इतिहास

जोर्वे ताम्र-पाषाणिक संस्कृति का उद्भव | जोर्वे ताम्र-पाषाणिक संस्कृति की विशेषताएँ

जोर्वे ताम्र-पाषाणिक संस्कृति का उद्भव | जोर्वे ताम्र-पाषाणिक संस्कृति की विशेषताएँ

जोर्वे ताम्र-पाषाणिक संस्कृति का उद्भव

महाराष्ट्र में स्थायी ग्राम जीवन का आरम्भ ताम्र-पाषाणिक संस्कृतियों के साथ होता है। महाराष्ट्र में विदर्भ के कुछ हिस्सों तथा कोंकण को छोड़कर शेष सम्पूर्ण भाग से मालवा ताम्राश्म संस्कृति के अवशेष मिले हैं तथापि जोर्वे की ताम्र पाषाणिक संस्कृति महाराष्ट्र की विशिष्ट संस्कृति प्रतीत होती है।

जोर्वे संस्कृति के विषय में जानकारी महाराष्ट्र के अहमद नगर जिले में स्थित जोर्वे नामक पुरास्थल के उत्खनन से सर्वप्रथम हुई है इसलिए इसको यह नाम दिया गया है। इस पुरास्थल पर एक ही संस्कृति के पुरावशेष उपलब्ध हुए थे, अतएव यह निश्चित नहीं किया जा सका कि अन्य संस्कृतियों के सन्दर्भ में जोर्वे की क्या स्थिति रही होगी। नासिक के उत्खनन से जोर्वे संस्कृति के पुरावशेष आरम्भिक ऐतिहासिक काल के पुरावशेषों के नीचे मिले थे जिससे यह पता चला कि इस क्षेत्र में जोर्वे संस्कृति छठवीं-पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व की आरम्भिक ऐतिहासिक युगीन संस्कृति से पहले विकसित हुई थी। जोर्वे तथा नासिक इन दोनों पुरास्थलों पर सीमित पैमाने पर उत्खनन होने के कारण इस संस्कृति के विभिन्न पक्षों के विषय में कोई उल्लेखनीय जानकारी नहीं हो सकी थी। विगत कतिपय दशकों में महाराष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रों में ताम्र-पाषाणिक संस्कृतियों के विषय में जो अन्वेषण एवं उत्खनन हुए हैं उनसे जोर्वे संस्कृति की प्रमुख विशेषताओं पर समुचित प्रकाश पड़ा है। जोर्वे संस्कृति से सम्बन्धित सबसे अधिक पुरास्थल तापी (ताप्ती) नदी की घाटी में उसकी सहायक नदियों के तटों पर स्थित हैं। इसके पश्चात् संख्या की दृष्टि से जोर्वे संस्कृति के पुरास्थल गोदावरी की घाटी में स्थित है। भीमानदी की घाटी में अत्यल्प संख्या में यत्र-तत्र जोर्वे संस्कृति के कतिपय गिने चुने पुरास्थल विद्यमान हैं।

इस संस्कृति के अनेक पुरास्थलों का अभी तक उत्खनन हो चुका है। इनमें से प्रकाश, सावलदा तथा कोठे धुले जिले में और बहाल एवं टेकवाडा जलगाँव जिले में स्थित हैं। तुलजापुरगढ़ी अमरावती जिले में, दायमाबाद, नेवासा, नासिक, जोर्वे, सोनगाँव और अपेगाँव अहमद नगर जिले में तथा इनामगाँव, चन्दोली एवं वाड़की (Walki) पुणे जनपद में पड़ते हैं। अधिकांश पुरास्थलों का आकार छोटा है। एक हेक्टेअर से लेकर दो-तीन हेक्टेअर तक क्षेत्रफल मिलता है। कतिपय पुरास्थल ऐसे हैं जिनका विस्तार नौ-दस हेक्टेअर तक मिला है। तापी एवं गोमय के संगम पर स्थित प्रकाश का विस्तार लगभग 10 हेक्टेअर क्षेत्र है। तापी नदी की घाटी में उसकी सहायक गिरना के तट पर स्थित बहाल एक अन्य विस्तृत क्षेत्रफल वाला पुरास्थल है जिसका विस्तार लगभग 15 हेक्टेअर में है।

जोर्वे ताम्र-पाषाणिक संस्कृति की विशेषताएँ –

  1. मृद्भाण्ड परम्पराएँ- जोर्वे संस्कृति में कई प्रकार की पात्र-परम्पराएँ प्रचलित थीं जिनमें से कुछ का आविर्भाव जोर्वे के साथ-साथ दिखलाई पड़ता है, कुछ पात्र परम्पराएँ पहले से ही अस्तित्व में थीं जिन्हें जोर्वे संस्कृति के लोगों ने ग्रहण कर लिया था। इस संस्कृति के परवर्ती चरण (Late Phase) में कुछ ऐसी पात्र परम्पराएँ दृष्टिगत होती हैं जो इस संस्कृति की पात्र-परम्पराएँ न होकर किसी अन्य संस्कृति से सम्बन्धित थीं। जोर्वे संस्कृति के लोगों ने इन पात्र-परम्पराओं को अपना लिया था।

वे पात्र-परम्पराएँ जो जोर्वे संस्कृति के पहले ही अस्तित्व में आ चुकी थीं, उनमें से मालवा पात्र-परम्परा और दूधिया स्लिप वाली पात्र-परम्परा (Cream Slipped Ware) विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। मालवा पात्र-परम्परा मुख्यतः मालवा संस्कृति से सम्बन्धित है जिसके विषय में सर्वप्रथम जानकारी नवदाटोली के उत्खनन से हुई थी। लेकिन इसका विस्तार (Distribution) पश्चिमी महाराष्ट्र प्रान्त में भी दिखलाई पड़ता है। इस क्षेत्र के प्रकाश, दायमाबाद, चन्दोली, सोनगाँव, इनामगाँव के उत्खननों से जोर्वे संस्कृति के निचले स्तरों से मालवा पात्र परम्परा उपलब्ध हुई। यह सुविदित है कि मालवा पात्र-परम्परा के बर्तन हल्के लाल रंग के मिलते हैं जिनके ऊपर काले या सलेटी रंग से चित्रण किये गए हैं। दूधिया स्लिप वाले मृद्भाण्ड चन्दोली से प्राप्त हुए हैं लेकिन यह मृद्भाण्ड-परम्परा घटिया किस्म की मालूम पड़ती है।

  1. औजार, उपकरण तथा अन्य परानिधियाँ- जोर्वे संस्कृति के लोग ताँबे के औजारों तथा उपकरणों के प्रयोग से परिचित थे लेकिन उनकी संख्या बहुत कम मिलती है। ताम्र- उपकरणों से कुल्हाड़ियों, चाकू के फलकों, सुइयों, चूड़ियों, मनकों तथा अंजन-शलाकाओं की गणना की जा सकती है। जोर्वे संस्कृति से सम्बन्धित विभिन्न पुरास्थलों से लघु पाषाण उपकरण बहुत बड़ी संख्या में मिले हैं। दायमाबाद एवं इनामगाँव के उत्खनन से इस तरह के उपकरण प्रायः प्रत्येक घर से मिले हैं। इससे यह अनुमान किया जा सकता है कि हर परिवार के लोग इसका निर्माण और प्रयोग करते थे।

प्रकाश, दायमाबाद, चन्दोली तथा इनामगाँव के जोर्वे संस्कृति के स्तरों से कतिपय मानव एवं पशु मृण्मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं। इनामगाँव से प्राप्त स्त्री तथा वृषभ की मूर्तियाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। अनुमान किया गया है कि स्त्री की मृण्मूर्ति मातृदेवी की है और वृषभ उसका वाहन है। दोनों की पूजा अविछिन्न रूप से एक दूसरे जुड़ी हुई प्रतीत होती है। सिलखड़ी, तामड़ा पत्थर, पकी मिट्टी, ताम्र तथा सोने के बने हुए मनके प्राप्त हुए हैं। नेवासा में एक बच्चे के कंकाल के गले में ताम्र के बने हुए मनकों का हार पड़ा हुआ मिला है।

  1. मकान- जोर्वे संस्कृति के लोग एक स्थान पर स्थायी रूप से निवास करते थे। यह बहुत स्वाभाविक था कि ये लोग अपने रहने के लिए मकानों का निर्माण मिट्टी से करते। इनके मकान प्रायः चौकोर होते थे। इनामगाँव के उत्खनन से अनेक मकान प्रकाश में आये हैं। मकानों की दीवालों के कोने गोल बना दिये जाते थे। मकानों के छप्परों के सम्बन्ध में स्पष्ट जानकारी नहीं मिली है। मिट्टी की दीवालें और घास-फूस का छाजन होता था। कुछ मकानों के बीचो-बीच आँगन के भी साक्ष्य मिले हैं। मकानों के अन्दर तरह-तरह के मिट्टी के बर्तन मिले हैं जिनमें से कुछ का प्रयोजन स्पष्टतः अनाज भण्डारण से तथा कुछ का प्रतिदिन के प्रयोग में आने वाले बर्तनों से था। बर्तनों के अतिरिक्त इनके मकानों में पत्थर के सिल तथा लोढ़े भी मिले हैं। अनुमान किया जाता है कि खाद्यान्नों को सिल-बट्टों में पीस कर प्रयोग में लाया जाता था।

इनामगाँव के उत्खनन से जोर्वे संस्कृति का एक ऐसा पक्ष उद्घाटित हुआ है जिसे हम उत्तरकालीन जोर्वे संस्कृति से जोड़ सकते हैं। उत्तरकालीन जोर्वे संस्कृति के इस स्तर से सम्बन्धित मकानों को देखने से यह पता चलता है कि अब लोगों ने चौकोर मकान बनाने छोड़ दिए थे और इन लोगों ने अपने मकान गोल आकार के बनाने प्रारम्भ कर दिये थे।

  1. कृषि तथा पशु-पालन- अहाड़ और मालवा की ताम्र-पाषाणिक संस्कृतियों के लोगों की ही भाँति जोर्वे संस्कृति के लोग कृषि तथा पशु-पालन करते थे। नेवासा के उत्खनन से इस बात के संकेत मिले हैं कि ये लोग सम्भवतः कपास की खेती करते थे। इनामगाँव के उत्खनन से जौ, गेहूं, मटर, मसूर, मूंग या उड़द की खेती के साक्ष्य मिले हैं। झरबेर, जामुन, जंगली ताड़ तथा बहेड़ा की गुठलियाँ भी इनामगाँव से प्राप्त हुई हैं।

पालतू पशुओं में गाय, बैल, भेड़-बकरी और कुत्ते प्रमुख पशु थे। इनामगाँव के एक पात्र पर बैलगाड़ी में जुते हुए दो बैलों का चित्रण मिलता है। इससे स्पष्ट है कि बैल भारवाही प्रमुख पालतू पशु थे। जंगली पशुओं का शिकार भी करते थे।

  1. अन्त्येष्टि संस्कार- जोर्वे संस्कृति के नेवासा, दायमाबाद, कौठे, चन्दोली, इनामगाँव आदि पुरास्थलों से जो मानव कंकाल मिले हैं वे अपेक्षाकृत अच्छी स्थिति में हैं। तुलजापुरगढी तथा वाडकी से जो कंकाल मिले हैं, वे बच्चों के हैं। अपेगाँव से एक वयस्क का जबड़ा (Mandible) मिला है। टेकवाड़ा से भी मानव कंकाल मिले हैं। इनामगाँव से 176, कौठे से 37 तथा दायमाबाद से 5 मानव कंकाल प्राप्त हुए हैं।

प्रकाश, कावलदा, बहाल, सोनगाँव, जोर्वे तथा नासिक के सीमित पैमाने पर शैर्षिक उत्खनन हुए थे। इन उपर्युक्त पुरास्थलों से अभी तक मानव कंकाल नहीं मिले हैं।

अस्थि पञ्जर मकानों के फर्श के नीचे दफनाये हुए मिले हैं। इस प्रकार हम यह देखते हैं कि सिन्धु सभ्यता की तरह जोर्वे संस्कृति में मुर्दो को आवास क्षेत्र से बाहर दफनाने की परम्परा नहीं थी। जोर्वे संस्कृति की यह विशिष्टता नव पाषाणिक तथा वृहत्पाषाणिक संस्कृतियों से अनुप्राणित प्रतीत होती है। वयस्क लोगों को कब्रों में दफनाया जाता था। कब्रों में सिर प्रायः उत्तर दिशा की ओर मिलते हैं। मृतकों के साथ अन्त्येष्टि सामग्री के रूप में मिट्टी के बर्तन तथा आभूषण मिलते हैं। कुछ ऐसे भी साक्ष्य मिले हैं जिनमें कंकालों की टाँगे नहीं मिली हैं। दफनाने के पहले ही सम्भवतः टाँगें अलग कर दी जाती थी। इस कार्य से पीछे क्या भावना रही होगी? कुछ विद्वानों का अनुमान है कि शायद इस परम्परा के पीछे जोर्वे संस्कृति के लोगों का अपने मृतकों के प्रति विशेष लगाव था। उन्हें इस बात का भय था कि मुर्दे कहीं भाग न जाएँ।

बच्चों को दफनाने के लिए बड़े आकार के अन्त्येष्टि-कलश उपयोग में लाये जाते थे। इस कार्य के लिए लाल अथवा धूसर रंग के बर्तन प्रयोग किये जाते थे। एक बच्चे के शव को भरने के लिए ज्यादातर दो अन्त्येष्टि कलश काम में लाये जाते थे जिन कलशों के आपस में मुख से मुख मिलाकर पड़े बल (Horizontal) गड्ढे में लिटाकर दफना दिये जाते थे। कभी- कभी एक अन्त्येष्टि कलश भी इस काम में लाया जाता था। अन्त्येष्टि कलशों में बच्चों के सिर उत्तर को तथा पैर दक्षिण दिशा की ओर करके दफनाये जाते थे। अन्त्येष्टि कलशों के साथ कटोरे तथा टोंटीदार बर्तन भी गड्ढों में दफनाये हुए मिलते हैं।

कालानुक्रम-

जोर्वे की ताम्र-पाषाणिक संस्कृति के तिथि-क्रम के सम्बन्ध में हमें सापेक्ष तथा निरपेक्ष तिथियाँ प्राप्त है। स्तर विन्यास-क्रम के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि जोर्वे. संस्कृति मालवा संस्कृति के बाद की है क्योंकि प्रकाश, दायमाबाद तथा इनामगाँव में जोर्वे मालवा-संस्कृति के स्तरों के ऊपर है। चन्दोली, सोनगाँव तथा बहाल में भी मालवा संस्कृति से सम्बन्धित पात्र-परम्परा जोर्वे संस्कृति के नीचे के स्तरों से उपलब्ध होती है। नवदाटोली में जोर्वे पात्र-परम्परा मालवा संस्कृति के तीसरे चरण से मिलने लगती है। ये सभी समवेत साक्ष्य इस ओर इंगित करते हैं कि जोर्वे संस्कृति का विकास मालवा संस्कृति के बाद की घटना है। लेकिन इससे यह नहीं समझना चाहिए कि जब जोर्वे संस्कृति अस्तित्व में आयी तब तक मालवा संस्कृति अतीत की वस्तु बन चुकी थी। इसके विपरीत हमें इस बात के संकेत मिलते हैं कि शताब्दियों तक दोनों संस्कृतियाँ साथ-साथ चलती रहीं।

जोर्वे संस्कृति से सम्बन्धित चन्दोली, सोनगाँव, नेवासा तथा इनामगाँव से कतिपय रेडियो कार्बन तिथियाँ उपलब्ध हैं जिनके आधार पर इस संस्कृति का समय 1600 ई०पू० से 1000 ई०पू० के बीच निर्धारित किया गया है। एच०डी०सांकलिया और एम०के०धौलिकर इनामगाँव के उत्खनन से प्राप्त साक्ष्यों के आलोक में जोर्वे संस्कृति के अन्तिम चरण को 700 ई०पू० में रखने के पक्ष में हैं। वर्षा की कमी के कारण सूखे की स्थिति उत्पन्न होने पर जोर्वे संस्कृति का अंत हो गया।

जोर्वे संस्कृति के विभिन्न अवयवों को लेकर जो छानबीन की गई है उससे यह पता चलता है कि इस संस्कृति के निर्माण में दो विभिन्न संस्कृतियों के तत्त्व दिखलाई पड़ते हैं। जोर्वे संस्कृति की विशिष्ट पात्र-परम्परा, मालवा पात्र-परम्परा से अनुप्राणित प्रतीत होती है। मालवा पात्र-परम्परा की ही भाँति जोर्वे पात्र-परम्परा में भी लाल धरातल के ऊपर काले रंग में चित्रण-अभिप्राय मिलते हैं। कुछ चित्रण अभिप्राय दोनों संस्कृतियों में समान भी हैं। यही बात कुछ पात्र-प्रकारों के सम्बन्ध में भी कही जा सकती है। यह दूसरी बात है कि मालवा तथा जोर्वे संस्कृतियों की विशिष्ट पात्र-परम्पराएँ परस्पर नितान्त भिन्न हैं।

जोर्वे संस्कृति के स्तरों से धूसर अथवा सलेटी रंग के पात्र भी मिले हैं। यह पात्र-परम्परा दक्षिण भारत की नवपाषाण काल की संस्कृति की अपनी परम्परा है। इस सन्दर्भ में यह उल्लेखनीय है कि दक्षिण भारत की नवपाषाण काल की संस्कृति के धूसर पात्र तथा जोर्वे के धूसर पात्र-प्रकार लगभग समान हैं। जोर्वे की अन्त्येष्टि संस्कार की परम्परा पर भी दक्षिण भारत की नवपाषाण काल की संस्कृति का प्रभाव परिलक्षित होता है।

जोर्वे संस्कृति के सन्दर्भ में उपर्युक्त सभी साक्ष्य एक मिली-जुली संस्कृति का रूप हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं। लेकिन इससे यह नहीं समझ लेना चाहिए कि जोर्वे संस्कृति की अपनी कोई मौलिकता नहीं थी।

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Pankaja Singh

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