निगमीय प्रबंधन

भारत में कार्पोरेट प्रशासन व्यवहार | कॉर्पोरेट प्रशासन के पक्षकार | कार्पोरेट प्रशासन के उद्देश्य | कार्पोरेट प्रशासन के प्रावधान

भारत में कार्पोरेट प्रशासन व्यवहार | कॉर्पोरेट प्रशासन के पक्षकार | कार्पोरेट प्रशासन के उद्देश्य | कार्पोरेट प्रशासन के प्रावधान | Corporate Governance Practices in India in Hindi | Proponents of Corporate Governance in Hindi | Objectives of Corporate Governance in Hindi | Corporate Governance Provisions in Hindi

भारत में कार्पोरेट प्रशासन व्यवहार

(Corporate Governance Practices in India)

कारपोरेट प्रशासन व्यवहार से आशय कम्पनी या फर्म के लिए निश्चित सिद्धान्त या प्रणाली विकसित करने से है, जिसके द्वारा कम्पनी /फर्म का प्रशासन चलाया जाता है। ये नियम या सिद्धान्त इस प्रकार बनाये जाते है कि दीर्घकाल में कम्पनी के उद्देश्यों, एवं लक्ष्यों की पूर्ति की जा सके एवं स्टेक होल्डर्स (Stake holders-विनियोग कर्त्ता, लेनदार फर्म या कम्पनी, सरकार एवं व्यक्ति) को लाभ हो सके। कार्पोरेट प्रशासन व्यवहार का विभिन्न हितधारकों पर सकारात्मक प्रभाव अन्ततः एक मजबूत व्यवस्था है और इसलिए अच्छा कार्पोरेट प्रशासन सामाजिक आर्थिक विकास का एक साधन है।

कॉर्पोरेट प्रशासन के पक्षकार

  1. कॉपोरेट प्रशासन में शामिल पक्षों में नियामक निकाय (मुख्य कार्यपालक अधिकारी, निदेशक मंडल, प्रबंधन, शेयरधारक और लेखा परीक्षक) सम्मिलित है। भाग लेने वाले अन्य हितधारकों में शामिल हैं आपूर्तिकर्ता, कर्मचारी, लेनदार, उपभोक्ता और सामान्य तौर पर समुदाय |
  2. निगमों में, शेयरधारक प्रबंधक को मूलधन के सर्वोतम हित में कार्य करने के लिए निर्णय का अधिकार सौंपता है। नियंत्रण से स्वामित्व का यह अलगाव का अर्थ है, शेयरधारकों द्वारा प्रबंधकीय फैसलों पर प्रभावी नियन्त्रण में कमी। दोनों पक्षों के बीच इस अलगाव के परिणामस्वरूप आंशिक रूप से कॉपोरेट प्रशासन नियन्त्रण की एक प्रणाली कार्यान्वित होती है, ताकि शेयरधारकों और प्रबन्धकों के प्रोत्साहन राशि के सुयोजन में मदद मिले। निवेशकों के इक्विटी पूंजी उल्लेखनीय वृद्धि के साथ, स्वामित्व और नियंत्रण की समस्याओं के अलगाव को उलटने का एक मौका है, क्योंकि स्वामित्व उतना फैला हुआ नहीं है।
  3. कॉर्पोरेट प्रशासन में अक्सर निदेशक मंडल प्रमुख भूमिका निभाता है। यह उनकी जिम्मेदारी है कि संगठन की रणनीति का समर्थन, दिशात्मक नीति का विकास, नियुक्ति, पर्यवेक्षण करें और वरिष्ठ कार्यपालकों को पारिश्रमिक दें तथा उसके मालिकों और प्राधिकारियों को संगठन की जवाबदेही सुनिश्चित करें।
  4. कंपनी सचिव, जो अमेरिका में कॉर्पोरेट सचिव के रूप में जाना जाता है और अक्सर एक चार्टर्ड सचिव के रूप में निर्दिष्ट होता है, यदि चार्टर्ड सचिव और प्रशासक संस्थान (ICSA) द्वारा योग्य पाया जाए। एक उच्च श्रेणी वाला पेशेवर, जो कॉर्पोरेट प्रशासन के उच्चतम मानकों को बनाए रखने, प्रभावी संचालन, अनुपालन और प्रशासन के लिए प्रशिक्षित किया जाता है।
  5. कॉर्पोरेट प्रशासन के सभी पक्षकारों की, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से, संगठन के प्रभावी निष्पादन में दिलचस्पी होती है। निदेशक, कर्मचारी और प्रबंधन को वेतन, लाभ और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है, जबकि शेयरधारकों को पूंजी पर प्रतिफल मिलता है। ग्राहकों को माल और सेवाएं हासिल होती है। आपूर्तिकर्ताओं को उनके उत्पादों या सेवाओं के लिए क्षतिपूर्ति प्राप्त होती है। बदले में ये व्यक्ति पूंजी के प्राकृतिक, मानवीय, सामाजिक या अन्य रूपों में मूल्य प्रदान करते हैं।
  6. एक प्रमुख कारक, व्यक्ति का संगठन में भाग लेने का निर्णय, जैसे वित्तीय पूँजी प्रदान कर और विश्वास कि उन्हें संगठन के लाभ का एक उचित हिस्सा मिलेगा। अगर कुछ पक्षों को उनके उचित प्रतिफल से ज्यादा प्राप्त हो रहा है, तो प्रतिभागी भाग न लेने का चयन कर सकते हैं, जिससे संगठनात्मक पतन होगा।

कार्पोरेट प्रशासन के उद्देश्य

(1) पारदर्शिता (Transparency)-कम्पनी के विकास लाभदायकता एवं स्थायित्व के कार्पोरेट व्यवहार में पारदर्शिता का होना अत्यन्त आवश्यक है। व्यवसाय में तेजी से बढ़ते प्रतियोगिता के फलस्वरूप कार्पोरेट प्रशासन की आवश्यकता में वृद्धि हुई है। भारतीय कम्पनी अधिनियम, 2013 के द्वारा उन्नतिशील एवं पारदर्शिता प्रक्रिया का प्रारम्भ किया गया है जिससे स्टेक होल्डर्स, निदेशक एवं कम्पनी के प्रबन्धक को लाभ होगा। विनियोग सलाह सेवाएं एवं प्राक्सी फर्मे अंशधारियों को संक्षेप में विनियोग सम्बन्धी सुझाव प्रदान करते हैं जिससे उन्हें लाभ होता है। सेबी द्वारा भी नियमों में संशोधन किये गये हैं। जिससे कम्पनी के प्रबन्ध में सरलता होगी तथा पारदर्शिता में वृद्धि होगी। ये संशोधन 1 अक्टूबर 2014 से प्रभावी हैं।

महिला निदेशक (Woman Director):

(2) कुछ निश्चित कम्पनियों में एक या अधिक महिला निदेशकों की नियुक्ति का प्रावधान है।

(3) भारत में प्रत्येक कम्पनी को (Resident Directory) रखना अनिवार्य है।

(4) स्वतन्त्र निदेशक वर्ष में कम से कम एक सभा में उपस्थित होंगे।

(5) एक पाब्लिक कम्पनी में संचालकों की संख्या 15 से अधिक नहीं हो सकती है। यह वृद्धि अंशधारियों की सलाह से विशेष प्रस्ताव द्वारा ही हो सकता है।

(6) प्रत्येक कम्पनी एक फर्म या व्यक्ति को अंकेक्षक नियुक्त कर सकती है।

(7) प्रत्येक कम्पनी पर्याप्त रूप से अपने वित्तीय विवरणों की सूचना उपलब्ध करायेगी।

(8) प्रबन्धन शेयर होल्डर्स के अधिकारों को मान्यता प्रदान करेगा तथा कम्पनी के मध्य सहयोग की भावना के विकास को बढ़ावा देगा।

(9) Clause 35B में परिवर्तन- अंशधारियों को E-Voting की सुविधा प्रदान की जायेगी।

कार्पोरेट प्रशासन के प्रावधान

कार्पोरेट प्रशासन के सामान्य सिद्धान्त एवं प्रावधान निम्नलिखित है।

अच्छे कॉर्पोटर प्रशासन सिद्धांतों के मुख्य तत्वों में शामिल है, ईमानदारी, विश्वास और अखंडता, खुलापन, निष्पादन अभिविन्यास, जिम्मेदारी और जवाबदेही, परस्पर सम्मान और संगठन के प्रति वचनबद्धता ।

महत्वपूर्ण है कि निदेशक और प्रबंधन कैसे प्रशासन का मॉडल विकसित करते हैं जो कॉर्पोरेट प्रतिभागियों के मूल्यों का सुयोजन करता है और फिर इस मॉडल का उसके प्रभाव को आंकने के लिए आवधिक मूल्यांकन करना, विशेष रूप से, वरिष्ठ कार्यपालक का आचरण सत्यनिष्ठ और नैतिक हो, खास तौर पर वास्तविक और स्पष्ट परस्पर विरोधी हितों के मामले में तथा वित्तीय विवरणियों में प्रकटन।

सामान्यतः स्वीकृत कार्पोरेट प्रशासन के सिद्धान्तों एवं प्रावधानों में शामिल हैं:

  1. शेयरधारकों के अधिकार और न्यायोचित व्यवहार :- संगठन द्वारा शेयरधारकों के अधिकारों का सम्मान और शेयरधारकों को उनके अधिकारों के प्रयोग में सहायता। वे शेयरधारकों को बोधगम्य और सुलभ तरीके से, प्रभावी तौर पर जानकारी उपलब्ध कराते हुए और सामान्य बैठकों में शेयरधारकों को भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करते हुए, उन्हें अपने अधिकारों का प्रयोग करने में मदद दे सकते हैं।
  2. अन्य हितधारकों के हितः संगठन को जानना चाहिए कि अन्य सभी हितधारकों के प्रति उनके कानूनी और अन्य दायित्व हैं।
  3. मंडल की भूमिका और जिम्मेदारियां: मंडल को व्यवस्थित कौशल और समझदारी की जरूरत है, ताकि विभिन्न व्यावसायिक मुद्दों से निपटने और प्रबंधन के निष्पादन की समीक्षा और उसे चुनौती देने में सक्षम हों। यह पर्याप्त आकार में और अपनी जिम्मेदारियों और कर्तव्यों को पूरा करने के लिए, उचित स्तर की प्रतिबद्धता होनी चाहिए। कार्यपालक और गैर कार्यपालक निदेशकों के समुचित मिश्रण के बारे में मुद्दे मौजूद हैं।
  4. ईमानदारी और नैतिक व्यवहारः- नैतिक और उत्तरदायी निर्णय करना न केवल सार्वजनिक संबंध के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह जोखिम प्रबंधन और कानूनी मुकदमों को टालने के लिए भी एक आवश्यक तत्व है। संगठनों द्वारा अपने निदेशक और कार्यपालकों के लिए आचार संहिता विकसित करनी चाहिए, जो नैतिक और उत्तरदायी निर्णय लेने को बढ़ावा दे। हालांकि यह समझना महत्वपूर्ण है कि कंपनी द्वारा व्यक्तियों की सत्यनिष्ठा और नैतिकता पर निर्भरता, अंततः विफलता के लिए बाध्य होगी। इस कारण, फर्म द्वारा नैतिक और कानूनी सीमाओं के बाहर जाने पर होने वाली जोखिम को कम करने के लिए, कई संगठन, अनुपालन और नैतिक कार्यक्रम स्थापित करते हैं।
  5. प्रकटीकरण और पारदर्शिताः- संगठन द्वारा मंडल और प्रबन्धन की भूमिका और जिम्मेदारियों को स्पष्ट और सार्वजनिक तौर पर समझाना चाहिए ताकि शेयरधारकों को एक हद तक जवाबदेही उपलब्ध करा सकें। उन्हें कंपनी के वित्तीय प्रतिवेदनों की सत्यनिष्ठा के स्वतंत्र सत्यापन और सुरक्षा के लिए प्रक्रियाओं को लागू करना चाहिए। संगठन से संबंधित वस्तुपरक मामलों का प्रकटीकरण समय पर और संतुलित होना चाहिए, ताकि सुनिश्चित हो सके कि सभी निवेशकों को स्पष्ट तथ्यात्मक जानकारी सुलभ है।
  6. अन्य मुद्दे:-

कारपोरेट प्रशासन संबंधी सिद्धान्तों से जुड़े मुद्दो में शामिल है :

  • आंतरिक नियंत्रण और आंतरिक लेखा परीक्षक
  • इकाई के बाह्य लेखा परीक्षकों की आजादी और उनके लेखा परीक्षणों की गुणवता
  • निरीक्षण और जोखिम प्रबंधन
  • एकक की वित्तीय विवरणियों की तैयारी का निरीक्षण
  • मुख्य कार्यपालक अधिकारी और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के लिए क्षतिपूर्ति व्यवस्था की समीक्षा
  • निदेशकों को उनके कर्तव्य-निर्वाह के लिए उपलब्ध कराए गए संसाधन
  • मंडल में पदों के लिए व्यक्तियों के नामांकन का तरीका।
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