हिंदी साहित्य का इतिहास

हिन्दी आलोचना के विकास में नन्द दुलारे वाजपेयी का योगदान

हिन्दी आलोचना के विकास में नन्द दुलारे वाजपेयी का योगदान

हिन्दी आलोचना के विकास में नन्द दुलारे वाजपेयी का योगदान

हिन्दी आलोचना में शुक्ल जी की रस-पद्धति और छायावाद की स्वच्छन्दतावादी आलोचना पद्धति के सामंजस्य का श्रेय आचार्य नन्द दुलारे वाजपेयी को है। उन्होंने हिन्दी आलोचना में इस सामंजस्य और सम्मिलन के द्वारा नवीन शक्ति का संचार किया। नई आलोचना पद्धति को जन्म दिया। सन्तुलन सामंजस्य की इस पृष्ठभूमि में यदि हम आचार्य बाजपेयी के हिन्दी आलोचना के विकास में योगदान पर विचार करें, तो हमें उनकी निम्नलिखित उपलब्धियाँ दृष्टिगत होती हैं-

  1. नवीन सौष्ठववादी समीक्षा पद्धति की प्रतिष्ठा- रस सिद्धान्त और स्वच्छन्दतावादी समीक्षा दृष्टि का समन्वय कर वाजपेयी जी ने एक नयी समीक्षा पद्धति को जन्म दिया जिसे सौष्ठववादी कहा जाता है और जिसमें काव्य के भाव सौन्दर्य का बिना किसी पूर्वाग्रह या सिद्धान्त की मर्यादा के उद्घाटन किया जाता है। सौन्दर्य बोध पर उनकी दृष्टि विशेष रूप से केन्द्रित है। उनकी सौष्ठवादी कला दृष्टि में अनुभूति और अभिव्यक्ति का भी सामंजस्य है। सौष्ठववादी समीक्षा दृष्टि की स्थूल उपयोगिता को स्वीकार नहीं करती। इस प्रकार वाजपेयी जी ने हिन्दी आलोचना को शुक्ल जी की अति नैतिकता से मुक्ति प्रदान की है। उनका निम्नलिखित वक्तव्य उल्लेखनीय है, “महान कला कभी अश्लील नहीं हो सकती। उसके बाहरी स्वरूप में यदा-कदा अश्लीलता सम्बन्धी रूप-आदर्शों का व्यतिक्रम भले ही हो और क्रान्तिकारी ऐसे भी हो जाता है। पर वास्तविक अश्लीलता, अमर्यादा या मानसिक स्खलन उसमें नहीं हो सकता है। साहित्य सदैव सबल दृष्टि का ही हिमायती होता है।

वाजपेयी जी साहित्य में भावना के उद्रेक, उच्छवास, परिष्कृत और प्रेरकता को समीक्षा के मुख्य मानदण्ड’ स्वीकार करते हैं। काव्यशास्त्र के तत्व भी गौण हैं, उनसे भी ऊपर उठकर सौन्दर्य का उद्घाटन ही उनकी समीक्षा का प्रधान उद्देश्य है। वाजपेयी जी की इस उपलब्धि के सम्बन्ध में डॉ0 शिवसहाय पाठक का कथन दृष्टव्य है- “सांस्कृतिक, कलात्मक, सौन्दर्यवादी और अनुभूति, अभिव्यक्तिपरक मूल्यों का अत्यन्त सुष्ठ रूप पहली बार हिन्दी में वाजपेयी जी की समीक्षा में ही निखार पा सका है। उनकी स्वतन्त्र, वैज्ञानिक और सौन्दर्यमूलक व्याख्याओं का स्थायी मूल्य है।

  1. विशुद्ध साहित्य भूमि पर वैज्ञानिक समीक्षा का सूत्रपात- वाज़पेयी की इस सम्बन्ध में दूसरी महत्वपूर्ण उपलब्धि है विशुद्ध साहित्य भूमि पर वैज्ञानिक समीक्षा का सूत्रपात। वाजपेयी जी ऐसी ही शुद्ध, आलोचना के पक्षपाती हैं जिसका मानदण्ड विशुद्ध साहित्यिक हो। वाजपेयी ने अपनी समीक्षाओं द्वारा इसी प्रकृत-स्वरूप की प्रतिष्ठा की। आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने ठीक ही लिखा है, “सम्प्रति हिन्दी में आलोचना बहुत हो रही है, पर विशुद्ध साहित्य भूमि पर स्थिति यदि कोई सच्चा आलोचक दिखाई देता है तो वह वाजपेयी जी के अतिरिक्त अन्य नहीं है।“
  2. छायावाद का समर्थ व्याख्या – छायावाद के प्रथम समर्थ व्याख्याता के रूप में आचार्य नन्द दुलारे वाजपेयी का महत्व निर्विवाद है। डॉ0 नगेन्द्र ने स्वीकार किया है कि, “हिन्दी का यह (वाजपेयी जी) पहला आलोचक था जिसने निर्भीक और निर्भ्रान्त होकर छायावाद के महत्व को स्वीकृत और प्रतिष्ठित किया।” वास्तव में हिन्दी आलोचना जगत में वाजपेयी जी छायावाद और उसकी काव्य शैली के समर्थ व्याख्याता और उन्नायक के रूप हमारे सामने आते हैं। अपने अभ्युत्थानकला में छायावाद को बहुत संघर्ष करना पड़ा। इस संघर्ष में वाजपेयी जी की भूमिका अन्यतम है।

इस सम्बन्ध में यह भी उल्लेखनीय है कि वाजपेयी जी ने ही छायाबाद की परीक्षा समीक्है के लिए सर्वप्रथम समीचीन और अपेक्षित प्रतिमानों की प्रतिष्ठा की। डॉ० वॅटक शर्मा ने इसीलिए उन्हें सौन्दर्यमूलक ‘स्वच्छन्दतावाद’ का प्रवर्तक कहा है। जिस समय आलोचकों की समीक्षाओं में छायावाद के गौरव का व्याख्यान किया। उनकी निम्नलिखित पंक्तियाँ हमारे इस कथन का प्रमाण प्रस्तुत करती हैं- “प्रसाद, निराला और पन्त जैसे महान, कवियों की एक साथ अवतारणा किसी भी साहित्य के इतिहास में कोई साधारण घटना नहीं है- उन्मुक्ति की आकांक्षा, मानवीय व्यक्तित्व के प्रति सम्मान तथा विश्व के समस्त जन समाज को एकान्तिक करने वाली मानवतावादी भूमिका यहाँ विद्यमान है।”

  1. सम्पूर्ण अर्थ में युग-सापेक्ष्य समीक्षा का जन्म- वाजपेयी जी को बदली हुई परिस्थितियों के अनुरूप, अर्थात सम्पूर्ण युग – सापेक्ष्य, परन्तु शाश्वत, समीक्षा मूल्यों के जन्म का श्रेय दिया जा सकता है। ‘नवीनता के अग्रगामी युग में नव्यतर साहित्यिक कृतियों को नये माप और बाँटों को तौलने का कार्य, इन कृतियों के साथ उत्पन्न होने वाले तरुण पारखियों द्वारा ही सम्पन्न हुआ। उन तरुण पारखियों में पं० नन्ददुलारे वाजपेयी जी की इस उपलब्धि से ही छायावादी काव्य को सही समीक्षक मिला।
  2. भारतीय रस- सिद्धान्त की व्यापकता की प्रतिष्ठा – वाजपेयी जी ने रस पर स्वतन्त्र दृष्टि से विचार किया है और रस को मूलभूत वस्तु मानते हुए भी उसके ब्रह्मानन्द सहोदरत्व अथवा अलौकिक को स्वीकार नहीं किया है। रस को वे सौन्दर्य संवेदन या आह्लादकारिणी सत्ता के रूप में लेते हैं। इस प्रकार रस की एक व्यापक मानवतावादी भूमि पर प्रतिष्ठा वाजपेयी जी की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। डॉ0 शिवसहाय पाठक के शब्दों में, उन्होंने रस-सिद्धान्त को राष्ट्रीय संवेदन से सम्बन्ध करके एक व्यापक एवं प्रौढ़ आधार दिया है। साथ ही समीक्षा क्षेत्र में व्यापक आराजकता के अल्पीकरण के लिए एक सशक्त मानदण्ड भी प्रस्तुत किया है।”
  3. स्वस्थ, वाद-निरपेक्ष दृष्टि- आचार्य वाजपेयी रस के रूप में ‘आह्लादमूलक तीव्र मार्मिक अनुभूति और उसकी कलापूर्ण अभिव्यक्ति को काव्य समीक्षा का निरापद आधार मानकर एक स्वस्थ और वाद-निरपेक्ष दृष्टि परिचय देते हैं। सौन्दर्य-दृष्टि और सिद्धान्त-निरपेक्षता जो सौष्ठववादी समीक्षा की मूलभूत आवश्यकताएँ बताई है। यहीं वे आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की रूढ़िवादिता का भी विरोध करते हैं।
  4. आलोचक की निर्भीकता और साहस का निर्वाह- समीक्षा क्षेत्र में बाजपेयी जी की एक अन्य महत्वपूर्ण उपलब्धि तटस्थता, निर्भीकता और साहस का निर्वाह है। डॉ0 नगेन्द्र ने कहा है- वर्तमान हिन्दी के कम आलोचकों ने अपनी प्रतिभा का इतना साहसपूर्ण परिचय दिया है। वस्तुतः यदि वाजपेयी जी में साहस और प्रतिभा का मणिकांचन सहज संयोग न होता तो वे शुक्ल जी का इतना दृढ़ विरोध न कर पाते और नब्योदित छायावादी काव्य को वह बौद्धिक अवलम्ब न दे पाते, जो उन्होंने दिया।”

निष्कर्ष-

उपर्युक्त विवेचन से हिन्दी आलोचना के विकास में वाजपेयी जी ने महत्वपूर्ण योगदान का सच्चा और सही चित्र हमारे सामने आया जाता है। शुक्लोत्तर हिन्दी समीक्षा में वाजपेयी जी का स्थान निर्विवाद रूप से अत्यन्त महत्वपूर्ण है। छायावाद का तना समर्थ व्याख्याता वैज्ञानिक सौष्ठववादी समीक्षा का पुरस्कर्ता और उन्नायक आलोचकों में वाजपेयी जी के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं है।”

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