हिंदी साहित्य का इतिहास

आचार्य नन्द दुलारे वाजपेयी की आलोचनात्मक पद्धति | आचार्य नन्द दुलारे वाजपेयी की समीक्षा पद्धति की विशेषतायें

आचार्य नन्द दुलारे वाजपेयी की आलोचनात्मक पद्धति | आचार्य नन्द दुलारे वाजपेयी की समीक्षा पद्धति की विशेषतायें

आचार्य नन्द दुलारे वाजपेयी की आलोचनात्मक पद्धति

नन्द दुलारे वाजपेयी के साथ हिन्दी सौष्ठववादी समीक्षा धारा को प्रतिष्ठा मिली। उन्होंने भारतीय काव्य शास्त्र व पाश्चात्य समीक्षा शास्त्र का व्यापक अध्ययन किया व दोनों से पर्याप्त प्रभाव ग्रहण किया। किन्तु उन्होंने दोनों को आत्मसात करते हुए अपनी मौलिक समीक्षा दृष्टि से अपने विचारों को अभिव्यक्ति भी प्रदान की जो एक उल्लेखनीय सन्दर्भ है। कहने का तात्पर्य यह है कि उन्होंने भारतीय रस सिद्धान्त को ग्रहण किया, किन्तु रस को व्यापक तथा नई दृष्टि से परिभाषित किया। जयशंकर प्रसाद, सूरदास, हिन्दी साहित्य – बीसवीं शताब्दी, नया साहित्य – नये प्रश्न, आधुनिक साहित्य आदि उनकी प्रौढ़ एवं मौलिक आलोचनात्मक कृतियाँ हैं। इन कृतियों में जो समीक्षात्मक सामग्री उपलब्ध है। उसके आधार पर उनकी समीक्षा की निम्नांकित पद्धतियाँ स्वीकार की जा सकती हैं-

आलोचना पद्धतियाँ

  1. सौष्ठववादी या समन्वयवादी समीक्षा पद्धति- वाजपेयी हिन्दी समीक्षा में समन्वय दृष्टिकोण लेकर अवतरित हुए। यदि उन्होंने भारतीय रसवादी दृष्टि को स्वीकार किया तो पाश्चात्य स्वच्छन्तावादी समीक्षा दृष्टि को भी यदि सूरदास जैसे पुराने कवि को अपनी समीक्षा का विषय बनाया तो आधुनिक प्रयोगवाद पर भी मौलिक समीक्षा लिखी। आधुनिक युग में विभिन्न समीक्षा पद्धति को समन्वय का श्रेय उन्हीं को जाता है। इस सम्बन्ध में डॉ0 भगवत स्वरूप मिश्र ने उचित ही लिखा है, “आज फिर हिन्दी साहित्य में समन्वयवादी प्रवृत्ति प्रबल हो रही है। ऐतिहासिक, प्रगतिवादी, क्रायडवादी, स्वच्छन्दतावादी, प्रभाववादी आदि सभी शैलियाँ दूर तक सामान्यतः पृथक और स्वतन्त्र रूप से विकसित होकर मिल रही हैं। इस प्रकार एक नवीन पद्धति विकसित हो रही है, जिसे समन्वयवादी नाम दिया जा सकता है। इस समन्वय का बहुत कुछ श्रेय वाजपेयी जी को है। वाजपेयी जी ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘आधुनिक साहित्य की भूमिका’ में पश्चिम के अस्ताचलगामी सूर्य प्रकाशित हुआ चार प्रमुख समीक्षा पद्धतियों से बचने की बात कही है-वैयक्तिक मनोविज्ञान पर आधारित (फ्रायड, एडलर, युग से प्रभावित) समाजवादी। इसका अर्थ यह नहीं कि वो इन समीक्षा पद्धतियों के परित्याग की बात कहते हैं। प्रत्युत वे पश्चात्य एवं भारतीय समीक्षा पद्धतियों के समन्वय को आवश्यक मानते हैं।

डॉ० भगवत स्वरूप मिश्र ने उनकी इसी समन्वयवादी दृष्टि को सौष्ठववादी समीक्षा के नाम से अभिहित किया है, इस आलोचना पद्धति का अनुकरण करने वाला आलोचक काव्य के भाव सौन्दर्य की वास्तविकता और उसकी मार्मिकता का उद्घाटन करता है। स्वयं वाजपेयी जी ने यह बात ‘हिन्दी साहित्य’ बीसवीं शताब्दी नामक ग्रन्थ में लिख दी है- “काव्य शास्त्र के तत्वों से ऊपर उठकर सौन्दर्य का उद्घाटन ही आलोचक का प्रधान कार्य है।

वाजपेयी जी ने अपनी समीक्षाओं में इसी पद्धति का अनुकरण किया है। ‘सूरदास’ जयशंकर प्रसाद ग्रन्थों में इस समीक्षा पद्धति का स्वरूप पूरे निखार पर हैं। इस पद्धति को वे अधिक निरपेक्ष तथा तटस्थ दृष्टि वाली पद्धति मानते हैं, क्योंकि इसमें आलोचक समीक्षा के पूर्व निर्धारित मानदण्डों पर उतना ध्यान नहीं देता जितना कृति के अभ्यंतरित मूल्य तथा सूक्ष्म सौन्दर्य के उद्घाटन पर देता है। ऐसा करना ही सौष्ठववादी समीक्षा पद्धति कहलाती है। वाजपेयी जी इस पद्धति के प्रवर्तक माने जाते हैं।

  1. व्याख्यात्मक आलोचना पद्धति- वाजपेयी जी की समीक्षा मूलतः व्यापक समीक्षक के अन्तर्गत आती है। क्योंकि उन्होंने अपने ग्रन्थों में इस पद्धति का प्रमुख रूप से प्रयोग किया है। वाजपेयी जी अपने विषय को स्पष्ट करने के लिए उसकी तह तक पहुँचते हैं तथा उस पर सूक्ष्मता से विचार करते हुए उसकी विशेषताओं का उद्घाटन करते हैं। समीक्षक के कार्य के विषय में उन्होंने स्वयं लिखा है, “उसका पहला और प्रमुख कार्य है कला का अध्ययन और उसका सौन्दर्यानुसंधान। इस कार्य में उसका व्यापक अध्ययन उसकी सूक्ष्म सौन्दर्य-दृष्टि और उसकी सिद्धान्त निरपेक्षता ही उसका साथ दे सकती है सिद्धान्त तो उसमें बाधक ही नहीं बनते हैं। उनका कथन भी उनकी व्याख्यात्मक समीक्षा पद्धति के उदाहरण है।
  2. स्वच्छन्दावादी अथवा छायावादी समीक्षा पद्धति- समीक्षा में स्वतंत्र व्याख्या विश्लेषण तथा कवि की अन्तवृत्तियों का उद्घाटन करना छायावादी समीक्षा पद्धति कहलाती है। इसके साथ ही छायावादी समीक्षा लोकादर्श और स्थूल नैतिकता के स्थान पर शाश्वत मूल्यों पर आधारित मानवतावादी दृष्टि को लेकर चलती है। वाजपेयी जी ने इस पद्धति को स्वीकार करते हुए हिन्दी साहित्य वीसवीं शताब्दी में लिखा है, “इस शिव शब्द को हम व्यर्थ समझकर निकाल देना चाहते हैं। सत्य और सुन्दर पर्याप्त है। “जयशंकर प्रसाद” तथा छायावादी सम्बन्धी आलोचनाओं में, उन्होंने इसी पद्धति का अनुकरण किया है।
  3. तुलनात्मक समीक्षा- पद्धति – अपनी समीक्षाओं में उन्होंने तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किए हैं। ‘साकेत’ की आधुनिकता पर विचार करते समय वे ‘कामायनी’ कुरुक्षेत्र, मानस ग्रन्थों से उसकी तुलना करते हैं। यह बात अवश्य है कि तुलना में वाजपेयी जी की दृष्टि साम्य वैषम्य का अत्यन्त सूक्ष्म विश्लेषण करती हुई चलती है। तुलनाओं में वे निर्णयों की ओर प्रवृत्त होकर किसी को श्रेष्ठ किसी को हेय घोषित नहीं करते। उन्होंने प्रसाद और निराला के काव्य का बहुत सही तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया है।
  4. प्रभाववादी समीक्षा पद्धति- वैसे वाजपेयी जी की समीक्षा दृष्टि अधिकतर निरपेक्ष एवं तटस्थ रही है, किन्तु कहीं-कहीं वे प्रभाववादी हो गये हैं, प्रसाद और सूरदास की समीक्षाओं में उनकी यह प्रवृत्ति मिल जाती है। शेखर एक जीवनी की समीक्षा उन्होंने लिखा है, “अब वह और भी निराश्रित हो गयी है, किन्तु शेखर को और भी बल मिला। संस्कार के लिए? समाधान के लिए ? शान्ति के लिए ? नहीं आत्म प्रवचन के लिए विषाद तृप्ति के लिए “यह प्रभाववादी समीक्षा पद्धति का ही उदाहरण है।

समीक्षा पद्धति की विशेषतायें

वाजपेयी जी द्वारा प्रयुक्त विभिन्न समीक्षा पद्धतियों पर विचार करने के पश्चात् उनकी समीक्षा पद्धति की विशेषताओं पर प्रकाश डालना उचित रहेगा। लेकिन इन विशेषताओं को जानने से पूर्व वाजपेयी जी का समीक्षा दृष्टिकोण भी जानना उचित रहेगा। ‘हिन्दी साहित्य’ : बीसवीं शताब्दी’ ग्रन्थ की भूमिका में उन्होंने अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करते हुए आलोचना सम्बन्धी अपनी सात चेष्टाओं की ओर संकेत किया है- 1. कवि की अन्तर्वृत्तियों का अध्ययन।

  1. कलात्मक सौष्ठव का अध्ययन।
  2. टेकनीक शैली का अध्ययन।
  3. समय समाज तथा उसकी प्रेरणाओं का सूक्ष्म अध्ययन।
  4. कवि की जीवनी और रचना पर उसके प्रभाव का अध्ययन।
  5. कवि के दार्शनिक, सामाजिक और राजनैतिक विचारों का अध्ययन
  6. काव्य के जीवन सम्बन्धी सामंजस्य तथा संदेश का अध्ययन।

यदि गहराई से देखें तो ये सातों चेष्टायें ही वाजपेयी जी की समीक्षा पद्धति की विशेषतायें कही जा सकती हैं क्योंकि उन्होंने स्वयं ही इन चेष्टाओं को करने का दावा किया है। इसके अतिरिक्त कतिपय अन्य विशेषताओं पर भी आगे विचार किया जा रहा है-

  1. व्यंग्य का समावेश- वाजपेयी जी ने अपनी समीक्षा में कहीं कहीं व्यंग्य का प्रयोग भी किया है। जैसे आलोचकों पर उनकी यह व्यंग्योक्ति देखिए, “जिन्हें छायावादी की नई प्रगति का पृष्ठपोषक समझा जाता है वे समीक्षा के नाम पर बिल्कुल कोरे थे। वे समीक्षक नामधारी अपना स्वतंत्र गद्य काव्य लिखने में लगे हुए थे। जिसे वे अपनी मर्मज्ञता के कारण अपनी समीक्षा समझने लगे थे और पाठकों का भावुक दल उन्हें समीक्षक कहकर पुकारने भी लगा था। (जयशंकर की भूमिका से) वाजपेयी जी के व्यंग्य अत्यन्त कटु और तीखे होते हैं।

विषय की विविधता तथा समीक्षा का व्यापक क्षेत्र- वाजपेयी जी ने अपने आपको किसी काल या कवि विशेष में बाँधकर नहीं रखा। इन्होंने सूरदास पर भी समीक्षा लिखी तो प्रसाद पर भी पश्चात्य काव्य शास्त्र या पाश्चात्य विचारधाराओं को अपनी समीक्षाओं में समेटा तो भारतीय रसशास्त्र को भी उन्होंने काव्य, नाटक, उपन्यास, कहानी आदि सभी विधाओं पर लिखा तो छायावाद, प्रयोगवाद प्रतीकवाद जैसी विभिन्न प्रवृत्तियों पर भी। यह उनके अध्ययन तथा विशद ज्ञान का प्रमाण है। विविध विषयों पर उन्होंने चलताऊ ढंग से नहीं लिखा है जो कुछ लिखा है उसमें मौलिकता तथा उसकी स्थापनायें अपना महत्व रखती हैं। साहित्यिक विषयों के अतिरिक्त उन्होंने भाषा सम्बन्धी (राष्ट्रभाषा की समस्यायें) सामाजिक (साहित्य संस्कृति के मूल तत्व), दार्शनिक बुद्धिवाद, एक अधूरी जीवन दृष्टि, प्राकृतिक (केरल की शारदीय परिक्रमा) विषय पर मौलिक निबन्ध लिखे हैं, उनके इन सम्बन्धों में विचारत्व की गहराई के साथ विषय की गहराई के दर्शन होते हैं।

  1. भाषा- वाजपेयी जी की भाषापूर्ण संपत तथा गम्भीर है। उसमें सूक्ष्म से सूक्ष्म विचारों को अभिव्यक्ति करने की क्षमता है। वाजपेयी जी द्वारा प्रयुक्त भाषा की निम्नलिखित विशेषतायें हैं।

गम्भीर तथा चिन्तन प्रधान- जहाँ वाजपेयी ने गम्भीर तथा चिन्तन प्रधान विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हैं वहाँ उनकी भाषा भी गम्भीर और चिन्तन प्रधान हो जाती है। निराला के भाव जगत पर विचार करते समय उन्होंने ऐसी ही भाषा का प्रयोग किया है। ऐसे ही साहित्य का प्रयोजन आत्मानुभूति निबन्ध, में भी भाषा का यह रूप विद्यमान है।

सरल, सुबोध एवं प्रवाहपूर्ण- वाजपेयी जी जिस जिस विषय पर लिखते हैं। बहुत स्पष्ट रूप से अपनी बात कहते हैं। पाठक को उनका विश्लेषण पढ़ने के बाद कोई भ्रान्ति नहीं रहती, इसका कारण उनकी सरल, सुबोध एवं प्रवाहपूर्ण भाषा है।

माधुर्य एवं अलंकरण- वाजपेयी जी की भाषा में कहीं-कहीं संगीत की लय और तान तथा अद्भुत रमणीयता एवं माधुर्य का समावेश हो गया है। प्रसाद के गीतिकाव्य सम्बन्धी विवेचना के भाषा में इन गुणों के उदाहरण मिल जाते हैं। कहीं-कहीं सुन्दर अलंकरण योजनाएँ भी उनकी समीक्षा में मिल जाती हैं। एक उदाहरण लीजिए – “प्रबन्ध काव्य यदि कोई रसीला फल है, जिसका आस्वादन छिलके, रेशे और बीज निकालने पर ही किया जा सकता है तो प्रगति रचना उसी फल का द्रव रस है। जिसे हम तत्काल घूँट-घूंट कर पी सकते हैं।

शैली- वाजपेयी जी के समीक्षा कृतियों में अनेक प्रकार की शैलियों का प्रयोग मिलता है-

विवेचनात्मक शैली- अधिकतर इस शैली का प्रयोग उनकी कृतियों में मिलता है। वे अपनी विषय की गम्भीरता पूर्वक विवेचन करते चलते हैं।

विवरणात्मक शैली- यात्रा वर्णन सम्बन्धी निबन्धों में जैसे केरल की शारदीय परिक्रमा में इस प्रकार की शैली का प्रयोग मिलता है।

भावात्मक शैली- उनकी शैली में भाव प्रवणता प्रसंग के अनुकूल आ जाती है। एक उदाहरण लीजिए- “गंगा की जो धारा कभी अपनी वीचि रचना के लक्ष्य में, वात्यिक के कविकंठ का सुवर्णहार प्राप्त करती होगी। आज भी दौलतपुर समीप निकलकर बहती है। वे आम्रकानन जो वही सोये-पथिकों के समीप अपने अमृत फल बरसाते हैं।

व्यंग्यात्मक शैली– वाजपेयी जी बीच-बीच में व्यंग्य की चुटकी, आलोचकों पर उनका व्यंग्य देखिए, जो उनके आधुनिक साहित्य नामक ग्रन्थ में है, “हमारे विश्वविद्यालयों में गम्भीरतावादी महानुभाव, जो सनातन शास्त्रीय पद्धति पर साहित्य के सिद्धान्तों का संग्रह करने में महाराज दक्ष की लक्षणा का लक्ष्य भेद कर चुके हैं, पर जिनका सामयिक साहित्य की परीक्षा करने का व्यावहारिक ज्ञान कछुए के मुँह के समान सदैव काया-प्रवेश ही किये रहता है-उक्त अन्तदृष्टि के बहुत बड़े हिस्सेदार हैं।

शब्द प्रयोग- वाजपेयी जी का भाषा पर पूरा अधिकार है। उन्होंने हिन्दी का प्रयोग किया है। उनकी भाषा के शब्द शिल्प तत्सम प्रधान ही कहा जायेगा, किन्तु उनकी भाषा में हमें अरबी- फारसी के शब्द (जैसे-खाका, पहलू, हवाला, आसान, दलील, निगाह, खामी हिमायत, मौजूद, बेतहासा, नाज आदि) तथा अंग्रेजी के शब्द जैसे (जैसे-प्रोपेगण्डा, क्लासीसिज्म, सब्जेक्टिव, आइडियलिस्ट आदि) प्रयुक्त हुए हैं। इन शब्दों का प्रयोग अत्यन्त सार्थक है।

निष्कर्ष-

अन्त में श्रीरामचन्द्र तिवारी के शब्दों में हम कह सकते हैं, “वस्तुतः शुक्ल जी के पश्चात् हिन्दी साहित्य समीक्षा के क्षेत्र में अनेक वादों से बचते हुए भारतीय रसवाद समस्त सौष्ठववादी समीक्षा की स्थापना में वाजपेयी जी सर्वश्रेष्ठ हैं। उनका योगदान विशिष्ट है। वाजपेयी जी की समीक्षा पद्धति की विविधता और उससे आर्दू विशिष्टता के कारण आचार्य नन्द दुलारे वाजपेयी की समीक्षा पद्धति न केवल विशिष्ट है, अपितु पर्याप्त, प्रभावी और मादक भी है।

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