का परिवर्धन पर्याप्त मात्रा में हो चुका था, इसके भवन सात-आठ मंजिल तक थे।

नासिक का गौतमी विहार हीनयान सम्प्रदाय का था। यह पर्वत को काटकर निर्मित है। आज भी उसे में यह खड़ा है। यह विहार कार्ले के चैत्यगृह का समकालीन है। नासिक के विहार में भिक्षुओं के रहने के छोटे-छोटे कमरे बने हुए हैं। इस विहार में एक बड़ा कमरा 45 फीट लम्बा और 41 फीट चौड़ा है। कमरे में दीवारों से लगी हुई तीन ओर प्रस्तर की बैचें हैं। हाल का द्वार एक बरामदे में होकर था, बरामदे के सम्मुख 6 स्तम्भ हैं, किन्तु इस पर कार्ले की भाँति देवमिथुन, गज, वृषभ, सिंह आदि चित्र नहीं हैं।

इसी के निकट ही नहपान विहार ईसा पूर्व प्रथम शतक का है। इस विहार के स्तम्भ त्रिकोण आधार और घट पर स्थित हैं। इनके शीर्ष घण्टाकृति के हैं। ऊपर पिरामिड है जिस पर वृषभ आरूढ़ है। ये वृषभ बिल्कुल कार्ले चैत्यगृह के समान हैं। विदिशा के पर्वत को काटकर बनाया गया विहार भी प्राचीन है, सम्भवतः ई०पू० द्वितीय शतक का। इसकी छत गुम्बदाकार है। चैत्य के चारों ओर प्रदक्षिणा भूमि है, कोठरियों के द्वार चैत्यगृह में निकलते हैं।

भाजा का पर्वतीय विहार-

इन विहारों में श्रेष्ठ, दर्शनीय तथा मुख्य है। यह प्राचीनतम भी है। यह पूना के निकट स्थित है। इसकी मूर्ति-सम्पत्ति अमित है। इस विहार की रूपरेखा सामान्य है- बाहर बरामदा, उसके पीछे दो द्वार वाली एक भित्ति, ऊपर चैत्य गवाक्ष, भीतर की ओर एक बड़ा हाल – जिसमें भिक्षुओं के रहने के लिए दोनों ओर कोठरियाँ बनी हुई हैं। ऊपर की ओर पर्वत को काटकर छत का आकार पीपे के समान बना दिया गया है। इस विहार की दीवारों तथा स्तम्भों में अनेक मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं, हाल के अन्दर रक्षकों के चित्र तथा अन्य अनेक प्रकार के दृश्य-अंकित हैं। इस विहार की मूर्तियाँ, दृश्य आदि सभी सजीव तथा अनुपम हैं। इन्द्र, सूर्य आदि के उभार लिए हुए अंकन आकर्षक हैं। नदसूर और पीतलखोरा के विहार भी इसी प्रकार के हैं, उनके द्वार या स्तम्भों पर लक्ष्मी के चित्र हैं, कुछ झुके हुए पशुओं के चित्र भी वहाँ देखे जा सकते हैं।

बौद्ध विहारों का वर्णन करते हुए चीनी यात्रियों ने इन्हें अनेक मंजिल का बताया है। फाह्यान तथा ह्वेनसांग दोनों ने ही लिखा है कि “विहार छः-छः, आठ अट्टों तक बनते चले गये थे। विहार मठ के रूप में भिक्षुओं के आवास तो थे ही, साथ ही उसके लिए विद्यालय का कार्य भी करते थे। नालन्दा विहार का वर्णन करते हुए चीनी यात्री ह्वेनसांग ने लिखा है, “भिक्षुओं का प्रत्येक आवास (विहार) चार मंजिला था ! संख के हाल स्तम्भों पर देव-मूर्तियां बनी थीं, और उसकी क्षत्रियों में इन्द्र-धनुष के सातों रंङ्ग विद्यमान थे, सर्वत्र अर्थ चित्र उत्कीर्ण थे और चौखटों का सौन्दर्य अकथनीय था। भीतर के रङ्ग परस्पर मिलकर अनेक अन्य रङ्ग उत्पन्न करते थे। जिससे बिहार का सौन्दर्य सहस्त्र गुना बढ़ जाता था।”

बाराबर की गुफाएँ

बाराबर की गुफाएँ बिहार राज्य में गया से तीस किलोमीटर उत्तर में स्थित है। वहाँ मौर्यकाल में चार शैलोत्कीर्ण विहार बनाये गये। उनके नाम हैं कर्ण चौपड़, सुदामा, लोमश ऋषि और विश्वझोपड़ी। इन गुहाओं का निर्माण नगर के कोलाहल से दूर ऋषि-मुनियों व भिक्षुओं के रहने के लिये किया गया ताकि वे पूजा उपासना इत्यादि कर सकें। बाराबर के गुहा-लेखों से यह पता चलता है कि मौर्य सम्राट अशोक तथा उसके पौत्र दशरथ ने आजीविक संप्रदाय के साधुओं के लिए इन गुहाओं को बनवाया था। बाराबर की पहाड़ी से लगभग तीन किलोमीटर उत्तर-पूर्व में नागार्जुनी पहाड़ी पर भी ऐसी तीन गुहाएं हैं। उनके नाम हैं गोपिका, वहिजक और बडल्हिक। इनके अतिरिक्त गया से चालीस किलोमीटर पूर्व और राजगृह से बीस किलोमीटर दक्षिण में सीतामढ़ी में भी एक गुहा है। ये सभी गुहाएँ मौर्यकालीन हैं।

उन गुहाओं के दीवार की भीतरी सतह पर मौर्यकाल में प्रचलित चमकदार पालिश का लेप किया है। इन गुहा-पक्षों का विशेष महत्त्व यह है कि ये भारत में शैलोत्कीर्ण विधि के आरम्भिक उदाहरण हैं तथा कुछ गुहाओं में वैदिककालीन काष्ठ और घास-फूस की झोपड़ी को साकार चट्टान पर उकेरा गया है। इससे यह पता चलता है कि पूर्ववर्ती पर्णशालाओं का निर्माण अस्थायी सामग्री के स्थान पर अब पत्थर पर किया जाने लगा।

बराबर की गुहाओं में सर्व आरंभिक सुदामा अथवा न्यग्रोध गुहा है जो अशोक के राज्यारोहण के बारहवें वर्ष में निर्मित हुई थी। इस गुहा में दो कक्ष हैं। आगे का आयताकार कक्ष 32 फुट 9 इंच लम्बा16 फुट 6 इंच चौड़ा तथा 6 फुट 9 इंच ऊँचा है। उसकी छत गजपृष्ठाकार है। कक्ष के द्वार में ढलुवाकार स्तम्भ लगे हैं। बाहर से कक्ष की कुल ऊँचाई 12 फुट 6 इंच है। इस कक्ष के अंत में संलग्न एक वृत्ताकार कोठरी है। उसका व्यास 19 फुट है तथा ऊंचाई 11 फुट है। छन झोपड़ी सदृश्य अर्ध वृत्ताकार है। बाह्य कक्ष से इस भीतरी कोठरी में प्रवेश हेतु द्वार बना है ।

कर्ण चौपड़ गुहा के लेख से यह पता चलता है कि उसका निर्माण अशोक के राज्यारोहण के 19वें वर्ष में हुआ था। यह एक सामान्य आयताकार (33 फुट 6 इंच x 14 फुट 6 इंच x 6 फुट 1 इंच) गुहा है। उसकी भीतरी दीवार पालिश के कारण अत्यंत चिकनी है।

सुदामा गुहा के समान उसके बगल में बनी हुई लोमश ऋषि गुहा भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। कालक्रम की दृष्टि से यह उपरोक्त दोनों की अपेक्षा परवर्ती है तथा स्थापत्य की दृष्टि से सर्वोत्कृष्ट है। उसमें कोई लेख अंकित नहीं है किन्तु यह मौर्यकाल की ही कृति है। आकार- प्रकार में यह सुदामा गुहा के समान ही है। बाह्य आयताकार कक्ष (32 फुट 9 इंच x 19 फुट 6 इंच x 12 फुट 3 इंच) से संलग्न वृत्ताकार कोठरी बनी हुई है। आयताकार कक्ष की छत गज पृष्ठाकार है। इस कक्ष के प्रवेश द्वार के दोनों ओर एक-एक ढलुवा स्तम्भ लगे हैं जो गुहा के अग्रभाग को विशेष आकर्षक बनाते हैं। काष्ठ रचना की पर्णशालाओं के अनुरूप अग्रभाग चट्टान पर उकेरा गया है। द्वार के दोनों ओर 13 फुट ऊँचे मोटे खम्बे लगे हैं जो थोड़ा भीतर को झुके हुए हैं। उनके ऊपरी सिरों पर समानान्तर शहतीरें बनी हैं। द्वार का ऊपरी भाग अर्ध चन्द्राकार मेहराब सदृश्य है। मेहराब के निचले भाग पर पंक्तिबद्ध हाथी स्तूप-पूजा करते हुए तथा उसके ऊपर जालीदार गवाक्ष बने हैं। इस प्रकार संपूर्ण अग्र भाग अत्यन्त अलंकृत है। बाह्य कक्ष से भीतरी कोठरी में जाने के लिए दरवाजा बना है। कोठरी अंडाकार 19 फुट व्यास की है उसकी अर्ध वृत्ताकार छत्त बीच में 12 फुट 3 इंच ऊँची है। बाहर से यह कोठरी घास- फूस की झोपड़ी सदृश प्रतीत होती है। उसके दीवार की भीतरी सतह अत्यन्त चमकीली है।

नागार्जुनी में ग्रेनाइट पत्थर की पहाड़ी पर तीन गुहाएँ खोदी गयी हैं। उनमें गोपी गुहा आकार-प्रकार में सर्वाधिक बड़ी है। यह योजना में गोलाकार सुरंग के समान है। लगभग 46 फुट लम्बी, 19 फुट 2 इंच चौड़ी तथा मध्य में 10 फुट ऊँची है। गुहा के दोनों सिरे वृत्ताकार हैं। प्रवेश हेतु द्वार दक्षिणी दिशा में है। दीवार की भीतरी सतह चिकनी व चमकदार है। प्रवेश द्वार के ऊपर अंकित लेख से यह पता चलता है कि उसे मौर्य सम्राट दशरथ ने अपने सिंहासनारोहण के बाद बनवाया था।

नागार्जुनी की दूसरी गुहा वहिअक अथवा वहिजक पहाड़ी के उत्तरी भाग पर है। उसमें 16 फुट 9 इंच लम्बा 11 फुट 3 इंच चौड़ा और बीच में 10 फुट ऊँचा कक्ष बना है। दीवार की भीतरी सतह चमकदार व चिकनी है। उसमें प्रवेश हेतु एक द्वार है। यह गुहा अशोक के पौत्र दशरथ द्वारा बनवायी गयी थी। इसी प्रकार तीसरी वडथिक अथवा वडल्हिक गुहा भी समान आकार-प्रकार वाली है। लेख से विदित होता है कि उसे भी दशरथ द्वारा बनवाया गया था।

सीतामढ़ी की गुहा किसी पहाड़ी पर न बनाकर स्वतन्त्र ग्रेनाइट पत्थर को भीतर से खोखला कर बनायी गयी है। यह 15 फुट 9 इंच लम्बा और 11 फुट 3 इंच चौड़ा एक आयताकार कक्ष है। सम्पूर्ण गुहा मेहराबदार प्रतीत होती उसकी ऊँचाई 6 फुट 7 इंच है। प्रवेश द्वार के दोनों स्तम्भ ढलुआकार हैं। इन्हीं विशेषताओं के कारण इसे मौर्यकालीन माना गया है।

मौर्यकालीन इन गुहाओं से बाराबर और उसके निकटवर्ती क्षेत्र में अर्ध शताब्दी तक कराये गये निर्माण कार्य का पता चलता है। इनमें से कुछ गुहाओं को देखकर यह ज्ञात होता है कि शौलोत्कीर्ण चैत्यगृह की मूलभूत योजना, जिसमें आयताकार मण्डप बनाया गया, अशोक के समय से ही उद्भूत हो चुकी थी। इस स्थापत्य का आगे चलकर चैत्यगृहों के रूप में अभूतपूर्व विकास हुआ। अतः निस्संदेह सुदामा और लोमश ऋषि की गुहाओं को इस विकासक्रम का आरम्भिक आधार बनाया गया। अशोक कालीन सुदामा और लोमश ऋषि की गुहाओं में एक ओर जहाँ भव्यता और अलंकृत स्थापत्य का दिग्दर्शन होता है, वहीं अशोक के पश्चात् इस स्थापत्य का ह्रास हुआ। दशरथ कालीन नागार्जुन की गुहाएं सामान्य कक्ष हैं तथा योजना और स्थापत्य में साधारण हैं। दशरथ के पश्चात् यह गुहा-निर्माण का कार्य पूर्वी भारत के उस क्षेत्र में पूर्णतः समाप्त हो गया। यह गुहा-स्थापत्य एक पृथक् केन्द्र के रूप में तो विकसित नहीं हो पाया, किन्तु इसने भारतीय कला के आरम्भिक इतिहास में गौरवपूर्ण स्थान अवश्य प्राप्त किया।

पश्चिम भारत की गुहाएँ-

आधुनिक भारत तथा महाराष्ट्र के अनेक भागों में लगभग ईसा पूर्व 200 से गुहाओं का निर्माण आरम्भ हुआ और वह ईसवी 9वीं शती तक चलता रहा। इनमें बौद्ध गुहाओं की संख्या अधिक है। इस धर्म के प्रचार के लिए शासकों, वणिकों तथा भिक्षुओं द्वारा गुहाओं का निर्माण कराया गया। ईसा पूर्व 200 से लेकर ईसवी दूसरी शती के अन्त तक पश्चिम भारत में बौद्ध धर्म के हीनयान की प्रबलता रही। उसके बाद से लेकर प्रायः सातवीं शती के उत्तरार्द्ध तक महायान मत का प्रसार विशेष रूप से हुआ। पश्चिमी भारत में सबसे पुरानी गुहाएँ वे मानी जाती हैं जो काठियावाड़ में जूनागढ़ तलाज तथा सान नामक स्थलों में विद्यमान हैं। उनके पश्चात् बम्बई के पूर्वांचल में भोरघाट पहाड़ियों की गुहाओं का निर्माण हुआ। इनके अंतर्गत भाजा, कोंडने, बेडसा, कार्ला तथा उनके उत्तरी क्षेत्र जुत्रर, नासिक, पीतलखोरा एवं अजन्ता की गुहाएं आती हैं। कन्हेरी की गुहाओं का पृथक् वर्ग है। इन गुहाओं के स्थापत्य की विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

  1. शैलगृह के द्वार-मुख के सामने की चाप कालक्रमानुसार बदलती गई। इस चाप की संज्ञा ‘चैत्यगवाक्ष’ मिलती है। आरम्भ में चाप का रूप अत्यन्त साधारण है, जैसा कि बाराबर की ‘लोमश ऋषि’ गुफा में मिलती है। उसके लगभग एक शताब्दी पश्चात् भाजा के चाप को हम कीर्तिमुख रूप में पाते हैं, जो कि अश्वपाद अथवा लंबायमान अर्द्धचन्द्र जैसी मिलती है। यही प्रकृति शैलगृह में भीतरी गजपृष्ठ (ऐप्स) की भी मिलती है। इसका नामकरण ‘द्विस्त्र’ (वेसर), प्रसिद्ध हुआ। कोंडने के शैलगृहों में ‘चैत्य-गवाक्ष’ की चाप में टेढ़ापन अधिक मिलता है। अजन्ता की नवी गुफा तथा कार्ला में चैत्यचाप पहले की अवस्था को प्राप्त करता है। उसका वह रूप दूसरी शती के अंत तक बना रहता है। ईसवी पाँचवीं शती से चैत्यवाक्ष का प्रवेशद्वार आधार पर संकरा होता जाता है। प्रसिद्ध कलाकेन्द्र एलोरा के ‘विश्वकर्मा चैत्य भवन’ के निर्माण (7वीं शती) तक आते-जाते अश्वपाद चाप का स्थान पूरा वृत्त ले लेता है।
  2. बरामदा की बाहरी दीवार पहले लकड़ी की बनी हुई थी, जैसा कि भाजा में उसके अवशेष मिले थे, परन्तु यह दीवार बाद में पत्थर की बनाई जाने लगी।
  3. परवर्ती शैलगृहों में लकड़ी का प्रयोग प्रायः बंद कर दिया गया। शैलगृह का गृहमुख, जो आरम्भ में सादा होता था, क्रमशः अधिक अलंकृत होता गया। उसमें दो कीर्तिस्तम्भों का प्रयोग होने लगा। कालान्तर में वह और अधिक विकसित हुआ और उसमें सामने चबूतरा तथा वेदिका का निर्माण भी होने लगा। आरम्भिक गुहाओं में गर्भद्वार (पोर्टिको) चैत्यशाला का अभिन्न अंग था परन्तु क्रमशः वह एक स्वतंत्र तत्त्व के रूप में मिलता है। कार्ला में हम उसे मंडप से भी अधिक चौड़ा पाते हैं।
  4. वेदिका निर्माण भी क्रमशः बदलता गया। आरम्भिक गुहाओं के बरामदे लघु वेदिकाओं तथा चैत्यगवाक्ष वाले अभिप्राय से युक्त बनाये जाते थे। धीरे-धीरे लघुवेदिका का निर्माण घटता गया। चौथी-पांचवीं शताब्दी तक उसे हम समाप्त पाते हैं।
  5. आरम्भिक शैलगृहों में काष्ठ का प्रयोग खाहरी सज्जा के लिए मिलता है। उदाहरण के लिए कार्ला तथा पीतलखोरा में परवर्ती शैलगृहों में लकड़ी के स्थान पर पूर्णतया पाषाण का प्रयोग मिलता है।
  6. आरम्भिक मंडपों मंडलों के स्तम्भ भीतर की ओर झुके मिलते हैं, जैसा कि भाजा में द्रष्टव्य है। यह काष्ठ-वास्तु के अनुकरण का सूचक है। मंडल के प्रवेश द्वारों के स्तम्भ भी पहले के शैलगृहों में झुकावदार मिलते हैं। परन्तु परवर्तीकाल में स्तम्भों को बिलकुल सीधा खड़ा किया जाने लगा। स्तम्भों के आकार में भी परिवर्तन लक्षित होता है। आरम्भ में सादे खम्भों का प्रयोग मिलता है, जिनके न तो आधार रहते हैं और न शीर्ष। धीरे-धीरे स्तम्भों के आधार रूप में पूर्ण घट का अलंकरण मिलने लगता । दूसरी विशेषता शीर्ष की है। पशुओं पर सवारी करते हुए महापुरुषों की शीर्षों पर प्रदर्शित किया जाने लगा। कार्ला तथा कन्हेरी में

पूर्ण-घट तथा पशुओं पर सवारी करते हुए स्त्री-पुरुष उल्लेखनीय हैं।

  1. आरम्भ में चैत्यशालाओं का आंतरिक आयाम छोटा होता था। धीरे-धीरे उसका विस्तार होता गया। यह बात भाजा तथा कार्ला में विशेष रूप से देखी जा सकती है।
  2. शैलगृहों की पार्श्ववथियों की चौड़ाई भी कालक्रमानुसार बढ़ती जाती है।

शैलगृहों के निर्माण-विषयक कतिपय शब्द प्राचीन साहित्य तथा अभिलेखों में मिलते हैं। पर्वतीय गुहा को अभिलेखों में ‘कुंभा’, ‘गुहा’ अथवा ‘घर’ कहा गया है। कोठरी को ‘अपवरक’ या ‘गर्भ’ कहते थे। शिला का कटाव ‘सेलकम्म’ (शैलकर्म) कहलाता था। शिल्पी के लिए ‘सेलबवढकि’ तथा मुख्य शिल्पी को ‘महसिला कम्मांतिक’ अथवा ‘मंहारूपकारक’ कहा गया है। शैलगृहों में मूर्तियाँ उत्कीर्ण करना ‘सेलरूपकम्म’ कहलाता था। चैत्यशाला के निर्माण के लिए ‘कीर्ति’ शब्द प्रयुक्त हुआ। चैत्य-गवाक्ष’ की संज्ञा ‘कीर्तिमुख’ थी। इसका शाब्दिक अर्थ उस प्रवेश द्वार से है जो कीर्ति अथवा उत्खनित शैलगृह के लिए होता था। शैलगृह के मुख (मुहार) के लिए ‘घरमुख’ (गृहमुख) शब्द आया है। इसके दो भाग होते थे- पहला ऊपरी खुला हुआ भाग (चैत्यगवाक्ष) तथा दूसरी निचली ठोस दीवार, जिसमें तीन दरवाजे होते थे। बीच का दरवाजा मध्यवर्ती मण्डप (नाभि) तक पहुँचने के लिए होता था अन्य दो दरवाजे पार्श्ववीथियों के लिए होते थे।

शैलगृहों के अभिलेखों में ‘लेण’ (संस्कृत-‘लयण’) शब्द का प्रयोग बहुत मिला है। नासिक, जुन्नर कार्ला आदि में प्राप्त अभिलेखों में दानदाताओं द्वारा भिक्षुओं के लिए ‘लेण’ बनवाने के उल्लेख मिले हैं। यह शब्द मुख्य रूप से विहार के एक या एक से अधिक कक्षा का द्योतक है। कभी-कभी उसका प्रयोग चैत्यशाला के लिए भी हुआ है। इस प्रकार की चैत्यशालाएँ पश्चिमी भारत के शैलगृहों में बहुत मिली हैं। इसके बीच में पत्थर का ठोस स्तूप या चैत्य होता था, इसके अलावा स्तम्भों पर आधारित मुख्य कक्ष होता था, जिसमें दोनों ओर पार्श्ववीथी या प्रदक्षिणा-पथ रहता था। इस प्रकार के चैत्यगृह में वैसी वेदिका आवश्यक नहीं थी, जैसी कि भरहुत, साँची आदि के स्तूपों के चारों ओर मिलती हैं। परन्तु वेदिका के प्रति शैलगृहों के निर्माताओं की पारंपरिक रुचि थी। संभवतः इसी कारण शैलगृहों के द्वार या बरामदों में लकड़ी या पत्थर की वेदिका के दर्शन होते हैं।

पश्चिमी भारत के शैलगृहों की संख्या बहुत बड़ी है। उनमें सबसे अधिक (लगभग 900) बौद्ध हैं, शेष200 जैन धर्म तथा वैदिक धर्मों से संबंधित हैं। इन गुहाओं को दो मुख्य वर्गों में विभाजित किया गया।

1. चैत्यशाला तथा

2. विहार।

चैत्यशालाओं की संख्या बहुत सीमित है, जबकि आवास के लिए बनाये गये विहारों की संख्या बहुत अधिक है।

हीनयान मत से सम्बद्ध मुख्य चैत्यशालाएँ भाजा, कोंडने, अजंता (2 शालाएं) बेडसा, नासिक तथा कार्ला में द्वितीय-प्रथम शती ईसवी में निर्मित हुई। चैत्यशाला के मुख्य अंगों को यदि हिन्दू मन्दिर के साथ तुलना करें तो कई बातों में साम्य मिलेगा। चैत्यशाला के अंतिम किनारे पर गजपृष्ठाकार पूजा-स्थल मिलता है। वह मन्दिर के गर्भगृह के स्थान पर होता है। चैत्यशाला की मध्यवीथी की तुलना मंदिर के मण्डप से की जा सकती है। दोनों ओर की पार्श्ववीथियों तथा मन्दिर के प्रदक्षिणा मार्ग में कोई अंतर नहीं होता।

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Pankaja Singh

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