अर्थशास्त्र

लघु एवं कुटीर उद्योग का अर्थ | लघु एवं कुटीर उद्योगों में अन्तर | भारतीय अर्थव्यवस्था में लघु तथा कुटीर उद्योगों का महत्त्व | लघु एवं कुटीर उद्योगों के विकास के लिए सरकार द्वारा किये गये उपाय

लघु एवं कुटीर उद्योग का अर्थ | लघु एवं कुटीर उद्योगों में अन्तर | भारतीय अर्थव्यवस्था में लघु तथा कुटीर उद्योगों का महत्त्व | लघु एवं कुटीर उद्योगों के विकास के लिए सरकार द्वारा किये गये उपाय

लघु एवं कुटीर उद्योग का अर्थ

(Meaning of Small and Cottage Industry)-

उद्योग साधारणतया दो प्रकार के होते हैं-

(i) बड़े पैमाने के उद्योग और (ii) छोटे पैमाने के उद्योग। जिन उद्योगों में भूमि, श्रम, पूँजी, प्रबन्ध आदि बड़े पैमाने पर प्रयोग किये जाते हैं, वे बड़े पैमाने के उद्योग कहलाते हैं एवं जिन उद्योगों में भूमि, श्रम, पूँजी, प्रबन्ध आदि का आकार अपेक्षाकृत छोटा होता है, वे छोटे पैमाने के उद्योग कहे जाते हैं। लघु उद्योगों का वर्गीकरण फिर दो प्रकार से कर दिया जाता है-(i) कुटीर उद्योग और (ii) लघु उद्योग। भारतीय परिस्थितियों में कुटीर उद्योगों और छोटे पैमाने के उद्योगों में अन्तर जानना आवश्यक है। दोनों प्रकार के उद्योगों को परिभाषित करके हम उनके बीच पाया जाने वाला अन्तर ज्ञात कर सकते हैं-

(i) कुटीर उद्योग- कुटीर उद्योग, वे उद्योग है, जो एक ही परिवार के सदस्यों द्वारा एक ही छत के नीचे पूर्णतः या आंशिक रूप में चलाये जाते हैं। राजकोषीय आयोग के अनुसार, “कुटीर उद्योग वे हैं, जो पूर्णरूप से या मुख्यतः परिवार के सदस्यो की सहायता से ही पूर्ण या आँशिक व्यवसाय के रूप में चलाये जाते हैं।”

(ii) लघु उद्योग- राजकोषीय आयोग के अनुसार, “लघु उद्योग, वे उद्योग हैं, जो मुख्यतः 10 या 15 श्रमिकों की सहायता से चलाये जाते हैं। इसमें लागत पूँजी पाँच लाख रुपये से कम होती है।” भारत सरकार ने अब श्रमिकों की संख्या पर ध्यान न देकर अपनी नवीन औद्योगिक नीति 1980 के अनुसार लघु उद्योगों की परिभाषा में विनियोजित पूँजी पर अधिक ध्यान दिया है। इस नीति के अनुसार 60 लाख रुपये से कम पूँजी विनियोग वाले उद्योगों को लघु उद्योग कहा जाता है। भारी मशीनरी वाले लघु उद्योगों में यह सीमा 75 लाख रुपये रखी गयी है। बहुत ही छोटे उद्योगों में यह पूँजी सीमा 5 लाख रुपये रखी गयी है।

1 मार्च, 1997 से आर्थिक सुधारों के अन्तर्गत लघु उद्योगों में संयंत्र पूर्व पूंजी विनियोग की सीमा 60 लाख रुपये तथा 75 लाख रुपये से बढ़कर 3 करोड़ रुपये भारत सरकार के द्वारा कर दी गयी है परन्तु बाद में इसे घटाकर 1 करोड़ कर दी गयी। ऐसे ही अत्यन्त छोटे उद्योगों में पूंजी विनियोग सीमा भी 5 लाख रुपये बढ़ाकर 25 लाख रुपये कर दी गयी है। सरकार के द्वारा ऐसा करने से जहाँ एक ओर लघु उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक शक्ति बढ़ेगी तथा वहीं दूसरी ओर उनके आर्थिक आकार में वृद्धि होगी।

इन सब के साथ-साथ संचालन यन्त्रों का प्रयोग, पूँजी तथा बाजार के आधार पर भी कुटीर उद्योग और लघु उद्योग में अन्तर किया जा सकता है।

लघु एवं कुटीर उद्योगों में अन्तर-

साधारणतया लघु एवं कुटीर उद्योग एक ही अर्थ में प्रयोग किये जाते हैं, परन्तु हमारे देश की परिस्थितियों के अनुसार इन दोनों के बीच कुछ भेद किया जाता है। अतएव कुटीर अथवा गृह उद्योग उन उद्योगों को कहा जाता है- (अ) जो मुख्य रूप से घरों में व्यक्तिगत आधार पर निजी साधनों एवं परिवार के सदस्यों की सहायता से पूर्णकालिक अथवा अंशकालिक व्यवसाय के रूप में चलाये जाते हैं; (ब) जिनमें अल्प निवेश सामान्य साज-सामान के साथ किया जाता है; (स) जिनमें स्थानीय कच्चे माल एवं कुशलता का प्रयोग होता है; और (द) जिनमें प्रायः स्थानीय बाजारों में बिक्री के लिए माल तैयार होता है।

दूसरी तरफ लघु उद्योग का अभिप्राय उन उद्योगों से है- (अ) जहाँ हस्त-प्रक्रियाओं की प्रधानता न रह करके शक्तिचालित मशीनों की प्रायः प्रधानता रहती; (ब) जिनमें मजदूरी और वेतन पर पर्याप्त व्यक्ति लगाये जाते हैं; (स) जो व्यापक बाजार की माँग की पूर्ति करते हैं; (द) जो साधारणतया स्थायी रूप से पूर्णकालिक चलाये जाते हैं। यदि सही अर्थ में देखा जाय तो हम पाते हैं कि लघु उद्योग बृहद उद्योग से सिर्फ पूँजी निवेश के आकार एवं उत्पादन के पैमाने से भिन्न होते हैं। साइकिल के पुर्जे, रेडियो, सिलाई की मशीनें, छपाई, बिस्कुट और बिजली के सामान आदि अनेक प्रकार की वस्तुओं के तैयार करने में लघु पैमाने के उद्योग हमारे देश में बहुत ही महत्व से होते जा रहे हैं।

लघु एवं कुटीर उद्योग, गाँवों एवं शहरों दोनों में चलाये जाते हैं। गावों में चलाये जाने वाले उद्योग को ग्रामोद्योग कहते हैं और शहरों में चलाये जाने वाले उद्योगों को शहरी उद्योग कहते हैं। प्रायः कुटीर उद्योगों का सम्बन्ध गाँवों से ही होता है। ये कृषि पर सहायक एवं ग्रामीण कौशल से सम्बन्धित होते हैं। वर्तमान समय में लघु एवं विद्युत-चालित करघों को आधुनिक लघु उद्योगों की श्रेणी में तथा खादी ग्रामोद्योग, हथकरघा, रेशम, हस्तशिल्प एवं नारियल रेशे से सम्बन्धित धन्धों को परम्परागत उद्योगों की श्रेणी में रखा जाता है।

भारतीय अर्थव्यवस्था में लघु तथा कुटीर उद्योगों का महत्त्व

(Significance of small and Cottage Industries in Indian Economy)

किसी भी देश की अर्थव्यवस्था में लघु तथा बड़े पैमाने के दोनों प्रकार के उद्योगों का विशेष महत्व होता है। भारत में तो प्राचीन काल से ही कुटीर व लघु उद्योगों का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। भारत अपने कारीगरों के कला-कौशल के लिए सारे विश्व में विख्यात था, परन्तु अंग्रेजों को भारत के गौरवपूर्ण कुटीर तथा लघु उद्योग आँखों में खटकने लगे, जिससे उन्होंने इन भारतीय उद्योगों को सभी प्रकार से तहस-नहस करने का सफल प्रयत्न किया। परन्तु इतनी अवनति होने के पश्चात् भी इन उद्योगों का अस्तित्व भारतीय अर्थव्यवस्था में आज भी कायम है। महात्मा गांधी ने तो यहाँ तक कहा था, “भारत का उद्धार कुटीर उद्योगों के द्वारा ही हो सकता है।” इसी तरह के विचार पं0 नेहरू ने इन शब्दों में व्यक्त किये थे, “भारत औद्योगिक राष्ट्र तभी बनेगा, जबकि यहाँ लाखों की संख्या में छोटे-छोटे उद्योग हों।” योजना आयोग ने भी भारतीय अर्थव्यवस्था में इन कुटीर और लघु उद्योगों के महत्त्व को समझा है और इस प्रकार के उद्योगों का विकास एवं प्रयास करने के लिए अपनी योजनाओं में गम्भीरता से विचार किया है।

भारत के आर्थिक जीवन में निम्नलिखित कारणों से इस प्रकार के उद्योगों का महत्त्व अधिक है-

  1. रोजगार- कुटीर तथा लघु उद्योग-धन्धे श्रम-बहुल होते हैं। भारतीय परिस्थितियों में जहाँ बेरोजगारी की समस्या एक भीषण रूप लिये खड़ी है, इस प्रकार के उद्योग उस भीषणता कम कर देंगे। 1951 में लघु एवं कुटीर उद्योगों में 61.4 लाख लोगों को रोजगार प्राप्त था। 1997-98 के अन्त तक 167.2 लाख लोगों को रोजगार मिला।
  2. भारत में पूँजी की कमी- कुटीर एवं लघु उद्योग पूँजीगत कम व श्रम प्रधान होते हैं और भारत में पूँजी निवेश की कमी के कारण भारतीय परिस्थितियों में श्रेयस्कर हैं।
  3. उत्पादन कार्य में कुशलता- छोटे पैमाने के उद्योगों में बड़े पैमाने के उद्योगों की अपेक्षा उत्पादन में कार्य-कुशलता अधिक होती है। इसका प्रमुख कारण छोटे पैमाने के उद्योगों की भली-भाँति देखभाल होने के कारण इनमें किसी प्रकार के नुकसान की गुंजाइश कम ही रहती है।
  4. आय व सम्पत्ति का न्यायोचित वितरण- बड़े उद्योगों में उत्पादन लाभ का एक बहुत बड़ा हिस्सा एक पूँजीपति ही हड़प जाता है, परन्तु कुटीर एवं लघु उद्योगों में उसी लाभ का अनेक उत्पादन इकाइयों में अधिक उचित रूप से वितरण हो जाता है।
  5. विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था- केन्द्रित अर्थव्यवस्था में शोषण की गुंजाइश अधिक रहती है, जो कि लोकतन्त्र और समाजवाद के सिद्धान्तों के विरुद्ध है। कुटीर और लघु उद्योग-धन्धे अर्थव्यवस्था को विकेन्द्रित बनाये रखते हैं।
  6. रोजगार की स्थिरता व सुरक्षा- छोटे-छोटे उद्योगं में बेरोजगारी का प्रश्न कम ही आ पाता है। छोटे उद्योगों में कभी भी उत्पादन इतना नहीं होता कि किसी अवधि विशेष के लिए उद्योगों को बन्द करके श्रमिकों को बेरोजगार कर दिया जावे। इसलिए छोटे उद्योगों में रोजगार के स्थायित्व की सुरक्षा रहती है।
  7. औद्योगिक शान्ति- बड़े-बड़े उद्योगों में मजदूरों और मिल मालिकों के बीच संघर्ष के कारण जो औद्योगिक संघर्ष रहता है और अशान्ति रहती है, छोटे-छोटे उद्योगों में आपसी सद्भावना के कारण इस प्रकार की अशान्ति फैलने का अवसर नहीं आता। इसके अतिरिक्त और भी औद्योगिक समस्याओं का प्रायः लोप हो जाता है।
  8. सैनिक महत्त्व- युद्ध के समय शत्रु बड़े उद्योगों को नष्ट करने का प्रयत्न करता है। यदि शत्रु हमारे देश पर युद्ध में बड़े उद्योगों पर बम आदि डालकर उनका विध्वंस करने मे सफल हो गया, तो देश की अर्थव्यवस्था ही मिट्टी में मिल जायेगी। इसके विपरीत, लघु उद्योगों का नष्ट करना शत्रु के लिए एक दुष्कर कार्य है।
  9. कलात्मक वस्तुओं का उत्पादन- कुटीर उद्योगों में अनेक कलात्मक वस्तुओं का उत्पादन होता है जिनका निर्यात करके देश को काफी विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है और देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होती है।
  10. शीघ्र उत्पादन वृद्धि– छोटे-छोटे उद्योगों की स्थापना तथा उनमें उत्पादन शुरू करने में अधिक समय नहीं लगता। इसके विपरीत, बड़े पैमाने के उद्योगों की स्थापना तथा उनमें सेउत्पादन शुरू करने में वर्षों लग जाते हैं। छोटे-छोटे उद्योगों द्वारा शीघ्र ही उत्पादन में वृद्धि की जा सकती है।
  11. देश की आत्म-निर्भरता- लघु उद्योग इस प्रकार का सामान उत्पादित करते हैं जिनको की विदेशों को निर्यात किया जाता है। इस रूप में ये विदेशी मुद्रा की बचत करते हैं। लघु उद्योगों में उत्पादित सामान का निर्यात करके विदेशी मुद्रा कमाई जाती है।
  12. उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन- उपभोग्य वस्तुओं का उत्पादन विशेषकर कुटीर व छोटे उद्योगों में किया जाता है। इससे मुंद्रा स्फीति रोकने में सहायता मिलती है।
  13. देश की सभ्यता व संस्कृति के अनुरूप- कुटीर उद्योगों में परस्पर सहयोग, सद्भावना व भ्रातृत्व की भावना बनी रहती है जो कि भारत देश की सभ्यता व संस्कृति के अनुरूप है।
  14. राष्ट्रीय आय और प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि- कुटीर एवं लघु उद्योगों के विकास से अधिकाधिक लोगों को रोजगार मिलता है, जिससे प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि होती है और उसी के फलस्वरूप राष्ट्रीय आय में भी वृद्धि होती है। किसान लोग भी अतिरिक्त समय में कुटीर उद्योगों से अपनी आय में वृद्धि कर सकते हैं।

लघु उद्योगों के महत्त्व को निम्न तालिका से स्पष्ट किया गया है-

लघु एवं कुटीर उद्योगों में उत्पादन, रोजगार एवं निर्यात

वर्ष उत्पादन मूल्य

(करोड़ रु0)

रोजगार

(लाख में)

निर्यात

(करोड़ रु0)

1980-81 28,060 71.0 1,643
1985-86 61,228 96.0 2,769
1990-91 1,55,340 125.3 9,100
1994-95 2,93,990 146.6 29,068
1995-96 3,56,213 152.6 36,470
2000-01 261289 239.09 69797
2001-02 282270 249.09 71244
2002-03 311993 260.13 86013
2003-04 357733 271.36 N.A
2004-05 245747 282.82 N.A.

स्रोत- आर्किक समीक्षा 2004-05

उपरोक्त तालिका से स्पष्ट है कि लघु उद्योगों में उत्पादन, रोजगार एवं निर्यातों में वृद्धि हुई है तथा तेजी से विकास हुआ है।

लघु एवं कुटीर उद्योगों के विकास के लिए सरकार द्वारा किये गये उपाय

(Measures Taken for the Development of Small and Cottage Industries by the Government)

भारतवर्ष में कुटीर एवं लगु उद्योगों की समस्याओं के समाधान हेतु सरकार ने अनेक उपाय किये हैं। सरकार द्वारा कुटीर एवं लघु उद्योगों के विकास के लिए किये गये उपायों को निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत स्पष्ट किया गया है-

  1. संगठनात्मक उपाय- कुटीर एवं लघु उद्योगों की समस्याओं एवं समाधान तथा विकास के लिए अनेक संगठनों की स्थापना की गई है, जैसे- कुटीर उद्योग बोर्ड, अखिल भारतीय हाथकर्घा बोर्ड, अखिल भारतीय हस्तशिल्प बोर्ड, खादी व ग्रामीण उद्योग आयोग, केन्द्रीय सिल्क बोर्ड, कोयर बोर्ड, जिला उद्योग केन्द्र, लघु उद्योग विकास संगठन, राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम आदि। संगठनों द्वारा लघु क्षेत्र के उद्योगों को सहायता प्रदान की जाती है।
  2. संस्थागत वित्त सहायता- कुटीर एवं लघु उद्योगों को रियायती दर पर वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने हेतु अनेक संस्थाओं का गठन किया गया है। सरकार ने लघु क्षेत्रों के उद्योगों को ऊंची प्राथमिकता का क्षेत्र घोषित किया है ताकि वित्तीय संस्थाएँ इस क्षेत्र में अधिकाधिक वित्तीय सुविधाएँ जुटाएँ। कार्यशील पूँजी तथा अवधि ऋणों की व्यवस्था हेतु सहकारी बैंक, वाणिज्य बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, राज्य वित्त निगम, लघु उद्योग विकास कोष आदि संस्थाएँ पूँजी की व्यवस्था करती हैं। रिजर्व बैंक भी लघु क्षेत्र के लिए गारण्टी योजना के अन्तर्गत वित्तीय सहायता प्रदान करती है।
  3. विक्रय सम्बन्धी सुविधाएँ- कुटीर एवं लघु उद्योगों को बिक्री के लिए सरकार द्वारा कुछ सुविधाएं उपलब्ध की गई हैं। देश व विदेश में विक्रय प्रोत्साहन के लिए प्रदर्शनियों का आयोजन किया जाता है। लघु उद्योगों के लिए बिक्री केन्द्र खोले गये हैं। निर्यात विकास परिषदों की स्थापना की गई है। कुटीर एवं लघु उद्योगों द्वारा निर्मित वस्तुओं के लिए विपणन हेतु प्रबन्ध किये गये हैं तथा 400 से अधिक वस्तुओं को सरकारी खरीद के लिए निर्धारित कर दिया है। इनके द्वारा निर्मित पदार्थों के खरीद सम्बन्धी नियमों में शिथिलता प्रदान की गई है।
  4. तकनीकी कौशल एवं दक्षता विकास- लघु क्षेत्र के उद्योगों में तकनीकी विकास एवं दस्तकारों की कुशलता में अभिवृद्धि के लिए सरकार द्वारा सरकारी एवं गैर-सरकारी संगठनों के माध्यम से उद्यमिता विकास प्रशिक्षण, तकनीकी प्रशिक्षण दिये जाने की व्यवस्था की गई है। केन्द्रीय लघु उद्योग विकास संगठन तथा चार प्रादेशिक लघु सेवा संस्थान स्थापित किये गये हैं।
  5. अन्य उपाय- कुटीर एवं लघु उद्योगों के विकास के लिए सरकार द्वारा इनके लिए कच्चा माल उपलब्ध कराने के लिए प्रयास किये गये हैं। उत्पादन शुल्क में छूट दी गई है। उद्योगों को किश्तों पर मशीनरी दिलवाने की व्यवस्था की गई है। बड़े उद्योगों की प्रतियोगिता से बचाने के लिए कुटीर एवं लघु उद्योगों को सरकारी नीति के तहत संरक्षण दिया गया है। औद्योगिक सहकारी समितियों की स्थापना कर इन उद्योगों को लाभ पहुंचाया गया है।
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Pankaja Singh

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