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बाल्कन समस्या 1908 से 1914 तक | The Balkan Problem from 1908 to 1914 in Hindi

बाल्कन समस्या 1908 से 1914 तक | The Balkan Problem from 1908 to 1914 in Hindi

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बाल्कन समस्या 1908 से 1914 तक

सन् 1908 तमें दक्षिण-पूर्वी यूरोप में एक बड़ी उथल-पुथल शुरू हुई। एक ऐसा घटनाक्रम शुरू हो गया, जिसका अन्त सीधा प्रथम विश्व युद्ध तक पहुंच कर ही हुआ।

बारुद का ढेर तैयार था- यूरोप बहुत समय से गुप्त सन्धियों और गुटबन्दियों का अखाड़ा बना हुआ था। एक ओर जर्मनी, आस्ट्रिया और इटली का त्रिराष्ट्र सहबन्ध था और दूसरी ओर फ्रांस और रूस का द्विराष्ट्र सौहार्द (मैत्री संगठन)। सन् 1907 में इंग्लैण्ड भी फ्रांस और रूस के साथ आ मिला। अब यह त्रिराष्ट्र सौहार्द बन गया। जर्मनी यह अनुभव करता था कि इंग्लैण्ड फ्रांस और रूस के साथ मिल कर उसे. सब ओर से घेरने का प्रयत्न कर रहा है। अतः पश्चिमी एशिया और ईरान को खाड़ी की ओर अपना मार्ग खुला रखने के लिए कटिबद्ध था।

बर्लिन संधि की व्यवस्था- प्रो० फिशर- ने लिखा है कि “बाल्कन देशों का राजनीतिक मानचित्र सन् 1878 में यूरोप की शक्तियों के सम्मेलन ने बड़ी कठिनाई से तैयार किया था। बर्लिन कांग्रेस ने बोरिया का आकार नियत कर दिया था मैसीडोनिया टर्की को लौटा दिया था, और तुर्क साम्राज्य के दो प्रान्त-बोस्निया और हर्जेगोविना-जहाँ के निवासी जाति और भाषा की दृष्टि से सर्व थे, शासन के लिए ऑस्ट्रिया को सौंप दिये गये थे; परन्तु इन प्रान्तों पर अधिराजत्व (Suzerainty) टर्को का ही रहना था” यह व्यवस्था निश्चय ही आदर्श नहीं थी, परन्तु इसमें कम से कम एक अच्छाई यह थी कि यह सब बड़ी शक्तियों की सहमति से की गई थी और इसे उनकी सहमति के बिना बदला नहीं जा सकता था।

टर्की की सन् 1908 की राज्यक्रान्ति- सन् 1908 में टर्की में युवा तुर्क दल के नेताओं ने सेना के सहयोग से सुल्तान् अब्दुल हमीद दितीय को अपदस्थ करके वहाँ लोकतंत्रीय शासन की स्थापना कर दी। ये युवा तुर्क टर्की के भ्रष्ट शासन को समाप्त करके उसकी दुर्वलता को दूर करना चाहते थे और तुर्के साम्राज्य को पुनः सशक्त और सतेज बनाने को कटिबद्ध थे। ये कट्टर राष्ट्रवादी थे। इनका लोकतंत्र केवल तुर्क लोगों के लिए ही था। अपनी गैरतुर्क प्रजा के लिए ये अब्दुल हमीद द्वितीय से भी अधिक कठोर और दमनकारी सिद्ध हुए। स्वाधीनता की मांग करने वाले बल्गेरिया और आर्मीनिया प्रान्तों में इन्होंने भीषण अत्याचार और हत्याकांड किये।

आस्ट्रिया द्वारा बोस्निया और हर्जेगोविना का अधिनहन (Annexation)- युवा तुर्को को उग्र नीति से आस्ट्रिया को शंका हुई कि कहीं वे बोस्निया और हर्जेगोविना प्रान्तों का शासन वापस न मागने लगे, अत; उसने 7 अक्टूबर 1908 को घोषणा कर दी कि उसने बोस्निया और हर्जेगोविना को अपने साम्राज्य का अंग बना लिया है। अब उनका तुर्क साम्राज्य से कोई सम्बन्ध नहीं है।

बल्गेरिया द्वारा स्वाधीनता की घोषणा- आस्ट्रिया के प्रोत्साहन पर 5 अक्टूबर 1908 को बलोरिया ने अपनी स्वाधीनता की घोषणा कर दी। अर्थात वह जो नाममात्र के लिए टर्की के अधीन था, उससे भी वह मुक्त हो गया।

सर्बिया और आस्ट्रिया का विरोध- बोस्निया और हर्जेगोविना का अधिनहन (Annexation) अन्तर्राष्ट्रीय सम्झौते का उल्लंघन तो था ही, किन्तु इसकी सबसे अधिक चुभन सर्विया को हुई। इन दोनों प्रान्तों के निवासी सर्व थे। सर्विया की इच्छा थी कि किसी दिन वह इन प्रान्तों को मिलाकर एक विशाल सर्बिया का निर्माण करेगा, जिसकी सीमा समुद्र को छूती होगी। अब आस्ट्रिया द्वारा इन प्रांतो को अपने साम्राज्य में मिला लेने से उसकी यह आशा मिट्टी में मिल गई । अतः उसका आस्ट्रिया से विरोध शुरू हुआ। रूस सर्बिया का समर्थक था। अतः रूस और आस्ट्रिया में भी शत्रुता ठन गई। यह कलह ही प्रथम विश्व युद्ध में परिणत हुआ।

सन् 1911 का इटली-टर्की युद्ध- टर्की को बाल्कन युद्धों में उलझा देखकर इटली ने तुर्क साम्राज्य के एक प्रान्त ट्रिपोली पर आक्रमण कर दिया। टर्की की हार हुई और ट्रिपोली पर इटली का अधिकार हो गया।

दो बाल्कन युद्ध- डा० सत्यकेतु विद्यालंकर ने लिखा है कि “सन् 1912 में टर्की की निर्बलता तथा आन्तरिक झगडों से लाभ उठाकर बल्गेरिया, ग्रीस, सर्बिया और मौटेनीग्रो -इन सब बाल्कन राज्यों ने परस्पर मिलकर गुप्त समझौता किया। इसका उद्देश्य यह था कि सब मिलकर टर्की से युद्ध करें और विजित प्रदेशों को आपस में बाँट लें।” इस समझौते को रूस का समर्थन प्राप्त था। प्रथम बाल्कन युद्ध में इन देशों को पूर्ण सफलता प्राप्त हुई। उन्होंने टर्की को बुरी तरह हराया और यूरोप से उसकी बोरिया-बिस्तर गोल कर दिया। परन्तु लूट के विभाजन के प्रश्न पर सन् 1913 में इन चारों बाल्कन देशों में आपस में ही युद्ध छिड़ गया, जिसमें बल्गेरिया बुरी तरह पराजित हुआ और टर्की ने फिर अपना छिना हुआ कुछ प्रदेश वापस ले लिया।

इन सब घटनाओं से प्रकट है कि सन् 1908 से 1914 तक बाल्कन समस्या बहुत ही बुरी दशा में थी। सन् 1878 की बर्लिन संधि का उल्लंघन आस्ट्रिया और बल्गेरिया दोनों ने किया था। जर्मनी आस्ट्रिया का समर्थक था। रूस सर्बिया को भड़का रहा था। बाल्कन राज्य न केवल टर्की से लड़ रहे थे, अपितु आपस में भी लड़ रहे थे। परस्पर विरोधी गुटबन्दियों के कारण युरोप पहले ही बारूद के ढेर पर खड़ा था। इस आपाधापी की कोई भी घटना भीषण विस्फोंट का कारण बन सकती थी। अन्त में सेराजेवो में आर्कड्यूक फर्डिनंस और उसकी पत्नी सोफिया की आतंकवादियों द्वारा हत्या से यह विस्फोट हुआ और प्रथम विश्व युद्ध शुरू हो गया।

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Pankaja Singh

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