इतिहास

प्राचीन भारतीय इतिहास के स्रोत | अभिलेखों का ऐतिहासिक महत्त्व | प्राचीन भारतीय इतिहास के विभिन्न स्रोत

प्राचीन भारतीय इतिहास के स्रोत | अभिलेखों का ऐतिहासिक महत्त्व | प्राचीन भारतीय इतिहास के विभिन्न स्रोत

प्राचीन भारतीय इतिहास के स्रोत

भारतीयों में इतिहास-लेखन के प्रति रुचि

कुछ विद्वानों की यह मान्यता थी कि प्राचीन काल में भारतीयों में इतिहास लेखन के प्रति कोई रुचि नहीं थी तथा उनमें ऐतिहासिक बुद्धि का अभाव था, परन्तु इस प्रकार के कथन को स्वीकार नहीं किया जा सकता। डॉ०जी०एस०पी०मिश्र का कथन है कि ‘यह विचारधारा पाश्चात्य इतिहासकारों की शायद इसलिए है कि प्राचीन भारतीयों का दृष्टिकोण आध्यात्मिक प्रधान था। बास्तव में यदि तिथि-क्रम के प्रश्न को पृथक् कर दिया जाए तो यह निश्चित रूप से स्पष्ट हो जायेगा कि प्राचीन इतिहासकारों में इतिहास-बुद्धि का अभाव नहीं था, अपितु यह प्रमाणित होगा कि भारत के प्राचीन ग्रन्थों में बहुमूल्य ऐतिहासिक सामग्री निहित है जिसे विविध रूपों में प्राप्त किया जा सकता है।’

डॉ० विमल चन्द्र पाण्डेय लिखते हैं कि “महाभारत, रामायण, पुराणों एवं बहुसंख्यक प्राचीन शिलालेखों, ताम्र-पत्रों और राज मुद्राओं आदि में प्राप्त वंश-वृक्षों तथा अनेकानेक ऐतिहासिक घटनाओं के उल्लेखों से स्पष्टतया प्रकट होता है कि भारतीयों में अपने इतिहास के प्रति उदासीनता न थी।”

डॉ० ओमप्रकाश का कथन है कि “यह समझना कि भारतीय विद्वान इतिहास को कोई महत्व नहीं देते थे, एक भारी भूल है। उनमें ऐतिहासिक बुद्धि पर्याप्त मात्रा में विद्यमान थी। इसकी पुष्टि इस बात से होती है कि वैदिक ऋषियों और बौद्ध तथा जैन आचार्यों की सूचियां विद्यमान हैं। प्राचीन भारतीय विद्वान इतिहास को पाँचवां वेद मानते थे। प्राचीन विद्याओं में इतिहास की भी गिनती की जाती थी।”

प्राचीन भारतीय इतिहास जानने के स्रोत

(Sources of the Ancient Indian History)

प्राचीन भारत के इतिहास के जानने के स्रोतों कों निम्नलिखित प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है-

(1) साहित्यक कृतियाँ । (2) विदेशी यात्रियों के विवरण। (3) पुरातात्विक सामग्री।

  1. साहित्यिक कृतियाँ-

भारत के प्राचीन साहित्य को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है- (अ) धर्म ग्रन्थ और (ब) ऐतिहासिक एवं समकालीन ग्रन्थ ।

(अ) धर्म ग्रन्थ-

वेद, ब्राह्मण, उपनिषद्, बौद्ध साहित्य, जैन साहित्य आदि धर्म-ग्रन्थ हैं। इन ग्रन्थों से बिम्बिसार के पहले इतिहास का ज्ञान होता है। इन ग्रन्थों में राजनीतिक तथ्य तो कम पाये जाते हैं लेकिन धार्मिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक तथ्यों की इनमें प्रचुरता है। प्राचीन भारत का अधिकांश इतिहास बतलाने वाले हमारे ये धर्म-परक ग्रन्थ ही हैं-

(क) ब्राह्मण धर्म ग्रन्थ-

(i) वेद- चार हैं-ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। वास्तव में वेद सम्पूर्ण भारतीय जीवन, धर्म, साहित्य, कला और विज्ञान आदि का मूल स्रोत है। ऋग्वेद हमको आर्यों के प्रसार, उनके आन्तरिक एवं बाह्य संघर्ष तथा उनके राजनीतिक एवं सामाजिक जीवन की पर्याप्त जानकारी देता है। अथर्ववेद में आर्यों के सांस्कृतिक विकास का चित्र मिलता है।

(ii) ब्राह्मण- वेदों की गद्य में की गई टीकाओं को ही ब्राह्मण कहा गया है। भारतीय इतिहास को स्पष्ट करने में ये ग्रन्थ काफी सहायक हैं।

(iii) आरण्यक- इनमें यज्ञों के रहस्य और दार्शनिक तत्वों का विवेचन किया गया है। ये ग्रन्थ संन्यासियों द्वारा शान्ति से वनों में पढ़े जाने के लिए हैं।

(iv) उपनिषद्- बिम्बिसार से पहले के समय का इतिहास जानने में ये ग्रन्थ सहायक हैं। उपनिषद् आर्यों के दर्शन के मूलाधार हैं। ये आर्यों के तत्कालीन सामाजिक एवं धार्मिक जीवन पर अच्छा प्रकाश डालते हैं।

(v) वेदांग- वेदों को समझने के लिए जिन ग्रन्थों की रचना की गई, उन्हें वेदांग कहते हैं। ये 6 हैं- (1) शिक्षा, (2) कल्प, (3) निरुक्त, (4) व्याकरण, (5) छन्द तथा (6) ज्योतिष । इनसे आर्यों के धार्मिक, सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन के बारे में जानकारी प्राप्त होती है।

(vi) सूत्र साहित्य- सूत्र साहित्य को तीन भागों में बाँटा गया है- (1) कल्प-सूत्र, (2) गृह्य सूत्र तथा धर्म सूत्र । कल्प-सूत्र में वैदिक यज्ञों सम्बन्धी विवरण दिया हुआ है। गृह्य सूत्र में गृहस्थ सम्बन्धी संस्कारों, कर्मकाण्डों का वर्णन है। धर्म सूत्र में सामाजिक, राजनीतिक एवं वैधानिक व्यवस्था का विवरण दिया हुआ है।

(vii) महाकाव्य- रामायण और महाभारत भारतीय महाकाव्य हैं। ये संस्कृत के काव्य ग्रन्थ हैं, इनके द्वारा हमको उस काल की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा धार्मिक दशाओं का ज्ञान होता है। ये महाकाव्य भारतीय इतिहास पर अधिक से अधिक प्रकाश डालते हैं। रामायण के रचयिता महाकवि वाल्मीकि ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम के चरित्र का चित्रण करके तत्कालीन भारत की सामाजिक, धार्मिक तथा राजनीतिक स्थिति पर काफी प्रकाश डाला है।

महाभारत के रचयिता व्यास मुनि माने जाते हैं। महाभारत में हमको भारत के प्राचीन इतिहास, कथाओं और उपदेशों का भण्डार मिलता है। इस महाकाव्य से हमको प्राचीन भारत की सामाजिक, धार्मिक तथा राजनीतिक स्थिति का ज्ञान होता है। कर्मयोग का उपदेश देने वाली ‘गीता’ इसी महाकाव्य का एक अंग है।

(viii) पुराण- पुराण की संख्या 18 है। पुराणों में ऐतिहासिक सामग्री भरी पड़ी है। इनमें प्राचीन भारत के इतिहास, धर्म, आख्यान, विज्ञान आदि का विस्तृत विवरण मिलता है। डॉ० वी०ए०स्मिथ का कथन है, “यदि इन पुराणों का अध्ययन ध्यानपूर्वक किया जाए तो हमें मूल्यवान ऐतिहासिक सामग्री प्राप्त होती है।” ‘विष्णु पुराण’ में मौर्य साप्राज्य, ‘मत्स्य पुराण’ में आंध्र वंश तथा ‘वायु पुराण’ में चन्द्रगुप्त प्रथम के विषय में पर्याप्त विवरण मिलता है। यद्यपि पुराणों में कुछ त्रुटियाँ हैं, किन्तु फिर भी ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक दृष्टिकोण से पुराणों का अत्यधिक महत्व है। सांस्कृतिक दृष्टि से पुराण वर्तमान हिन्दू धर्म की आधारशिला है। पुराणों में जो धार्मिक विधियाँ, विश्वास एवं सम्प्रदाय बताये गये हैं, वही आज हमारे समाज में चल रहे हैं। जिन देवी-देवताओं की उपासना पुराणों में बताई गई है, उनकी उपासना हमारे हिन्दू समाज में पूर्णतया प्रचलित है। डॉ० प्रधान के शब्दों में, “पुराण हमें प्राचीन भारत का इतिहास बताने का दावा करते हैं। ऐसा करते हुए वे ऋग्वेद काल से राजाओं की वंशावलियाँ बताना प्रारम्भ करते हैं। इसके साथ वे यह भी बतलाते हैं कि किन राजाओं ने प्राचीन काल में भारत के किस-किस भाग पर राज्य किया और कौन-कौन से राज्यों की स्थापना की। कहीं-कहीं राजाओं और ऋषियों के साहसी और असाधारण कार्यों का वर्णन भी मिलता है।”

(ix) स्मृतियाँ- ऐतिहासिक जानकारी देने में स्मृतियाँ भी विशेष महत्व रखती हैं। इन स्मृतियों में साधारण वर्णाश्रम, धर्म, राजा के कर्तव्य आदि के विषय में पर्याप्त प्रकाश डाला गया है। डॉ० राजबली पाण्डेय के शब्दों में, “विधि, न्याय तथा सामाजिक एवं धार्मिक जीवन के इतिहास के लिए इन स्मृतियों में प्रचुर सामग्री भरी पड़ी है।”

(ख) बौद्ध धर्म ग्रन्थ-

(i) त्रिपिटक- ये तीन हैं-विनयपिटक, सुत्तपिटक तथा अभिधम्म पिटक। ‘विनय पिटक’ में बौद्ध भिक्षु और भिक्षुणियों के आचरण सम्बन्धी नियम दिये गये हैं। ‘सुत्तपिटक’ में भगवान बुद्ध के धार्मिक उपदेशों का संग्रह है। अभिधम्म पिटक में बौद्ध धर्म के दार्शनिक सिद्धान्तों का विवेचन किया गया है। इन तीनों ग्रन्थों से तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक, तथा आर्थिक जीवन पर भी अच्छा प्रकाश पड़ता है।

(ii) जातक- जातकों में भगवान बुद्ध के पूर्वजन्म की कथायें दी गई हैं। इनकी कुल संख्या 549 है। इनके अध्ययन से तत्कालीन सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तथा राजनीतिक अवस्था के विषय में जानकारी मिलती है।

(viii) महावंश और दीपवंश- ये लंका में लिखे गये बौद्ध ग्रन्थ हैं। इनसे लंका के इतिहास के साथ-साथ भारतीय इतिहास पर भी प्रकाश पड़ता है। मौर्य काल के इतिहास के अध्ययन के लिये ये दोनों ग्रन्थ बड़े उपयोगी हैं।

(iv) महावस्तु- इस ग्रन्थ में महात्मा बुद्ध का जीवन-वृत्त मिलता है।

(v) ललित विस्तार- इसमें महात्मा बुद्ध के जीवन को प्रस्तुत किया गया है। इसमें महात्मा बुद्ध की दैवी शक्ति का रूप अंकित है।

(vi) मंजूश्री मूल कल्प- इस ग्रन्थ में मौर्यों से लेकर हर्ष के समय तक की घटनाओं का ज्ञान प्राप्त होता है।

(vii) दिव्यावदान- इससे अशोक तथा उसके उत्तराधिकारियों के विषय में पर्याप्त जानकारी मिलती है।

(ग) जैन धर्म ग्रन्थ-

प्राचीन भारत के इतिहास के निर्माण के लिए जैन साहित्य में पर्याप्त जानकारी मिलती है। जैन ग्रन्थों से तत्कालीन भारत के गणराज्यों और राजतन्त्रों के बारे में जानकारी मिलती है। ऐतिहासिक दृष्टि से जैन-साहित्य का सबसे महत्वपूर्ण ग्रन्थ ‘परिशिष्ट पर्वन’ है। इस ग्रन्थ की रचना हेमचन्द्र ने की थी। इस ग्रन्थ से महावीर स्वामी के समय से लेकर मौर्य काल तक के इतिहास के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। ‘भद्रबाहु चरित’ नामक ग्रन्थ से प्रसिद्द जैन विद्वान भद्रबाहु तथा चन्द्रगुप्त मौर्य के जीवन की घटनाओं का विवरण मिलता है। इसके अतिरिक्त “भगवती सूत्र” ‘कथा-कोष’ आदि ग्रन्थ भी उपयोगी ग्रन्थ हैं।

(ब) ऐतिहासिक एवं समसामयिक ग्रन्थ-

(i) हर्षचरित- इस ग्रन्थ के रचयिता बाणभट्ट थे। इससे सम्राट हर्षवर्धन के जीवन चरित्र तथा उसकी विजयों के बारे में पर्याप्त जानकारी मिलती है। इसके अतिरिक्त इस ग्रन्थ से सातवीं शताब्दी के भारत की राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक एवं आर्थिक स्थिति पर प्रकाश पड़ता है।

(ii) कौटिल्य का अर्थशास्त्र-इस ग्रन्थ से मौर्यकालीन भारत की शासन-पद्धति, राजनीतिक व्यवस्था, सामाजिक एवं आर्थिक जीवन के बारे में जानकारी मिलती है।

(iii) कल्हण की राजतरंगिणी-कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ से हमको प्राचीन काल से लेकर 12वीं शताब्दी तक का कश्मीर का ऐतिहासिक वृत्तान्त मिलता है। ऐतिहासिक उपादेयता की दृष्टि से यह अत्यंत ही महत्व का ग्रन्थ है।

(iv) कामन्दकीय नीतिशास्त्र- कामन्दक के “नीतिसार” नामक ग्रन्थ से उस समय के राजस्व सिद्धान्तों, राजा के कर्तव्यों तथा अन्य सामाजिक रीति-रिवाजों की हमको जानकारी मिलती है।

(v) अन्य ऐतिहासिक ग्रन्थ- इन ग्रन्थों के अतिरिक्त, ऐसे और भी बहुत-से ग्रन्थ हैं, जिनसे हमको उस समय की सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक आदि दशा का ज्ञान मिलता है। इन ग्रन्थों में पाणिनी की अष्टाध्यायी, “गार्गी संहिता” पतंजलि का महाभाष्य, कालिदास का मालिविकाग्निमित्रम्, विशाखादत्त का ‘मुद्राराक्षस’, नाटक, कालिदास तथा भास के नाटक प्रमुख हैं। पाणिनी का “अष्टाध्यायी’ व्याकरण का एक ग्रन्थ है, परन्तु मौर्यों से पहले की एवं मौर्यकालीन राजनीतिक अवस्था पर यह काफी प्रकाश डालता है। गार्गी संहिता में यवनों द्वारा भारत पर आक्रमण का वर्णन किया गया है। इसी प्रकार पतंजलि के महाभाष्य में भी पर्याप्त ऐतिहासिक जानकारी मिलती है। कालिदास के मालविकाग्निमित्रम् में शुंग वंश की तथा उसके पहले के राजवंशों की समकालीन राजनीतिक दशा का बोध होता है। विशाखदत्त के नाटक “मुद्राराक्षस’ में चन्द्रगुप्त मौर्य और चाणक्य का वर्णन किया गया है। इसमें नन्द वंश के पतन के कारणों तथा मौर्य वंश की स्थापना का वृत्तान्त भी दिया गया है।

इन ग्रन्थों के अतिरिक्त कुछ ग्रन्थ जीवनियों के रूप में हैं। इनसे भी हमको तत्कालीन स्थिति की ऐतिहासिक जानकारी मिलती है। इन ग्रन्थों में हर्षचरित के अतिरिक्त बिल्हण का ‘विक्रमांकदेव चरित’ बंगाल के राजा रामपाल के जीवन पर आधारित ‘रामचरित’ चन्दवरदाई का ‘पृथ्वीराज रासो’, जिसमें पृथ्वीराज चौहान तथा मोहम्मद गोरी के बीच युद्ध का पूर्ण विवरण दिया है, आदि उल्लेखनीय हैं। जयसिंह का ‘कुमारपाल चरित’ जिसमें अन्हिलवाड़ा के शासक कुमारपाल का वर्णन किया गया है, बिल्हण के ‘विक्रमांकदेव चरित’ में कल्याणी के चालुक्य वंश के इतिहास का वर्णन किया गया है। पदमगुप्त का ‘नवसाहसाँक चरित’ जिसमें परमार वंश का इतिहास मिलता है, मुख्य हैं। हर्षवर्द्धन द्वारा रचित नाटक ‘नागानन्द’, ‘रत्नावली’ और ‘प्रियदर्शिका’ भी सातवीं शताब्दी के भारत का चित्रण करते हैं। वाक्पति राज द्वारा रचित ‘गौड़नहो’ नामक ग्रन्थ में कन्नौज नरेश यशोवर्मन की विजयों का वर्णन है।

  1. विदेशी यात्रियों के विवरण-

प्राचीन भारत के निर्माण में विदेशी यात्रियों के विवरण भी काफी योगदान करते हैं। प्राचीन भारत के काफी ऐतिहासिक ज्ञान के लिए हम इन विदेशियों के आभारी हैं। यद्यपि भारत अपनी विशेषताओं के कारण एक पृथक् देश है फिर भी हजारों वर्षों से भारत के सम्बन्ध अन्य देशों से जुड़े हुए हैं। प्राचीन भारत तो साहित्य, कला, संस्कृति, शिक्षा एवं धर्म का केन्द्र रहा है। अनेक उद्देश्यों से विदेशी यात्री यहाँ आये हैं, जिन्होंने उस समय के भारत की दशा का वर्णन किया है। विदेशी विवरण को हम दो भागों में बाँट सकते हैं- विदेशी लेखकों के विवरण एवं भारत में यात्रा करने वाले विदेशी यात्रियों द्वारा लिखे गये विवरण। डेरियस के विदेशी अभिलेखों में तथा विदेशी साहित्य जैसे – “हेरोडोट्स के इतिहास” में भारत का वर्णन मिलता है। लेकिन इन विदेशी लेखकों के साहित्य से बहुत अधिक महत्वपूर्ण उन विदेशियों के वर्णन हैं, जिन्होंने भारत की यात्रा की और भारत का आँखों देखा वर्णन उन्होंने अपनी पुस्तकों में किया। यूनानी; चीनी और मुसलमान यात्री यहाँ आए और उन्होंने अपने काल के भारत का वर्णन किया। सिकन्दर के पूर्व के लेखकों में स्कारलैक्स, हिकेटिअस, मिलेट्स हेरोडोट्स तथा केसियस के नाम उल्लेखनीय हैं। सिकन्दर के बाद के यूनानी लेखकों में मेगस्थनीज, डायमेकस, एरियन, स्ट्रेबो, प्लिनी, पेट्रोक्लीज आदि के नाम प्रसिद्ध हैं। मैगस्थनीज सैल्यूकस के राजदूत के रूप में चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में आया था। उसने अपनी इण्डिका नामक पुस्तक में आँखों-देखा भारत का वर्णन किया है। इसके द्वारा हमको मौर्यकालीन शासन व्यवस्था, सभ्यता, सामाजिक तथा आर्थिक स्थिति का ज्ञान मिलता है। डायमेकस बिन्दुसार के दरबार में यूनानी राजदूत था। एलिन ने ‘इण्डिका’ तथा ‘सिकन्दर का आक्रमण’ नामक दो ग्रन्थ लिखे। स्ट्रेबो ने ‘भूगोल’ नामक ग्रन्थ की रचना की जिसमें भारत की सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तथा राजनीतिक अवस्थाओं के बारे में जानकारी मिलती है। प्लिनी ने ‘प्राकृतिक इतिहास’ नामक ग्रन्थ लिखा जिसमें भारत का भी विवरण मिलता है। इसके अतिरिक्त बौद्ध धर्म के विषय में सामग्री एकत्र करने आये चीनी यात्रियों में फाह्यान और ह्वेनसाँग के नाम प्रसिद्ध हैं। भारत में वर्षों रहकर इन्होंने यहाँ काफी भ्रमण किया और अपने अनुभवों को लिपिबद्ध किया जो भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। फाह्यान ने चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य तथा ह्वेनसांग ने हर्ष के काल का विशद वर्णन किया है। इत्सिंग 7वीं शताब्दी में भारत आया और उसके वर्णन से भी प्राचीन भारत के इतिहास को जानने में कुछ सहायता मिलती है। भारत में आने वाले मुसलमान इतिहासकारों में अलबेरुनी का नाम महत्वपूर्ण है। उसके ग्रन्थ ‘तहकील-ए-हिन्द’ से राजपूतकालीन भारत की सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक तथा आर्थिक स्थिति के बारे में जानकारी मिलती है। ‘डॉ० रमाशंकर त्रिपाठी का कथन है कि ‘इन विदेशी लेखकों के वृत्तान्त प्राचीन भारत की राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, भौगोलिक आदि परिस्थितियों पर तो प्रकाश डालते ही हैं, भारतीय तिथिक्रम की गुत्थियाँ सुलझाने में भी इनसे प्रचुर सहायता मिलती है।’’

3. पुरातात्विक सामग्री-

भारतीय इतिहास के ज्ञान की दृष्टि से पुरातात्विक सामग्री सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। पुरातत्व सामग्री में प्राचीन सिक्के, अभिलेख, शिलालेख, प्राचीन स्मारक आदि सम्मिलित किये जाते हैं।

(i) स्मारक तथा खण्डहर-प्राचीन काल के मन्दिरों, मूर्तियों, स्तूपों, खण्डहरों आदि के अध्ययन से हमें प्राचीन इतिहास के निर्माण में बहुत सहायता मिलती है। विभिन्न स्थानों पर खोदकर निकाली हुई वस्तुयें जैसे- ईंटें, बर्तन, औजार, मूर्तियाँ, सिक्के, हथियार, मकान, भवन, मन्दिर आदि से भारत के इतिहास पर विशेष प्रकाश पड़ता है। यदि उस काल का इतिहास जानने का और कोई स्त्रोत नहीं होता, तो ऐसी पुरातात्विक सामग्री बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाती है। हड़प्पा और मोहनजोदडो की खुदाई से सिन्धु घाटी की सभ्यता प्रकट होती है। तक्षशिला की खुदाई कुषाणवंशीय सम्राटों के बारे में ज्ञान प्रकट करती है। पाटलिपुत्र के खण्डहरों से मौर्यकाल के इतिहास पर प्रकाश पड़ता है। देवगढ़, भितरीगाँव और तिगवा के मन्दिरों से गुप्तकालीन स्थापत्य कला के बारे में जानकारी मिलती है। कनिष्क के शासनकाल की तक्षशिला से प्राप्त भगवान बुद्ध की मूर्ति से गान्धार कला के सौन्दर्य के बारे में पता चलता है। इसी प्रकार सिन्धु प्रदेश में प्राप्त पशुपति शिव की मूर्तियों से पता चलता है कि सिन्धु प्रदेश के निवासी शिव के उपासक थे। अजन्ता व ऐलोरा की गुफाओं से हमें प्राचीन भारत की चित्रकला के उत्कृष्ट उदाहरण मिलते हैं। इनसे तत्कालीन जन-जीवन की झाँकी भी मिलती है। दक्षिण पूर्वी एशिया में प्राप्त स्मारकों से पता चलता है कि प्राचीन काल में वहाँ भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का प्रसार हुआ तथा वहाँ भारतीय उपनिवेश स्थापित हुए।

(ii) अभिलेख- प्राचीन भारत का इतिहास जानने के सबसे अधिक महत्वपूर्ण एवं विश्वसनीय साधन अभिलेख हैं। ये लेख मुख्य रूप से स्तम्भों, शिलाओं तथा गुफाओं पर मिलते हैं। परन्तु वे कभी-कभी मूर्तियों, पात्रों तथा ताम्रपत्रों पर भी अंकित मिलते हैं। प्रयाग में अशोक की लाट से समुद्रगुप्त की विजयों का वर्णन मिलता है। सम्राट अशोक देवानाम् प्रिय तथा प्रियदर्शी था, यह भी शिलालेख से ही ज्ञात हुआ।

अशोक के स्तम्भ लेखों एवं शिलालेखों से अशोक के धर्म, उसके साम्राज्य विस्तार, उसके शासन-प्रबन्ध एवं लोक कल्याणकारी कार्यों के बारे में जानकारी मिलती है। इसके अतिरिक्त समुद्रगुप्त का प्रयाग स्तम्भलेख और चन्द्रगुप्त द्वितीय का महरौली स्तम्भलेख बड़े महत्वपूर्ण हैं। इसी प्रकार पुष्यमित्र शुंग का अयोध्या अभिलेख खारवेल का ‘हाथी गुम्फा अभिलेख” तथा रुद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख भारतीय इतिहास के निर्माण में बड़े उपयोगी सिद्ध हुए हैं।

अभिलेखों का ऐतिहासिक महत्त्व

(1) अभिलेखों से राज्यों की सीमाओं की जानकारी प्राप्त होती है।

(2) ये अभिलेख तत्कालीन शासकों के चरित्र तथा व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हैं।

(3) इन अभिलेखों से सम्राट अशोक, समुद्रगुप्त, चन्द्रगुप्त द्वितीय, खारवेल, रुद्रदामन आदि के शासन काल की घटनाओं पर प्रकाश पड़ता है।

(4) प्रयाग-प्रशस्ति अभिलेख से समुद्रगुप्त की विजयों और उसकी चारित्रिक विशेषताओं के बारे में जानकारी मिलती है। ‘हाथी गुम्फा अभिलेख’ से कलिंग-नरेश खारवेल की उपलब्धियों पर प्रकाश पड़ता है। जूनागढ़ अभिलेख से रुद्रदामन की उपलब्धियों के बारे में जानकारी मिलती है।

(5) अशोक तथा अन्य राजाओं के अभिलेखों से उनकी शासन-व्यवस्था के बारे में जानकारी मिलती है।

(6) अभिलेखों से तिथि-क्रम निश्चित करने में सहायता मिलती है।

फ्लीट महोदय ने अभिलेखों का महत्व बतलाते हुए लिखा है कि “प्राचीन भारत के राजनैतिक इतिहास का ज्ञान हमें केवल अभिलेखों के थैर्यपूर्ण अध्ययन से प्राप्त होता है।” इसी प्रकार का मत प्रकट करते हुए डॉ०वी०एस्मिथ ने लिखा है कि ‘प्रारम्भिक हिन्दू इतिहास में घटनाओं की तिथि का जो ठीक-ठीक ज्ञान अभी प्राप्त हो सका है, वह मुख्यतः अभिलेखों के साक्ष्य पर आधारित है।”

(iii) सिक्के- प्राचीन भारत के इतिहास को व्यवस्थित रूप से लिपिबद्ध करने में प्राचीन भारत के सिक्कों से काफी मदद मिली है। सिकों द्वारा हमें सम्राटों के राज्य विस्तार, उनके व्यक्तिगत गुण तथा उस काल की आर्थिक दशा का ज्ञान हो जाता है। सिक्कों के द्वारा घटना काल तथा क्रम का ज्ञान होता है। मुद्राओं के रूप तथा आकार से भी तत्कालीन आर्थिक स्थिति का बहुत-कुछ ज्ञान हो जाता है। सिक्कों ने ही समुद्रगुप्त के संगीत प्रेम का ज्ञान दिया है। कुछ सिक्कों पर पौराणिक कथाएँ अंकित हैं जिनके द्वारा हमको पर्याप्त ऐतिहासिक सामग्री मिल जाती है। इण्डोबैक्ट्रियन, इण्डोग्रीक तथा इण्डोसीथियन आदि वंशों का ज्ञान हमें केवल सिक्कों से ही मिलता है। शक, पल्लव शासकों की मुद्राओं से हमको तत्कालीन शासन-पद्धति का ज्ञान मिलता है। सिक्कों से ही उस काल की कलाओं का ज्ञान होता है। डॉ० ओमप्रकाश लिखते हैं कि “सिक्के प्राचीन भारत का इतिहास लिखने में बहुत उपयोगी सिद्ध हुए हैं। यह बात इस तथ्य से सपष्ट होती है कि 206 ई०पू० से 300 ई० तक इतिहास अधिकतर सिक्कों के आधार पर ही लिखा गया है। इस समय के सिक्कों के बिना यह काल पूर्णतया अन्धकार युग बना रहता। भारतीय शक राजाओं और मालव, यौधेय आदि गणराज्यों के इतिहास पर अनेक सिक्के, पर्याप्त प्रकाश डालते हैं। सिक्कों के पाए जाने के स्थानों से राजाओं के राज्य विस्तार का भी अनुमान होता है। कभी-कभी उन पर अंकित चित्र विशेष घटनाओं पर प्रकाश डालते हैं जैसे कि समुद्रगुप्त के कुछ सिक्कों पर यूप बने हैं और “अश्वमेध पराक्रमः’ शब्द खुदे हुए हैं जिससे स्पष्ट हो जाता है कि उसने अश्वमेध यज्ञ किया था। सिक्कों पर उत्कीर्ण देवताओं की आकृतियों से तत्कालीन राजाओं के धार्मिक विश्वासों की जानकारी होती है। गुप्तकालीन सिक्कों से गुप्त राजाओं के बारे में बहुत-सी बातें ज्ञात होती हैं।

निष्कर्ष-

डॉ० स्मिथ ने लिखा है कि ‘प्राचीन भारत का इतिहास जानने के लिए तथ्यों का अभाव नहीं है, अपितु तिथिक्रम की कठिनाई है।” प्राचीन भारतीय इतिहासकारों के पास पर्याप्त नामों की सूची, परम्परागत कथाएँ आदि हैं। डॉ० स्मिथ का यह कथन पूर्णतया ठीक है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम इस सामग्री का अध्ययन धैर्यपूर्वक करें तथा विभिन्न प्रकार की सामग्री में सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास करें। अब इस दिशा में भारतीय इतिहासकार बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। निश्चित ही कुछ समय पश्चात् प्राचीन भारत का तथ्यपूर्ण एवं सारगर्भित इतिहास पाठकों को मिल जायेगा।

डॉ० राजबली पाण्डेय के मतानुसार, “वृहत्तर भारत में उपलब्ध मन्दिर और चैत्य भारतीय संस्कृति और कला के लिए महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं, जैसे- जावा में बोरोबदुर, कम्बोडिया का अंगकोरवाट तथा मलेशिया और थाईलैण्ड के हिन्दू व बौद्ध मन्दिर आदि।”

डॉ० सत्यकेतु विद्यालंकार ने कहा है, “उत्कीर्ण लेखों और मुद्राओं के समान प्राचीन भारत की कृतियों व स्मारकों से भी भारत के प्राचीन इतिहास का बहुत ज्ञान प्राप्त होता है।” इस प्रकार हम कह सकते हैं कि भारत के प्राचीन इतिहास को जानने के लिए पर्याप्त सामग्री तो उपलब्ध है, किन्तु आवश्यकता है धैर्यपूर्वक अनुसन्धान करने की।

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Pankaja Singh

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