निगमीय प्रबंधन

कार्पोरेट प्रशासन की परिभाषा | कार्पोरेट गवर्नेन्स का विकास | विश्व में कॉर्पोरेट प्रशासन मॉडल

कार्पोरेट प्रशासन की परिभाषा | कार्पोरेट गवर्नेन्स का विकास | विश्व में कॉर्पोरेट प्रशासन मॉडल | Definition of Corporate Governance in Hindi | Evolution of Corporate Governance in Hindi | Corporate Governance Models in the World in Hindi

कार्पोरेट प्रशासन की परिभाषा

(Definition of Corporate Governance)

ए बोर्ड कल्चर ऑफ कार्पोरेट गवर्नेन्स में व्यापार लेखक गेबरियल ओडोनौवन कॉर्पोरेट प्रशासन को परिभाषित करते हुए कहते हैं कि वह ‘एक आंतरिक व्यवस्था है, जिसमें शामिल हैं नीतियाँ, प्रक्रियाएं और लोग, जो अच्छे व्यापार ज्ञान, वस्तुगत दृष्टि, जवाबदेही और सत्यनिष्ठा के साथ प्रबन्धन गतिविधियों को निर्देशित और नियंत्रित करते हुए, शेयरधारकों और अन्य हितधारकों की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। ठोस कॉर्पोरेट प्रशासन, बाजार प्रतिबद्धता और कानून, और साथ ही नीतियों और प्रकियाओं को सुरक्षित रखने वाली एक स्वस्थ बोर्ड संस्कृति पर निर्भर है। ओडोनोवैन का आगे कहना है कि ‘एक कंपनी के कॉरपेरिट प्रशासन की अनुभूत गुणवत्ता, उसके शेयर की कीमत और पूंजी जुटाने की लागत को प्रभावित कर सकती है। गुणवत्ता का निर्धारण होता है वित्तीय बाजारों, कानून और अन्य विदेशी बाजार की शक्तियों से और इस आधार पर कि नीतियों और प्रक्रियाओं को कैसे लागू किया गया है तथा लोगों का नेतृत्व किस प्रकार हो रहा है। बाह्य शक्तियां, अधिकांशतः किसी भी बोर्ड के नियंत्रण से बाहर के घेरे में रहती हैं। आंतरिक परिवेश बिल्कुल अलग बात है और कंपनियां अपनी बोर्ड संस्कृति के जरिए प्रतियोगियों से अंतर पहचानने का मौका देती हैं। अब तक, ज्यादातर कॉर्पोरेट प्रशासन बहसें विधायी नीति, धोखाधड़ी की गतिविधियों का निवारण और पारदर्शिता नीति पर केंन्द्रित रही हैं, जो कार्यपालकों को, कारण की बजाय लक्षणों के उपचार के लिए बहकाती हैं।

यह दीर्घकालिक समारिक लक्ष्यों को प्राप्त करने की दृष्टि से संरचना, संचालन और कंपनी के नियंत्रण की प्रणाली है, ताकि शेयरधारकों, लेनदारों, कर्मचारियों, उपभोक्ताओं और आपूर्तिकर्ताओं की संतुष्टि और कानूनी तथा नियामक अपेक्षाओं के अनुपालन के अतिरिक्त पर्यावरण तथा स्थानीय सामुदायिक आवश्यकताओं की पूर्ति संभव हो सकें। कॉर्पोरेट प्रशासन पर (SEBI) समिति (भारत) की रिपोर्ट, “निगम के वास्तविक मालिकों के रूप में शेयरधारकों के असंक्राम्य आधिकारों के प्रबंधन द्वारा स्वीकृति और शेयरधारकों की ओर से न्यासी के रूप में अपनी भूमिका के तौर पर, कॉर्पोरेट प्रशासन को परिभाषित करती हैं। यह मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता, नैतिक व्यापार आचरण और कंपनी के प्रबंधन में निजी तथा कॉर्पोरेट निधियों के बीच अंतर करने से संबंधित है।” यह परिभाषा न्यासिता संबंधी गांधीवादी सिद्धान्त और भारतीय संविधान के निदेशक सिद्धान्तों से ली गई है। कार्पोरेट प्रशासन को आचार और नैतिक कर्तव्य के रूप में देखा जाता है। प्रोफेसर ब्रजलाल् सापोवादिया के अनुसार कार्पोरेट प्रशासन व्यक्तिगत हित का संस्था के लिये भोग देना एवं संस्था का हित समाज के लिए बलिदान करना है।

कार्पोरेट गवर्नेन्स का विकास

  1. 19वीं सदी में राज्य निगम कानून ने कॉर्पोरेट प्रशासन को अधिक प्रभावी बढ़ाने के लिए, मूल्यांकन अधिकार जैसे सर्वाधिक लाभों के बदले में शेयरधारकों की सर्वसम्मति के बिना कार्पोरिट बोर्ड के शासनाधिकारों को बढ़ाया। तब से और क्योंकि अमेरिका में सार्वजनिक तौर पर करोबार करने वाले अधिकांश बड़े निगम, कॉर्पोरेट प्रशासन के अनुकूल डेलावेयर कानून के तहत समाविष्ट हैं और चूंकि अमेरिका की सम्पत्ति तेजी से विभिन्न कार्पोरेट इकाइयों और संस्थानों में प्रतिभूतिकृत की जा रही है। व्यक्तिगत मालिकों और शेयरधारकों के अधिकार तेजी से व्युत्पन्न और अपव्यय होते जा रहे हैं। प्रशासनिक वेतन और शेयर घाटों के प्रति शेयरधारकों की चिंताओं ने कॉर्पोरेट प्रशासन में सुधार के लिए अधिकाधिक जोर दिया। भारतीय साहित्य इसोपनिषद में ‘त्येन त्यक्तेन भुन्जिता’ यानि कि त्याग कर भुगतने कि बात कही है। महात्मा गान्धी ने ये बात निक्षेप के रूप में कही। यानि कि धन्धे के मालिक को trust माना।
  2. 20वीं सदी में 1929 के बाल स्ट्रीट गिरावट के तत्काल बाद भावी परिणामों के सन्दर्भ में एडॉल्फ-आगस्टस बर्ले एडविन डोड और गार्डिनिर सी. जैसे कानूनी विद्वानों ने समाज में आधुनिक निगम की बदलती भूमिका पर विचार किया। बर्ले और मीन्स विनिबंध “द मॉडर्न कार्पोरेशन एंड प्राइवेट प्रापर्टी” (1932, मैकमिलन) का गहरा प्रभाव, आज भी कॉर्पोरेट प्रशासन की अवधारणा पर विद्वानों की बहस में देखा जा सकता है।
  3. शिकागो स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से, रोनाल्ड कोस के “द नेचर ऑफ द फर्म” (1937) ने, फर्मों की स्थापना क्यों की जाती है और वे कैसे व्यवहार करती हैं, को समझने के लिए सौदों की लागत की धारणा को प्रवर्तित किया। पचास साल बाद, यूजीन फामा और माइकल जेनसन के “द सपरेशन ऑफ ओनरशिप एंड कंट्रोल” (1983, जर्नल ऑफ लॉ एंड इकोनॉमिक्स) ने कॉर्पोरेट प्रशासन को समझने के तरीके के रूप में एजेंसी सिद्धान्त को स्थाई तौर पर स्थापित कियाः फर्म को ठेकों की श्रृंखला के रूप में देखा जाता है। एजेंसी सिद्धान्त के प्रभुत्व को कैथलीन ईजनहार्ट द्वारा 1987 के एक लेख में प्रकाश डाला गया (“एजेंसी थिअरीः एन असेसमेंट एंड रिव्यू”, एकाडेमी ऑफ मैनेजमेंट रिव्यू) ।
  4. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बहुराष्ट्रीय निगमों के उद्भव के माध्यम से अमेरिकी विस्तार ने प्रबंधकीय वर्ग की स्थापना को अनुभव किया। तदनुसार, निम्नलिखित हार्वर्ड बिजनेस स्कूल के मैनेजमेंट प्रोफेसरों ने उनके महत्व का अध्ययन करने वाले प्रभावशाली विनिबंध प्रकाशित किएः माइल्स मेस (उद्यमिता), अल्फ्रेड डी. शंडलर, जूनियर (व्यवसाय इतिहास), जे लॉर्श (संगठनात्मक व्यवहार) और एलिजाबेथ मैकआइवर (संगठनात्मक व्यवहार)। लॉर्श और मैक आइवर के अनुसार “कई बड़े निमगों के पास, बिना उनके निदेशक मंडल की पर्याप्त जवाबदेही या निगरानी के, व्यापार मामलों में प्रभावी नियंत्रण मौजूद है।”
  5. 1970 के अंत से, अमेरिका और दुनिया भर में कॉर्पोरेट प्रशासन महत्वपूर्ण बहस का मुद्दा रहा है। कॉर्पोरेट प्रशासन को सुधारने के लिए साहसिक, व्यापक प्रयास, अंशतः शेयरधारकों की जरूरतें और कंपनी स्वामित्व के अपने अधिकारों के प्रयोग और अपने शेयरों के मूल्य में वृद्धि और इसलिए संपत्ति की इच्छा से संचालित हुए हैं। पिछले तीन दशकों में, कॉर्पोरेट निर्देशकों के कर्तव्य में निगम और उसके शेयरधारकों के प्रति वफादारी के कर्तव्य की पारंपरिक कानूनी जिम्मेदारी से परे व्यापक रूप से विस्तृत हुए हैं।

विश्व में कॉर्पोरेट प्रशासन मॉडल

  1. यद्यपि कॉर्पोरेट प्रशासन का अमेरिकी मॉडल सर्वाधिक प्रसिद्ध है, तथापि दुनिया भर के कॉर्पोरेट प्रशासन मॉडलों में काफी भिन्नता है। जापान में केइ रेत्सु की पेचीदा शेयर होल्डिंग संरचना, जर्मन फर्मों के शेयरों में बैंकों की भारी उपस्थिति, दक्षिण कोरिया में शेबोल और कई अन्य, ऐसी व्यवस्थाओं के उदारहरण हैं, जो उन्हीं कॉर्पोरेट प्रशासन चुनौतियों पर प्रतिक्रिया जताने की कोशिश करते हैं, जैसे अमेरिका में, संयुक्त राज्य अमेरिका में मुख्य समस्या व्यापक रूप से विस्तृत शेयरधारकों को शक्तिशाली प्रबंधकों के बीच हितों का टकराव है। यूरोप में, मुख्य समस्या यह है कि मतदान का स्वामित्व, पिरामिड स्वामित्व और दोहरे शेयर (मतदान और गैर मतदान) के मध्यम से परिवार द्वारा दृढतापूर्वक धारित है। इससे “स्वयं व्यवहार” को मौका मिलता है, जहां नियंत्रक परिवार उन सहायक कंपनियों का पक्ष लेती हैं जिनके लिए उनके पास उच्च नकदी प्रवाह अधिकार हैं।
  2. एंग्लो-अमेरिकन मॉडल- दुनिया भर में कार्पोरेट प्रशासन के विभिन्न मॉडल मौजूद हैं। पूंजीवाद के जिस किस्म में वे सन्निहित हैं, उसके अनुसार यह विभिन्नता है। उदार मॉडल में, जो एंग्लो-अमेरिकी देशों में आम है, शेयरधारकों के हितों को प्राथमिकता दी जाती है। यूरोप महाद्वीप और जापान में पाया जाने वाला समन्वित मॉडल भी कर्मचारियों, प्रबंधकों, आपूर्तिकर्ताओं, ग्राहकों और समुदाय के हितों को पहचानता है। प्रत्येक मॉडल का अपना अलग प्रतिस्पर्धात्म लाभ है। कॉर्पोरेट प्रशासन का उदारवादी मॉडल आमूल नाचार और प्रतिस्पर्धी लागत को प्रोस्ताहित करता है, जबकि कॉर्पोरेशन प्रशासन का समन्वित मॉडल का समन्वित मॉडल वर्धमान नवोन्मेष और प्रतिस्पर्धात्मक गुणवत्ता को सुसाध्य बनाता है। तथापि, हाल ही में प्रशासनिक मुद्दों पर अमेरिका के दृष्टिकोण और ब्रिटेन में जो घटित हुआ है, उनके बीच महत्वपूर्ण अंतर हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका में निगम, निदेशक मंडल द्वारा प्रशासित होता है, जिसके पास एक कार्यपालक अधिकारी के चयन की शक्ति होती है, जो आम तौर पर मुख्य कार्यपालक अधिकारी के रूप में जाना जाता है। CEO के पास दैनिक आधार पर निगम प्रबंधन की व्यापक शक्ति होती है, लेकिन कुछ प्रमुख कार्रवाइयों के लिए 1990 दशक के पूर्वार्ध में, अमेरिका में कॉर्पोरेट प्रशासन के मुद्दे ने बोर्ड द्वारा CEO बरखास्तगियों की लहर (उदाहरण, IBM कोडेक, हनीवेल) ने प्रेस का काफी ध्यान आकर्षित किया। द कैलिफोर्निया पब्लिक एम्प्लाइज रिटारमेंट सिस्टम (CalPERS) ने, अब पारंपरिक रूप से देखे जा रहे, CEO और निदेशक मंडल के बीच सुखद रिश्तों द्वारा, (जैसे कि स्टॉक विकल्प का असंयमित निर्गमन, विरले ही पूर्व दिनांकित) कॉर्पोरेट मूल्य नष्ट ना हों, यह सुनिश्चित करने के तरीके के रूप में, संस्थागत शेयरधारक सक्रियता की लहर दौड़ाई (कुछ इस तरह, जैसा पहले शायद ही कभी देखा हो).

1997 में पूर्व एशियाई वित्तीय संकट ने संपति आस्तियों में गिरावट के बाद विदेशी पूंजी के बाहर चलने से थाईलैंड इंडोनेशिया, दक्षिण कोरिया, मलेशिया और फिलीपींस की अर्थ-व्यवस्थाओं को गंभीर रूप से प्रभावित होते हुए देखा. इन देशों मे कॉर्पोरेट प्रशासन तंत्र के अभाव ने संस्थाओं की अर्थ-व्यवस्थाओं में कमजोरियों पर प्रकाश डाला।

2000 दशक की शुरुआत में, एनरॉन और वर्ल्डकॉम के बड़े पैमाने पर दिवालियापन (और आपराधिक भ्रष्टाचार) और साथ ही Adelphia Communications. AOL, आर्थर एंडरसन, ग्लोबल क्रॉसिंग, टाइको जैसे छोटे निगमों के आकस्मिक विध्वंरा ने कॉर्पोरेट प्रशासन में शेयरधारकों और सरकारी दिलचस्पी को बढ़ाया। यह 2002 के सरबेन्स-ऑक्सले अधिनियम के परिच्छेद में परिलक्षित होता है।

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