इतिहास

महिलाओं और हरिजनों के प्रति गांधी जी के विचार | महिलाओं के विषय में गांधी जी के विचार | हरिजनों के विषय में गांधी जी के विचार | महात्मा गांधी के महिलाओं एवं हरिजनों के प्रति विचार

महिलाओं और हरिजनों के प्रति गांधी जी के विचार | महिलाओं के विषय में गांधी जी के विचार | हरिजनों के विषय में गांधी जी के विचार | महात्मा गांधी के महिलाओं एवं हरिजनों के प्रति विचार

महिलाओं और हरिजनों के प्रति गांधी जी के विचार

महिलाओं के विषय में गांधी जी के विचार-

महिलाओं के उद्धार का आन्दोलन गांधी जी से बहुत पहले ही शुरू हो गया था। राजा राममोहन राय, स्वामी दयानन्द आदि समाज सुधारको और ब्रह्म समाज, आर्य समाज, प्रार्थना समाज आदि संस्थाओं ने स्त्रियों की स्थिति सुधारने के लिए अनेक महत्वपूर्ण कार्य किये थे। सती प्रथा, बहु-विवाह, बाल-विवाह, कन्या-बध आदि कुरीतियों के विरुद्ध कदम उठाये जा चुके थे। स्त्री-शिक्षा शुरू हो गई थी। पर्दा-प्रथा हट गई थी। गांधी जी ने स्त्रियों और पुरुषों के समान अधिकारों पर जोर दिया। उनकी प्रेरणा पर कस्तूरबा, विजयलक्ष्मी पंडित सरोजिनी नायडू, कमला नेहरू, राजकुमारी अमृत कौर आदि ने स्वाधीनता संग्राम में भाग लिया।

गांधी जी स्त्रियों को उपभोग की वस्तु नहीं, अपितु मातृशक्ति पानते थे। स्त्रियां समाज का आधा अंग हैं। अतः वे इस अंग को भी स्वस्थ, सुशिक्षित और समर्थ देखना चाहते थे।

दहेज प्रथा और बाल-विवाह का वह विरोध करते थे, क्योंकि इनका दुष्प्रभाव मुख्य रूप से स्त्रियों पर ही पड़ता है।

उनका विश्वास था कि संसार में शान्ति स्थापना का काम स्त्रियां अधिक अच्छी तरह कर सकती हैं। वह स्त्रियों की स्वेच्छाचारिता के समर्थक नहीं थे, अपितु उन्हें सदाचारिणी देखना चाहते थे।

हरिजनों के विषय में गांधी जी के विचार-

हरिजन उद्धार का कार्य भी गांधी जी से पहले शुरू हो चुका था। राजा राममोहन राय ने जातिभेद के विरुद्ध और स्वामी दयानन्द ने अस्पृश्यता के विरुद्ध जोरदार आन्दोलन किया था। गाँधी जी ने उसी काम को आगे बढ़ाया। गांधी जी का कार्य सामाजिक स्तर पर कम और राजनीतिक स्तर पर अधिक था।

अछूत समझे जाने वाले दलित हिन्दुओं के साथ गांधी जी की गहरी सहानुभूति थी। वह उनकी स्थिति को सुधारना चाहते थे और उन्हे हिन्दू समाज में बराबर का स्थान दिलाना चाहते थे। अछूतों को ‘हरिजन’ नाम गांधी जी ने ही दिया था।

उस समय अस्पृश्य समझे जाने वाले ये हरिजन हिन्दू मन्दिरों में नहीं जा सकते थे, सार्वजनिक कुओं से पानी नहीं भर सकते थे, वे किसी को छू लें, तो वह अपवित्र हुआ माना जाता था, फिर उनके साथ खान-पान की तो चर्चा की क्या? गांधी जी ने उन्हें इन अक्षमताओं से मुक्त कराने का सफल प्रयत्न किया । हरिजनों को मन्दिरों में प्रवेश की छूट दी गई, कुओं से पानी भरने और पाठशालाओं में पढ़ने की सुविधा दी गई और छूआछूत समाप्त की गई।

गांधी जी ने हरिजनों की दशा सुधारने के लिए एक हरिजन सेवक संघ’ बनाया। अपने साप्ताहिक पत्र का नाम ‘हरिजन’ रखा। हरिजनों की शिक्षा का प्रबन्ध किया गया और उन्हें नौकरियां दिलाई गईं।

जब ब्रिटिश सरकार ने कम्यूनल अवार्ड (साम्प्रदायिक निर्णय) द्वारा हरिजनों को पृथक मताधिकार देने की घोषणा की, तब गांधी जी ने उसके विरुद्ध आमरण अनशन शुरू कर दिया। अन्त में वह घोषणा वापस ली गई और हरिजनों को हिन्दू समाज का अंग मानते हुए ही उन्हे विशेष सुविधाएं दी गईं। गांधी जी हरिजनों को सवर्ण हिन्दुओं जितना ही पक्का हिन्दू मानते थे और उनके साथ किसी प्रकार का भेदभाव अनुचित मानते थे। क्योंकि शताब्दियों के शोषण तथा अत्याचारों से हरिजनों की आर्थिक तथा सांस्कृतिक दशा हीन हो गई थी, अतः वे उन्हें विशेष सहानुभूति और सहायता का पात्र मानते थे।

गांधी जी के विचारों का अनुसरण करते हुए स्वाधीन भारत के संविधान में अस्पृश्यता को दंडनीय अपराध बना दिया गया है। अनुसूचित जातियों (हरिजनों) को शिक्षा तथा नौकरियों के मामले में विशेष रियायतें दी गई हैं। ये रियायतें पहले केवल 10 वर्ष के लिए थीं, पर बाद में इन्हें दो बार दस-दस वर्ष के लिए और बढ़ाया गया है। इस प्रकार हरिजन लगभग स्थायी रूप से एक अलग वर्ग बन गये हैं।

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